न हाथी बदला लेना भूलता है और ना ही भारतीय (अमर शहीद उधमसिंह जयन्ती पर विशेष)

26 दिसंबर वह ऐतिहासिक दिन है, जिस दिन 1899 में अनन्य राष्ट्रभक्त शेर सिंह का जन्म हुआ था | जी हाँ बचपन में शेर सिंह ही नाम था अमर शहीद ऊ...


26 दिसंबर वह ऐतिहासिक दिन है, जिस दिन 1899 में अनन्य राष्ट्रभक्त शेर सिंह का जन्म हुआ था | जी हाँ बचपन में शेर सिंह ही नाम था अमर शहीद ऊधम सिंह का | दो वर्ष की आयु में माँ और आठ वर्ष की आयु में पिता का देहांत हो जाने के कारण इनकी परवरिश अनाथालय में हुई | अपने बड़े भाई के साथ अमृतसर के अनाथालय में ही उधम सिंह का बचपन गुजरा | दुर्भाग्य ने पीछा नहीं छोड़ा 1917 में बड़े भाई भी भगवान् को प्यारे हो गए | यह वही समय था जब अमृतसर के स्वर्ण मंदिर के नजदीक जलियाँवाला बाग़ में 13 अप्रेल 1919 को जनरल डायर ने निहत्थे, शांत लोगों की जनसभा में गोलियां चलाकर 379 लोगों को मार डाला और हजारों को घायल कर दिया |

तरुण उधमसिंह पर यह दोहरी मार बहुत भारी पडी | एक तरफ भाई की मौत का दुःख तो दूसरी तरफ अपने समाज बंधुओं पर यह जघन्य अत्याचार | उन्होंने जलियाँवाला बाग़ की शहीदी मिट्टी को हाथ में लेकर शपथ ली कि उनके जीवन का अब एक ही उद्देश्य है, बदला, इस जघन्य हत्याकांड का बदला | किन्तु दुर्भाग्य ने अभी भी उनका पीछा नही छोड़ा | जलियाँवाला बाग़ काण्ड का मुख्य अपराधी रैजीनोल्ड डायर १९२८ में अपनी मौत मर गया | इन्हे अपनी प्रतिज्ञा पूरी न कर पाने का बडा दुख हुआ। फिर उधमसिंह ने पंजाब प्रांत के तत्कालीन गवर्नर माइकल ओ डायर को मार डालना तय किया । 

अपने मिशन को अंजाम देने के लिए वे अलग अलग नामों से अफ्रीका, नैरोबी, ब्राजील और अमरीका होते हुए 1934 में लन्दन जा पहुंचे | 9 एल्डर स्ट्रीट कमर्शियल रोड पर रहने की व्यवस्था की, एक कार और छः गोलियों वाली एक रिवाल्वर खरीदी | भारत का यह वीर क्रांतिकारी अब उचित मौके का इंतज़ार करने लगा | उधमसिंह को अपने सेंकडों भाई बहिनों की मौत का बदला लेने का मौक़ा छः साल बाद मिला, 1940 में | 

13 मार्च 1940 को रॉयल सेन्ट्रल एशियन सोसायटी ने जलियाँवाला बाग़ काण्ड को महिमामंडित करने के लिए एक कार्यक्रम आयोजित किया | जलियाँवाला बाग़ काण्ड का मुख्य कर्ताधर्ता माइकल ओ डायर उस कार्यक्रम का मुख्य वक्ता था | उधमसिंह समय से पूर्व ही सभा स्थल पर जा पहुंचे | उन्होंने अपनी रिवाल्वर एक मोटी पुस्तक के पृष्ठों को रिवाल्वर के आकार में काट कर उसमें छिपा ली थी | जैसे ही सभा प्रारम्भ हुई उधमसिंह ने माईकल ओ डायर पर गोलियां दाग दीं | दो गोलियां डायर के सीने में जा धंसी और उसकी मौके पर ही मौत हो गई | 

उधमसिंह ने भागने की कोई कोशिश नहीं की और अपनी गिरफ्तारी दी | 4 जून 1940 को उन्हें ह्त्या का दोषी ठहराकर मृत्युदण्ड दिया गया और 31 जुलाई 1940 को पेटनविले जेल में उन्हें फांसी दे दी गई | 1974 में ब्रिटेन ने उनका अस्थिकलश भारत को सोंपा |


जनरल डायर की मृत्यु और जलियांवाला बागकाण्ड का बदला लेने से भारत की आम जनता अत्यंत खुश हुई । नौजवानों ने जगह जगह सम्मेलनों में उधमसिंह जिन्दाबाद,उधमसिंह अमर रहे के नारे लगाए | किन्तु गांधी जी व नेहरु जी की प्रतिक्रियाएं इसके विपरीत थी। गांधी जी ने अपने समाचार पत्र हरिजन में लिखा था कि मै उधमसिंह के इस कार्य से अत्यन्त दुखी हूं। माइकल ओ डायर से हमारे मतभेद हो सकते है,किन्तु क्या हमें उनकी हत्या कर देना चाहिए? ये हत्या एक पागलपन में किया गया कार्य है और अपराधी पर बहादुरी के अहं का नशा सवार है। मै इस काण्ड पर खेद व्यक्त करता हूं। पं. नेहरु ने कहा कि मुझे हत्या का गहरा दुख है और मै इसे शर्मनाक कृत्य मानता हूं। और मजा देखिये कि इन्ही नेहरु ने १९६२ में पंजाब में भाषण देते समय कहा था कि मै उधम सिंह को नमन करता हूं। उधमसिंह ने फांसी का फन्दा स्वीकार करके हमें आजादी प्रदान की है।केवल सुभाषचन्द्र बोस ने उधमसिंह के इस काण्ड की जमकर तारीफ की थी। उन्होने इस कृत्य को जायज ठहराया और कहा कि इस समय द्वितीय विश्वयुध्द में संलग्र ब्रिटेन की अस्थिरता का हमे फायदा उठाना चाहिए। युध्द के पश्चात अंग्रेज हमे आजादी दे देंगे। जैसा कि गांधी जी व नेहरु सोचते है,गलत है। ऐसा सोचकर हमे चुपचाप नहीं बैठना चाहिए। उन्होने कलकत्ता में आयोजित सम्मेलन में अपने भाषण में कहा कि उधमसिंह ने आजादी का बिगुल बजा दिया है।विदेशों में प्रतिक्रिया- उधमसिंह द्वारा डायर की हत्या की योरोप में अच्छी प्रतिक्रिया हुई। खासकर जर्मनी ने खूब तारीफ की। जर्मनी में बर्लिन से निकलने वाले समाचार पत्रों में इस कृत्य को भारत की स्वतंत्रता की घोषणा कहा। जर्मनी रेडियो ने कहा कि नरसंहार से उत्पीडित व्यक्तियों की आवाज आज गोली की आवाज के रुप में आई है। जिस प्रकार हाथी बदला लेना नहीं भूलते ठीक इसी प्रकार भारतीय लोग भी बदला लेना नहीं भूलते हैं और बीस वर्ष बाद बदला लेकर एक भारतीय ने ये सिध्द कर दिया है। लन्दन टाईम्स ने उधमसिंह को स्वतंत्रता का लडाकू कहा तो दूसरे समाचार पत्र ने उसे निडर व निर्भीक कहा।

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क्रांतिदूत: न हाथी बदला लेना भूलता है और ना ही भारतीय (अमर शहीद उधमसिंह जयन्ती पर विशेष)
न हाथी बदला लेना भूलता है और ना ही भारतीय (अमर शहीद उधमसिंह जयन्ती पर विशेष)
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