जात न पूछो साधू की--प्रियंका कौशल

मंगलवार को देश के कई अखबारों की सुर्खियां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का रूपनगर में दिया गया संबोधन रहा, जिसमें डॉ...


मंगलवार को देश के कई अखबारों की सुर्खियां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का रूपनगर में दिया गया संबोधन रहा, जिसमें डॉ भागवत ने कहा कि भारत एक जाति मुक्त राष्ट्र होना चाहिए। संघ के स्वयंसेवकों की एक शाखा को संबोधित करते हुए डॉ भागवत ने कहा कि जातीय भेदभाव के कारण राष्ट्र को गंभीर परिणाम भुगतने पड़ रहे हैं। जातीय भेदभाव देश के विकास में सबसे बड़ी बाधा है, जिसके परिणाम हमारे सामने आ रहे हैं। संघ प्रमुख के इस व्यक्त्व्य को समझने के लिए हमें भारत के उन अनन्य महापुरुषों के विचारों को, चिंतन को, मनन को, अतुलनीय राष्ट्र प्रेम को समझना होगा,जो जीवनपर्यंत केवल और केवल अपने देश, समाज, राष्ट्र, बंधु-बांधवों की उत्तरोत्तर उन्नति के लिए प्रयास करते रहे। अपने विचार, आचार और व्यवहार से आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रगति का मार्ग प्रशस्त कर गए।

“तं वर्ष भारतं नाम भारती यत्र संततिः।।“ 

अर्थात् हम सभी हिंदू बंधु-बांधव हैं। हमारी जाति भी एक है, क्योंकि हममें समान पूर्वजों का ही रक्त संचारित होता है, हम सभी भारतीय संतति हैं। हमारे पौराणिक श्लोकों में भी “आर्य” शब्द का तात्पर्य उन सभी लोगों से है, जो सिंधु नदी के इस पार एक जाति के अविभाज्य अंग बने थे। वैदिक-अवैदिक, ब्राह्मण-चांडाल सभी का इसमें समावेश था। उन सभी की एक ही जाति थी, एक ही संस्कृति थी और एक ही देश था। वीर विनायक दामोदर सावरकर लिखते हैं कि हम सभी रक्त की समानता के बंधनों से एकता के सूत्र में आबद्ध हैं। हम एक राष्ट्रमात्र ही नहीं अपितु एक जाति भी हैं। सावरकर इसे कुछ ऐसे समझाते हैं कि “जाति शब्द का मूल जन धातु से आरोपित है, जिसका अर्थ है जनता और इसका अर्थ है भातृसंघ। एक ही धातु से उद्भूत हुई जाति की नसों में समान रक्त का संचार होता और यह शब्द इसी का बोधक है। सभी हिंदुओं की नसों में उसी शक्तिशाली जाति का पावन रक्त प्रवाहित हो रहा है, जिसका उद्भव उन वैदिक पूर्वजों अर्थात् सिंधुओं से हुआ है।”

वैदिक काल से लेकर अब तक ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं, जो यह बताते हैं कि हिंदू समाज वर्ण व्यवस्था में जरूर विश्वास करता था, लेकिन जाति मुक्त था। महर्षि पाराशर ब्राह्ण थे किंतु एक धीवर कन्या पर आसक्त हुए। इन्हीं दोनों की संतान के रूप में उत्पन्न हुए महर्षि वेदव्यास। महाभारत काल के कर्ण, घटोत्कच, विदुर सरीखे अति विशिष्ट व उल्लेखनीय पुरुषों की जन्म कहानियां कुछ इसी तरह की हैं। सम्राट चंद्रगुप्त ने एक ब्राह्मण कन्या से विवाह कर जो पुत्र उत्पन्न किया, वे वही बिंदुसार थे, जिन्होंने अशोक जैसे महाप्रतापी राजा को जन्म दिया। स्वयं अशोक ने एक वैश्यपुत्री को अपनी पत्नी बनाया। सम्राट हर्षवर्धन स्वयं वैश्य थे, लेकिन उन्होंने अपनी पुत्री का विवाह एक क्षत्रिय से किया। व्याघकर्मा एक व्याघ के पुत्र थे, लेकिन उनकी माता ब्राह्मण कन्या थी। आगे चलकर व्याघकर्मा महाराज विक्रमादित्य के यज्ञ आचार्य की पदवी पर अधिष्ठित हुए। सावरकर कहते हैं कि“शुद्रो ब्राह्मण-तामेति ब्रह्मणाश्चेति शुद्रताम्” अर्थात् यह भी संभव है कि किसी जाति विशेष में जन्म ग्रहण करने वाला व्यक्ति अपने सद्कार्य या दुष्कर्मों की वजह से किसी अन्य जाति में शामिल हो जाए।

स्वामी विवेकानंद भी कहते हैं कि हम सब की संस्कृति, पूर्वज, राष्ट्र सब कुछ एक है। आर्य, द्रविड, तमिल सभी हिंदू हैं। अतऋ वर्ष विद्वेष की आग भड़काने में अपनी शक्ति व्यय मत करो। समस्त हिंदुओं का आह्वान करते हुए स्वामी जी कहते हैं कि यह मत भूलो कि तुम्हारा जन्म व्यक्तिगत उपभोग के लिए नहीं है। भूलो मत कि ये शूद्रवर्ण, अज्ञानी, निरक्षर, गरीब, यह मछुआरा, यह भंगी, ये सारे तुम्हारे ही अस्थिमांस के हैं। ये सारे तुम्हारे भाई हैं। अपने हिंदुत्व का अभिमान धारण करो। स्वाभिमान से ये घोषणा करो कि मैं हिंदू हूं, प्रत्येक हिंदू मेरा भाई है। अशिक्षित हिंदू, गरीब और अनाथ हिंदू, ब्राह्मण हूं, अस्पृश्य हिंदू, प्रत्येक हिंदू मेरा भाई है।

हमारे संपूर्ण इतिहास के एक-एक पन्ना यही तथ्य प्रस्तुत करता है कि हमारी नसों में एक ही पावन रक्त प्रवाहित हो रहा है। हम सब आपस में न केवल बंधुत्व के भाव से बंधे हुए हैं, बल्कि हमारा गौरवशाली इतिहास भी हमें एक सूत्र में बांधता है। हममें से कोई एकेश्वरवादी है कोई अनेकेश्वरवादी, कोई आस्तिक हो, कोई नास्तिक, लेकिन हम सभी हिंदू हैं। जो रक्त भगवान राम और कृष्ण, बुद्ध और महावीर में, नानक और चैतन्य में, रोहीदास और तिरुवेल्लकर की धमनियों में प्रवाहित होता रहा है, वहीं हममें भी प्रवाहित हो रहा है। हम जन्म से ही सहोदर हैं। हम एक ही जाति के हैं और यह जाति रक्त की समानता के बंधन में आबद्ध है। यह जाति अखंड है, अविभाज्य है और यही सत्य भी है। आज के परिप्रेक्ष्य में भी आवश्यक है कि हम अपनी ऊर्जा, अपने ज्ञान, अपने पौरुष का उपयोग देश की तरक्की के लिए करें। एक-दूसरे के ज्ञान के सहारे आने वाली पीढ़ियों के लिए एक उज्जवल भविष्य का निर्माण करें।

कबीरदास भी गए हैं कि -

जात न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान
मोल करो तलवार का, पड़ी रहन दो म्यान।

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क्रांतिदूत: जात न पूछो साधू की--प्रियंका कौशल
जात न पूछो साधू की--प्रियंका कौशल
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