सुधार का प्रणेता सवालों के कटघरे में क्यों? - गोविंद मालू

व्यवस्था सुधारने की प्रक्रिया को क्या अव्यवस्था कहा जाए? सही परिप्रेक्ष्य को कुतर्कों के आधार पर राजनीतिक रोटी सेंकने का हथियार बनाया...



व्यवस्था सुधारने की प्रक्रिया को क्या अव्यवस्था कहा जाए? सही परिप्रेक्ष्य को कुतर्कों के आधार पर राजनीतिक रोटी सेंकने का हथियार बनाया जाए, तो यह अपराध उससे भी बड़ा है! जिस अपराध के लिए दोषियों को दंडित कर, व्यवस्था सुधारने का बीड़ा एक सरकार, एक राजनेता द्वारा उठाया गया है! ऐसे में व्यवस्था सुधारने की जिद में यदि अपने ही अवरोध बनें, हों तो उन्हें भी नहीं बख्शने व दोषी चाहे अपने ही दल के हों, उन्हें भी रियायत न देने की इच्छाशक्ति बताई हो तो यह ईमानदार राजनेता शुचिता व पारदर्शिता के पक्षधर राजनेता की निशानी है। 


आजादी के बाद व्यवस्था व तन्त्र में गिरावट इसलिए आई कि जो कानून-कायदे और नैतिकता से काम करने वाले नौकरशाह थे, उन्हें राजनेताओं की जिद के आगे समर्पण करना पड़ा! उन्हें राजनेताओं की अवैधानिक मंशा को पूरा करने का उपकरण बनना पड़ा। जिन्होंने ऐसा नहीं किया, उन्हें प्रताड़ित भी होना पड़ा! स्थानांतरण के जरिए या झूठे प्रकरण बनाकर विभागीय कार्यवाही के जरिए! इसलिए कमज़ोर मानसिकता, सुविधाजनक स्थिति में रहने वाले और भय से संघर्ष न करने वाले नौकरशाहों ने समझौता करना उचित समझा! उन्हें लगा कि 'हमें क्या करना, भाड़ में जाए सुशासन।' यशी कारण है कि 'तुम भी कमाओ, हम भी कमाएं' का 'शासन-राजतंत्र' विकसित हुआ और साथ ही 'जो आज्ञा हुजूर' की परिपाठी विकसित हुई। 

कमोबेश राजनीतिक पार्टियों (खासकर कांग्रेस) में यही परंपरा विकसित हुई! सर्वेसर्वा नेता को यह नागवार गुज़रा कि कहीं मेरे अधीनस्थ रहे मंत्री या मुख्यमंत्री की छवि मुझसे उजली न हो जाए! ऐसे लोगों को हटाने और गिराने का खेल चलता रहा और सारा तंत्र ही परतंत्र हो गया। व्यवस्था भी दुरावस्था की मोहताज हो गई! लोकतंत्र में सशक्त चुनौती के अभाव में कांग्रेस में अधिनायकता का वायरस फ़ैल गया। मुख्यमंत्रियों ने न केवल जय जयकार की, बल्कि जूते चप्पल भी उठवा! क्योंकि, उन्हें डर था कि मैडम की पलकें गिरी तो हमें भी औंधे मुंह गिरने से कोई रोक नहीं पाएगा। 

सरदार वल्लभभाई पटेल, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, डॉ. भीमराव अम्बेडकर, डॉ. राममनोहर लोहिया, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के बाद लालबहादुर शास्त्री व मोरारजी भाई देसाई जैसे खुद्दार राजनेताओं को जो झेलना पड़ा वह इतिहास बन गया! आत्मकथाओं में इन कथानकों को उकेरा जरूर गया है! पास से देखने वालों ने इस पीड़ा को अपनी कलम के जरिए दस्तावेजीकरण कर सबक भी आगे की पीढ़ी के लिए छोड़ दिए हैं। कांग्रेस ने अपने प्रशिक्षण केन्द्रों व अभ्यास वर्गों में यही पाठ्यक्रम पढ़ा है। राजनीति में दशकों तक विराट पूंजी, विराट रिश्वत के अवसर बने रहें! 

कथित ईमानदारी के नाम पर भ्रष्टाचार की अविरल दुर्गन्ध धारा बहती रही! इस दुर्गन्ध भरी धारा में कोई सुशासन की निर्मल गंगा न प्रवाहित कर दें, इस बात का विशेष कॉडर तैयार किया गया! 'लूटों और खाओ, जो बोले उसे मार भगाओ' की समवेत वंदना करते हुए कांग्रेसी राजनीतिक पाठशाला का श्री गणेश करते रहे। ये सोच का विषय है कि नेहरु ने क्या किया, देश को और कांग्रेस को क्या दिया? उन्होंने कैसी संस्कृति विकसित की, जो कांग्रेस आज भी उस परिवार से मुक्त नहीं हो पाई? यही कारण है कि कांग्रेस से मुक्ति की छटपटाहट आज जनता के मन में आ गई है। नेहरूवादी संस्कारों की यही परिणति कांग्रेस में आज तक है। बाद में देश के जनमन को भी उन्होंने इसी सांचे में ढालने का काम किया! 

80 के दशक तक तो सब कुछ ऐसे ही चलता रहा! लेकिन, वक़्त ने 1980 के उतरार्द्ध में करवट ली, 'सम्पूर्ण क्रांति' के शंखनाद के साथ! पहले जयप्रकाश नारायण ने और उसके के बाद विश्वनाथप्रताप सिंह ने भी उसी भ्रष्टाचार विरोधी व्यवस्था परिवर्तन के वाहक के रूप में उभरे। कांग्रेस में होते हुए भी नरसिम्हाराव को भी व्यक्तिगत रूप से इसी श्रेणी का मानता हूँ। लेकिन, जिस घर की पहरेदारी वे कर रहे थे, उस घर का चौका-चूल्हा और परम्पराओं की विरासत की केमेस्ट्री वे नहीं बदल पाए! कालांतर में मनमोहनसिंह भी मौनी बाबा के रूप में इसलिए ही कुख्यात हुए। लेकिन, व्यवस्था बदलने के माद्दा उनके लिए कुर्सी का बोझ बन गया। उन्हें वह सब करना पड़ा, जो नेहरुकालीन सन्दर्भ व परंपरा की रवायत थी। 

यह वही कांग्रेस है जिसके रक्त में ऐसे कीटाणु हैं, जो अच्छे और सच्चे को बर्दाश्त नहीं कर पाते! इसीलिए कांग्रेस को मुलायम सिंह, लालू यादव ज्यादा रास आते हैं, नरेंद्र मोदी और शिवराजसिंह नहीं! यहाँ तक कि अटलजी भी नहीं! उन्हें अपनों में से चंद्रशेखर, रामधन, पी.ए. संगम, कृष्णकान्त भी रास नहीं आते! बाबू जगजीवनराम ने भी जब करवट ली तो उन्हें धक्का मारकर बाहर कर दिया गया। यह कांग्रेस गरीबी, अशिक्षा, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार ये मुद्दे कांग्रेस के घर के बाहर लगे बोर्ड पर शोभा पाते रहे! घर के कण-कण में इसे निजात पाने के कोई औजार नहीं दिखा तो जो छोटे लड़ाके घर में थे, उन्हें वनवास दे दिया या बोथरा बताकर अटाले वाले कमरे में डाल दिया गया! कुछ को स्वतंत्रता सेनानी का झुनझुना पकड़ाकर रिटायर कर दिया गया! 

ऐसी कांग्रेस को व्यवस्था परिवर्तन का कदम कभी रास नहीं आ सकता! अच्छे प्रयत्नों को पराकाष्ठा तक ले जाने में अपनी आहुति देने के बजाए वही हथियार उठा लिया कि आने वाला क्यों व्यवस्था परिवर्तन की जोखिम उठाए हवन करने में हाथ क्यों जलाए! 'जब जागो, तभी सवेरा' उन्हें रास नहीं आता! क्योंकि, ये तो काली रात के सौदागर हैं! अन्धकार के उद्योगपति हैं, उजालों के प्रतिस्पर्धी हैं! भ्रष्टाचार के खिलाफ सफाई का कोई चौघड़िया, नक्षत्र व दिन नहीं होता, जब से शुरू हो तब से पहला दिन होना चाहिए! 

शिक्षा माफिया, नौकरी माफिया व करियर माफिया से निजात दिलाना क्या अपराध है? शिवराज सिंह ने क्यों किया इस अभियान का श्री गणेश? यह जनता जान चुकी है, तभी व्यापमं के व्यापक प्रचार के बाद कांग्रेस को उसकी असली जगह परिणाम में बता दी! सुधारवादी को अपराधी बनाने का कांग्रेस का षड्यंत्र जनता जान चुकी है। एक पीढ़ी की गुणवत्ता को उसके करियर को बचाने का काम सरकार कर रही है! कांग्रेस उन आरोपियों के खिलाफ आवाज़ उठाने व कदम की सराहना करने के बजाए अलिप्त, परिश्रमी, प्रखर प्रतिभाशालियों को ही कटघरे में खड़ा करने की राजनीति कर रही है। व्यवस्था के सुधारवादियों की सराहना करने के बजाए उन्हें देश में बदनाम करके व्यवस्था को हमेशा के लिए विकलांग करने का प्रयास कर रही है! ये नव-विचारवादी इस दौर के अपराधी नहीं हैं! नया सोचने वाले इन बदलाव समर्थकों की पीढ़ी को बचाने की जरुरत है। इन्हें अपनी राजनीति के लिए कटघरे में खड़ा मत कीजिए, इतिहास माफ़ नहीं करेगा! संवेदनशील मुद्दों पर कुत्सित राजनीति की इज़ाज़त कभी कोई समाज नहीं देता, इतना याद रखना!

(लेखक खनिज विकास निगम के पूर्व उपाध्यक्ष हैं)

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सुधार का प्रणेता सवालों के कटघरे में क्यों? - गोविंद मालू
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