अटाली के दंगे बनाम मेवात की कहानी !

राष्ट्रीय मीडिया ने अटाली गाँव में हुए दंगों की एक पक्षीय तस्वीर प्रस्तुत की है | यह इस बात का भी प्रमाण है कि हमारे मीडियाकर्मी सामान्य...

राष्ट्रीय मीडिया ने अटाली गाँव में हुए दंगों की एक पक्षीय तस्वीर प्रस्तुत की है | यह इस बात का भी प्रमाण है कि हमारे मीडियाकर्मी सामान्यतः उस क्षेत्र की भौगोलिक और ऐतिहासिक प्रष्ठभूमि से भी कितने अनजान हैं ? वस्तुतः वल्लभगढ़ के नजदीक स्थित वह गाँव मेवात क्षेत्र में आता है | मेवात का यह क्षेत्र हरियाणा के चार जिलों और राजस्थान के तीन जिलों से मिलकर बना है | 

मेवाती मुसलमान मूलतः राजपूत थे | सुलतान गयासुद्दीन बलवन के शासनकाल में उनका जबरन धर्मांतरण किया गया था | मुस्लिम इतिहासकारों ने भी इस तथ्य को स्वीकार किया है कि उस दौरान जिन लोगों ने इस्लाम नहीं कबूला, उनका बड़े पैमाने पर नरसंहार किया गया था | यहाँ तक कि जिहादी तलवार से महिलायें और बच्चे भी नहीं बचे थे | इस क्षेत्र के धर्मान्तरित मुसलमानों ने स्वयं को मेव कहना शुरू कर दिया था |

वे भले ही मुसलमान बन गए थे किन्तु भारतीय संस्कृति से अपना नाता नहीं तोड़ पाए | 800 वर्ष गुजरने के बाद भी 1920 तक उनमें से अधिकाँश के नाम हिन्दू होते थे तथा वे होली, दशहरा, दीवाली आदि हिन्दू पर्व धूमधाम से मनाते थे | उनके गाँवों में हिन्दू मंदिर भी बहुतायत से थे, जिनमें वे पूजा अर्चना भी करते थे |

आर्यसमाज के स्वामी श्रद्धानंद जी ने शुद्धि आन्दोलन प्रारम्भ कर इन लोगों को पुनः वापस अपने मूल धर्म में लाकर हिन्दू बनाने का अभियान प्रारम्भ कर दिया | और जैसा कि सबको मालूम है कि, उनकी ह्त्या कर दी गई | साथ ही इस शुद्धि आन्दोलन के जबाब में 1926 में इस इलाके में तबलीगी आन्दोलन शुरू हुआ | देवबंद से एक कट्टर सुन्नी मौलवी मौलाना मोहम्मद इलियास कान्धलवी ने यहाँ आकर मेवों के बीच इस बात का जोरदार अभियान चलाया कि वे हिन्दू रीति रिवाज पूरी तरह छोड़कर पक्के मुसलमान बन जाएँ | 

और इसके बाद एक बार फिर शूरू हुआ कट्टरवाद का कहर | मेव जो पहले गौ ह्त्या नहीं करते थे, लेकिन तबलीगी जमातों ने आ आकर अपने साथ उन्हें भी गौमांस भक्षण को विवश भी किया और प्रेरित भी | और उसके बाद तो गौकशी उस इलाके में आम हो गई | और देखते देखते यह क्षेत्र मुस्लिम लीग का प्रमुख गढ़ बन गया | 1947 में विभाजन की मांग भी यहाँ से बड़े जोरशोर से उठी | 

यहाँ तक कि देश के विभाजन के बाद तीन लाख मेव अपना बोरिया बिस्तर बांधकर पाकिस्तान जाने के लिए निकल भी पड़े | लेकिन मौलाना आजाद दिल्ली के पुराने किले के पास लगे केम्प से उन्हें वापस ले आये | आजाद ने उन्हें समझाया कि हम तो पूरे देश के शासक रहे हैं, पाकिस्तान जाकर अपना अधिकार क्यों छोड़ना ? हमारा लक्ष्य तो देर सबेर पुनः दिल्ली की गद्दी पर काबिज होना है | मौलाना आजाद ने साम्प्रदायिकता की जो आग जलाई, उसे उन्होंने लोकसभा चुनाव में केश भी किया और वे गुडगाँव के मेव बहुल इलाके से सांसद चुन लिए गए | 

साम्प्रदायिकता की यह चिंगारी 1992 में ज्वाला बनकर धधक उठी | रामजन्मभूमि आन्दोलन की प्रतिक्रिया में जो दंगे हुए, उनमें इलाके के 26 हिन्दू मंदिर जला दिए गए | आज भी यह क्षेत्र पाकिस्तानी गुप्तचर एजेंसी आईएसआई का गढ़ माना जाता है | गत तीन वर्ष में यहाँ से एक दर्जन से अधिक पाकिस्तानी गुप्तचर पकडे गए हैं, जिनमें तीन इमाम भी शामिल थे  | अब इस प्रष्ठभूमि में जब अटाली गाँव का विचार किया जाए तो तस्वीर का सही स्वरुप सामने आता है और समस्या का मूल लवजिहाद दिखाई देता है |

गाँव की कुल आवादी 4000 है, जिनमें मुस्लिम परिवार 400 हैं | दो वर्ष पूर्व नौसाद नामक एक युवक ने हिन्दू जाट किशोरी का अपहरण कर उससे निकाह कर लिया | जब उस घर में वालिका पैदा हुई तो मुस्लिम महिलाओं ने हिन्दू महिलाओं को ताना दिया कि अब भात(छूछक) लेकर आओ हमारे नौसाद के यहाँ | हिन्दुओं से अपनी लड़कियां नहीं संभाली जातीं आदि आदि | 

और इतना ही नहीं तो गाँव के इकलौते मंदिर के पास पहले तो कब्रिस्तान बनाया गया और फिर वहां मस्जिद बनाना प्रारम्भ कर दिया गया | इन घटनाओं ने आग में घी का काम किया और दंगा भड़क उठा | 

अब सवाल यह है कि तेजी से फैलते बैमनस्य को कम कैसे किया जाये ? कम से कम इकतरफा समाचारों के प्रसारण से और तुष्टीकरण से तो यह होने से रहा | देश में जिस प्रकार धर्म प्रचार के लिए मुस्लिम जमातें निकलती हैं, उसी तर्ज पर हिन्दू-मुस्लिम संत और उलेमा साथ साथ पारस्परिक सद्भाव के लिए भी निकल सकते हैं ? शान्ति और सहअस्तित्व के लिए सर्वाधिक आवश्यकत तो इसी बात की है | पर शायद वोटपरस्ती के चलते यह हो पाना बहुत कठिन है | फुट डालो और राज करो की नीति यह कभी होने नहीं देगी |


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