नक्सल समस्या और बिहार की मुस्लिम राजनीति |

यह जानकर किसी को भी हैरत हो सकती है कि इस बार बिहार में मुस्लिम राजनीतिक कार्यकर्ता बड़ी संख्या में भाजपा में शामिल हो रहे हैं | दक्षिण ब...


यह जानकर किसी को भी हैरत हो सकती है कि इस बार बिहार में मुस्लिम राजनीतिक कार्यकर्ता बड़ी संख्या में भाजपा में शामिल हो रहे हैं | दक्षिण बिहार के नक्सली गढ़ में नक्सलियों के भय के कारण यह हो रहा है |

नरेंद्र मोदी ने अपनी चुनावी सभा में “जंगल राज” की संभावना यूं ही नहीं जताई थी | विरोधियों ने इसे महज जुमला बताकर आलोचना की थी | किन्तु बिहार के मतदाता वास्तविकता जानते हैं, और अब यह भय दिखाई भी देने लगा है | इस भय की स्वीकारोक्ति करते हुए झारखंड की सीमा से सटे गया के इमामगंज निवासी यिसहार करीम खान (55) कहते हैं –

मैं पहले आरजेडी में था | किन्तु हम जनता दल यू के नेता और बिहार विधानसभा के अध्यक्ष उदित नारायण चौधरी का समर्थन नहीं कर सकते, जो 1990 के बाद से ही लगातार पांच बार यहाँ से विधायक रहे हैं | और निश्चय ही अब एक बार फिर महागठबंधन के प्रत्यासी होने वाले हैं | चौधरी ने क्या किया है, यहाँ का हर मुसलमान जानता है। क्योंकि इसे हमने पुस्तकों में नहीं पढ़ा है, बल्कि अपनी आँखों से देखा है। हम अपने लोगों के नरसंहार को कैसे भूल सकते है? 

हाल ही में भाजपा में सम्मिलित हुए राब्दा गाँव के अहमद आलम खान बताते हैं कि किस प्रकार नक्सली हमले में डुमरिया ब्लाक के बद्री देह, रामदोहर, सिमरी और बिजुआ गाँव में कथित तौर पर मुसलमान मारे गए और उनकी संपत्ति नष्ट की गई | अहमद आलम खान ने कहा कि –

दस साल से यह अत्याचार जारी है । हम यह नहीं कहते कि चौधरी ने यह किया, किन्तु उनका नक्सलियों के प्रति रुझान है, इसमें हमें कोई संदेह नहीं है। उन्होंने खुले तौर पर नक्सलियों का समर्थन किया और अल्पसंख्यकों की कोई मदद नहीं की | हम जानते हैं कि अभी भी बहुत से मुसलमानों में भाजपा को वोट देने में हिचकिचाहट होगी, किन्तु हम चौधरी को हारने की अपनी तरफ से पूरी कोशिश करेंगे । हम एक बार भाजपा को भी आजमाना चाहते हैं |

डुमरिया की मुख्य सड़क से नीचे उतरकर संकरी पगडंडियों पर ढही हुई हवेलियां और उजड़े हुए बाग़ बगीचे इस गुस्से के कारण को बयान करते दिखाई देते हैं । एक ओर तो किसी समय जमींदार रहे खान साहिबों के उजड़े हुए निशान तो दूसरी तरफ कीचड़ से लथपथ गरीब मुसलमानों की झोंपड़ियाँ | अपने घर के बरामदे में एक लकड़ी की कुर्सी पर टिके अजहर करीम खान कहते हैं कि –

हमारे बुजुर्ग बताते थे कि, एक समय था जब हमारे पास लगभग सात एकड़ जमीन थी, और हम संपन्न किसान थे । लेकिन अब हम बरबाद हो चुके हैं | दशकों पहले बनाया गया पुरखों का यह आलीशान भवन अब खंडहर में हो चुका है, और हम इसमें ही रहने को विवश हैं | हमारे सेवानिवृत्त बैंक मैनेजर बड़े भाई भी इसी घर में साथ रहते हैं । मैं दिल्ली और पंजाब में थर्मल संयंत्रों में मैकेनिक के रूप में काम कर चुका हूँ । छह साल पहले ही लौटा हूँ । इस इमामगंज निर्वाचन क्षेत्र में लगभग 13 प्रतिशत मुसलमान आवादी है, तथा आशा है कि इस आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र से जीतन राम मांझी (पूर्व मुख्यमंत्री और महादलित नेता) ही चुनाव मैदान में उतरेंगे । इससे हमारा काम और आसान हो जाएगा। अन्य संभावित उम्मीदवारों में रोशन मांझी हैं, जो 2010 में यहां लालू के उम्मीदवार थे, लेकिन बाद में भाजपा में सम्मिलित हो गए ।

मदारपुर गाँव के शब्बीर अहमद खान का गुस्सा साफ़ झलकता है, जब वे कहते हैं कि, पठान समुदाय के अनेक लोग न केवल भाजपा में शामिल हो रहे हैं, बल्कि दूसरों को भी इसके लिए प्रोत्साहित भी कर रहे हैं | बहुत से पिछड़े अंसारी मुसलमानभी इस बार भाजपा के साथ हैं । उनमें से एक आडर चक गांव के मुजफ्फर अंसारी के अनुसार शमशाबाद और कोठी गाँव से भाजपा को अनेक नए कार्यकर्ता मिले हैं | मैं भी पहले जद (यू) में था, किन्तु अब भाजपा में शामिल होने का फैसला किया है । हम उस पार्टी में ही तो रहेंगे जो हमें सम्मान दे । हम अपने गांव के लोगों को भी समझाने में कामयाब रहे हैं । 

दूसरी ओर उदय नारायण चौधरी इस विरोध को पुराने जमींदारों की पुरानी सोच बताकर हवा में उडा देते हैं | चौधरी ने पिछला चुनाव राजद उम्मीदवार को महज 1211 वोट से हराकर जीता था | 2010 के चुनाव में कुल 2,29,249 मतदाताओं में से महज 44,126 ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था, जो महज 47.58 प्रतिशत ही था । 63 वर्षीय उदित नारायण चौधरी का कहना है कि –

मैं 1990 के बाद से यहाँ का विधायक हूं और जैसा कि आप देख सकते हैं, यहाँ जो कुछ भी सड़क, बिजली, अस्पताल आदि हैं, वह विकास मेरे समय में ही हुआ है | मैं केवल एक बार 1995 में महज 120 मतों के अंतर से पराजित हुआ था | वे नक्सलियों के समर्थन वाले आरोप को भी नकारते हैं, लेकिन यह भी मानते हैं कि उनकी और हमारी लड़ाई एक ही है, केवल तरीके का अंतर है | हम दोनों ही गरीब और वंचित के अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं । फर्क सिर्फ इतना है कि वे हिंसक ढंग से लड़ रहे हैं, जबकि हम अहिंसक साधनों के माध्यम से यह करना चाहते हैं। उनका मानना है कि भाजपा में बहुत थोड़े ही मुसलमान सम्मिलित हुए हैं और अधिकाँश आज भी “बिजली के खम्बे” के लिए ही मतदान करेंगे |

लुटुआ गाँव के जद (यू) कार्यकर्ता मोहम्मद सिराज-उद-दीन अंसारी कहते हैं कि निर्वाचन क्षेत्र में मुस्लिम वोटों की संख्या हजारों में है। उनमें से भाजपा के साथ कितने जायेंगे ? मुसलामानों का बहुमत मजबूती के साथ नीतीश कुमार के साथ खड़ा है। उन्होंने हमारे समुदाय के फायदे के लिए विगत दस वर्षों में जो कुछ किया है, उसे कोई नकार नहीं सकता । आप सड़कों की हालत देख लीजिये । बिजली की समस्या तो हम भूल ही चुके हैं । जहां तक नक्सल समस्या का सवाल है, कोई भी समस्या एकदम समाप्त नहीं हो सकती, लेकिन हम पहले की तुलना में कहीं अधिक सुरक्षित हैं । 

कोठी गांव के कांग्रेसी कार्यकर्ता सिकंदर खान जोर देकर कहते हैं कि केवल कुछ एक मुसलमान ही भाजपा में शामिल हुए हैं । हम में से अधिकांश 'महा गठबंधन' के साथ हैं। हम चौधरी को नहीं नीतीश को देख रहे हैं ।

आधार - इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित Bihar polls: In Naxal pocket, why Muslims are searching for BJP as an option |

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