साईबर क्राईम - सवालों की भूलभुलैया |

ट्विटर या फेसबुक जैसी सोशल मीडिया साईट पर आपको हर तरह के लोग मिल जायेंगे | राजनीतिक कार्यकर्ता, उद्यमी, समाजसेवी, नारीवादी, शिक्षा मनीषी...


ट्विटर या फेसबुक जैसी सोशल मीडिया साईट पर आपको हर तरह के लोग मिल जायेंगे | राजनीतिक कार्यकर्ता, उद्यमी, समाजसेवी, नारीवादी, शिक्षा मनीषी से लेकर धार्मिक कट्टरपंथियों तक | उल्लेखनीय है कि इनमें से कुछ गुमनाम रहकर अपनी छुपी हुई गतिविधियों का संचालन करते हैं तो कुछ अपना नाम चमकाने के लिए इन साईटों का उपयोग करते हैं | दोनों तरह के लोगों में कुछ अनजाने में तो कुछ जानबूझकर क़ानून का उल्लंघन करते हैं | 

बेंगलुरू में 24 वर्षीय मेहदी मसरूर बिस्वास गुमनाम रहकर आतंकवादी ट्विटर एकाउंट shamiwitness का संचालन कर रहा था | उसकी गिरफ्तारी ने नए सवाल पैदा कर दिए हैं | भारतीय कानूनों में क्या उग्रवाद के इस स्वरुप से निबटने की पर्याप्त शक्ति व सामर्थ्य है ? बिना शारीरिक रूप से आतंकी गतिविधियों में संलग्न हुए भी कोई भारतीय नागरिक आतंकवाद समर्थक हो सकता है, यह उग्रवाद का एक नया रूप है?

दिन में आईटीसी समूह का कर्मचारी बिस्वास, रात में आईएस का कार्यकर्ता बन जाता था । बिस्वास के शब्दों में यह उसका केवल शौक था, लेकिन उसके कारण भारतीय हित प्रभावित हुए, साथ साथ भारत की सुरक्षा को भी गंभीर खतरा उत्पन्न हुआ | स्वाभाविक ही आने वाले दिनों में इन मुद्दों पर गंभीर बहस होगी | किन्तु दो बातों पर ध्यान देना प्रासंगिक होगा |

पहला सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66F के तहत कानूनी प्रावधानों की विवादास्पद व्याख्या | कोई व्यक्ति अपने एकाउंट की हैकिंग बताकर क्या स्वयं को बचा सकता है, अपने अपराध की गंभीरता को कम कर सकता है ? मौजूदा संकेतों के मुताबिक बिस्वास के कंप्यूटर नेटवर्क को किसी ने हैक नहीं किया था ।

मोटे तौर पर किसी जानकारी का उपयोग दो समुदायों के बीच घृणा फैलाने के लिए किया जाना इस अधिनियम की धारा के अनुसार आपराधिक व दंडनीय है | लेकिन जो सबसे महत्वपूर्ण बात है कि किसी आतंकवादी संगठन को दिया गया समर्थन वह गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम, 1967 की धारा 39 है ।

भारत में ट्विटर पर दर्जनों विष वमन करने वाले तथा नफरत फैलाने वाले व्यक्ति सक्रिय हैं । बिस्वास पक्षपात का आरोप लगाकर अपने अपराध की गंभीरता कम करने का प्रयास कर सकता है | और इतने लोगों पर एक साथ कोई कानूनी कार्यवाही न तो संभव है, और नही व्यवहारिक | क्योंकि बैसा करने पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मुद्दा उठ जाएगा | 

सवालों की एक ऐसी भूलभुलैया के बीच, भारत की इस नई ऑनलाइन वैश्विक संस्कृति में देश की सुरक्षा के प्रति जिम्मेदारी कैसे सुनिश्चित हो, कैसे एक नया कानूनी ढांचा विकसित हो, इस पर गंभीर चिंतन की आवश्यकता है ।

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