नारद भक्ति सूत्र की व्याख्या - आचार्य रजनीश द्वारा

“भक्ति के प्राप्त होने पर मनुष्य न किसी वस्तु की इच्छा करता है, न द्वेष करता है, न आसक्त होता है, और न उसे विषय- भोगों में उत्साह होता ह...


“भक्ति के प्राप्त होने पर मनुष्य न किसी वस्तु की इच्छा करता है, न द्वेष करता है, न आसक्त होता है, और न उसे विषय- भोगों में उत्साह होता है।”

“यज्ज्ञात्वा उन्मतो भवति, स्तब्धो भवति, आत्मारामो भवति!”

“उस भक्ति को जानकर मनुष्य उन्मत्त हो जाता है, स्तब्ध हो जाता है, और आत्माराम हो जाता है।”

उन्मत्त हो जाता है! पागल हो जाता है!

कहते हैं, मीरा एक मंदिर में गयी। उस मंदिर में रिवाज था कि कोई स्त्री प्रवेश न कर सकेगी। बहुत-से मंदिर स्त्रियों के लिए बंद रहे : डरपोकों ने बनवाये होंगे, कायरों ने बनवाये होंगे, व्यभिचारियों ने बनवाये होंगे।

उस मंदिर का जो पुजारी था, वह बाल-ब्रह्मचारी था। और दूर-दूर तक उसकी ख्याति थी। ख्याति उसकी यही थी कि स्त्रियों को वह देखता भी नहीं, मंदिर से बाहर निकलता नहीं। मीरा उस द्वार पर पहुंच गयी। कृष्ण का मंदिर था, वह नाचने लगी। वह भीतर प्रवेश करने लगी। उसे रोका गया। पुजारी घबड़ाया हुआ आया। उसने कहा कि सुनो, वहां स्त्रियों का प्रवेश नहीं है।
मीरा ने गौर से उस पुजारी को देखा और उसने कहा, “मैंने तो सोचा था कि एक ही पुरुष है। तो दो हैं पुरुष, तुम भी एक पुरुष हो, मैंने तो कृष्ण को ही जाना कि एक पुरुष है, बाकी तो सब प्रकृति है। पुरुष तो एक ही है, बाकी तो सब गोपियां हैं। और कृष्ण के मंदिर में इतने दिन रहकर तुम क्या करते रहे, अभी भी तुम पुरुष हो, तुम्हें मेरी स्त्री दिखायी पड़ती है, लेकिन मुझे तुम्हारा “पुरुष “ दिखायी नहीं पड़ता। रास्ता दो!” उस दिन जैसे किसी ने नींद से जगाया उस पुजारी को! रास्ता दे दिया। आंखें आंसुओ से भर गयी, पश्चाताप से भर गयीं। यह अब तक का समय व्यर्थ गंवाया!… किसको रोक रहा था, अब मीरा क्या लोक-लाज रखे, उसे कोई पुरुष दिखायी नहीं पड़ता। तो घूंघट सरक गया है, कपड़ों का हिसाब नहीं रहा है, रास्तों पर नाच रही है!

भक्त उन्मत्त हो जाता है–होगा ही।

ऐसा समझो कि छोटी प्याली में सागर समा जाए तो प्याली पागल न होगी तो और क्या होगी, बूंद में सागर उतर आये तो बूंद कहां हिसाब रख पाएगी, और बूंदों की दुनिया के नियम कैसे बचेंगे, फिर तो सागर की उन्मत्तता होगी। फिर तो सागर की उन्मत्त लहरें होंगी। 

हम उसे देखा किये जब तक हमें गफलत रही,
पड़ गया आंखों पर परदा होश आ जाने के बाद। 

भक्ति परमात्मा को खोजने की कला नहीं है, अपने को खोने की कला है। खोजने में तो अहंकार बना ही रखता है। खोजने वाला बना रहता है। खोना है अपने को। और जिसने अपने को खोया उसने उसे पाया। अपने भीतर ही नहीं फिर, फिर सब तरफ वही मालूम पड़ता है। फिर हर पत्ती में उसी की हरियाली है। हर हवा के झोंके में उसी की ताजगी है। चांदतारों में वही तुम्हारी तरफ झांकता है और तुम्हारे भीतर भी वही चांदत्तारों की तरफ झांकता है।

आंखें खोलो! थोड़ा हृदय को अपने से ऊपर जाने की सुविधा दो। काम को प्रेम बनाओ। प्रेम को भक्ति बनने दो।

परमात्मा से पहले तृप्त होना ही मत।

पीड़ा होगी बहुत। विरह होगा बहुत। बहुत आंसू पड़ेंगे मार्ग से। पर घबड़ाना मत। क्योंकि जो मिलनेवाला है उसका कोई भी मूल्य नहीं है। हम कुछ भी करें, जिस दिन मिलेगा उस दिन हम जानेंगे, जो हमने किया था वह ना-कुछ था।

तुम्हारे एक-एक आंसू पर हजार-हजार फूल खिलेंगे। और तुम्हारी एक-एक पीड़ा हजार-हजार मंदिरों का द्वार बन जाएगी। घबड़ाना मत। जहां भक्तों के पैर पड़े, वहां काबा बन जाता हैं।

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