कैसे हुई शेख मुजीब की हत्या ?

उपरोक्त चित्र सन 1972 का है जब शेख मुजीबुर्रहमान ढाका पहुंचे थे | जन सैलाब अपने बंगबंधू के स्वागत में उमड़ा हुआ था | केवल 3 वर्ष बाद 15 अ...



उपरोक्त चित्र सन 1972 का है जब शेख मुजीबुर्रहमान ढाका पहुंचे थे | जन सैलाब अपने बंगबंधू के स्वागत में उमड़ा हुआ था | केवल 3 वर्ष बाद 15 अगस्त 1975 को सुबह सबेरे स्थिति एकदम बदल गई | बंगलादेश की सेना ने ही बंगबंधु की नृशंस ह्त्या कर दी | केवल मुजीब को ही नहीं तो उनकी पत्नी और 10 साल के बेटे को भी नहीं बख्शा गया | उनके साले अब्दुरब सर्नियाबत भी खुदागंज का टिकिट कटा गए | हाल ही में मशहूर लेखक सलील त्रिपाठी की पुस्तक प्रकाशित हुई है 'द कर्नल हू वुड नॉट रिपेंट' जिसमें उन्होंने बंगबंधु की ह्त्या का जीवंत चित्रण कुछ इस प्रकार किया है -

शेख़़ मुजीब को अंदाज़ा ही नहीं था कि उनकी हत्या का मिशन शुरू हो चुका था. मेजर फ़ारूक रहमान, मेजर अब्दुर रशीद कुछ अन्य अफ़सरों के साथ अपने अभियान पर निकल चुके थे.

दूसरी तरफ जब बांग्लादेश के सेनाध्यक्ष जनरल शफ़ीउल्ला को ख़बर मिली कि सेना की दो बटालियन बिना किसी आदेश के शहर के बीचोंबीच शेख़ मुजीब के घर की तरफ़ बढ़ रही हैं, तो उन्होंने शेख़़ मुजीब को फ़ोन मिलाया.

फ़ोन लाइन व्यस्त थी. बहुत कोशिशों के बाद उनका शेख़ मुजीब से संपर्क हुआ.शेख़ मुजीब बहुत गुस्से में बोले, तुम्हारी फ़ोर्स ने मेरे घर पर हमला किया है...'शफ़ीउल्ला तोमार फ़ोर्स आमार बॉड़ी अटैक करोछे. तुमि जल्दी फ़ोर्स पठाओ.' वे हलो-हलो-हलो करते रह गए और नेपथ्य में फ़ायरिंग की आवाज़ सुनाई दी.''

पूरे परिवार का हुआ सफाया -
घर में फ़ौज दाखिल हुई | उस समय सबसे आगे चल रहे मोहितुल ने देखा कि शेख़ के बेटे कमाल नीचे दौड़ते हुए चले आ रहे हैं. तभी सैनिकों ने घर के अंदर प्रवेश किया. मेजर बज़लुल हुदा ने कमाल के पैरों पर गोली चलाई. कमाल ने अपने को बचाने की कोशिश करते हुए कहा, ''मैं शेख़ कमाल हूँ. शेख़़ मुजीब का बेटा.''

इतना सुनना था कि सैनिकों ने कमाल पर गोलियों की बौछार शुरू कर दी. फिर मेजर हुदा, नूर और मोहिउद्दीन ने हर कमरे में शेख़ मुजीब को ढूंढना शुरू कर दिया.

मोहिउद्दीन सीढ़ी चढ़ रहे थे कि उन्हें ऊपरी सीढ़ी पर शेख़ मुजीब दिखाई दिए. वो सफ़ेद कुर्ता और सिलेटी रंग की चारख़ाने की लुंगी पहने हुए थे और उनके हाथ में पाइप था.

एंटनी मेसक्रनहस अपनी किताब 'बांग्लादेश ए लिगेसी ऑफ़ ब्लड' में लिखते हैं, "हालांकि मोहिउद्दीन शेख़़ मुजीब को मारने निकले थे लेकिन उनको देखते ही वो नर्वस हो गए. उनके मुंह से सिर्फ़ इतना ही निकला, सर आपनी आशुन...सर आप आइए. मुजीब ने चिल्ला कर कहा, क्या चाहते हो? क्या तुम मुझे मारने आए हो? भूल जाओ. पाकिस्तान की सेना ऐसा नहीं कर पाई. तुम किस खेत की मूली हो?''

मुजीब के व्यक्तित्व का ऐसा असर था कि मोहिउद्दीन हकलाने लगे थे...और बार-बार यही दोहरा रहे थे... सर आपनी आशुन. तभी स्टेन गन लिए मेजर नूर ने प्रवेश किया. उन्हें लगा कि मुजीब, मोहिउद्दीन को बातों में लगा कर समय बचा रहे हैं.
नूर ने मोहिउद्दीन को धक्का देते हुए अपने पीछे लिया और मुजीब पर अपनी पूरी स्टेन गन खाली कर दी.
मुजीब मुंह के बल गिरे और नीचे गिरते चले गए. उनका फ़ेवरेट पाइप अभी भी उनके हाथ में था.
सलील त्रिपाठी अपनी किताब 'द कर्नल हू वुड नॉट रिपेंट' में लिखते हैं कि शेख़ का नौकर रामा दौड़ता हुआ मुजीब की पत्नी फ़ज़ीलातुन्निसा के पास गया और उन्हें बताया कि शेख़ मुजीब को गोली मार दी गई है. इस बीच सैनिक भी उस कमरे में आ पहुंचे. उन्होंने दरवाज़े पर गोली चलानी शुरू कर दी.
फ़ज़ीलातुन्निसा ने ख़ुद दरवाज़ा खोला और कहा, ’अगर हमें मरना है तो हम सब साथ मरेंगें.’ सैनिकों ने कमरे में मौजूद सब लोगों को इकट्ठा कर सीढ़ी से नीचे उतरने के लिए कहा. जब फ़ज़ीलातुन्निसा ने शेख़़ के मृत शरीर को देखा तो उन्होंने आगे जाने से इनकार कर दिया और कहा, ’ मैं आगे नहीं जाउंगी. मुझे यहीं गोली मारो.’ सैनिक उन्हें वापस उनके कमरे में ले गए और रिसालदार मुस्लेमुद्दीन और मेजर अज़ीज़ पाशा ने उन पर गोली चलानी शुरू कर दी. देखते-देखते कमरे में मौजूद सब लोग मारे गए.
कुछ सैनिक शेख़ मुजीब के 10 साल के बेटे रसेल मुजीब को नीचे ले आए.
सलील त्रिपाठी लिखते हैं कि रसेल ने मोहितुल से पूछा, ’भय्या क्या ये लोग मुझे भी मार देंगे?’ रसेल ने एक सिपाही से कहा वो अपनी माँ के पास जाना चाहते हैं. मेजर पाशा ने उस सैनिक से कहा, ’इसे इसकी माँ के पास पहुंचा दो.’
वो सैनिक मुस्कराया. वो रसेल को पहली मंज़िल पर ले गया, जहाँ उनकी माँ का शव पड़ा हुआ था. स्टेन गन का एक और बर्स्ट सुनाई दिया और रसेल का शव भी अपना माँ के पास जा गिरा. तभी एक जीप शेख़ मुजीब के घर के सामने आ कर रुकी और उसमें से मेजर फ़ारूक रहमान बाहर आए. मेजर हुदा ने उनके कान में फुसफुसाया, ‘सब ख़त्म हो गए.’

हत्यारों को फांसी -
1997 में शेख़ हसीना सत्ता में आईं तो फ़ारूक रहमान और उनके पांच साथियों को शेख़ मुजीब की हत्या के आरोप में गिरफ़्तार किया गया.
कई साल मुक़दमा चलने के बाद उन्हें 27 जनवरी 2010 को फाँसी दे दी गई.
सबसे पहले बज़लुल हुदा को फाँसी के फंदे पर ले जाया गया. जेल के एक अधिकारी ने लाल रुमाल गिराया और जल्लाद ने फाँसी का फंदा खींच दिया.
इसके बाद मोहिउद्दीन, फ़ारूक, शहरयार और एकेएम मोहिउद्दीन की बारी आई. शेख़़ मुजीब की बेटी हसीना वाजेद को इन फांसियों की सूचना दी गई.
उन्होंने कहा कि उन्हें अकेला छोड़ दिया जाए. कुछ समय बाद उन्होंने शुकराने की नमाज़ पढ़ी.

बांग्लादेश, शेख़ हसीना, शेख़ रेहाना

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कैसे हुई शेख मुजीब की हत्या ?
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