मार्गदर्शक "आत्माराम"

मेरे मन | तू बड़ा नटखट है | आचार क्या करूं ? कैसा करूं ? आदि प्रश्नों की झड़ी लगाकर - तू स्वयं ही विचार विस्तार के जाल में फंसने का प्रवंध...

मेरे मन | तू बड़ा नटखट है | आचार क्या करूं ? कैसा करूं ? आदि प्रश्नों की झड़ी लगाकर - तू स्वयं ही विचार विस्तार के जाल में फंसने का प्रवंध कर रहा है | यह सब छोड़ और एक आस - एक विश्वास - प्रभु में रख ! वह आत्मा रूप राम "आत्माराम" स्वयं तुझे मार्ग दिखाएगा | अतएव संशय छोड़, और विश्वास का आश्रय अपने स्वांस प्रश्वांस में पिरोकर बढ़ चल | विश्वास ही भक्ति की कसौटी है | उस पर खरा उतर मेरे मन मान, और स्वतः को सोंप दे उस करुना सागर की लहरों की लीला को | वह तुझे अंगीकार करेगा |

मेरे मन | तुम विश्वास करने की बात करते हो और शर्त रखते हो, कि वह प्रभु अंगीकार करेगा कि नहीं | यदि अंगीकार नहीं किया तब क्या होगा ? राम भी न मिला और जगत भी गया | इस शंका का, पूर्व शर्त का अर्थ ही है - कि हे मेरे मन - अभी तू जगत की लालसा से बंधा है और प्रभु प्राप्ति के लिए शर्त रख रहा है कि वह जगत से भी अधिक तुझे देगा कि नहीं, और उसने नहीं दिया तब क्या होगा ? अरे मूढ़ मन - जो था, उसका ही था - जो है, उसका ही है - और जो होगा, उसका ही होगा | दे, न दे, मैं उसका हूँ, उसके लिए हूँ और उसीका रहूँगा - जानकर - ठानकर - निशंक हो | मेरे मन | तभी विश्वास जागेगा | उस विश्वास के आने पर विश्व की आस कहीं नहीं ठहरेगी !

मेरे मन ! जब तू विश्व की आस छोड़कर एक प्रभु का आलम्ब लेगा - तभी तुझे प्रभु का विश्वास प्राप्त होगा | प्रभु भक्त की निष्ठा का परीक्षण करने के लिए, उसे अनेक प्रलोभनों के बीच खुला छोड़ देते हैं | भक्त को - जीव को - आत्म निर्णय का पूर्ण अवसर रहता है - और जो भक्त - जीव - अपने सभी निर्णय करने का अधिकारी केवल एक प्रभु को मानता है - और आत्म निर्णय को प्रभु निर्णय पर छोड़ देता है - वही आत्मा, परमात्मा से तादात्म्य पाकर पूर्ण प्रभु विश्वास की भागी होती है | अतएव मेरे मन - तू विश्वास और निष्ठा पूर्वक - इश्वर पूजन - कीर्तन - मनन - सेवन में रमा रह | प्रभु तुम्हारे सदा साथ रहेंगे !

मेरे मन ! प्रभु तेरे पास ही हैं | उनकी माया विचित्र और अगम्य है | वे ह्रदयस्थ होकर भी - जहां तक तुम्हारी दौड़ है - वहां तक और उससे भी परे हैं | तुम स्वयं को अत्यंत गतिमान मानते हो - पलक झपकते न झपकते - लपक कर दूर दूर तक भटक आते हो - परन्तु वह प्रभु अविचल रहते हुए भी, तुम्हारे पहुँचने और लौटने के पहले, वहां भी रहते हैं - और यहाँ भी रहते हैं | अतएव इस निकटतम को खोजने - पूजने के लिए दूर न जाओ | बस उस सर्व व्यापी को अपने आस पास ही अनुभव करो | अपने प्रत्येक कार्य में पूजा का भाव भरो | मेरे मन - तुम्हारा प्रत्येक कर्म - प्रभु पूजा बने | इसका ही ध्यान रहे |

मेरे मन ! तुम्हारी दशा बड़ी ही विचित्र है | जो तुम्हारे पास है, उसकी उपस्थिति तुम्हे प्रतिक्षण प्रेरित करती रहती है, तुम्हें बुलाती है | और उसे सुनकर तुम उसे पाने के लिए अकुलाते भी हो | और व्याकुलता में - जो स्वयं तुम्हारे पास है, उस अंग अंग, रोम रोम में समाये हुए को - आस पास खोजते फिरते हो - तुम्हारी दशा का वर्णन कवीर ने ठीक ही किया है -

ज्यों कस्तूरी का मिरग, फिर फिर सूंघे घांस |

तुम जगत में भटकते हो - अपने आप में नहीं डूबते | जिसने अपनी सभी इन्द्रियों को अपने आप में समेट लिया - उसकी भटकन समाप्त हो जाती है - मेरे मन |और तभी अपने आप में डूबकर उस कस्तूरी के अपार भण्डार प्रभु को पा सकोगे | मेरे मन !

मेरे मन ! एक बार उस सर्व व्यापी, अनादि, अनंत, अरूप, अकाम, अविनाशी "सच्चिदानंद" के साथ तादात्म्य हो गया, कि जो कुछ शेष बचता है वह बाह्याचार बचता है | देह वृत्ति एवं व्यवहार, ज्ञानी और अज्ञानी के एक से ही रहते हैं | उठना, बैठना, सोना, खाना, पीना, गाना, सुनना, बोलना, चलना, रुकना, हँसना सभी क्रियाएं एक सी ही रहती हैं | परन्तु अज्ञानी जहां इन सभी क्रियाओं का स्वयं को कर्ता जानता है और देह बुद्धि से इन क्रियाओं के सम्पादन को करता है, तब ज्ञानी इन क्रियाओं के कर्त्र भाव से मुक्त, इन क्रियाओं में देह और उससे परे सर्वत्र व्याप्त प्रभु शक्ति - आत्म तत्व की व्याप्ति को देखता है | उसके लिए ये सभी प्रकृतिगत गुणत्रय की लहरियां मात्र हैं | वह इनसे अनासक्त रहता है | अतएव तू निर्लिप्त भाव से इन देह्धर्मों को करते हुए भी उसके चरणों में रम मान हो | वह रमारमण ही तुम्हारी चंचलता को विराम देगा !

मेरे मन ! उस रमारमण प्रभु की आराधना जिसने की, उसी में रम गया, उसे जीवन में सभी विकारों से विरक्ति हो जाती है | वह जगत की इन सुखदुख रूप लहरियों में डूबता उतराता नहीं है | धन संपत्ति का मिलना न मिलना, रहना न रहना, उसे विचलित नहीं करता | माता पिता, पुत्र, कलत्र, सभी संबंधी जनों का आना जाना, उसे एसे जान पड़ता है, जैसे प्रभु भिन्न भिन्न रूप लेकर आ जा रहा हो | इस कारण उसे शत्रु और मित्र में सम भाव प्राप्त हो जाता है - क्यों कि उसके लिए ये दोनों ही परमेश्वर के ही रूप हैं | मेरे मन - इस सम भाव के आने पर - सारी चंचलता जाती रहती है | तुझे अपनी चंचल प्रवृत्ति से छुटकारा पाना है न ? फिर उस रमारमण के चरणों को उर में धारण करो | चित्त से ध्यान करो और उसकी छवि में घुल मिल जाओ - मेरे मन | यही आनंद - परमानंद का क्रीडांगण है | इसी में खेलो और प्रसन्न रहो !

मेरे मन ! तुम परमानन्द घन प्रभु की झलक पाकर ही प्रसन्न हो, और स्वयं को कृत कृत्य जानकर फूले नहीं समाते हो | स्वयं को ही दीप्त मानते हो | हे मेरे मन एसे उद्दीप्त न बनो | सम्हलो | यह चमत्कार तुम्हारा नहीं है | यह चमत्कार उस परमानन्द घन परमेश्वर की छाया का - माया का है | अभी तो तुम्हे उस माया के आवरण से पार जाना है | उससे पार पाना है | और यह तभी संभव है, जब तुम माया से परे उस प्रभु से प्रार्थना करोगे - कि माया की स्वर्ण आभा - मरीचिका से आवृत्त "सत्य" स्वस्वरूप को प्रभु प्रकट करो और उस स्वरुप को ह्रदय में धारण करने के लिए - अन्तः चक्षु को वही गुरु रूप में उद्घाटित करेगा | अतएव अत्यंत दीन भाव से उस करुनाघन को पुकारते रहो - मेरे मन | मेरे मन पुकारते रहो - गुहारते रहो - वह तुम्हारी ओर अवश्य निहारेगा और तुम्हें अपने आप में समा लेगा |

मेरे मन ! प्रभु जब प्रसन्न होते हैं, तब वह कृपा पात्र को अपने स्वरुप में विलीन कर लेते हैं | अतएव तुम यह जान लो कि जब तुम्हारा अस्तित्व शून्य हो जाएगा - तब केवल उस प्रभु का ही अस्तित्व रहेगा | अतएव तुम स्वयं के अस्तित्व से - "मैं हूँ" के अहम भाव से मुक्त होकर केवल तू ही, तू ही की रट लगा | जब तू रहेगा न तेरा अहंकार, तब केवल एक वही प्रभु रहेगा - मेरे मन | बस उस दिन की राह देख, चातक सा, उस करुणाघन की, कृपा वृष्टि की राह देख | तेरी प्यास वह अवश्य बुझाएगा |


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