पिता मजदूर, मां दृिष्टहीन, स्वयं बहरे फिर भी बने आईएएस !

अलवर जिले का एक पिछड़ा गांव है  बदनगढ़ी ! यहां आज भी पढ़ने के लिए सरकारी स्कूल नहीं है। पढ़ने के लिए तीन किलोमीटर दूर अखेगढ़ गांव जा...

आईएएस मनीराम शर्मा फाइल फोटो।


अलवर जिले का एक पिछड़ा गांव है बदनगढ़ी ! यहां आज भी पढ़ने के लिए सरकारी स्कूल नहीं है। पढ़ने के लिए तीन किलोमीटर दूर अखेगढ़ गांव जाना पड़ता है। इसी गांव में पैदा हुए मनीराम शर्मा ! पिता मजदूरी करते थे। मां अंधी थी, और स्वयं पूर्ण रूप से बहरे | परिवार की गुजर-बसर के भी लाले थे, लिहाजा बहरेपन का इलाज कराना प्राथमिकताओं से कोसों दूर था। नौ साल की उम्र में शर्मा की सुनने की क्षमता बिल्कुल खत्म हो गई। लेकिन हिम्मत नहीं हारी। पढ़ाई जारी रखी। सहपाठी और टीचर तक सब मजाक उड़ाते, मगर छोटे मनीराम ने इस निगेटिव एनर्जी को अपने लिए आगे बढ़ने की प्रेरणा बना लिया।

दसवीं क्लास में शर्मा प्रदेश मेरिट में पांचवे स्थान पर आया। कहते हैं- मुझे तो कुछ सुनता नहीं था, दोस्त खेड़ली जाकर रिजल्ट देखकर आए, मेरे घर की तरफ हाथ हिलाकर दौड़ते आए, पिता को लगा मैं फेल हो गया, मुझे भी कुछ समझ में नहीं आया। काफी देर बाद पता चला मै तो मेरिट में आया हूं। पिता मेरिट के मायने समझते नहीं थे, केवल इतना समझे की मैं बड़ा वाला पास हो गया। पिता को लगा अब मैं कम से कम किसी सरकारी संस्थान में चपरासी तो बन ही जाऊंगा।

वे किसी परिचित विकास अधिकारी के पास ले गए और बोले- बेटा दसवीं में बड़ा पास हुआ है, चपरासी लगा दो। बीडीओ ने कहा- ये तो सुन ही नहीं सकता, इसे न घंटी सुनाई देगी न ही किसी की आवाज। ये कैसे चपरासी बन सकता है। पिता की आंखों में आंसू छलक आए, शर्मा कहते हैं- खुद को घोर अपमानित महसूस किया, मेरिट में आने से हौसला बढ़ चुका था। लौटते समय रास्ते में पिता का हाथ पकड़कर रोका और बोले- मुझ पर भरोसा रखो, बड़ा पास हुआ हूं तो एक दिन बड़ा अफसर ही बनूंगा

12वीं में प्रदेश सूची में 7वे स्थान पर रहे। बीए आनर्स में राजस्थान विश्वविद्यालय टॉप किया। इसके बाद बहरोड़ के गंडाला राउमावि. में क्लर्क बन गए। पढ़ाई जारी रखी, एक साल बाद क्लर्क की नौकरी छोड़ दी। बतौर प्राइवेट स्टूडेंट राजनीति विज्ञान में एमए किया, बीएड भी। नेट, स्लेट, जेआरएफ करने के साथ पीएचडी भी पूरी कर ली। कुछ समय के लिए टोंक जिले के देवली राजकीय महाविद्यालय में बतौर राजनीति विज्ञान व्याख्याता भी रहे। 2001 में आरएएस एलाइड परीक्षा पास की। भरतपुर में देवस्थान विभाग में बतौर निरीक्षक करीब पांच वर्ष तक नौकरी की।

शर्मा ने पढ़ाई जारी रखी और 2005 में आईएएस परीक्षा में सामान्य वर्ग में वे 27वीं रैंक पर रहे। सौ फीसदी बहरापन होने से रिजेक्ट हो गए। 2006 में फिर आईएएस परीक्षा में 378वीं रैंक पर आए, इस बार फिर अयोग्य करार दिए गए। हिम्मत टूट रही थी, मगर तीसरी बार फिर कोशिश की। 2009 में एक बार फिर आईएएस परीक्षा उत्तीर्ण की। शर्मा के मुताबिक उस समय तक आंशिक बहरेपन वाले अभ्यर्थियों के लिए आरक्षण लागू हो गया था, मगर वह सौ फीसदी बहरे थे।
लोगों की मदद से ऑपरेशन करवाया जिसके बाद उन्हें आंशिक तौर पर सुनाई देने लगा। वे मेडिकल बोर्ड में गए, शर्मा की लिप रीडिंग में विलक्षण प्रतिभा थी। बोर्ड सदस्यों के सवालों के जवाब इस ढंग से दिए कि सब चकरा गए। मशीनें उनके सौ फीसदी बहरेपन की पुष्टि कर रही थी, मगर उनकी कार्यशैली बता रही थी कि बहरापन आंशिक है। काफी जद्दोजहद के बाद शर्मा को आंशिक बहरे का प्रमाण पत्र दिया गया। पीएमओ की पहल पर शर्मा को योग्य मानते हुए 2010 में मणिपुर कैडर दिया गया। दो साल पहले उन्होंने कैडर बदलने के लिए पीएमओ में प्रार्थना पत्र दिया। तीन महीने पहले ही 9 फरवरी 2015 को नूंह मेवात के एडीएम कम जिला परिषद सीईओ पद पर लगाया गया।

साभार - दैनिक भास्कर 

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क्रांतिदूत: पिता मजदूर, मां दृिष्टहीन, स्वयं बहरे फिर भी बने आईएएस !
पिता मजदूर, मां दृिष्टहीन, स्वयं बहरे फिर भी बने आईएएस !
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http://www.krantidoot.in/2015/05/deaf-ias-maniram-sharma-story.html
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