हे अमर बलिदानी आजाद - शत शत प्रणाम -फ़िरदौस ख़ान

23 जुलाई जयंती पर विशेष हिंदुस्तान को फ़िरंगियों की ग़ुलामी से आज़ाद कराने के लिए इस धरती के सपूतों ने अपनी जान तक कुर्बान कर दी, लेकि...

23 जुलाई जयंती पर विशेष

हिंदुस्तान को फ़िरंगियों की ग़ुलामी से आज़ाद कराने के लिए इस धरती के सपूतों ने अपनी जान तक कुर्बान कर दी, लेकिन यह हमारे देश की बदक़िस्मती ही है कि राजनेताओं ने इस आज़ादी को केवल सत्ता हासिल करने का ज़रिया ही समझा. देश की अधिकांश आबादी आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रही है. एक तरफ़ मुट्ठी भर लोग गगनचुंबी इमारतों में बैठकर ऐश की ज़िंदगी जी रहे हैं, तो दूसरी तरफ़ लाखों लोग खुले आसमान के नीचे ज़िंदगी गुज़ारने के लिए मजबूर हैं. यह कैसी आज़ादी है, जहां जनता के साथ समान बर्ताव नहीं किया जाता है. महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद समाजवादी शासन व्यवस्था के घोर समर्थक थे. उनके प्रति यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि हम उनके सपने को साकार करें. चंद्रशेखर आज़ाद का बलिदान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत है.

चंद्रशेखर आज़ाद का जन्म 23 जुलाई, 1906 को मध्य प्रदेश के अलीराजपुर रियासत के गांव भावरा में हुआ था. उनके पिता उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िले के गांव बदर के रहने वाले थे. आज़ाद के पिता पंडित सीताराम तिवारी अकाल के वक्त अपना पैतृक गांव छोड़कर मध्य प्रदेश के अलीराजपुर रियासत के गांव भावरा में बस गए, जो अब झाबुआ ज़िले में आता है. यहीं चंद्रशेखर का बचपन बीता. बड़ा होने पर वे माता-पिता को छोड़कर बनारस चले गए, जहां उनके फूफा पंडित शिवविनायक मिश्र रहते थे. उन्हीं की मदद से उन्होंने संस्कृत विद्यापीठ में दाख़िला ले लिया और संस्कृत का अध्ययन करने लगे. उन दिनों बनारस में असहयोग आंदोलन की लहर चल रही थी. विदेशी माल न बेचा जाए, इसके लिए लोग दुकानों के सामने लेटकर धरना देते थे. चंद्रशेखर इससे बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने देश को ग़ुलामी की ज़ंजीरों से आज़ाद कराने का प्रण लिया. दरअसल, 1919 में हुए अमृतसर के जलियांवाला बाग़ नरसंहार ने उनको उद्वेलित कर दिया था. इसलिए वे असहयोग आंदोलन में बढ़-चढ़कर शिरकत करने लगे. एक दिन वे धरना देते हुए पकड़े गए. उन्हें पारसी मजिस्ट्रेट मिस्टर खरेघाट की अदालत में पेश किया गया. उन्होंने चंद्रशेखर से उसकी व्यक्तिगत जानकारियों के बारे में पूछना शुरू किया-तुम्हारा नाम क्या है?मेरा नाम आज़ाद है.तुम्हारे पिता का क्या नाम है?मेरे पिता का नाम स्वाधीन है.तुम्हारा घर कहां पर है?मेरा घर जेलख़ाना है.मजिस्ट्रेट मिस्टर खरेघाट इन उत्तरों से चिढ़ गए. उन्होंने चंद्रशेखर को पंद्रह बेंतों की सज़ा सुना दी. जल्लाद ने चंद्रशेखर की निर्वसन देह पर बेंतों के प्रहार किए. हर बेंत के साथ कुछ खाल उधड़कर बाहर आ जाती थी. पीड़ा सहन कर लेने का अभ्यास चंद्रशेखर को बचपन से ही था. वह हर बेंत के साथ महात्मा गांधी की जय या भारत माता की जय बोलते जाते थे. जब पूरे बेंत लगाए जा चुके, तो जेल के नियमानुसार जेलर ने उसकी हथेली पर तीन आने रख दिए. बालक चंद्रशेखर ने वे पैसे जेलर के मुंह पर दे मारे और भागकर जेल से बाहर आ गए. इस पर बनारस के ज्ञानवापी मोहल्ले में उनका नागरिक अभिनंदन किया गया. अब वे चंद्रशेखर आज़ाद कहलाने लगे. 

ग़ौरतलब है कि 1922 में महात्मा गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन बंद कर देने से चंद्रशेखर की विचारधारा में बदलाव आया और वे अहिंसात्मक उपायों से हटकर सशस्त्र क्रांति के समर्थक बन गए. दरअसल, उस वक्त बनारस क्रांतिकारियों का गढ़ था. चंद्रशेखर आज़ाद मन्मथनाथ गुप्त और प्रणवेश चटर्जी के संपर्क में आए और क्रांतिकारी दल के सदस्य बन गए. क्रांतिकारियों का वह दल हिंदुस्तान प्रजातंत्र संघ के नाम से जाना जाता था. इस संगठन के ज़रिए उन्होंने राम प्रसाद बिस्मिल की अगुवाई में पहले 9 अगस्त, 1925 को काकोरी कांड किया और फ़रार हो गए. इसके बाद 1927 में बिस्मिल के चार प्रमुख साथियों के बलिदान के बाद उन्होंने उत्तर भारत की सभी क्रांतिकारी पार्टियों को मिलाकर एक करते हुए हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन ऐसोसिएशन का गठन किया. उन्होंने भगत सिंह के साथ लाहौर में लाला लाजपत राय की मौत का बदला सॉन्डर्स का क़त्ल करके लिया. इसके बाद उन्होंने दिल्ली पहुंच कर असेंबली बम कांड को अंजाम दिया. वे 27 फ़रवरी, 1931 को अपने साथी सुखदेव राज के साथ बैठकर विचार-विमर्श कर रहे थे. मुखबिर की सूचना पर पुलिस अधीक्षक नाटबाबर ने आज़ाद को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में घेर लिया. इस दौरान पुलिस और चंद्रशेखर के बीच गोलीबारी हुई, जिससे उनकी मौत हो गई. कहा जाता है कि चंद्रशेखर ज़िंदा गिरफ्तार नहीं होना चाहते थे, इसलिए उन्होंने ख़ुद पर गोली चलाकर अपनी जान ले ली. वे आज़ाद जिए और आख़िर तक पुलिस के हाथ न आए. ऐसे व्यक्ति युग में एक बार ही जन्म लेते हैं. आज़ाद भारत के सपने का ज़िक्र करते हुए वे अक्सर झूम झूमकर गाते थे-जेहि दिन होईहैं सुरजवाअरहर के दलिया, धान के भतुआ खूब कचरके खैबेना अरे जेहि दिन होई हैं सुरजवा 

मगर देश की आज़ादी को वे अपनी आंखों से नहीं देख पाए. हालांकि चंद्रशेखर आज़ाद के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर असंख्य युवाओं ने क्रांति के मार्ग पर क़दम बढ़ाए. देश की आज़ादी के लिए भारतीय क्रांतिकारियों के त्याग को कभी भुलाया नहीं जा सकता है-ज़ालिम फलक ने लाख मिटाने की फ़िक्र कीहर दिल में अक्स रह गया, तस्वीर रह गईहे अमर बलिदानी तुझे शत शत प्रणाम. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

राजकमल प्रकाशन की पुस्तक "चन्द्रशेखर आज़ाद" के अंश

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