देशभक्ति बनाम धर्म - पंडित दीनदयाल उपाध्याय

जब कोई राष्ट्र परकीय सत्ता के अधीन रहता है तो उस राष्ट्र के नागरिकों की देशभक्ति का एकमेव लक्ष्य उस सत्ता को दूर करना होता है | हम तनिक गह...



जब कोई राष्ट्र परकीय सत्ता के अधीन रहता है तो उस राष्ट्र के नागरिकों की देशभक्ति का एकमेव लक्ष्य उस सत्ता को दूर करना होता है | हम तनिक गहराई में जाकर विचार करें कि हम परकीय सत्ता का विरोध हम क्यों करते हैं ? क्या इसीलिए कि परकीय सत्ता के कारण हमारी आर्थिक दशा बिगड़ जाती है ? हमारे यहाँ बेकारी और निर्धनता का साम्राज्य है, हमको बड़ी बड़ी नौकरियाँ नहीं मिलतीं, हमारे व्यक्तिगत स्वाभिमान को ठेस पहुँचती है, आदि, आदि | जो आज परकीय सत्ता का विरोध कर रहा है, कल उसे नौकरी मिल जाए और वह विरोध करना छोड़ दे, तो भी क्या उसे देशभक्त कहा जाएगा ? निर्धन होने के कारण जो आज विरोध में था, कल सत्ता द्वारा खरीद लिया जाए, तो क्या वह हमारी श्रद्धा का केंद्र रहेगा ? देशभक्त तो पद, धन वैभव को ठुकराकर निर्धनता, अभाव और सेवावृत को स्वीकार करता है, इसी में उसकी महानता रहती है |

क्या परतंत्र देशों में ही देशभक्त होते हैं ? राष्ट्रीयता के लिए क्या पराधीनता ही आवश्यक है ? तब विचार करना पडेगा कि देशभक्ति क्या है ?

जिस प्रकार आत्म साक्षात्कार व्यक्ति के जीवन का लक्ष्य होता है और वह हो जाने पर उसे मुक्त कहा जाता है, मोक्ष प्राप्ति का अधिकारी माना जाता है, उसी प्रकार राष्ट्र को आत्म साक्षात्कार के मार्ग पर ले जाने वाले व्यक्ति ही देशभक्त होता है | 

भारतीय राष्ट्र न तो हिमालय से कन्याकुमारी तक फैले हुए इस भूखंड से बन सकता है और ना ही इसमें बसने वाले कोटि कोटि मनुष्यों के झुण्ड से | इन कोटि कोटि जन के समूह को इस विस्तृत भूभाग से बांधने वाला कोई सूत्र है तो वह है “धर्म” | बिना धर्म के भारतीय जीवन का चैतन्य ही नष्ट हो जाएगा |

धर्म के लिए ही श्रवण कुमार अपने अंधे माता पिता को कंधे पर लिए वन वन घूमा और धर्म के लिए ही प्रहलाद ने अपने पिता हिरण्यकश्यिपू का विरोध किया | राम ने एक पत्नी वृत का पालन करके धर्म की रक्षा की तो कृष्ण ने अनेकों विवाह करके धर्म का निर्वाह किया | इस प्रकार के विरोधाभासों की निराकृति केवल धर्म को समझकर ही हो सकती है | धर्म को आचरण में लाने वाले बाल्मीकि, व्यास, कालिदास, तुलसी, सूर, ज्ञानदेव, समर्थ, चैतन्य और नानक कवी थे, संत थे ऋषि थे, इसीलिए उनके शब्द राष्ट्र के शब्द हो गए | 

हमारे राजनीति विशारद आचार्यों ने भी राजनीति पर धर्म का पुट चढ़ाया | शुक्राचार्य, वृहस्पति, विश्वामित्र या चाणक्य धर्मविहीन राजनीति के पोषक नहीं थे | धर्महीन राजनीति का कोई अर्थ नहीं है | राणा प्रताप, शिवाजी और गुरु गोविन्द सिंह राजनैतिक नेता हैं या धार्मिक ? दयानन्द और विवेकानंद के कार्य का भारत की राजनीति और राष्ट्र पर क्या कोई प्रभाव नहीं है ? गांधीजी के भारतव्यापी प्रभाव के पीछे उनका महात्मापन, उनकी धार्मिकता है या राजनीति ? स्वाधीनता आन्दोलन में फांसी के तख्ते पर गीता की प्रति लेकर चढने वाले क्रांतिकारी वीरों में धार्मिक प्रेरणा थी या राजनैतिक ? हम देखते हैं कि दोनों को अलग नहीं किया जा सकता | हमारी राजनीति हमारी धार्मिक वृत्ति का ही परिणाम है | राजनीति हमारी धार्मिकता की रक्षा करने का साधन मात्र है |

संतानोत्पत्ति हम धर्म समझकर करते हैं तो संतान भी अपने मातापिता की सेवा धर्म समझकर ही करती है | बड़ेबूढों की वंदना करना हमारा धर्म है | नित्य स्नान करना, बिना स्नान भोजन न करना, कुए पर जूते उतार कर जाना, भोजन को स्वच्छता पूर्वक बनाना, सब धर्म से जुडा है | अपने घर में तुलसी धर्म समझकर रखते हैं, मलेरिया नाशक समझकर नहीं | स्वच्छता और स्वास्थ्य के सब नियम धर्म बन गए हैं | कृषक बीज बोता है तो उसके पीछे भी धार्मिक भावना छुपी हुई रहती है | जीवन के प्रत्येक कृत्य को हमने धार्मिक रंग में रंगा है | धर्म से प्रेरणा लेकर ही हमने अपनी जीवन रचना की है | इसीलिए अनेक विद्वानों ने कहा है कि भारत एक धर्म प्राण देश है | आज अपनी इस आत्मा की प्रेरणा को अचेतन से चेतन में लाने पर ही राष्ट्र जीवन में दिखाई देने वाली विकृति, संघर्ष व अनिश्चितता दूर की जा सकती है |

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