भिखारी सम्राट, राष्ट्र शिक्षक, भारत रत्न, महामना प. मदनमोहन मालवीय

पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने 25 दिसंबर 1861 को अपने जन्म से लेकर 12 नवम्बर 1946 को अपने महाप्रयाण तक संघर्षशीलता, स्वदेशी चिंतन व राष्ट्रीय...


पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने 25 दिसंबर 1861 को अपने जन्म से लेकर 12 नवम्बर 1946 को अपने महाप्रयाण तक संघर्षशीलता, स्वदेशी चिंतन व राष्ट्रीयता को बल देने का काम किया | जिस कांग्रेस को जन्म देने वाले एक सेवानिवृत्त अंग्रेज अधिकारी ए.ओ.ह्यूम थे, उसी कांग्रेस में मालवीय जी जैसे लोगों के प्रवेश के बाद उस संस्था की अंग्रेजियत धीरे-धीरे कम होती गई और भारतीयता बढ़ती गई। जहां प्रारंभ में कांग्रेस अधिवेशनों का प्रारम्भ सम्राट की सुख-समृद्धि की कामना के गीत से होता था, वहां मालवीय जी के आने के बाद उसमें ‘वन्देमातम्’ का गान होने लगा । अपनी प्राचीन संस्कृति की ओर कांग्रेस का सदा ध्यान रहे, मालवीय जी इसके लिए प्रयत्न शील रहते थे। कांग्रेस की अंग्रेजियत पर मालवीय जी बहुत अंशों में अंकुश लगाने में सफल हो गए थे।

इस संबंध में पण्डित नेहरु ने एक स्थान पर लिखा है-मालवीय जी ने अपना सारा वजन हिन्दुस्तानियत पर, भारतीयता पर डाला और तराजू के पलड़े को कुछ बराबर किया । उस समय भी बहुत सारे लोग थे, बड़े विद्वान लोग थे, संस्कृति के बड़े पण्डित लोग भी थे, पर जहां तक मेरा विचार है, राजनैतिक नेताओं में बड़े नेताओं में मालवीय जी ही शायद इस मामले में सबसे आगे थे। वे रोकते थे अंग्रेजियत की बाढ़ को, पर विरोध करके नहीं बल्कि अपने काम से, अपने विचारों से और कोशिश करते थे अपनी संस्कृति को बढ़ाने की।’’
आजकल के नवयुवक मालवीय जी के जीवन से बहुत कुछ सीख सकते हैं। मनुष्य अपने सम्मुख एक लक्ष्य निर्धारित करे, एक उद्देश्य निर्धारित करे और फिर उसके लिए काम करना आरंभ कर प्राण पण से लग जाए तथा जब तक सिद्धि प्राप्त न हो जाए तब तक कार्य में लगा रहे। इसी का प्रगटीकरण उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना के अपने लक्ष्य और अपने उद्देश्य के लिए किया। 
मालवीय जी ने राजनीति में भी इसी प्रकार अपना लक्ष्य निर्धारित किया और उस ओर चल पड़े। किन्तु एकाकी नहीं अपितु सब को साथ लेकर। केवल स्वयं आगे बढ़ जाना नेतृत्व की कसौटी नहीं है। अपितु सबको साथ लेकर चलना ही श्रेष्ठता की कसौटी है। मालवीय जी ने पुरानी और नई पीढी में सामंजस्य स्थापित किया, इस प्रकार दोनों पीढ़ियों का उन्होंने दिशा निर्देशन किया। वे 1909, 1918, 1932 तथा 1933 में कांग्रेस के अध्यक्ष रहे |
मालवीय जी न केवल स्वयं सम्मान से जिए अपितु उन्होंने अपने देशवासियों को सम्मानित जीवन की कला सिखाई। मालवीय जी ने कभी स्वार्थ अथवा अपने परिवार आदि के लिए अपने नेतृत्व और वकृत्व का दुरुपयोग नहीं किया। सन १८९२ में अलाहाबाद उच्च न्यायालय के एडवोकेट हुए। थोड़े ही समय में वे प्रसिद्ध वकील बन गए। असाधारण बुद्धिमत्ता, भाषणशक्ति, धैर्य तथा खूब काम करने की शक्ति उन्हें ईश्वरीय देन थी। वे यदि चाहते तो अपनी वकालत से ही भारत के धन कुबेरों में से एक हो सकते थे। उनका जो परिवार तिल-तिल और कण कण के लिए संघर्षरत रहा वह सम्पदा में लोट-पोट हो सकता था। किन्तु अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने अपनी चलती हुई वकालत को ठुकराया और कर्मक्षेत्र में उतरे। 

मालवीय जी की महानता और स्वतंत्र भारत की बेशर्मी का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा, कि उनकी पौत्री आज वृद्धाश्रम में रहने को विवश है |



वृद्धाश्रम के कर्मचारी कृष्णा का कहना है कि पिछले पांच साल से विजया यहां रह रही हैं। उनके परिजन उन्हें यहां छोड़ने आए थे।हालांकि उनका भरा-पूरा परिवार है लेकिन उस समय विजया का कहना था कि वे किसी पर बोझ नहीं बनना चाहती, इसी कारण यहां रहने आई हैं। सरकार की ओर से किसी प्रकार की सहायता के सवाल पर भी उन्होंने कहा कि मैंने पहले ही स्पष्ट कर दिया कि मैं किसी की सहायता पर नहीं जीना चाहती। इस आश्रम में मेरी उम्र के लोग हैं, जो मेरे साथी हैं। बस इतना मेरे लिए काफी है, किसी की सहायता मुझे नहीं चाहिए।
पंडित मालवीय पौत्री विजया ने कांग्रेस सरकार में उनके दादा को भारत रत्न नहीं दिए जाने पर कहा कि कांग्रेस तो आजादी के समय तक ही थी। अब कांग्रेस कहां है, देश को आगे ले जाने की विचारधारा कभी कांग्रेस की होती थी। अब वो कांग्रेस कहां बची है। वो समय और था जब कांग्रेस के नाम पर लोग बिना कुछ सोचे-समझे मरने मिटने को चल देते थे। अब तो सिर्फ कहने के लिए कांग्रेस है। शायद यही वजह है कि कांग्रेस का ये हाल है।
मालवीय जी राष्ट्र के शिक्षक -

भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में मालवीयजी अदृश्य नींव की भांति थे। गांधीजी जिस प्रकार ’’राष्ट्र के पिता हैं‘‘ उसी प्रकार मालवीयजी ’’राष्ट्र के शिक्षक हैं।‘‘ भारत सरकार ने कलकत्ता, मुंबई और मद्रास में सन १८५७ में विश्वविद्यालयों की स्थापना की। ये विश्वविद्यालय अंग्रेजी विश्वविद्यालयों के आदर्शों के आधार का अनुकरण करने वाले थी। अनेक भारतीय अंग्रेजी भाषा, रीति-रिवाज और संस्कृति पर गर्व करने लगे थे। यह भावना बढ रही थी कि भारतीय सब कुछ तुच्छ है। मालवीयजी राष्ट्रप्रेमी थे, अतः इस बात के अधिक इच्छुक थे कि भारतीय संस्कृति उचित सम्मान पाए और शिक्षित लोग इस संस्कृति को समझें। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने वाराणसी में एक विश्वविद्यालय स्थापित करने की योजना बनाई ।
विश्वविद्यालय की स्थापना क्या सरल काम है? एक पाठशाला की स्थापना और उसका संचालन ही तो कठिन है। फिर विश्वविद्यालय का प्रारंभ करना तब कितना कठिन काम होना चाहिए? और वह भी तब जबकि अकेला आदमी प्रयत्न करता है। किंतु ज्ञान की देवी के इस उपासक ने एकबारगी ही सदा के लिए निश्चय कर लिया था। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का इक्कीसवां अधिवेशन बनारस में हुआ था। गोपाल कृष्ण गोखले उसके मान्य अध्यक्ष थे। पंडित मालवीयजी ने इस अवसर का लाभ उठाया। उन्होंने कांग्रेस के ज्येष्ठ नेताओं को इकट्ठा किया और बनारस में विश्वविद्यालय स्थापित करने की अपनी तीव्र इच्छा के बारे में उनसे कहा। प्रारम्भ में तो लोगों को भरोसा ही नहीं हुआ | गोपाल कृष्ण गोखले ने तो यहाँ तक कहा कि “हेव यू विकम मेड ?” तो सर सुन्दरलाल ने उनकी परिकल्पना को मजाकिया लहजे में टॉय यूनिवार्शिटी कहां | किन्तु अधिकाँश नेताओं ने हृदय से इस कल्पना का स्वागत किया। प्रसिद्ध नेता सुनेन्द्रनाथ बैनर्जी खडे हुए और बोले-’’मैं बनारस हिन्दू युनिवर्सिटी में तब तक निःशुल्क अंग्रेजी के प्रोफेसर के रूप में काम करूंगा जब तक कि कोई उपयुक्त विद्वान नहीं मिल जाता।‘‘

भिखारी सम्राट -
आज जहाँ बनारस हिन्दू युनिवर्सिटी है, वह जमीन प्राप्त करने के लिए मालवीयजी ने निश्चय कर रखा था। वह जमीन बनारस के राजा की थी। राजा ने कहा-’’मैं आपको जितना चाहे उतना रूपया देने को तैयार हूँ लेकिन आप उस जमीन को न मांगे। मेरा उस जमीन से बहुत लगाव है।‘‘ किंतु ईश्वर की कृपा से मालवीयजी ने मकर संक्रांति के पावन दिन दान के रूप में उसी जमीन को प्राप्त कर लिया।
फिर अर्थ का प्रश्न उपस्थित हुआ। मालवीयजी ने सारे देश के दौरे का काम हाथ में लिया। उन्होंने हिन्दू विश्वविद्यालय के लिए आर्थिक सहायता प्राप्त करना प्रारंभ किया। जैसे जैसे उनका दौरा आगे बढ़ता था, वैसे वैसे उनकी झोली भी भरनी प्रारंभ हुई। अपने अर्थ-संग्रह के दौरान मालवीयजी हैदराबाद पहुंचे। उस समय निजाम वहां के शासक थे। निजाम को उनके आने के कारण का पता चला। किंतु मुसलमान होने के कारण हिन्दू विश्वविद्यालय नामक संस्था को वे दान में धनराशि नहीं देना चाहते थे। उन्होंने अपना निर्णय स्पष्ट रूप में मालवीयजी तक पहुँचा दिया। किंतु मालवीयजी निजाम से बिना कुछ लिये लौटना नहीं चाहते थे। उसी दिन हैदराबाद में एक हिन्दू धनी का स्वर्गवास हो गया। उसकी अर्थी बडी धूम-धाम से ले जाई जा रही थी, उसके प्रशंसक उसके मृत शरीर पर से पैसा बरसा रहे थे। यह देखकर मालवीयजी ने वह पैसा बटोरना शुरू किया और उसे एक थैली में इकट्ठा करने लगे। जिन लोगों ने यह देखा, तो आश्चर्य करने लगे। उन्होंने मालवीयजी की इस क्रिया में हिस्सा बंटाना शुरू किया। वे भी रूपयों को बटोर कर मालवीयजी की थैली में डालने लगे। इस प्रकार थैली भर गई। निजाम ने ये समाचार सुने। उसे इस घटना से थोडी शर्म महसूस हुइ। इस पर निजाम ने उदारतापूर्वक दान दिया और उससे उसे बडा सन्तोष मिला |
मालवीयजी ने अनेकों बार देश की चारों दिशाओं का दौरा किया। वे हिमाचल से कन्याकुमारी और पेशावर से ब्रह्यदेश गए। जहां कहीं भी वे गए, उन्हें इस महान कार्य के लिए बहुत रूपये मिले। एक बार मालवीयजी ने दरभंगा में श्रीमद्भागवत का प्रवचन किया। दरभंगा के महाराजा समाप्ति के दिन उपस्थित हुए थे। जब महाराजा ने मालवीयजी का असाधारण भाषण सुना तो अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने न केवल पच्चीस लाख रूपये बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय को दान में दिए, वरन् अपने जीवन की अंतिम घड़ी तक इस महान कार्य में सहयोग देने का वचन दिया। मालवीयजी इससे अत्यंत प्रभावित हुए और उनकी आंखों से आनंद के आंसू बहने लगे। दरभंगा के महाराजा ने अपने वचनों को पूरा किया। मालवीयजी के साथ वे अनेक रियासतों में घूमे और विश्वविद्यालय के लिए उन्होंने खूब धन इकट्ठा किया। पंडित मालवीयजी ने देश का दौरा करके एक करोड़ चौंतीस लाख रूपये इकट्ठे किये और ’’भिखमंगों के सम्राट‘‘ की उपाधि प्राप्त की। एक बार गांधीजी ने कहा था कि ’’मांगने की कला उन्होंने अपने बड़े भाई मालवीयजी से सीखी है।‘‘
4 फरवरी 1916 को वसंत पंचमी का शुभ दिन था। बनारस में उत्सव की सी धूम धाम थी। पवित्र गंगा के किनारे भारत के तत्कालीन वायसराय और गर्वनर जनरल लार्ड हार्डिग्ज द्वारा हिन्दू विश्वविद्यालय का शिलान्यास किया गया। मालवीयजी का दृष्टिकोण था कि वेद, उपनिषद, गीता, महाभारत, रामायण आदि पवित्र ग्रन्थों का तथा भारतीय संस्कृति के संस्कार डाले जाने और संस्कृत भाषा के अध्ययन का महत्व है। उन्होंने जीवन के इन आदर्शो की पूर्ति के लिए विश्वविद्यालय की स्थापना की थी और यह उनके जीवन की सांस बन गई थी।
आदर्श पत्रकार –
पत्रकारिता के क्षेत्र में भी मालवीय जी की सेवाएँ कम नहीं थी। जब उन्होंने ’’दि हिन्दुस्तान‘‘ का संपादन-भार सम्हाला तो उन्होंने पत्र के मालिक राजा रामपालसिंह से कहा था-’’मेरे संपादकीय कार्य में जरा भी हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। मुझे पूर्ण स्वतंत्रता रहनी चाहिए।‘‘ चूंकि राजासाहब ने इस शर्त को स्वीकार किया और मालवीयजी को पूरी स्वतंत्रता दी। इसीलिए मालवीयजी ने संपादन की भारी जिम्मेवारी को स्वीकार किया। पत्रकारिता के क्षेत्र में उन दिनों पं. प्रतापनारायण मिश्र और श्री बालमुकुन्द गुप्त बड़े निर्भीक माने जाते थे। मालवीयजी ने इन पराक्रमी पत्रकारों से निकट की मित्रता प्राप्त की।
मालवीयजी अनेक छोटे पत्रों के मार्गदर्शक थे। दिल्ली से प्रकाशित होने वाला एक साप्ताहिक ’’गोपाल‘‘ था। वह इनकी संरक्षण में था। उसी तरह ये ’’अभ्युदय‘‘ के चालक प्राण थे जिसका संपादन बाबू पुरुषोत्तम दासजी टंडन करते थे। मालवीयजी यह कहा करते थे पत्रकार को आदर्श होना चाहिए। उसे स्वाभिमानी होना चाहिए। और उसमें सम्मान की भावना होनी चाहिए। उसका महत्व होना चाहिए और उसमें जिम्मेवारी की भावना होनी चाहिए। वह चारित्र्यवान हो और सत्य और न्याय का पालन करने वाला हो। मालवीयजी में एक अच्छे पत्रकार के सभी गुण मौजूद थे। मालवीयजी ने दिल्ली का ’’दि हिन्दुस्तान टाइम्स‘‘ खरीद लिया और उसका बहुत वर्षों तक सफल संचालन किया। जब उनका समय अन्य कामों में लगने लगा तो उन्होंने यह पत्र एक संगठन को सौंप दिया। दिल्ली से प्रकाशित होने वाले ’’दि हिन्दुस्तान टाइम्स‘‘ और ’’दि हिन्दुस्तान‘‘ उन्हीं की प्रेरणा के फल हैं।
मालवीय जी के ओजस्वी विचार –
जब उनसे पूछा गया कि उन हिन्दुओं को कैसे पुनः हिन्दू बनाया जा सकता है कि जिन्हें मुसलमानी धर्म स्वीकार करना पड़ा तो वे बोले-राम नाम और गंगाजल ये दोनों पर्याप्त हैं। हिन्दुओं को संगठित करने के लिए उन्होंने अथक परिश्रम किया | उन्होंने घोषणा की यदि ’’हरिजनों‘‘ की उन्नति नहीं की जाती है तो भारत कभी तरक्की नहीं कर सकता। पिछड़ी जातियों, गरीबों, विधवा युवतियों तथा अशिक्षित ग्रामीणों को ऊपर उठाने के उपायों के बारे में वे हमेशा चिन्तन करते रहते थे।
अन्न के व्यापारी इस हिन्दुस्तान के गाँव का अनाज खींचकर अपने स्वार्थ के लिए विलायत भेजते हैं, इसके कारण इस देश में जहां अन्न बहुतायत से होता है, बारह महीने अकाल का सा भाव छाया रहता है | इसलिए अन्न का बाहर जाना बंद करना प्रजा की प्राणरक्षा के लिए पहली आवश्यकता है (अभ्युदय 27 अक्टूबर 1905)
गवर्नमेंट सेना पर इतना व्यय करती है, इसका आधा भी अगर प्रजा को विद्या पढ़ाने और उसकी सुख संपत्ति तथा पौरुष बढाने में खर्च की जाए तो देश का दुःख दारिद्र्य और दुर्बलता मिट जाए, किन्तु इसकी क्या आशा की जाए ? (अभ्युदय 23 मार्च 1907)


हिन्दुस्तान में अब केवल हिन्दू ही नहीं बसते हैं – हिन्दुस्तान अब केवल उनका ही देश नहीं है | हिन्दुस्तान जैसे हिन्दुओं का प्यारा जन्मस्थान है, वैसा ही मुसलामानों का भी है | ये दोनों जातियां अब यहाँ बसती हैं, और सदा बसी रहेंगी | जितनी इन दोनों में मेल और एकता बढ़ेगी, उतनी ही देश की उन्नति में हमारी शक्ति बढ़ेगी और उनमें जितना वैर, विरोध या अनेकता रहेगी, उतना ही हम दुर्बल रहेंगे | जब ये दोनों एकता के साथ उन्नति की कोशिश करेंगे तभी देश की उन्नति होगी | (अभ्युदय 26 फरवरी 1908)

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