कितना बड़ा मजाक - प्रजातांत्रिक भारत में वंशवादी कांग्रेस |

यह काफी हद तक स्पष्ट है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और उनकी नाराज की कहानी केवल और केवल पार्टी में उनकी पदोन्नति के लिए जमीन तैयार...


यह काफी हद तक स्पष्ट है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और उनकी नाराज की कहानी केवल और केवल पार्टी में उनकी पदोन्नति के लिए जमीन तैयार करने का प्रयत्न है। परोक्ष रूप से कहानी का समर्थन करते हुए लगभग हमेशा राहुल के पक्ष में बोलने वाले वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने स्वीकार किया है कि राहुल पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र को बढ़ावा देने की लड़ाई अकेले लड़ रहे थे और परिस्थिति से असहज थे ।
इकोनोमिक्स टाइम्स के अनुसार बैंगलोर में होने वाली आगामी अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में राहुल का राजकुमार से राजा बनना तय है, साथ ही न वह हताश है और न उदास | उनका प्रयत्न भावी उत्तरदायित्व के लिए स्वयं को तैयार करना है | एक राजवंश में इसके अतिरिक्त हो भी क्या सकता है । राहुल के बचपने पर ध्यान मत दीजिये | ऐसे समय में जब कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम और उसमें मोदी सरकार द्वारा किये जाने वाले परिवर्तन के प्रयत्न के खिलाफ एक सक्षम विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करने की उनसे अपेक्षा की गई थी वे दिल्ली से दूर हैं | इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
अधिकांशतः गांधी परिवार में अगली पीढ़ी के लिए सत्ता हस्तांतरण की पटकथा बफादार लिखते रहे हैं | याद कीजिए 1966 में प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की आकस्मिक मृत्यु के बाद किस प्रकार कामराज के नेतृत्व में वरिष्ठ वफादारों की फ़ौज ने मोरारजी देसाई के स्थान पर कांग्रेस संसदीय दल के नेता के रूप में इंदिरा गांधी को चुना था । आज कामराज की भूमिका में दिग्विजयसिंह हैं |राजीव की हत्या के बाद पार्टी के पास पीवी नरसिंह राव के नेतृत्व में प्रजातंत्रीय व्यवस्था लागू करने का एक अवसर आया था | किन्तु 1998 में माधव राव सिंधिया, नारायण दत्त तिवारी और राजेश पायलट जैसे नेताओं ने ऎसी ही नौटंकी की | त्यागमूर्ति के रूप में सोनिया गांधी को सामने लाया गया, प्रचारित किया गया कि वे किसी पद के प्रति अनिच्छुक हैं | और वे आज सबसे लम्बे तक रहने वाली कांग्रेस अध्यक्ष हैं | भले ही विदेशी मूल के मुद्दे के चलते वे प्रधान मंत्री न बन सकी हों, किन्तु कठपुतली प्रधान मंत्री सामने रखकर सत्ता की चाबी उनके ही हाथ में रही, यह सब जानते हैं |
कांग्रेस आज हताशा के दौर में है और वफादारों की वर्तमान फ़ौज की नजर राजवंश की अगली पीढ़ी पर है। दिग्विजय सिंह जो राहुल समर्थन में चल रहे कोरस का दृश्य चेहरा है, निश्चित रूप से सफल होंगे । जब इंदिरा गांधी नेता बनीं थीं, तब भी उनके विरोध में कुछ नेता अलग हुए थे और सोनिया जी के समय भी शरद पंवार ने पार्टी में विभाजन का नेतृत्व किया था | किन्तु इस प्रकार के विभाजनों का कांग्रेस के ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ा था | और आज भी अगर कोई छुटपुट विरोध के स्वर उठे तो वे नक्कारखाने में तूती कि आवाज से अधिक नहीं होंगे | कांग्रेस एक राजवंशीय पार्टी है और रहेगी | आखिर दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे बरिष्ठ नेताओं के होते वह इससे अधिक कुछ हो भी कैसे सकती है | 
नर्वस नेताओं की शक्ति केवल चाटुकारिता ही है | ऐसे ही लोग अब राहुल के लिए मंच तैयार कर रहे हैं । राहुल परिवर्तन के बड़े बड़े दावे करते रहते है, लेकिन उनकी शाब्दिक झाडपोंछ के पीछे वफादारों की अनिवार्य भूमिका होती है | परिवारवाद के सबसे बड़े प्रतीक राहुल युवा कांग्रेस और कांग्रेस संगठन में प्रजातांत्रिक व्यवस्था लागू करने की बात करते हैं, इससे बड़ा मजाक क्या होगा ? 


तमिलनाडु की पूर्व कांग्रेस नेता जयंती नटराजन ने पार्टी से इस्तीफा देते समय रेखांकित भी किया कि कांग्रेस केवल मां-बेटे की पार्टी है और इसीलिए अपने न्यूनतम स्तर पर पहुंची है। हैरत की बात है कि कांग्रेस अभी भी अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए एक वंश पर ही आश्रित है । राहुल असफल हो जाएँ तो ये लोग उनकी बहन प्रियंका गांधी या उनके बाद उनके बच्चों को सर माथे पर बैठाएंगे | लोकतान्त्रिक भारत में कांग्रेस जैसी वंशवादी पार्टी का होना अपने आप में सबसे बड़ा विरोधाभाष है |

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क्रांतिदूत: कितना बड़ा मजाक - प्रजातांत्रिक भारत में वंशवादी कांग्रेस |
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