आपातकाल और शिवपुरी के कार्यकर्ताओं का संघर्ष

१९७४ में श्री जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में प्रारम्भ हुआ छात्रों का नव निर्माण आन्दोलन गुजरात वा उसके बाद बिहार से होता हुआ पूरे देश मे...


१९७४ में श्री जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में प्रारम्भ हुआ छात्रों का नव निर्माण आन्दोलन गुजरात वा उसके बाद बिहार से होता हुआ पूरे देश में फ़ैल गया ! भ्रष्टाचार, कोटा परमिट राज, लाल फीताशाही के विरुद्ध पूरा देश उठ खड़ा हुआ ! विद्यार्थी परिषद् ने भी इस आन्दोलन में अग्रणी भूमिका निर्वाह की ! तभी इलाहावाद उच्च न्यायालय ने अपने आदेश से श्रीमती इंदिरा गांधी का चुनाव अवैध घोषित कर दिया ! भ्रष्ट आचरण के आरोप में चुनाव निरस्त किये जाने से क्षुव्ध श्रीमती इंदिरा गांधी ने २५ जून १९७५ अर्द्ध रात्री में देश पर आपात काल थोपकर सभी दिग्गज राजनेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं को जेलों में ठूंस दिया ! विरोधी दलों के नेता ही नही वल्कि कांग्रेस में भी श्रीमती गांधी से मतभेद रखने बाले मोरार जी देसाई, चन्द्र शेखर, मोहन धारिया, राम धन, कृष्ण कान्त जैसे नेता भी मीसा के अंतर्गत जेलों में ठूंस दिए गए ! MISA अर्थात भारत रक्षा अधिनियम (Maintenance of Internal Security Act) ! गोया सभी लोग देश के लिये खतरा बन चुके हों ! देश भर में लाखों देशभक्त राष्ट्र वादी नेता इंदिरा जी की कुर्सी परस्ती की खातिर जेल में पहुँच गए ! 

तत्कालीन जनसंघ नेतृत्व - बाबूलाल गुप्ता, गुलाब चन्द्र शर्मा,
सुशील बहादुर अष्ठाना, कौशल चन्द्र जैन, बनवारीलाल अग्रवाल
शिवपुरी में भी सर्व श्री सुशील बहादुर अष्ठाना, घनश्याम भसीन, जगदीश वर्मा, हरदास गुप्ता, भगवान लाल पाराशर, बाबूलाल गुप्ता, दामोदर शर्मा, कृष्ण कान्त रावत, बैजनाथ छिरोलिया, रामजी दास बंसल, चन्द्र भान पटेल, उत्तम चन्द्र जैन, बाबूलाल जी शर्मा, मुन्नालाल गुप्ता, गोपाल सिंघल प्रारम्भिक दौर में ही गिरफ्तार कर लिये गए ! ये तो वे लोग हैं जिन्हें गिरफ्तार कर मीसा में भेजा गया ! उन लोगों की संख्या तो २०० से ज्यादा थी जिन्हें १५१ में गिरफ्तार कर माफीनामा लिखवाकर जमानत पर रिहा किया गया !

जहां एक ओर देवकांत बरुआ इंदिरा इज इण्डिया एंड इण्डिया इस इंदिरा कह कर मां भारती का अपमान कर रहे थे तो सरकारी संत बिनोवा भावे जैसे लोगों ने भी आपातकाल को अनुशासन पर्व की संज्ञा दी !

शिवपुरी महाविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष व विद्यार्थी परिषद् के प्रांतीय महामंत्री श्री गोपाल डंडोतिया जी के पिताजी तृतीय श्रेणी कर्मचारी संघ के अध्यक्ष थे, अतः पूर्व सूचना मिल जाने के कारण गोपाल जी भूमिगत हो गए | एक माह तक वे पुलिस के हाथ नहीं आये | प्रशासन ने दबाब बनाया कि यदि वे हाजिर नहीं होंगे तो पिताजी श्री रामचरण लाल जी डंडोतिया को मीसा में बंद कर दिया जाएगा | नौकरी जायेगी सो अलग | विवश होकर तय किया गया कि गोपाल जी गिरफ्तारी दें | किन्तु गोपाल जी ने तय किया कि सीधे सादे ढंग से गिरफ्तारी नहीं देंगे, गिरफ्तार भी होंगे तो शान से, सम्मान से | सत्याग्रह करके गिरफ्तारी देंगे |

लम्बे समय बाद गोपाल जी शिवपुरी आये तथा मीसावंदी परिवारों में मिलने जुलने पहुंचे | पुलिस को भनक लग गई कि वे शिवपुरी में आ चुके हैं | किसी ने सूचना दी कि वे हरिहर के घर महादेव मंदिर पर रुके हैं | तत्कालीन स्टेशन ऑफीसर श्री त्यागी ने एक कांस्टेबल को भेजकर मुझे बुलवाया | परिवार में सबको लगा कि आज हरिहर भी गया मीसा में | मैंने भी पिताजी माताजी के चरण स्पर्श किये और कांस्टेबल के साथ हो लिया | घर से कुछ दूर पर ही धर्मशाला के सामने त्यागी जी खड़े थे | उन्होंने पूछा क्यों गोपाल आया था क्या ? मैंने मुस्कुराकर कहा “क्यों परेशान हो रहे हो त्यागी जी, वे तो आये ही गिरफ्तारी के लिए हैं | बस उसके पहले सबसे मिलजुल रहे हैं |” त्यागी जी को मेरी बात पर पूरा भरोसा था | फिर भी सुनिश्चित करने के लिए दुबारा पूछा “सच में गिरफ्तारी देने ही आया है न ?” मेरे हाँ कहने पर वे निश्चिन्त होकर चले गए |

एक अन्य मित्र श्री दिनेश गौतम (अब स्वर्गीय) का भी वारंट था | जब उनके परिवार को पता चला कि गोपाल जी गिरफ्तारी दे रहे हैं, तो उन्होंने आग्रह किया कि दिनेश भी साथ में ही गिरफ्तारी दे दें | दूसरे दिन गोपाल जी और दिनेश जी मेरे घर से ही सर पर काला कपड़ा बाँध कर सत्याग्रह के लिए शहर की सडकों पर निकले | महादेव मंदिर के बगीचे में ही पूरे परिवार ने उन्हें विदाई दी | (उसी अवसर का चित्र)

25 जुलाई 1975 प्रातः दस बजे दोनों महादेव गली से सदर बाजार, माधव चौक, कमलागंज आदि में घूमते हुए नारे लगा रहे थे – इंदिरा तेरी तानाशाही नहीं चलेगी, ओ हिटलर की चाल चलेगा वो कुत्ते कि मौत मरेगा, नरक से नेहरू करे पुकार मत कर बेटी अत्याचार | उनके पीछे सेंकडों की संख्या में हुजूम हो गया | उस समय के माहौल में जब यह पता न हो कि गिरफ्तारी के बाद कब छूटेंगे, छूटेंगे भी या नहीं, इस प्रकार स्वयं को गिरफ्तारी के लिए प्रस्तुत करना, निश्चय ही बड़े जीवट का काम था | कई दूकानदार व नगरवासी उस समय आंसू पोंछते दिखाई दिए | ये लोग पूरे शहर में घूमते रहे, किन्तु कोई गिरफ्तार करने ही नहीं आया | कुछ तो उमड़ा हुआ अन सैलाब, और कुछ पुलिस की भी उनके प्रति आतंरिक सहानुभूति | अंततः बहुत देर बाद उन्हें गिरफ्तार करने पुलिस अधिकारी पहुंचे |

गिरफ्तारी के बाद इन लोगों को शिवपुरी जेल में रखा गया | तीन लोगों के लिए उपयुक्त कमरे में 18 मीसाबंदी ठूंसे गए | रात को सोते समय यदि किसी को करबट लेना हो तो बगल वाले को कहना पड़ता था कि भैया जरा तू भी करबट ले ले | कुछ बुजुर्ग मीसाबंदियों के आग्रह के कारण जेल की मेस में बने भोजन के स्थान पर स्वयं भोजन बनाकर करने का तय हुआ | मेनुअल के अनुसार जो भोजन सामग्री मिलती थी, वह कितनी अपर्याप्त होती थी, इसका एक रोचक उदाहरण है | सबके हिस्से में चार रोटी और दाल आती थी | एक मीसाबंदी की खुराक कुछ अधिक जानकर सर्व श्री मुन्नालाल गुप्ता, गोपाल डंडोतिया व अशोक पांडे ने अपने हिस्से की एक एक रोटी उनको देना तय किया | कुछ समय पश्चात जब उक्त मीसाबंदी से पूछा कि भैया अब तो पेट भर जाता होगा न ? तो उन्होंने रूहांसे स्वर में जबाब दिया, भाई साहब इनसे क्या होता है, मैं तो इतनी ही और खा सकता हूँ | स्मरणीय है कि उस समय गोपाल जी की आयु भी मात्र 24 वर्ष ही थी |

जेल में समय बिताने के लिए नियमित दिनचर्या बनाई गई | सुबह नित्यकर्म उपरांत व्यायाम स्वाध्याय, गीता पाठ फिर भोजन बनाने की सामूहिक तैयारी | दोपहर में कुछ बौद्धिक कार्यक्रम, चर्चा, प्रतियोगिता आदि | यही क्रम मार्च 1976 तक चला | तब तक कई लोग माफी मांगकर छूट छाट गए और शेष लोग ग्वालियर सेन्ट्रल जेल शिफ्ट कर दिए गए, जहां का जीवन अपेक्षाकृत बेहतर था | 

भय वा आतंक के एसे समय में जब सामान्य व्यक्ति मीसावंदियों के परिवार से दूर रहने में ही अपनी भलाई समझ रहा था, तब मीसावंदी परिवारों के सुख दुःख की चिंता करने, उन्हें दिलासा देने का काम संभाला सर्व श्री रमेश जी गुप्ता, प्रोफ़ेसर राम गोपाल जी त्रिवेदी, जगदीश गुप्ता, ओम खेमरिया, पुरुषोत्तम गुप्ता आदि स्वयं सेवकों ने ! 

जेल जीवन से घवराये अनेक नेताओं ने येन केन प्रकारेण, माफी मांगकर मुक्त होने में ही भलाई समझी, तब भी संघ के आदर्श स्वयं सेवकों ने हिम्मत नहीं हारी ! सबसे ज्यादा निराश किया तत्कालीन विधायक सुशील बहादुर अष्ठाना ने ! तब तक उनकी छवि एक जुझारू नेता की थी, किन्तु उन्होंने न केवल माफी माँगी, दूसरे जनसंघ नेताओं को माफी माँगने के लिए प्रेरित किया, बल्कि राज्यसभा चुनाव में जनसंघ के अधिकृत प्रत्यासी रामहित गुप्त के खिलाफ वोट किया ! स्वाभाविक ही इसके बाद तो उन्हें मुक्त होना ही था ! 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एकमात्र संगठन निकला जिसने इस आपाधापी का मुखर विरोध किया ! १४ नवम्बर १९७५ से देशव्यापी सत्याग्रह आन्दोलन का श्री गणेश हुआ ! जवाहरलाल नेहरू के जन्म दिवस से देश में नारे गूंजने लगे " नरक से नेहरू करे पुकार, मत कर बेटी अत्याचार" और जो हिटलर की चाल चलेगा, वो कुत्ते की मौत मरेगा" आदि आदि ! जहां एक ओर आम जन में अत्याधिक भय वा आतंक का साम्राज्य तो दूसरी ओर आत्माहुति की भावना से ओतप्रोत एसे स्वर !

व्यूह रचना हेतु शिवपुरी में संघ के विभाग प्रचारक श्री लक्ष्मण राव तराणेकर जी, जनसंघ के संगठन मंत्री श्री बसंत राव निगुडीकर, संघ प्रचारक अपारवल सिंह जी कुशवाह आदि लोगो का आना जाना शुरू हुआ ! शिवपुरी के अधिकाँश जाने माने राजनेता या तो जेल में थे अथवा अपने घुटने टेक, क्षमा याचना कर फासिस्ट विरोधी सम्मेलनों के आयोजक बनकर संघ को गाली देने बालों के साथ खड़े हो चुके थे ! अतः विवशतः २२ वर्षीय किशोर इस हरिहर को भूमिगत सत्याग्रह आन्दोलन का संयोजक बनाया गया ! मैं उन दिनों विद्यार्थी परिषद् का जिला संगठन मंत्री हुआ करता था | 

मोहना के नजदीक स्थित सुल्तानगढ़ के जंगल में एक गोपनीय बैठक हुई, जिसमें सत्याग्रह की व्यूह रचना बनी ! ग्वालियर के एक कार्यकर्ता श्री सुधाकर गोखले की शिंदे की छावनी स्थित दूकान विविध बस्तु भण्डार को सूचनाओं के आदान प्रदान के लिए नियत किया गया ! वहां से ही बाद में एक डुप्लीकेटिंग मशीन बाद में प्राप्त हुई ! श्री विमलेश गोयल को सह संयोजक बनाया गया, किन्तु मार्ग दर्शक की भूमिका में परदे के पीछे से वरिष्ठ प्रचारक श्री अपारबल सिंह कुशवाह, महाविद्यालय में व्याख्याता श्री डा. राम गोपाल जी त्रिवेदी वा भारतीय खाद्य निगम कर्मचारी श्री रमेश जी गुप्ता रहे ! मूलतः भिंड निवासी अपारबल सिंह जी उन दिनों अलग अलग घरों में रहा करते थे ! वे किसी परिवार में बच्चों के मामा तो कहीं ताऊ तो कहीं भाई बनकर रहे ! दिनेश स्वयं मीसाबंदी के रूप में जेल में थे, किन्तु उनके परिवार ने अद्भुत साहस दिखाया, व भूमिगत आन्दोलन में पूर्ण सहयोग किया ! डुप्लीकेटिंग मशीन पिपरसमा गाँव में श्री दिनेश गौतम के खलिहान में ही छुपाकर रखी गई ! जहाँ से हस्त लिखित पेम्पलेट छापकर रात के समय घरों में और दुकानों में डाल दिए जाते थे ! इन पर्चों ने जन जागरण में बड़ा योगदान दिया !

१४ नवम्बर को पहला सत्याग्रही जत्था श्री महावीर प्रसाद जैन के नेतृत्व में निकला ! इसमें सर्व श्री महावीर प्रसाद जैन, लक्ष्मीनारायण गुप्ता, रमेश उदैया, प्रदीप भार्गव वा अशोक शर्मा शामिल थे ! अशोक शर्मा की आयु तो महज १६ वर्ष ही थी बही लक्ष्मीनारायण गुप्ता की अगले ही दिन सगाई होने बाली थी ! जत्थे में शामिल महावीर प्रसाद जैन, लक्ष्मीनारायण गुप्ता, अशोक शर्मा को मीसावंदी के रूप में शिवपुरी जेल भेज दिया गया ! इस जत्थे में शामिल प्रदीप भार्गव पूर्व में अनेक प्रकरणों में पुलिस के मुखबिर रह चुके थे | इस बार भी उन्होंने वही भूमिका अदा की तथा प्रशासन को जानकारी मिल गई कि इस आन्दोलन का सूत्रधार कौन है | परिणाम स्वरुप मुझे भूमिगत होना पडा | यह वह समय था जब सहयोगियों का पूर्णतः अभाव था | कोई अपने घर में ठहराने को तैयार नहीं होता था | मेरे चाचाजी श्यामसुंदर जी त्रिवेदी कांग्रेस के नेता हुआ करते थे | कुछ समय तो उनके यहाँ रहा, किन्तु आन्दोलन का संचालन उनके यहाँ से करना कठिन मानकर अधिकाँश समय पिपरसमा, तानपूर आदि गाँवों में तो कई बार रात जंगलों में भी गुजारनी पडी | 

ऐसे में तत्कालीन राज्यपाल का कार्यक्रम शिवपुरी में तय हुआ | आन्दोलन के उस दौर में प्रशासन के हाथ पाँव फूल गए, कि कहीं ऐसा न हो कि राज्यपाल के कार्यक्रम में प्रदर्शन हो जाए | उन्हें जानकारी मिल ही चुकी थी कि मैं इस आन्दोलन का संयोजक हूँ | मेरे वृद्ध पिताजी को पुलिस कोतवाली में बैठा लिया गया, इकलौता पुत्र होने के कारण पुलिस को आशा थी कि मैं स्वतः गिरफ्तारी के लिये स्वयं को प्रस्तुत कर दूंगा ! किन्तु संघ प्रचारकों के आग्रह के चलते इच्छा होने के बावजूद मैं एसा ना कर सका ! पिताजी बैसे ही तो वृद्ध ऊपर से एक प्राचीन शिव मंदिर के पुजारी ! उन्होंने कोतवाली में कुछ भी आहार नहीं लिया ! अंततः २४ घंटे में ही पिताजी की भूख हड़ताल के चलते प्रशासन में भी कुछ इंसानियत जगी और राज्यपाल के कार्यक्रम के बाद पिताजी मुक्त हुए ! मैंने भी राहत की सांस ली और दूने मनोयोग से सत्याग्रह की तैयारियों में जुट गया ! 

इस गिरफ्तारी के कारण इतना अवश्य हुआ कि राज्यपाल के कार्यक्रम में हम कोई व्यवधान नहीं डाल पाए | उनके जाने के बाद श्री गुलाब चन्द्र शर्मा के नेतृत्व में दूसरा जत्था शहर की सडकों पर "नरक से नेहरू करे पुकार, मत कर बेटी अत्याचार" का नारा गुंजाते निकला ! इस जत्थे में शामिल गुलाब चन्द्र शर्मा, लक्ष्मण व्यास, महेश गौतम वा ओमप्रकाश शर्मा'गुरू' को भी मीसा के अंतर्गत गिरफ्तार कर शिवपुरी जेल भेज दिया गया ! २० दिसंबर को अंतिम सत्याग्रही जत्था श्री कामता प्रसाद बेमटे, श्री मोहन जोशी वा श्री सीताराम राठोर का निकला ! पुलिस ने कामता जी के साथ बेरहमी से मारपीट भी की !

२५ दिसंबर को विमलेश गोयल पुलिस की पकड़ में आगये ! अकेले रह जाने के बाद मैने पेम्पलेट छापने वा वितरित करने भर तक स्वयं को सीमित कर लिया ! कालेज में दिन दहाड़े खुले आम पेम्पलेट वितरण करने पर मेरे खिलाफ डी आई आर में मुक़दमा कायम कर दिया गया ! अंततः मुझे भी ६ जून १९७६ को साइकिल द्वारा पिपरसमा गाँव से लौटते समय एक कांस्टेबल ने देख लिया और मेरा पीछा किया ! मुझसे गलती यह हुई कि मैं कस्टम गेट के पास स्थित प्रेम जी शर्मा के घर में छुपा, किन्तु साईकिल घर के दरवाजे पर ही छोड़ दी ! पीछे पीछे आये कांस्टेबिल अशोक तथा एस आई राजेन्द्र सिंह रघुबंशी ने साइकिल पहचान ली और मैं भी ग्वालियर केन्द्रीय काराग्रह में भेज दिया गया ! मुझे गिरफ्तार करने बाले कांस्टेबल अशोक सिंह तथा ऐ एस आई राजेन्द्र सिंह रघुवंशी को दो दो इन्क्रीमेंट मिले, मानो मैं ना हुआ कोई डकैत हो गया ! मध्य भारत का मैं इकलौता शख्स था जिस पर मीसा में निरुद्ध करने के साथ साथ डी आई आर का मुक़दमा भी चलाया गया ! 

जेल से ही तत्कालीन कलेक्टर श्री अतुल सिन्हा को दीपावली के अवसर पर पोस्ट कार्ड द्वारा जो दीपावली अभिनन्दन भेजा उस से प्रभावित होकर वे मेरे लम्बे समय के लिये आत्मीय बन गए !

आज हम उगलते हैं अँधेरे, 

निगलते है प्रकाश,

जो डूब जाता है कहीं गहरे,

अंतस की कालिख में  !

काश दीपक दे सके प्रेरणा उत्साह,

सिखा पाए हमको भी पीना अँधेरे !!

कैसे बना बाती खुद की,

दुनिया से तमस हटाया जाए !

अमावस की अंधियारी रात में,

यही तो दीपक सिखाये !!


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