संत नामदेव का नेटवर्क

किसी भी संत के दो चरित्र होते हैं | एक धार्मिक दूसरा सामाजिक | धार्मिक चरित्र अर्थात उनके द्वारा रचित काव्य या उनके द्वारा व्यक्त विचार ...


किसी भी संत के दो चरित्र होते हैं | एक धार्मिक दूसरा सामाजिक | धार्मिक चरित्र अर्थात उनके द्वारा रचित काव्य या उनके द्वारा व्यक्त विचार | केन्तु आध्यात्म को लेकर जन मान्यता के दो द्रष्टिकोण हैं | जो धारणा अधिक लोकप्रिय है, वह है समय समय पर उनके क्रिया कलापों से प्रगट चमत्कारों को आध्यात्म से जोड़ कर देखना | किन्तु वस्तुतः जिस कालखंड में संत का जन्म हुआ, उस समय की परिस्थिति क्या थी, और उस परिस्थिति में समाज को धर्म की मूलभूत संकल्पना का मार्गदर्शन संत ने किस प्रकार किया, इससे ही उनके आध्यात्मिक और सामजिक दोनों रूपों का आंकलन होता है | 

संत के आध्यात्मिक अभ्युदय का मूल तो उस समय का सामाजिक परिवेश ही होता है | किसी भी धर्म और उसकी संकल्पना का आधार भी तात्कालिक परिस्थितियां ही होती हैं | इसे यूं भी कहा जा सकता है - संत का आध्यात्म ही तात्कालिक राजनीति | जैसे कि महाराष्ट्र में संत नामदेव, संत ज्ञानदेव और आगे चलकर समर्थ स्वामी रामदास – पंजाब में सिख धर्मगुरुओं की परंपरा | 

पंजाब में मान्यता है कि संत नामदेव ने पंजाब के गुरुदासपुर जिले में प्रवास करते समय देह त्याग की, इसीलिए वहां संत नामदेव के नाम पर गुरुद्वारा भी बना है | जबकि महाराष्ट्र में मान्यता है कि पंढरपुर में बिट्ठल मंदिर के महाद्वार पर उन्होंने समाधि ली | पर यह प्रश्न श्रद्धा और विश्वास का अधिक है | पर अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि इसमें से ध्वनित क्या होता है ? 
महाराष्ट्र के गाँव गाँव में, घर घर में संत नामदेव की तस्वीर मिल जायेगी | किन्तु पंजाब सहित देश के हर गुरुद्वारे में सादर स्थित गुरुग्रंथसाहब में नामदेव जी रचित 61 पद होना अपने आप में महत्वपूर्ण भी हैं और उल्लेखनीय भी | जो पद “नामदेव जी की मुखवाणी” में हैं, वे ही पद गुरुग्रन्थ साहब में भी है | अब प्रश्न उठता है कि नामदेव जी ने हिन्दी और पंजाबी में इन पदों की रचना कब की ? 

संत नामदेव के चरित्र में अनेक चमत्कारिक प्रसंगों का वर्णन आता है | उदाहरण के लिए बाल्यकाल में उनकी जिद पर विवश होकर स्वयं आकर बिट्ठल द्वारा नैवेद्य ग्रहण करना, या कि मारवाड़ में पानी भरते समय मिली मृत गाय को जीवित करना आदि | बैसे ही क्या इन पदों को भी चमत्कार ही मान लिया जाए ? किन्तु वास्तविकता यह है कि इन पदों की रचना को समझने के लिए उस काल को समझना होगा |

संत नामदेव का जन्म 1270 में हुआ, और उसके लगभग पांच वर्ष बाद संत ज्ञानदेव हुए, अर्थात दोनों समकालीन ही थे | दोनों ही मराठबाड़ा से थे | यह वह समय था जब देवगिरी पर यादव साम्राज्य था | सत्ता प्राप्ति के लिए किसी भी सीमा तक जाना साधारण बात थी | रामदेव राय ने देवगिरी की सत्ता पर काबिज होने के लिए अपने चचेरे भाई आमण देव की आँखें निकलवाकर उसे कारावास में डाल दिया था | इस अति महत्वाकांक्षी राजा ने सम्पूर्ण दक्षिण पर ही नहीं तो बनारस तक अपनी विजय पताका फहराई थी | नामदेव के 22 वर्ष के होने तक यह सारी कारगुजारियां चल रही थीं | 

एक तरफ तो यादव सत्ता वैभव के चरमोत्कर्ष पर थी, तो दूसरी ओर समाज पर पुरोहित वर्ग का बर्चस्व था | कुल मिलाकर वैभव के शिखर पर केवल सत्ताधारी वर्ग था | आज 900 वर्ष बाद भी तो स्थिति यथावत है | ब्राह्मणशाही के बर्चस्व की प्रतिक्रिया में ही महाराष्ट्र में बौद्ध धर्म की सुगबुगाहट प्रारम्भ हुई, किनती जैन मत की जड़ें उससे कहीं अधिक गहरी थीं | इसलाम का अभ्युदय तीसरी वास्तविकता थी, जिसके चलते राजसत्ताएँ अपनी चमक खोती गईं | और यहीं से नामदेव या ज्ञानदेव का सामाजिक चरित्र आकार लेता है |

यादवों के काल में ब्राह्मणों के बर्चस्व से आक्रान्त बौद्ध व जैन महानुभावों ने इस्लाम का आव्हान किया, यह सामजिक ह्रास का तात्कालिक लक्षण था | यही कारण है कि ज्ञानदेव के गीतों में सामाजिक विषमता दूर करने व समाज संगठन की भावना दिखाई देती है | उनके द्वारा प्रस्थापित अद्वैत मत के पीछे की मूल भावना भी वही थी | सामाजिक समता की अभिव्यक्ति “ज्ञानेश्वरी” में स्पष्ट परिलक्षित होती है | यदि स्त्री, शूद्र और पापी भी अन्तःकरण से भक्ति करे, तो उसे भी मुक्ति प्राप्त हो सकती है, वह भी मोक्ष का अधिकारी बन सकता है | उनके इन गीतों ने पुरोहितशाही के विरोध की क्रान्ति को जन्म दिया | 

ज्ञानदेव के इस तत्वज्ञान ने भागवत धर्म को नवीन ऊंचाई दी | सुतार, लोहार, महार, कुंभार, चांभार, परीट, नाई, भाट, तेली आदि 12 बड़े समाजों के साथ साथ तंबोली, माली, घडसी, शिपि आदि छोटी जातियों में से भी ख्यातनाम संतों का प्रादुर्भाव हुआ | नामदेव जाति से शिंपी थे, जनाबाई दासी थीं, नरहरी - सुनार, सेना – नाई, गोरा कुंभार, सावता माली तथा बंका महार थे | यह ज्ञानेश्वरी का ही प्रभाव था | ईश्वर की कल्पना के लोकशाहीकरण जेसे धार्मिक वातावरण में नामदेव ने पंढरपुर को अपना केंद्र बनाया | 

नामदेव के जीवन की सबसे महत्वपूर्ण घटना है, उनका तीर्थाटन | तीर्थाटन भी अकेले नहीं, संत मंडली के साथ | “तीर्थावली” के अनुसार नामदेव व ज्ञानदेव के अतिरिक्त सावता माली, नरहरी सोनार, चोखामेला, बंका महार, गोरा कुंभार इस मंडली में शामिल थे | महाराष्ट्र गुजरात के तीर्थों के अतिरिक्त उत्तर में गोकुल, वृन्दावन, मथुरा, काशी, प्रयाग होते हुए ये लोग पंजाब तक गए | यह महज तीर्थाटन नहीं था, ये लोग देश के जिस जिस भाग में गए धार्मिक दिशानिर्देश देने का कार्य भी करते गए | स्पष्ट ही यह एक प्रकार से भक्ति मार्ग का प्रचार अभियान तथा इस्लाम के धार्मिक आक्रमण का प्रतिकार भी था | 

अलाउद्दीन खिलजी तथा तुर्कों ने 1296 में दिवगिरी पर पहला धावा बोला था | तेरहवीं सदी के प्रारम्भ में शहाबुद्दीन घोरी का दूसरा आक्रमण हुआ | इसी दौरान ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती जैसे सूफी संत दिल्ली आये तथा अजमेर को अपना केंद्र बनाया | भारत में इस्लाम के प्रचार में उनकी सर्वाधिक प्रमुख भूमिका रही | इसी कालखंड में दक्षिण में भी सूफी संतों का आनाजाना शुरू हुआ | स्थानीय राजा को अपने प्रभाव में लेकर गुलबर्गा जिले के शहापुर में इन्होने अपना स्थाई आवास बना लिया | वर्हाड़ में मंगलूपीर तथा कलंदर आदि सूफियों ने स्थानीय राजा की हत्या कर अनेकों को इस्लाम की दीक्षा दी | फिर तो इस्लाम का प्रभाव इतना बढ़ा कि भक्तों के सामने भगवान दत्तात्रय के फकीर वेश में आने की कथाएं जनसामान्य में प्रचलित होने लगीं | ऐसे वातावरण में नामदेव की धार्मिक यात्राओं का महत्व और अधिक है | वस्तुतः दक्षिण में ये यात्राएं उत्तर की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण व कठिन थीं |

संत ज्ञानेश्वर के समाधि लेने के बाद नामदेव पुन्हः भारत यात्रा करते हैं, यह ध्यान देने योग्य है | वे दक्षिण गए, गुजरात, सौराष्ट्र, सिंध, राजस्थान, मध्यप्रदेश, हिमाचल में न केवल गए, बल्कि लम्बे समय तक रहे, बहां की भाषाएं सीखीं | उनके व्यक्तित्व और विचारों का स्थाई प्रभाव उन क्षेत्रों के लोगों पर पड़ा, जो आज भी दिखता है | दक्षिण की दर्जी जाति के लोग स्वयं को नामदेव लिखते हैं, भूसागर व मल्ला जातियों में भी नामदेव नाम प्रचलन में हैं | राजस्थान के छीपा भी स्वयं का उपनाम नामदेव लिखते हैं | मध्यप्रदेश, गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, उत्तरप्रदेश व दिल्ली में नामदेव के मंदिर बने हैं | उस कालखंड व बाद में भी घना, तुलसीदास, कबीर, मीराबाई, नरसी मेहता आदि संतों के वांग्मय में नामदेव के नाम का उल्लेख मिलता है | पंजाब में तो वे अठारह वर्षों तक रहे | 1350 में उनकी मृत्यु के 109 वर्षों बाद नानक आये | और उसके भी 231 वर्षों बाद 1581 में सिक्खों के पांचवें गुरू अर्जुनदेव के काल में गुरूग्रन्थ साहब की निर्मिती प्रारम्भ हुई, जिसमें नामदेव जी के 61 पद हैं | समाज जीवन में उनकी स्मृति ने कितनी गहरी पैठ बनाई थी, यह उसका प्रमाण है |

हमारे समाज जीवन में अनेकों संतों की मालिका है, जिन्होंने समाज को जगाने व उसे सक्षम बनाने का कार्य किया है और जिनका पूण्य स्मरण आज भी समाज को प्रेरणा देता है | उन्हीं में से एक थे बाबा नामदेव | आध्यात्मिक स्फूर्ति के साथ साथ समाज को आत्म विश्वास प्रदान करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी | उनके मुख से निकले कुछ पद इसे ही स्पष्ट करते हैं |
मैं अंधुले की टेक, तेरा नाम खुन्द्कारा |
संसार में अन्धकार व्याप्त है, मेरे जैसे दीन मनुष्य के लिए एक हरिनाम ही आधार है |

यह विचार कर्मकांड की उलझनों व झंझटों से सामान्य जन को त्राण दिलाने वाला था | एक सुगम राह बताने वाला था |

हिन्दू पूजे देहुरा, मुसलमान मसीत, 

नामा सोई सेविया, जहाँ देहुरा न मसीत |
हिन्दू देवालयों में व मुसलमान मस्जिदों में पूजा करता है, किन्तु मैं ऐसे स्थान पर भजन करता हूँ, जहाँ न मंदिर है, न मस्जिद |

यह विचार ईश्वर की सर्व व्यापकता को दर्शाता है | नामदेव के जीवन का एक महत्वपूर्ण प्रसंग है, मुसलमान सुलतान द्वारा उन्हें इसलाम स्वीकार करने के लिए बाध्य किया जाना | उनकी माँ घबरा गईं, दुखी होने लगीं | नामदेव ने उन्हें दिलासा दिया –

रुदन करे नामे की माई, छोडी राम कीन भजन खुदाई |
न हौऊ तोर पूंगडा, न तू मेरी माई, पिंडु पडै तऊ हरिगुण गाई |

समाज के बड़े लोग जिस समय मुस्लिम सत्ता का चरण चुम्बन कर रहे थे, उस समय शूद्रातिशूद्र वर्ग में आत्माभिमान जागृत रखने का यह कार्य था | क्यों रोती हैं माँ, न मैं तेरा बेटा हूँ, न तू मेरी माँ है, पिंडदान के बाद तो केवल हरिनाम ही साथी है, उसे छोड़कर किस खुदाई को भजें | मध्ययुग के उस कालखंड में जहाँ एक ओर सारी प्रेरणा धार्मिक थी, तो सारी लड़ाई भी धर्म को लेकर ही थी | नामदेव का संघर्ष “चतुर्वर्ग चिंतामणि” में व्यक्त ब्राहमण धर्म से था तो आक्रामक इस्लाम से भी | इस दृष्टि से ही नामदेव की यात्राएं रणनीतिक ही थी | उसी का परिणाम था कि उन्हें पंजाब से बहोरदास, लद्धा, विष्णुस्वामी, केशव कलधारी, जाल्लो तथा जाल्हण सुतार जैसे शिष्य मिले | 

नामदेव का महत्व उनका जन संपर्क व उसके माध्यम से जगाई गई ज्ञानदीप की लौ के कारण है | दूसरे प्रान्तों में जाकर, वहां की भाषा सीखना और वहां की भाषा में साहित्य रचना, ऐसा दुष्कर कार्य उन्होंने किया | वे जहां गए, वहां जाकर जन सामान्य में धर्म जागृति की | तेरहवीं, चौदहवीं शताब्दी में जब कि आज के सामान आवागमन के साधन कल्पनातीत थे, वे महाराष्ट्र से बनारस तक गए | उनके कारण ही पैठण क्षेत्र को दक्षिण की काशी कहा जाता है | 

नामदेव का वैशिष्ट्य है कि उनके कारण एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में आनाजाना प्रारम्भ हुआ | इसे आज की भाषा में कहें तो उनके कारण सार्वदेशिक नेटवर्क विकसित हुआ, जिसने संस्कृति व सभ्यता की रक्षा की | आज तो संपर्क व संवाद के लिए इंटरनेट भी है, किन्तु तेरहवी सदी में क्या था ? इस दृष्टि से विचार करें तो नामदेव जी की महानता समझ में आती है | स्वतंत्र भारत में आवश्यकता है नारे और जुमलेबाजी से इतर नामदेव जी के समान जागृति पैदा करने की | हमारे देश में ऐसे ऐसे महापुरुष हुए हैं, यह वरदानी भूमि है, बोलकर सो जाने से काम नहीं चलने वाला | महापुरुषों से प्रेरणा लेकर सतत सक्रिय रहना आवश्यक है |

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