अपने जीवन में करें राम का प्राकट्य - डॉ. वंदना सेन प्राचार्या

वर्तमान में प्रायः हर व्यक्ति के मुंह से यह शब्द सुनाई देता है कि हर व्यक्ति के अंदर कोई न कोई बुराई होती है। अगर बुराई न हो तो व्यक...

वर्तमान में प्रायः हर व्यक्ति के मुंह से यह शब्द सुनाई देता है कि हर व्यक्ति के अंदर कोई न कोई बुराई होती है। अगर बुराई न हो तो व्यक्ति भगवान के समान हो जाता है। समाज में अत्यंत श्रद्धा भाव का पात्र बनने में उस व्यक्ति को देर नहीं लगती। कहने का मतलब यही है कि व्यक्ति को यह बात अच्छी तरह से पता होती है कि उसके अंदर भी बुराई है। जिसके कारण उसे यह भान भी रहता है कि समाज मेरी स्वयं की बुराई का अच्छी प्रकार से अध्ययन करता है। बुराई का आभास होने पर व्यक्ति के मन में एक ग्लानि का भाव जन्म लेता है। इसी ग्लानि के भाव के कारण ही वह व्यक्ति कुछ व्यक्तियों के लिए दिखावे के लिए आदर का असत्य पात्र बन जाता है, जबकि उसे यह बात अच्छी प्रकार से पता होती है कि जो व्यक्ति उसे सम्मान दे रहे हैं, वह झूंठ का पुलिंदा मात्र है, इस सम्मान में सत्य का समावेश नहीं है। भारत की सांस्कृतिक भाषा में इसे आसुरी प्रवृति निरूपित किया जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

इसमें एक बात यह भी कहना समीचीन होगा कि जब कोई व्यक्ति इस बुराई को अच्छाई के तौर पर स्वीकार करता है, तब उससे सुधार करने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। लेकिन अच्छी बात यही कही जा सकती है कि व्यक्ति को बुराई का अहसास है। व्यक्ति का मन भी इसे बुराई ही मानता है। इसलिए यह माना जा सकता है कि व्यक्ति को अच्छाई और सच्चाई का बोध है। कहा जाता है कि जो व्यक्ति पहली बार किसी गलत काम की ओर प्रवृत होता है, तब उसकी आत्मा उसको जरूर यह संदेश देती है कि जो काम किया जा रहा है वह गलत है। हमारी मान्यता है कि व्यक्ति के अंदर जो आत्मा है उसी के कारण व्यक्ति का जीवन संचालित होता है, जब आत्मा ही जीवन को चला रही है, तब हम आत्मा की आवाज को अनसुना कैसे कर सकते हैं। यह भी अकाट्य सत्य है कि आत्मा परमात्मा का अंश है, सीधे शब्द में कहा जाए तो देव शक्ति है। देव शक्ति हमें गलत कार्य करने से रोकती है, अगर इसके बाद भी हम गलत काम करते हैं तो यही माना जाएगा कि हम पर आसुरी प्रवृतियां हाबी हैं। यह प्रामाणिक तौर पर कहा जा सकता है कि हमारे मन में सदैव देव और दानव शक्ति का संग्राम चलता रहता है, लेकिन यह हमारे विवेक पर निर्भर करता है कि हम अपने जीवन में किस शक्ति को समाहित करें और किसका त्याग करें।

सामान्यतः देश में देव शक्ति को स्वीकार करने का विधान है। ऐसा भारत देश में ही देखने को मिलता है कि देश के किसी भी हिस्से में भगवान राम के चरित्र का मंचन किया जाता है तब आज भी लोग बहुत रुचि के साथ देखते और सुनते हैं। इसका कारण साफ है कि राम हमारे मन में समाहित हैं। इसके साथ ही आसुरी शक्तियां भी सक्रिय रहतीं हैं। यह प्रामाणिकता के साथ कहा जा सकता है कि हर अच्छे काम में आसुरी प्रवृति रुकावट का कारण बनती है। हमारे जीवन में भी इस प्रकार के अवसर बनते हैं, लेकिन जो व्यक्ति एक परीक्षा के तौर पर इस कठिनाई का सामना करता है, उसके जीवन में सफलता मिलने की संभावना रहती है। लेकिन व्यक्ति हिम्मत हार जाए तब व्यक्ति पर यही आसुरी प्रवृतियां पूरी तरह से हमला कर देतीं हैं फिर व्यक्ति न चाहते हुए भी गलत कार्य की ओर मजबूरी में कदम बढ़ा देता है। यह मजबूरी ही व्यक्ति के जीवन की परीक्षा है, जिसे भगवान राम का सुमिरन करते हुए पास करने का सामर्थ्य जुटाना चाहिए।

भगवान राम के जीवन का अध्ययन किया जाए तो यह भलीभांति दिखाई देता है कि हर व्यक्ति के प्रेरणा देने वाला मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम का जीवन में कठिनाई भी आई थी, भगवान राम ने इन कठिनाइयों पर मर्यादित रहकर विजय प्राप्त की। राम का जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि हम कठिन अवस्था में भी अपने संस्कारों से विचलित न होते हुए भी मर्यादा युक्त जीवन जिएं। भगवान राम ने जिस प्रकार से सभी प्राणियों से समान व्यवहार करते हुए गले लगाया उसी प्रकार सामाजिक परिवेश में रहने वाले हर मानव के अंदर हमें भी राम का दर्शन करना चाहिए। चूंकि संसार सागर में जन्म लेने वाला हर प्राणी भगवान का ही एक लघु रूप है, तो हम भी नर सेवा नारायण सेवा के भाव को जागृत रखते भगवान की बनाई कृतियों की सेवा करके पुण्य का काम कर सकते हैं। गरीबों की सेवा से भगवान भी प्रसन्न हो जाते हैं।

बुराई पर अच्छाई का प्रतीक विजयादशमी का पावन पर्व हमेशा यही संदेश देता है कि हमें अपने जीवन से तो असत्य को दूर करना ही है, साथ ही समाज को भी इस बुराई के प्रति सचेत करना होगा। हमारे अपने मन के विचारों में ही राम और रावण विद्यमान हैं। भगवान राम सत्य के प्रतीक हैं तो रावण असत्य का। हम अपने अंदर एक भी बुराई पर विजय प्राप्त करते हैं तो यह कहा जा सकता है कि हमने रावण को मार दिया है। इसी प्रकार समाज के बीच जाकर भी राम के जीवन का प्राकट्य कराना चाहिए। अगर हम समाज के एक व्यक्ति की बुराई को दूर कर देते हैं, तो ही यह माना जा सकता है कि हम सही मायने में विजयादशमी यानी दशहरा का त्यौहार मनाने के रास्ते पर अग्रसर हुए हैं। हमारे अंदर भी राम भाव समाहित है। जरूरत इस बात की है कि हम उस राम शक्ति का बोध करते हुए प्राकट्य करें। तभी दशहरा मनाएं, यह निवेदन है।


डॉ. वंदना सेन प्राचार्या
द्वारा वी. पी. चौबे
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