वाह नर्मदापुर (होशंगावाद )

देश भर में संघ कार्य को गति देने तथा प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण योगदान उसके स्वयंसेवकों का ही रहा है | अनेकानेक कठिनाईयों और विपरीत ...



देश भर में संघ कार्य को गति देने तथा प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण योगदान उसके स्वयंसेवकों का ही रहा है | अनेकानेक कठिनाईयों और विपरीत परिस्थितियों में से मार्ग निकालकर स्वयंसेवकों ने संघ की विचार गंगा को प्रवाहित रखा है | नर्मदापुर (होशंगावाद) में भी आदर्श स्वयंसेवक हुए हैं | प्रस्तुत हैं उनके कुछ संस्मरण -

प्रेरक व्यक्तित्व डा. राधामोहन सेठा –

· होशंगावाद प्रवास के अवसर पर प.पू. गुरूजी केकरे जी के घर पर रुके ! केकरे जी ने उनसे परिचय कराने की द्रष्टि से नगर के प्रसिद्ध डाक्टर राधामोहन सेठा को भी बुलाया था ! तब तक श्री सेठा स्वयंसेवक नहीं बने थे ! गुरूजी की गुण ग्राह्य दृष्टि ने उनके अंदर की उपयोगिता को पहचाना तथा श्री गुरूजी ने सेठा जी से जिला संघ चालक दायित्व स्वीकार करने का आग्रह किया ! सेठा जी ने विनम्रता से अपनी व्यस्तता तथा समय ना होने की बात रखी, इस पर गुरू जी ने कहा की बही व्यक्ति काम कर सकता है जो समय की कीमत जानता हो ! आप प्रयत्न कीजिए और सफलता निश्चित मिलेगी ! समय ने सिद्ध किया की गुरूजी की बात कितनी सत्य थी ! डाक्टर सेठा ना केवल जिला संघ चालक वरन आगे चलकर विभाग संघ चालक भी बने ! एक आदर्श स्वयंसेवक के रूप में भी उन्होंने स्वयं को ढाला और संघ कार्य अत्यंत निष्ठा और प्रामाणिकता से किया ! 

· एक बार प.पू.गुरूजी ने डाक्टर सेठा जी से कहा की अपनी आय का दसवां भाग समाज कार्य में लगाना चाहिये, इससे अपनी आय शुद्ध होती है ! डाक्टर साहब ने कहा की एकदम इतनी राशि निकालना तो कठिन है ! गुरू जी ने सुझाव दिया की यदि प्रतिदिन की आय का दसवां हिस्सा निकाला जाए, तो आसानी से संभव हो सकता है ! सेठाजी ने गुरूजी के इस सुझाव का जीवन पर्यन्त अक्षरशः पालन किया ! इसी कारण वे सामाजिक कार्यों के लिए बड़ी राशियाँ आसानी से दे देते थे ! कार्यकर्ताओं की निजी समस्याओं व कठिनाईयों में भी डाक्टर सेठा हर संभव मदद करते ! वे कहा करते थे की संघ कार्य निष्ठा से करने बाला स्वयंसेवक कई बार अपने पारिवारिक उत्तरदायित्वों की और समुचित ध्यान नहीं दे पाता, एसे में यदि उसे मदद नही मिले तो बह निश्शंक होकर कार्य कैसे कर पायेगा ?

· इटारसी के संघ कार्यालय निर्माण हेतु डाक्टर साहब ने ५०,००० रु देने का आश्वासन दिया, किन्तु कार्यालय निर्माण में विलम्ब हो गया ! बहुत समय बाद जब कार्यालय निर्माण शुरू हुआ तो डाक्टर साहब ने एक लाख रु. दिए ! जब कार्यकर्ताओं ने उन्हें स्मरण कराया कि आपने तो कार्यालय के लिए ५०,००० राशि देने का तय किया था ! डाक्टर साहब ने उत्तर दिया कि मैंने एक प्लाट बेचकर कार्यालय के लिए राशि देने का विचार किया था, किन्तु उस समय कार्यालय न बनने पर प्लाट नही बेचा ! अब जब कार्यालय बन रहा है, बह प्लाट भी अभी ही बेचा है ! इस समय प्लाट बेचने पर उसकी कीमत बढ़ गई तथा उस समय की तुलना में दूनी धनराशि प्राप्त हुई है, अतः स्वाभाविक रूप से संकल्प राशि भी दुगनी कर दी है ! ऐसा था संघ अनुराग डाक्टर राधामोहन सेठा जी का !

संस्मरण पण्डित दीनदयाल उपाध्याय –

· एक बार डाक्टर सेठा अपने क्लीनिक पर मरीजों को देख रहे थे ! लगभग सभी मरीजों को देख लेने के बाद उनकी नजर बेंच के आख़िरी छोर पर बैठे व्यक्ति पर पडी ! वे पण्डित दीनदयाल उपाध्याय जी थे ! उन्हें इस प्रकार बैठा देखकर डाक्टर साहब अत्यंत हैरत में पड गए और उन्होंने दीनदयाल जी से पूछा “ अरे आप कब आये, यहाँ क्यों बैठे हैं”! दीनदयाल जी ने सहज उत्तर दिया कि आप मरीजों में व्यस्त थे इसलिए आपको बीच में टोकना उचित नही समझा ! उनके मलिन चहरे को देखकर डाक्टर साहब को लगा कि कुछ गडबड है ! उन्होंने स्वास्थ्य के विषय में पूछा तो ज्ञात हुआ कि उपाध्याय जी बुखार में हैं और इसी कारण उपचार हेतु प्रवास के बीच में ही इटारसी रुक गए हैं ! 

सेठाजी ने परीक्षण कर दवा लिख तो दी किन्तु पर्चा हाथ में लिए पण्डित जी को विचारमग्न देखते ही उन्हें समझ में आ गया कि पण्डित जी पर दवाईयां खरीदने के लिए भी व्यवस्था नहीं है और शायद इसी कारण उन्हें इटारसी उतरना पड़ा है ! उन्होंने पुनः देखने के बहाने पण्डित जी से पर्चा वापस लिया और अपने कर्मचारी को भेजकर बाज़ार से दवाई मंगवाई ! दवाई आते ही दीनदयाल जी को चलने के लिए उद्यत देखकर सेठा जी ने उनसे ठीक होने तक रुकने का आग्रह किया ! किन्तु उपाध्याय जी ने जबाब दिया “आपने दवा दे दी है, अब तो मैं ठीक हो ही जाऊंगा” ! और चल दिए अपने प्रवास पर !

· पण्डित दीनदयाल जी उपाध्याय की शाखा निष्ठा का अद्भुत द्रश्य देखने का अवसर मिला इटारसी के स्वयंसेवकों को ! हुआ यूं कि इटारसी में भारतीय जनसंघ का प्रांतीय अधिवेशन हुआ, जिसमें प्रदेश भर के लगभग ४०० प्रतिनिधि भाग ले रहे थे ! इस अवसर पर नगर के प्रमुख मार्गों से एक शोभा यात्रा भी निकाली गई ! अधिवेशन के मुख्य अतिथि होने के कारण उपाध्याय जी एक सुसज्जित जीप में खड़े हो जनता का अभिवादन करते जा रहे थे ! शोभा यात्रा के मार्ग में जैसे ही दीनदयाल जी ने मालवीयगंज के जोधराज प्राथमिक विद्यालय प्रांगण में शाखा लगती देखी, वे अपनी जीप से उतरे, संघ स्थान पर पहुँच ध्वज प्रणाम किया फिर मुख्य शिक्षक को प्रणाम कर उनसे अनुमति लेकर पुनः ध्वज प्रणाम कर जीप में सवार हो आगे बढे !

कुछ अन्य संस्मरण –

· इटारसी के सूरजगंज में कुछ विरोध के चलते शाखा लगाने में परेशानी आ रही थी ! इससे निबटने के लिए तत्कालीन जिला प्रचारक श्री संतोष त्रिवेदी ने एक स्थानीय गुंडे से दोस्ती गांठी और फिर उसके माध्यम से शाखा प्रारम्भ की ! इससे दो लाभ हुए | एक तो शाखा लगाने में आ रही कठिनाई से निजात मिली, तो दूसरी ओर संघ के संस्कारों के प्रभाव से वह गुंडा भी धीरे धीरे स्वयंसेवक व सामाजिक व्यक्ति बन गया | इसे कहते हैं, आम के आम गुठली के भी दाम |

· सीहोर में तहसील प्रचारक रहे दिनेश चौरे इटारसी तहसील प्रचारक श्री गंगाराम चंदेल की सहनशीलता से अतिशय प्रभावित थे ! उन्होंने बताया कि संघ कार्य हेतु उनके घर छोडने के निर्णय से उनके बड़े भाई संघ के अधिकारियों से इतने नाराज थे कि उन्होंने एक बार अपने एक मुसलमान मित्र के द्वारा गंगाराम जी को थप्पड़ भी लगवा दिए थे ! किन्तु गंगाराम जी इस अपमान को चुपचाप पी गए ! उन्होंने इस घटना का जिक्र भी किसी से नहीं किया ! किन्तु चौरे को जब यह मालूम पड़ा और उन्होंने गंगाराम जी से इस बाबत पूछा तो उनका जबाब था कि तुम्हारे बड़े भाई से भला मैं कैसे लड़ सकता था ?

· विभाजन के परिणामस्वरूप सिंध से विस्थापित होकर भारत आये संघ स्वयंसेवक श्री राजपाल आर्य का संस्मरण है कि प्रारम्भ में अपरिचित इटारसी में सभी लोग कन्नी काटते थे ! लोगों में ना जाने कैसे धारणा फ़ैल गई थी कि सिंधी लोग बच्चों को भगा ले जाते हैं ! एक तो घर से बेघर, बेरोजगारी की मार और ऊपर से लोगों का ऐसा रूखा व्यवहार ! बिलकुल टूट से गए थे आर्य ! किन्तु एक दिन रामेश्वर नाई की दूकान पर बाल बनबाते समय जैसे ही स्वयं को सिंध का स्वयंसेवक इस नाते परिचय दिया, पूरा वातावरण ही बदल गया ! रामेश्वर नाई भी स्वयंसेवक थे ! उन्होंने इटारसी भर के स्वयंसेवकों से राजपाल आर्य का परिचय करा दिया ! उसके बाद ना तो इटारसी उनके लिए अपरिचित रहा और ना वे इटारसी के लिए ! फिर तो इटारसी के ही होकर रह गए राजपाल आर्य !

समाज परिवर्तन –

· संघ की शाखा पर आते आते वहाँ के वातावरण व संस्कारों से बुरे लोग भी अपनी बुराईयों से छुटकारा पाकर समाज में प्रतिष्ठित हो जाते हैं ! इसका रोचक तथा दिशावोधक उदाहरण इटारसी रेलवे स्टेशन के पास लगने बाली गंज शाखा पर अनुभव हुआ ! रेलवे स्टेशनों पर अक्सर जेबकतरों की टोलियाँ सक्रिय रहती हैं ! यही उनकी जीविका का साधन भी होती है ! इटारसी में भी एसे जेबकतरों की कमी नही थी ! एक स्वयंसेवक के प्रयत्न से कुछ जेबकतरे शाखा आने लगे ! यद्यपि उस कार्यकर्ता को इस विषय में जानकारी नही थी कि जिनको बह इतने आग्रह पूर्वक शाखा ला रहा है, उनका व्यवसाय क्या है ! वे लोग शाखा पर बड़ी लगन से सब कार्यक्रम करते, अनुशासन में रहते तथा उनका व्यवहार भी अत्यंत सभ्यतापूर्ण रहता ! 

शाखा आते आते वे इतने संस्कारित तो हो गए कि किसी स्वयंसेवक को कोई नुक्सान नही पहुंचाते ! किन्तु एक बार व्यवस्था प्रमुख गुरू दक्षिणा की एक बड़ी राशि के साथ रेल से इटारसी उतरे ! उन्हें ना जानने बाले एक जेबकतरे ने उनकी जेब पर हाथ साफ़ कर दिया ! किन्तु जैसे ही घर जाकर उसने उडाया गया लिफाफा खोलकर देखा तो उसमें गुरू दक्षिणा देने बाले स्वयंसेवकों की सूची देखकर उसे समझ में आ गया ! बह गुरू दक्षिणा के महत्व को समझता था और स्वयं भी गुरू दक्षिणा करता था ! बह सीधे अपने शाखा के अधिकारी के पास गया तथा बह राशि एवं सूची उन्हें सोंप दी ! शाखा पर होने बाले संस्कारों का प्रभाव उन लोगों पर बढता गया और परिणाम स्वरुप जेबकटी के काम को अपराध मानकर उन लोगों ने उसे पूरी तरह छोड़ दिया !

· दहेज दानव से पूरा समाज ग्रस्त व त्रस्त है, किन्तु समस्या यह है कि जब घर में विवाह योग्य पुत्र होता है तब यह प्रथा वरदान प्रतीत होती है और जब अपनी पुत्री का विवाह करना होता है तब ही प्रथा अभिशाप लगती है ! समाज के इस दोहरे मापदंड के कारण यह कुरीति समाप्त नही हो पा रही है ! शिव चौबे होशंगावाद के अच्छे कार्यकर्ता हैं ! समाज के प्रति संवेदनशीलता ने उन्हें इस कुप्रथा के खिलाफ कुछ करने के लिए प्रेरित किया ! उन्होंने अपने दस साथी और तैयार किये तथा सबने मिलकर निर्धन वालिकाओं के विवाह का बीडा उठाया ! सीहोर तथा बुधनी तहसीलों की १२७ से अधिक निर्धन कन्याओं के विवाह उनके प्रयत्नों से संपन्न हुए ! और यह क्रम सतत जारी रहा ! वे वर पक्ष को दहेज मुक्त विवाह के लिए प्रेरित करते तथा समारोह के लिए आवश्यक धनराशि समाज के सहयोग से जुटाते ! उनका यह प्रयत्न भले ही दहेज की विकरालता को पूरी तरह समाप्त ना कर पाया हो, किन्तु सही दिशा में उठा हुआ एक कदम तो है ही !

· संतोष छत्रपाल भेंस देही का स्वयंसेवक है ! एक विद्यालय में शिक्षक भी है किन्तु दलित समाज से होने के एक बार अप्रिय अनुभव से गुजरा ! अपने नवजात पुत्र के लिए राशि के अनुसार नाम पूछने बह एक पंडितजी के पास गया, किन्तु उन्होंने कहा तेरे को क्या कोई भी नाम रख ले ! काफी अनुनय विनय करने पर भी जब पंडितजी ने सहयोगी रुख नही दिखाया, तब उसने अपनी व्यथा संघ के एक अधिकारी को सुनाई ! अधिकारी ने सुझाव दिया की तुम पढ़े लिखे होकर इस तरह परेशान क्यों हो रहे हो ? तुम्हे स्वयं योग्यता प्राप्त कर समाज के सम्मुख उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए ! संतोष को बात जाँच गई ! वे पढ़े लिखे थे ही ! थोड़े ही समय में उन्होंने ज्योतिष व कर्मकांड का अध्ययन कर उसमें दक्षता प्राप्त कर ली ! कहाँ तो वे अपने काम के लिए पंडित जी के यहाँ चक्कर लगा रहे थे, जबकि अब लोग उनके दरवाजे पर खड़े रहते हैं !

· तत्कालीन विभाग प्रचारक श्री राजकुमार जैन के संपर्क में आकर श्री राधेश्याम रावल स्वयंसेवक भी बने और संघ साहित्य के प्रति उनका रुझान भी जाग्रत हुआ ! वे अधिक दौड धूप करने की स्थिति में नही थे ! किन्तु वे कुछ सकारात्मक करना चाहते थे, अतः उन्होंने अपनी रूचि का एक काम स्वतः ढूंढ लिया ! संघ के विषय में जब भी कोई पुस्तक या पत्रिका प्रकाशित होती, वे उसकी दो प्रतियां खरीद लेते ! एक स्वयं के अध्ययन और अपने मित्रों को पढाने के लिए और दूसरी संघ कार्यालय के लिए ! वे इस प्रकार संघ विचार के प्रसार में अपना योगदान देते रहे !

सेवा कार्य –

· सन १९७३ में नर्मदा नदी की बाढ ने ना केवल होशंगावाद के निचले हिस्से को वरन पूरे नगर को ही अपनी चपेट में ले लिया था ! नगर की मुख्य सड़कें पानी से सराबोर थीं ! बाढ के कारण सेंकडों लोग प्रभावित हुए थे ! स्वयंसेवकों द्वारा जन सहयोग से प्रभावित लोगों के आवास, औषधि व भोजन की व्यवस्था की गई ! जब तक बाढ़ का पानी उतर नही गया और लोग अपने अपने घरों को वापस नही हो गए, यह सेवा कार्य जारी रहा !

· राम जन्म भूमि आंदोलन के समय अयोध्या जाने बाले कारसेवकों की बड़ी संख्या ईटारसी स्टेशन से निकलती थी ! स्थानीय स्वयंसेवकों ने स्टेशन के नजदीक स्थित गुरुद्वारे में उनके भोजन की व्यवस्था की थी ! प्रतिदिन लगभग ५,००० कारसेवकों ने उस दौरान बहां भोजन किया ! यहाँ अस्वस्थ कारसेवकों को चिकित्सकीय सुविधा भी उपलव्ध कराई गई !

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