औचित्यहीन आरक्षण की मांग और सर्वोच्च न्यायालय के दिशा निर्देश - प्रमोद भार्गव

आखिरकार पटेल समुदाय भी आरक्षण की मांग को लेकर हिंसा,आगजनी और तोड़-फोड़ की उसी राह पर चल पड़ा,जिसकी मांग करते गुर्जर और जाट समुदाय के लोग चल र...



आखिरकार पटेल समुदाय भी आरक्षण की मांग को लेकर हिंसा,आगजनी और तोड़-फोड़ की उसी राह पर चल पड़ा,जिसकी मांग करते गुर्जर और जाट समुदाय के लोग चल रहे थे। पटेल जाति के युवा नेता हार्दिक पटेल ने तो एक बयान में साफ कर दिया कि उनकी मांगें नहीं मानी गई तो वे गांधी और सरदार पटेल का अहिंसा का रास्ता छोड़,भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद का रास्ता भी अपना सकते हैं। जाहिर है,गुजरात सरकार को भविष्य में बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही अब समय आ गया है कि आरक्षण संबंधी मांगों से बार-बार शासन-प्रशासन को रूबरू न होना पड़े,इस हेतु केंद्र सरकार किसी स्थाई सामाधान की कोशिश करे ? यह अच्छी बात है कि आंदोलन को बेकाबू होते देख,प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अविलम्ब गुजरातियों से गुजराती में लोकतंत्र की मर्यादा का पालन करने और शान्ति बनाए रखने की अपील की ।

आर्थिक रूप से सक्षम माने जाने वाले जाट और गुर्जरों के बाद पाटीदार-पटेल जाति समूह की आरक्षण की मांग के साथ ही,गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल ने संविधान और सर्वोच्च न्यायलय के फैसलों का हवाला देते हुए पटेलों को किसी भी प्रकार का आरक्षण देने की मांग ठुकरा दी थी। बावजूद आरक्षण को लेकर हार्दिक पटेल का हठ,छीनने की अलोकतांत्रिक हद तक जा पहुंचा है। आर्थिक रूप से सक्षम व दबंग जातीय समूहों में आरक्षण की बढ़ती महत्वकांक्षा अब आरक्षण की राजनीति को महज पारंपरिक ढर्रे पर ले जाने का काम कर रही है। गोया,नैतिक रूप से एक समय आरक्षण का विरोध करने वाली,समाज में प्रतिष्ठित व संपन्न जातियां भी एक-एक करके आरक्षण के पक्ष में आती दिखाई दे रही हैं। 

जाट जाति को जब राजस्थान और उत्तरप्रदेश में पिछड़े वर्ग की आरक्षण सूची में शामिल कर लिया गया था,तब उसका अनुसरण 2008 में गुर्जरों ने राजस्थान में किया था। तब वसुंधरा सरकार ने हिंसक हो उठे आंदोलन को शांत करने की दृष्टि से पिछड़ा वर्ग के कोटे में गुर्जरों को 5 प्रतिशत अतिरिक्त आरक्षण देने का प्रावधान कर दिया था। किंतु आरक्षण का यह लाभ सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आरक्षण की निर्धारित की गई सीमा से अधिक था,इसलिए इस फैसले पर अमल नहीं हो पाया था। 

बावजूद इसके पूर्ववर्ती संप्रग सरकार ने 2014 के आम चुनाव से ठीक पहले वोट की राजनीती के चलते,जाटों की आरक्षण संबंधी मांग को लेकर अधिसूचना जारी कर दी थी। लेकिन अदालत ने इस अधिसूचना को खारिज करते हुए साफ कर दिया था कि ‘जाटों को आरक्षण की जरूरत नहीं है। क्योंकि किसी भी जाति समूह को पिछड़ा वर्ग का दर्जा देने में सामाजिक पिछड़ेपन की अहम् भूमिका होती है। इस संबंध में केवल जाति को अधार नहीं बनाया जा सकता है।‘ कमोवेश यही स्थिति पटेल जाति की है। 

महाराष्ट्र में सत्ताच्युत हुई कांग्रेस और राकांपा गठबंधन सरकार ने विधानसभा चुनाव के ऐन पहले वोट-बटोरने की दृश्टि से मराठों को 16 फीसदी और मुसलमानों को 5 फीसदी आरक्षण दे दिया था। इसे तत्काल प्रभाव से शिक्षा के साथ सरकारी और गैर-सरकारी नौकरियों में भी लागू कर दिया गया। इस प्रावधान के लागू होते ही महाराष्ट्र में आरक्षण की सीमा 52 प्रतिशत से बढ़कर 73 फीसदी हो गई थी। यह व्यवस्था भी संविधान के उस बुनियादी सिद्धांत के विरूद्ध थी,जिसके अनुसार 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सकता। इस आरक्षण को देते समय सरकार ने चतुराई बरतते हुए ‘मराठी उपराष्ट्रीयता‘ का एक विशेष प्रवर्ग भी बनाया था। किंतु यह टोटके भी संविधान की कसौटी पर खरे नहीं उतरते हैं,क्योंकि संविधान में धर्म और उपराष्ट्रीयताओं के आधार पर आरक्षण देने का कोई प्रावधान नहीं है। गोया यह मामला भी महाराष्ट्र उच्च न्यायालय में लटक गया है।

वैसे भी मौजूदा परिदृष्य में गुर्जर,जाट,मराठा और पटेल समुदाय ऐसे गए गुजरे नहीं रह गए हैं कि उन्हें आर्थिक उद्धार के लिए आरक्षण की वाकई जरूरत है ? गुजरात,राजस्थान,हरियाणा और उत्तरी उत्तर प्रदेश में ये जाति समुदाय न केवल राजनीतिक दृश्टि से बल्कि आर्थिक,सामाजिक व शैक्षिक नजरीए से भी उच्च व धनी तबके हैं। महाराष्ट्र में यही स्थिति मराठों की है। सत्तर के दशक में आई हरित क्रांति ने भी इन्हीं समुदायों के पौ-बारह किए और पंचायती राज में आरक्षण के लाभ से इन्हीं समुदायों की आर्थिक,सामाजिक और राजनैतिक ताकत बढ़ी,लिहाजा ये तबके हर स्तर पर सक्षम हैं। 

इससे साबित होता है कि हार्दिक पटेल जैसे युवा आरक्षण के जातीय औजार से स्वंय को राजनीति के फलक पर स्थापित करने की सोची-समझी चाल चल रहे हैं। गोया,एक सामाजिक समस्या के सामाधान को जब सियासी मकसद हासिल करने का हथियार बना लिया जाता है तो समस्या और उलझने लगती है। यह सही है कि आरक्षण की व्यवस्था हमारी सामाजिक जरूरत थी,लेकिन हमें इस परिप्रेक्ष्य में सोचना होगा कि आरक्षण बैसाखी है,पैर नहीं। याद रहे यदि विकलांगता ठीक होने लगती है तो चिकित्सक बैसाखी का उपयोग बंद करने की सलाह देते हैं और बैसाखी का उपयोगकर्ता भी यही चाहता है। किंतु राजनैतिक महत्वाकांक्षा है कि आरक्षण की बैसाखी से मुक्ति नहीं चाहती ? 

वैसे भी आरक्षण की लक्ष्मण रेखा का जो संवैधानिक स्वरूप है,उसमें आरक्षण की सीमा को 50 फीसदी से ऊपर नहीं ले जाया सकता। बावजूद यदि किसी समुदाय को आरक्षण मिल भी जाता है तो यह वंचितों और जरूरतमंदों की हकमारी होगी। आरक्षण के दायरे में नई जातियों को शामिल करने की भी सीमाएं सुनिश्चित हैं। कई संवैधानिक अड़चनें हैं। किस जाति को पिछड़े वर्ग में शामिल किया जाए,किसे अनुसूचित जाति में और किसे अनुसूचित जनजाति में संविधान में इसकी परिभाषित कसौटियां हैं। इन कसौटियों पर किसी जाति विशेष की जब आर्थिक व सामाजिक रूप से दरिद्रता पेश आती है,तब कहीं उस जाति के लिए आरक्षण की खिड़की खुलने की संभावना बनती है। इसके बाद राष्ट्रपति का अनुमोदन भी जरूरी होता है।

हालात ये हो गए हैं कि आरक्षण का अतिवाद अब हमारे राजनीतिकों में वैचारिक पिछड़ापन बढ़ाने का काम कर रहा है। नतीजतन रोजगार व उत्पाद के नए अवसर पैदा करने की बजाय,हमारे नेता नई जातियां व उप-जातियां खोज कर उन्हें आरक्षण के लिए उकसाने का काम कर रहे हैं। यही वजह थी कि मायावती ने तो उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों तक को आरक्षण देने का शिगूफा छोड़ दिया था। आरक्षण के टोटके छोड़ने की बजाय अच्छा है सत्तारूढ़ नेता रोजगार के अवसर उपलब्ध नौकरियों में ही तलाशने की शुरूआत कर दें तो शायद बेरोजगारी दूर करने के कारगर परिणाम निकलनें लगें | 

इस नजरिए से तत्काल नौकरी पेशाओं की उम्र घटाई जाए,सेवानिवृतों के सेवा विस्तार और प्रतिनियुक्तियों पर प्रतिबंध लगे ? वैसे भी सरकारी दफ्तरों में कंप्युटर व इंटरनेट तकनीक का प्रयोग जरूरी हो जाने से ज्यादातर उम्रदराज कर्मचारी अपनी योग्यता व कार्यक्षमता खो बैठे हैं। लिहाजा इस तकनीक से त्वरित प्रभाव और पारदर्शिता की जो उम्मीद थी,वह इसलिए कारगर नहीं हो पाई,क्योंकि तकनीक से जुड़ने की उम्रदराज कर्मचारियों में कोई जिज्ञासा ही नहीं है ? 

यह प्रावधान भी सख्ती से लागू करने की जरूरत है,कि जिस किसी भी व्यक्ति को एक मर्तबा आरक्षण का लाभ मिल चुका है,उसकी संतान को इस सुविधा से वंचित किया जाए ? क्योंकि एक बार आरक्षण का लाभ मिल जाने के बाद,जब परिवार आर्थिक रूप से संपन्न हो चुका है तो उसे खुली प्रतियोगिता की चुनौती मंजूर करनी चाहिए। जिससे उसी की जाति के अन्य युवाओं को आरक्षण का लाभ मिल सके। इससे नागरिक समाज में सामाजिक समरसता का निर्माण होगा,नतीजतन आर्थिक बद्हाली के चलते जो शिक्षित बेरोजगार कुंठित हो रहे हैं,वे कुंठा मुक्त होंगे। जातीय समुदायों को यदि हम आरक्षण के बहाने संजीवनी देते रहे तो न तो जातीय चक्र टूटने वाला है और न ही किसी एक जातीय समुदाय का समग्र उत्थान अथवा कल्याण होने वाला है। 

स्वतंत्र भारत में बाह्मण,क्षत्रिय,वैश्य और कायस्थों को निर्विवाद रूप से सबसे ज्यादा सरकारी व निजी क्षेत्रों में नौकरी के अवसर मिले,लेकिन क्या इन जातियों से जुड़े समाजों की समग्र रूप में दरिद्रता दूर हुई ? यही स्थिति अनुसूचित जाति व जनजातियों की है। दरअसल आरक्षण को सामाजिक असमानता खत्म करने का अस्त्र बनाने की जरूरत थी,लेकेन हमने इसे भ्रामक प्रगति का साध्य मान लिया है। नौकरी पाने के वही साधन सर्वग्राही व सर्वमंगलकारी होंगे,जो खुली प्रतियोगिता के भागीदार बनेंगे। अन्यथा आरक्षण के कोटे में आरक्षण को थोपने के उपाय तो जातिगत प्रतिद्वंद्विता को ही बढ़ाने का काम करेंगे। पटेल समुदाय इसी महत्वाकांक्षी प्रतिद्वंद्विता का शिकार हुआ दिखाई दे रहा है।

प्रमोद भार्गव
लेखक/पत्रकार
शब्दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी
शिवपुरी म.प्र.
मो. 09425488224
फोन 07492 232007

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।

COMMENTS

नाम

अखबारों की कतरन अपराध आंतरिक सुरक्षा इतिहास उत्तराखंड ओशोवाणी कहानियां काव्य सुधा खाना खजाना खेल चिकटे जी तकनीक दुनिया रंगविरंगी देश धर्म और अध्यात्म पर्यटन पुस्तक सार प्रेरक प्रसंग बीजेपी बुरा न मानो होली है भगत सिंह भोपाल मध्यप्रदेश मनुस्मृति मनोरंजन महापुरुष जीवन गाथा मेरा भारत महान मेरी राम कहानी राजीव जी दीक्षित लेख विज्ञापन विडियो विदेश वैदिक ज्ञान शिवपुरी संघगाथा संस्मरण समाचार समाचार समीक्षा साक्षात्कार सोशल मीडिया स्वास्थ्य
false
ltr
item
क्रांतिदूत: औचित्यहीन आरक्षण की मांग और सर्वोच्च न्यायालय के दिशा निर्देश - प्रमोद भार्गव
औचित्यहीन आरक्षण की मांग और सर्वोच्च न्यायालय के दिशा निर्देश - प्रमोद भार्गव
http://2.bp.blogspot.com/-BDjkrpq7drA/Vd7xwmnkYjI/AAAAAAAABi0/HYdZLVYANko/s320/pramod.jpg
http://2.bp.blogspot.com/-BDjkrpq7drA/Vd7xwmnkYjI/AAAAAAAABi0/HYdZLVYANko/s72-c/pramod.jpg
क्रांतिदूत
http://www.krantidoot.in/2015/08/Reservation-and-Supreme-Court-guidelines.html
http://www.krantidoot.in/
http://www.krantidoot.in/
http://www.krantidoot.in/2015/08/Reservation-and-Supreme-Court-guidelines.html
true
8510248389967890617
UTF-8
Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS CONTENT IS PREMIUM Please share to unlock Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy