संसद में शोर शराबा - पलायन या फरेब - सुरेश हिन्दुस्थानी

भारत की संसद में जिस प्रकार से सरकार पर हमला बोला जा रहा है, उससे देश को बहुत बड़ी क्षति हो रही है। आज देश में भले ही राजनीतिक सत्ता परि...


भारत की संसद में जिस प्रकार से सरकार पर हमला बोला जा रहा है, उससे देश को बहुत बड़ी क्षति हो रही है। आज देश में भले ही राजनीतिक सत्ता परिवर्तित हो चुकी है, लेकिन संसद में जिस प्रकार की राजनीति कांग्रेस के शासनकाल में शुरू हुई थी, उसी का परिपालन करते हुए कांग्रेस संसद के सत्र को अवरोधित करती दिखाई दे रही है। इससे संसद का महत्वपूर्ण समय फिजूल ही जा रहा है। संसद अगर आगे भी इसी प्रकार के हंगामे की भेंट चढ़ती रही तो आने वाले दिनों में देश की जनता का लोकतंत्र के इस मंदिर से ही विश्वास उठ जाएगा।

वर्तमान में कांग्रेस की हालत देखकर निश्चित ही यह कहा जा सकता है कि वह राजनीति करने के लिए अपने लिए मुद्दे तलाश कर रही है, जैसे ही कोई मुद्दा मिलता है, वैसे कांग्रेस उस पर सवार होकर राजनीति करने लगती है। कैसी विचित्र बात है कि जब कांग्रेस केन्द्र की सत्ता पर काबिज थी, तब उसने भाजपा द्वारा उठाई गई चर्चा कराने की मांग को सिरे से ठुकरा दिया था। किन्तु आज सरकार द्वारा चर्चा कराए जाने की बात स्वीकार कर लेने के बाद आज भी कांग्रेस चर्चा से पीछे हटती हुई दिखाई दे रही है। 

कांग्रेस नेता शायद इस बात को भलीभांति जानते हैं कि चर्चा कराने पर कांग्रेस की बची हुई साख भी धूमिल हो जाएगी। क्योंकि कांग्रेस के शासनकाल में देश ने भ्रष्टाचार का जो रूप देखा कांग्रेस उससे पहले ही कटघरे में खड़ी है, आज अगर भ्रष्टाचार पर चर्चा होती है तब यह घेरा और बड़ा ही होगा, यह तय माना जा रहा है। हो सकता है कांग्रेस इसी डर के कारण ही चर्चा से दूर भाग रही है। यह बात सही है कि किसी भी विवाद का हल चर्चा से ही निकाला जा सकता है। अगर चर्चा नहीं होगी, तो ऐसे प्रकरणों का हल निकल ही नहीं सकता।

यह समझ से परे है कि मध्यप्रदेश के व्यापम घोटाले को लेकर जब केन्द्रीय जांच ब्यूरो ने अपनी जांच प्रारंभ कर दी है, तब इस मुद्दे को संसद में उठाने की क्या जरूरत ? क्योंकि पहली बात तो यह है कि जांच का विषय ही यह होता है कि अपराधी को सामने लाया जाए, लेकिन जांच की प्रतीक्षा किए बिना ही कांग्रेस ने अपराधी घोषित कर दिया। इसके विपरीत हम यह भी जानते हैं कि कांग्रेस की सरकारों ने ऐसे मुद्दों पर कभी भी किसी मंत्री का त्याग पत्र नहीं दिलवाया। कांग्रेस के नेताओं का स्पष्ट कहना होता था कि जब तक आरोप सिद्ध नहीं हो जाता तब तक किसी को आरोपी नहीं माना जा सकता। कांग्रेस ने अपने मंत्रियों को केवल उसी स्थिति में हटाया, तब न्यायालय ने उन पर आरोप तय कर दिए। ऐसे में क्या कांग्रेस को यह अधिकार है कि वह भ्रष्टाचार (जो अभी जांच के दायरे में है) के मामले में किसी का त्याग पत्र मांगे।

लोकसभा और राज्यसभा में किसी विवादित मुद्दे पर बहस होना एक स्वस्थ प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन यह बहस शोर शराबा का आधार नहीं बनना चाहिए। वास्तव में बहस के बाद ही किसी ठोस नजीजे पर पहुंचा जा सकता है, और सरकार व विपक्षी दल दोनों को ही बहस के बाद जो निर्णय निकलता है उसका अनुपालन करना चाहिए। शोर शराबा करने से संसद में कोई काम काज नहीं होता। यह शोर शराबा निश्चित रूप से देश के साथ एक धोखा है, फिर चाहे वह कांग्रेस करे अथवा भाजपा। कांग्रेस ने संसद में जो मुद्दे उठाए हैं, वह निश्चित रूप से उठना ही चाहिए, क्योंकि महंगाई, भ्रष्टाचार और व्यापम घोटाला वर्तमान में राजनीतिक दलों के लिए संजीवनी प्रदान कर रहा है, अगर केन्द्र सरकार इस बारे में शीघ्र ही निर्णय नहीं लेती तो इसके बारे में जिस भ्रम का संदेश जनता में जाएगा, उससे फिर सरकार भी नहीं बच पाएगी। इसलिए केन्द्र सरकार के मुखिया नरेन्द्र मोदी को अपनी सरकार की योजना के अनुसार अच्छे दिन लाने की तर्ज पर इन प्रकरणों का पटाक्षेप करना ही चाहिए।

इसमें एक बात यह भी सामने आ रही है कि कांग्रेस वर्तमान में जिस प्रकार से बहस से भाग रही है। उससे शायद कांग्रेस को ही नुकसान होने वाला है। क्योंकि कांग्रेस इस बात को जानती है कि पिछले चुनाव में जनता ने भ्रष्टाचार को कांग्रेस का पर्याय मान लिया था। उस चुनाव में जिस प्रकार का प्रचार किया गया उससे कांग्रेस का चेहरा भ्रष्टाचार युक्त नजर आया। वर्तमान में जनता इस बात को भूल गई होगी ऐसा कदापि नहीं लगता, लेकिन कांग्रेस अब राजनीति के माध्यम से इस भ्रष्टाचार के मुद्दे को भाजपा के पाले में ले जाना चाहती है। कांग्रेस ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर फिलहाल तो केन्द्र सरकार को निशाने पर ले लिया है, लेकिन कांग्रेस को यह भी पता है कि भ्रष्टाचार के मुद्दे वह स्वयं इतना नहीं बोल सकती।

लोकतंत्र के मंदिर संसद में बहस के नाम पर इस प्रकार का शोर शराबा बन्द ही होना चाहिए। और देश के सभी राजनीतिक दलों को रचनात्मक विरोध करने का तरीका अपनाकर ही अपनी राजनीतिक दिशा तय करना चाहिए। इसी में देश की भलाई है, और इसी से ही लोकतंत्र सुरक्षित रहेगा।

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सुरेश हिन्दुस्तानी 

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