अक्रोध की कोंपल

मेरे मन ! तुम जानते ही हो कि प्रभु को वे ही भक्त प्रिय होते हैं - जो भूत मात्र के प्रति निर्वैर होते हैं | भूत मात्र के प्रति निर्वैर होना...

मेरे मन ! तुम जानते ही हो कि प्रभु को वे ही भक्त प्रिय होते हैं - जो भूत मात्र के प्रति निर्वैर होते हैं | भूत मात्र के प्रति निर्वैर होना तभी संभव है, जब तुम उस प्रभु को भूत मात्र में देखो - अनुभव करो और उसकी वहां उपस्थिति को स्वीकार कर कह सको, आचरण में ला सको - "राम मय सब जग जानी, करहूँ प्रणाम जोर जुग पानी |" इस विनम्रता से, निरहंकारिता को जब तुम प्राप्त कर लोगे, प्रभु के प्रिय भक्त बनने की पहली शर्त तुम पूर्ण कर लोगे मेरे मन | परन्तु इतना ही करने से काम नहीं बनेगा | उसका - प्रभु का दर्शन - सभी जड़ चेतन जगत में करने से ही - काम नहीं बनेगा, अपितु तुम्हें उनके प्रति मित्र भाव तथा करुणार्द्र भी होना होगा | तथा निर्गम और निरहंकारिता भी ग्रहण करनी होगी | मेरे मन - ये सभी शर्तें तुम पूर्ण करते हो क्या ? करना चाहते हो क्या ? अपने आप को इन निकषों पर कसो और परखो | जैसे ही तुम इन पर खरे उतारोगे - अन्तर्यामी परमेश्वर के तुम प्रिय बन जाओगे | 

मेरे मन ! क्या तुम 'स्व' निरीक्षण में स्वयं को निर्वैर नहीं पाते ? ठीक है - अभी तुम - छोटी मोटी बातों में ही अन्यों के प्रति ईर्ष्या, द्वेष से भर उठते हो और अन्यों के अहित की कामना करते हो | परन्तु एसा क्यों होता है ? इसका भी विचार किया क्या ? एसा इस कारण ही होता है कि, तुम अभी निरीच्छ भी नहीं हुए हो और अन्यों को तुम अभी आत्म सद्रश्य भी नहीं मानते ? पहले अन्यों को आत्म सद्रश्य मान - उनके सुख में हर्षित, प्रसन्न होना प्रारम्भ करो, और अन्यों के दोषों को देखना छोड़ - उनके दोषों को स्वयं कष्ट उठाकर भी ढकना सीखो | यह करते ही - तुम्हें स्वयं एक लाभ होगा कि तुम ईर्ष्या के जलन से, द्वेष के धूम से - सर्वथा सुरक्षित हो जाओगे और अन्यों की मंगल कामना - तथा उनके सुख में सुखी होने से - तुम्हारे दुःख स्वयं ही दूर हो जायेंगे | तुम निर्वैर हो जाओगे | जहां, निर्वैर हुए - निरभिमानिता स्वतः तुम्हें अनुग्रहीत करेगी | 

मेरे मन ! सदा ध्यान रखो, कि जहां तुमने अपने मलों को, लोभ, मोह, मद,अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष, मत्सर, वैर भाव को धोना प्रारम्भ किया, वहां प्रारम्भ में ये, तुम्हारे सभी प्रयत्नों को, शिथिल और मैला कर देंगे | चिकने वर्तन मांजने बाले हाथों को, वर्तनों की चिकनाई लिपड़ जाती है, दवात धोने के लिए उसमें भरा जल - काली स्याही से काला हो जाता है, और हाथ भी उसमें रंग जाते हैं | परन्तु प्रत्येक प्रयत्न के साथ - मैल घटता जाता है - तथा अंततः वह स्वच्छ निर्मल हो जाता है | वारंवार स्वच्छ जल से प्रच्छालन जैसे उन्हें स्वच्छ करता है, वैसे ही वारंवार, तुम इन मलिनता के कारकों को दूर करने का प्रयत्न करोगे, प्रत्येक प्रयत्न के साथ उनका प्रभाव घटता जाएगा | और, इस मलिनता को धोने के लिए, प्रभु के प्रति शरणागति, सर्वत्र जगत में उसके दर्शन, तथा उनके नाम का संकीर्तन, तथा सत्संग - तुम्हें सहायक होंगे | जैसे जैसे इनका प्रभाव बढेगा - मैल स्वयं घटेंगे, और तुम निर्मल बन प्रभुविम्ब को धारण कर सकोगे | मेरे मन - तुम सतत प्रयत्नशील बनो | 

मेरे मन ! वारंवार नाम जप, निश्चित समय पर नित्य ध्यान, तथा शेष समय में, श्रम रत होते हुए अथवा विश्रामरत होते हुए, शांतिदाता प्रभु के रूप का मनन चिंतन, उसके हेतु कर्म सम्पादन तथा उसका उसको समर्पित कर, उसे ग्रहण करने हेतु प्रार्थना, विनय करते रहना, तुम्हें - वैर, मोह, लोभ, मत्सर, क्रोध, भय आदि दोषों से सर्वथा बचाकर रखेंगे | अतएव द्रढता पूर्वक, विश्वास एवं निष्ठा के साथ, निरंतर उस प्रभु के नाम का स्मरण करते रहो | उसकी स्मृति सदा जागती रहे | वह तुम्हारी पुकार सुनकर - सदैव तुम्हारे आगे पीछे तथा स्वतः तुममें ही वसा रहेगा | मेरे मन - बस जीवट से, एकचित्त होकर - उसका स्मरण करो | वही तुम्हें - इन भय, क्रोध, काम की मार से बचने के उपाय सुझाएगा | उन उपायों को क्रियान्वित करने का बल देगा - और तुम्हारी रक्षा करेगा | 

मेरे मन ! तुम्हारा कहना सही है कि, काम, क्रोध, भय, वहुरुपिये हैं | वे अनेक रूपों में आकर, प्रसंग प्रसंग से तुम्हें ठगते हैं | परन्तु मेरे मन - क्या तुम कामना - इच्छा - का परित्याग करने को तैयार हो | सचाई तो यह है कि, प्रत्येक कामना - तुम स्वयं के इन्द्रिय सुख के लिए करते हो | तुम इन्द्रिय सुखों के लोभ से वंधे हो | यदि तुम इन भोगों के भोक्ता बनोगे - कर्मों के कर्ता भी बनोगे और कर्म फलों से उत्पन्न सुख दुःख दोनों ही पाटों में पिसोगे भी | वास्तव में वह प्रभु ही कर्ता है, वही भोक्ता है - उसी की सेवार्थ सारे इन्द्रिय कर्म करने हैं | जो कर्म उसे प्रिय होंगे वही कर्म किये जायेंगे, अन्य इन्द्रिय कर्मों की तुम्हें कामना नहीं रहेगी - तुम एकनिष्ठ होकर प्रभुसेवामय आचरण करोगे - तब तुम सुख दुखों में समभाव को प्राप्त हो जाओगे | पिसने का भय जाता रहेगा | जहां निर्भय हुए - अक्रोध की कोंपल फूटेगी | और तुम प्रभु कृपा के पात्र बन जाओगे | तुम पर कृपा करने के लिए प्रभु स्वयं विवश होंगे | 

मेरे मन ! जब भक्त, सर्वथा प्रभु का होकर रहता है, उस भक्त की चिंता प्रभु करते हैं | और वह भक्त, जगत की सभी, क्रियाकलापों में इस प्रकार व्यवहार करता है, जैसे कि वह कुछ भी नहीं करता है, अपितु सभी क्रियाएं सहज ही हो रही हैं |

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