हिंदू धर्म के बारे में फैलाए गए भ्रम - भाग 3

16. छुआछूत : अक्सर जातिवाद, छुआछूत और सवर्ण-दलित वर्ग के मुद्दे को लेकर धर्मशास्त्रों को भी दोषी ठहराया जाता है, लेकिन यह बिलकुल ही अ...

16. छुआछूत : अक्सर जातिवाद, छुआछूत और सवर्ण-दलित वर्ग के मुद्दे को लेकर धर्मशास्त्रों को भी दोषी ठहराया जाता है, लेकिन यह बिलकुल ही असत्य है। इस मुद्दे पर धर्मशास्त्रों में क्या लिखा है? यह जानना बहुत जरूरी है, क्योंकि इस मुद्दे को लेकर हिन्दू सनातन धर्म को बहुत बदनाम किया गया है और किया जा रहा है।

दलितों को ‘दलित’ नाम हिन्दू धर्म ने नहीं दिया, इससे पहले ‘हरिजन’ नाम भी हिन्दू धर्म के किसी शास्त्र ने नहीं दिया। इसी तरह इससे पूर्व के जो भी नाम थे, वे हिन्दू धर्म ने नहीं दिए। आज जो नाम दिए गए हैं, वे पिछले 60 वर्षों की राजनीति की उपज हैं और इससे पहले जो नाम दिए गए थे, वे पिछले 900 सालों की गुलामी की उपज हैं।

बहुत से ऐसे ब्राह्मण हैं, जो आज दलित हैं, मुसलमान हैं, ईसाई हैं या अब वे बौद्ध हैं। बहुत से ऐसे दलित हैं, जो आज ब्राह्मण समाज का हिस्सा हैं। यहां ऊंची जाति के लोगों को ‘सवर्ण’ कहा जाने लगा है। यह ‘सवर्ण’ नाम भी सनातन हिन्दू धर्म ने नहीं दिया। मनु स्मृति, पुराण, रामायण और महाभारत ये हिन्दुओं के धर्मग्रंथ नहीं, इतिहास ग्रंथ हैं। तुलसीदासकृत रामचरित मानस भी हिन्दू धर्मग्रंथ नहीं है। यदि इन ग्रंथों में कहीं भेदभाव की भावना लिखी है तो यह वेदसम्मत नहीं है। जो वेद, उपनिषद और गीतासम्मत नहीं है उसका सनातन हिन्दू धर्म से कोई नाता नहीं।

17. ग्रह-नक्षत्र की पूजा निषेध : क्या प्रचलित ज्योतिषी धारणा हिन्दू धर्म का हिस्सा है? इसका जवाब है- नहीं। आज का ज्योतिषी लोगों का भविष्य बताने और दुखों के टोटके बताने का कार्य करता है। इस विद्या से व्यक्ति ईश्वर से कटकर ग्रह-नक्षत्रों और तरह-तरह के देवी-देवताओं को मानकर वहमपरस्त बन जाता है। इससे उसके जीवन में सुधार होने के बजाय वह और भयपूर्ण और विरोधाभासी जीवन जीने लगता है।

महाभारत के दौर में राशियां नहीं हुआ करती थीं। ज्योतिष 27 नक्षत्रों पर आधारित था, न कि 12 राशियों पर। नक्षत्रों में पहले स्थान पर रोहिणी थी, न कि अश्विनी। जैसे-जैसे समय गुजरा, विभिन्न सभ्यताओं ने ज्योतिष में प्रयोग किए और चंद्रमा और सूर्य के आधार पर राशियां बनाईं और लोगों का भविष्य बताना शुरू किया। एक समय था जबकि लोग 12 नहीं 13 राशियों के आधार पर भविष्य बताते थे लेकिन फिर 13 का भाग और विभाजन नहीं होने से उसे छोड़ दिया।

वेद के 6 अंग हैं जिसमें 6ठा अंग ज्योतिष है। वेद अनुसार ज्योतिष खगोल विज्ञान है। ज्योतिष को वेदों का विज्ञान माना गया है। ऋग्वेद में ज्योतिष से संबंधित लगभग 30 श्लोक हैं, यजुर्वेद में 44 तथा अथर्ववेद में 162 श्लोक हैं। यूरेनस को एक राशि में आने के लिए 84 वर्ष, नेप्च्यून को 1,648 वर्ष तथा प्लूटो को 2,844 वर्षों का समय लगता है। हमारे सौरमंडल में सभी ग्रहों को मिलाकर 64 चंद्रमा खोजे गए हैं और असंख्‍य उल्काएं सौर्य पथ पर भ्रमण कर रही हैं। अभी खोज जारी है, संभवत: चंद्रमा और उल्काओं की संख्याएं बढ़ेंगी।

वेदों में ज्योतिष के जो श्लोक हैं उनका संबंध मानव भविष्य बताने से नहीं, वरन ब्रह्मांडीय गणित और समय बताने से है। ज्यादातर नक्षत्रों पर आधारित और उनकी शक्ति की महिमा से है। इससे मानव के वर्तमान और भविष्य पर क्या फर्क पड़ता है, यह स्पष्ट नहीं। वेदों के उक्त श्लोकों पर आधारित आज का ज्योतिष पूर्णत: बदलकर भटक गया है। कुंडली पर आधारित फलित ज्योतिष का संबंध वेदों से नहीं है। भविष्य कथन के संबंध में वेद कहते हैं कि आपके विचार, आपकी ऊर्जा, आपकी योग्यता और आपकी प्रार्थना से ही आपके भविष्य का निर्माण होता है इसीलिए वैदिक ऋषि उस एक परम शक्ति ब्रह्म (ईश्वर) के अलावा प्रकृति के 5 तत्वों की भिन्न-भिन्न रूप में विशेष समय, स्थान तथा रीति से स्तुति करते थे।

जो भी ज्योतिष या ज्योतिष विद्या नकारात्मक विचारों को बढ़ावा देकर भयभीत करने का कार्य करते हैं, उनका वेदों से कोई संबंध नहीं और जिनका वेदों से कोई संबंध नहीं, उनका हिन्दू धर्म से भी कोई संबंध नहीं। इसीलिए वर्तमान ज्योतिष विद्या पर पुन: विचार करने की आवश्यकता है।

ज्योतिष अद्वैत का विज्ञान है। इस विज्ञान को सही और सकारात्मक दिशा में विकसित किए जाने की आवश्यकता है। यदि आप ज्योतिष विद्या के माध्यम से लोगों को भयभीत करते रहे हैं तो समाज अकर्मण्यता और बिखराव का शिकार होकर वेदोक्त ईश्वर के मार्ग से भटक जाएगा और कहना होगा कि भटक ही गया है।

18. हजारों त्योहार क्यों? : त्योहार, पर्व, व्रत और उत्सव सभी का अर्थ अलग-अलग है। सभी को खुशियों से मनाया जाता है। ये सभी खुशियों के त्योहार ही हैं। कुछ त्योहार धर्म का हिस्सा हैं तो कुछ भारतीय संस्कृति और स्थानीय परंपरा का।
हिन्दू त्योहार (Hindu festivals) कुछ खास ही हैं लेकिन भारत के प्रत्येक समाज या प्रांत के अलग-अलग त्योहार, उत्सव, पर्व, परंपरा और रीति-रिवाज हो चले हैं। हिन्दू त्योहार और पर्व में मकर संक्रांति, श्राद्ध पर्व, श्रावण मास, कार्तिक मास और राम, कृष्ण तथा हनुमान जयंती का अधिक महत्व है।

19. पूजा का एक एकमात्र तरीका संध्या वंदन : संध्या वंदन को संध्योपासना भी कहते हैं। संधिकाल में ही संध्या वंदन की जाती है। वैसे संधि 5 वक्त (समय) की होती है, लेकिन प्रात:काल और संध्‍याकाल- उक्त 2 समय की संधि प्रमुख है अर्थात सूर्य उदय और अस्त के समय। इस समय मंदिर या एकांत में शौच, आचमन, प्राणायामादि कर गायत्री छंद से निराकार ईश्वर की प्रार्थना की जाती है।

वेदज्ञ और ईश्‍वरपरायण लोग इस समय प्रार्थना करते हैं। ज्ञानीजन इस समय ध्‍यान करते हैं। भक्तजन कीर्तन करते हैं। पुराणिक लोग देवमूर्ति के समक्ष इस समय पूजा या आरती करते हैं। तब सिद्ध हुआ कि संध्योपासना के 4 प्रकार हैं- (1) प्रार्थना, (2) ध्यान, (3) कीर्तन और (4) पूजा-आरती। व्यक्ति की जिसमें जैसी श्रद्धा है, वह वैसा करता है।

20. क्या हिन्दू धर्म में पशु बलि प्रथा है? : देवताओं को प्रसन्न करने के लिए बलि का प्रयोग किया जाता है। बलि प्रथा के अंतर्गत बकरा, मुर्गा या भैंसे की बलि दिए जाने का प्रचलन है। सवाल यह उठता है कि क्या बलि प्रथा हिन्दू धर्म का हिस्सा है?

”मा नो गोषु मा नो अश्वेसु रीरिष:।”- ऋग्वेद 1/114/8

अर्थ : हमारी गायों और घोड़ों को मत मार।

विद्वान मानते हैं कि हिन्दू धर्म में लोक परंपरा की धाराएं भी जुड़ती गईं और उन्हें हिन्दू धर्म का हिस्सा माना जाने लगा। जैसे वट वर्ष से असंख्य लताएं लिपटकर अपना ‍अस्तित्व बना लेती हैं लेकिन वे लताएं वक्ष नहीं होतीं उसी तरह वैदिक आर्य धर्म की छत्रछाया में अन्य परंपराओं ने भी जड़ फैला ली। इन्हें कभी रोकने की कोशिश नहीं की गई।

बलि प्रथा का प्राचलन हिंदुओं के शाक्त और तांत्रिकों के संप्रदाय में ही देखने को मिलता है लेकिन इसका कोई धार्मिक आधार नहीं है। बहुत से समाजों में लड़के के जन्म होने या उसकी मान उतारने के नाम पर बलि दी जाती है तो कुछ समाज में विवाह आदि समारोह में बलि दी जाती है जो कि अनुचित मानी गई है। वेदों में किसी भी प्रकार की बलि प्रथा कि इजाजत नहीं दी गई है।

”इममूर्णायुं वरुणस्य नाभिं त्वचं पशूनां द्विपदां चतुष्पदाम्।
त्वष्टु: प्रजानां प्रथमं जानिन्नमग्ने मा हिश्सी परमे व्योम।।”

अर्थ : ”उन जैसे बालों वाले बकरी, ऊंट आदि चौपायों और पक्षियों आदि दो पगों वालों को मत मार।।” -यजु. 13/50

पशुबलि की यह प्रथा कब और कैसे प्रारंभ हुई, कहना कठिन है। कुछ लोग तर्क देते हैं कि वैदिक काल में यज्ञ में पशुओं की बलि दी जाती है। ऐसा तर्क देने वाले लोग वैदिक शब्दों का गलत अर्थ निकालने वाले हैं। वेदों में पांच प्रकार के यज्ञों का वर्णन मिलता है। पशु बलि प्रथा के संबंध में पंडित श्रीराम शर्मा की शोधपरक किताब ‘पशुबलि : हिन्दू धर्म और मानव सभ्यता पर एक कलंक’ पढ़ना चाहिए।

” न कि देवा इनीमसि न क्या योपयामसि। मन्त्रश्रुत्यं चरामसि।।’- सामवेद-2/7

अर्थ : ”देवों! हम हिंसा नहीं करते और न ही ऐसा अनुष्ठान करते हैं, वेद मंत्र के आदेशानुसार आचरण करते हैं।”

वेदों में ऐसे सैकड़ों मंत्र और ऋचाएं हैं जिससे यह सिद्ध किया जा सकता है कि हिन्दू धर्म में बलि प्रथा निषेध है और यह प्रथा हिन्दू धर्म का हिस्सा नहीं है। जो बलि प्रथा का समर्थन करता है वह धर्मविरुद्ध दानवी आचरण करता है। ऐसे व्यक्ति के लिए सजा तैयार है। मृत्यु के बाद उसे ही जवाब देना के लिए हाजिर होना होगा।

21. जादू-टोना, तंत्र-मंत्र : क्या जादू टोना करना या मंत्र-तंत्र द्वारा अपने स्वार्थ सिद्ध करना या दूसरों को नुकसान पहुंचाना हिन्दू धर्म का अंग है? शैव, शाक्त और तांत्रिकों के संप्रदाय में इस तरह का प्रचलन बहुत है। आजकल ज्योतिष भी तांत्रिक टोटके और उपाय बताने लगे हैं।

ग्रह-नक्षत्र पूजा, वशीकरण, सम्मोहन, मारण, ताबीज, स्तंभन, काला जादू आदि सभी का वैदिक मत अनुसार निषेध है। ये सभी तरह की विद्याएं स्थानीय परंपरा का हिंसा हैं। हालांकि अथर्ववेद में इस तरह की विद्या को यह कहकर दर्शाया गया है कि ऐसी विद्याएं भी समाज में प्रचलित हैं, जो कि वेद विरुद्ध हैं। अथर्ववेद का लक्ष्य है लोगों को सेहतमंद बनाए रखना, जीवन को सरल बनाना और ब्रह्मांड के रहस्य से अवगत कराना।

टोने-टोटके से व्यक्ति और समाज का अहित ही होता है और सामाजिक एकता टूटती है। ऐसे कर्म करने वाले लोगों को जाहिल समाज का माना जाता है।

अथर्ववेद को जादू-टोना, तंत्र-मंत्र का मूल मान जाता है लेकिन यह गलत धारणा पश्चिमी लोगों ने फैलाई है जिसका अनुसरण भारतीय लोगों ने भी किया है। जादू-टोने के स्थान पर अथर्ववेद में आयुर्वेद का वर्णन मिलता है कि किस प्रकार से विभिन्न रोगों का उपचार विभिन्न जड़ी-बुटिओं द्वारा किया जा सकता हैं। अथर्ववेद में बताया गया है कि जिस घर में मूर्खों की पूजा नहीं होती है, जहां विद्वान लोगों का अपमान नहीं होता है बल्कि विद्वान और संत लोगों का उचित मान-सम्मान किया जाता है, वहां समृद्धि और शांति होती है। कर्मप्रथान सफल जीवन जीने की सीख देता है अथर्ववेद।

22. सती प्रथा : सती प्रथा के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है। सती माता के मंदिर भी बने हैं, खासकर ये मंदिर राजस्थान में बहुतायत में मिलते हैं। सवाल उठता है कि हिन्दू धर्म शास्त्रों में स्त्री के विधवा हो जाने पर उसके सती होने की प्रथा का प्रचलन है?
जवाब है नहीं। हालांकि अब यह प्रथा बंद है लेकिन इस प्रथा में जीवित विधवा पत्नी को उसकी इच्छा से मृत पति की चिता पर जिंदा ही जला दिया जाता था। विधवा हुई महिला अपने पति के अंतिम संस्कार के समय स्वयं भी उसकी जलती चिता में कूदकर आत्मदाह कर लेती थी। इस प्रथा को लोगों ने देवी सती (दुर्गा) का नाम दिया। देवी सती ने अपने पिता राजा दक्ष द्वारा उनके पति शिव का अपमान न सह सकने करने के कारण यज्ञ की अग्नि में जलकर अपनी जान दे दी थी।

शोधकर्ता मानते हैं कि इस प्रथा का भयानक रूप मुस्लिम काल में देखने को मिला जबकि मुस्लिम आक्रांता महिलाओं को लूटकर अरब ले जाते थे। जब हिन्दुस्तान पर मुसलमान हमलावरों ने आतंक मचाना शुरू किया और पुरुषों की हत्या के बाद महिलाओं का अपहरण करके उनके साथ दुर्व्यवहार करना शुरू किया तो बहुत-सी महिलाओं ने उनके हाथ आने से, अपनी जान देना बेहतर समझा।

और जब अलाउद्दीन खिलजी ने पद्मावती को पाने की खातिर चित्तौड़ में नरसंहार किया था तब उस समय अपनी लाज बचाने की खातिर पद्मावती ने सभी राजपूत विधवाओं के साथ सामूहिक जौहर किया था, तभी से सती के प्रति सम्मान बढ़ गया और सती प्रथा परंपरा में आ गई। इस प्रथा के लिए धर्म नहीं, बल्कि उस समय की परिस्थितियां और लालचियों की नीयत जिम्मेदार थी।

23. पारंपरिक अंधविश्वास और टोटके : ऐसे बहुत से अंधविश्वास हैं, जो लोक परंपरा से आते हैं जिनके पीछे कोई ठोस आधार नहीं होता। ये शोध का विषय भी हो सकते हैं। इसमें से बहुत-सी ऐसी बातें हैं, जो धर्म का हिस्सा हैं और बहुत-सी बातें नहीं हैं। हालांकि इनमें से कुछ के जवाब हमारे पास नहीं है। उदारणार्थ-

* आप बिल्ली के रास्ता काटने पर क्यों रुक जाते हैं?
* जाते समय अगर कोई पीछे से टोक दे तो आप क्यों चिढ़ जाते हैं?
* किसी दिन विशेष को बाल कटवाने या दाढ़ी बनवाने से परहेज क्यों करते हैं?
* क्या आपको लगता है कि घर या अपने अनुष्ठान के बाहर नींबू-मिर्च लगाने से बुरी नजर से बचाव होगा?
* कोई छींक दे तो आप अपना जाना रोक क्यों देते हैं?
* क्या किसी की छींक को अपने कार्य के लिए अशुभ मानते हैं?
* घर से बाहर निकलते वक्त अपना दायां पैर ही पहले क्यों बाहर निकालते हैं?
* जूते-चप्पल उल्टे हो जाए तो आप मानते हैं कि किसी से लड़ाई-झगड़ा हो सकता है?
* रात में किसी पेड़ के नीचे क्यों नहीं सोते?
* रात में बैंगन, दही और खट्टे पदार्थ क्यों नहीं खाते?
* रात में झाडू क्यों नहीं लगाते और झाड़ू को खड़ा क्यों नहीं रखते?
* अंजुली से या खड़े होकर जल नहीं पीना चाहिए।
* क्या बांस जलाने से वंश नष्ट होता है।

ऐसे ढेरों विश्वास और अंधविश्वास हैं जिनमें से कुछ का धर्म में उल्लेख मिलता है और उसका कारण भी लेकिन बहुत से ऐसे विश्वास हैं, जो लोक परंपरा और स्थानीय लोगों की मान्यताओं पर आधारित हैं।

24. कर्मकांड और संस्कार : बहुत से ऐसे कर्मकांड और संस्कार हैं जिनका हिन्दू धर्म से कोई नाता नहीं है। जैसे 16 संस्कार के अलावा भी लोग तरह-तरह के संस्कार और रीति-रिवाज मानते हैं। प्रत्येक समाज का अपना अलग रीति और रिवाज है। जन्म-संस्कार के तरीके अलग, विवाह के तरीके अलग और अंतिम संस्कार के तरीके भी अलग। क्या मृत्युभोज का धर्म में उल्लेख मिलता है?

ऐसे बहुत से संस्कार, कर्मकांड, यज्ञकर्म और पूजा-पाठ हैं जिनका वैदिक हिन्दू धर्म से कोई नाता नहीं। उनमें से ज्यादातर स्थानीय परंपरा का हिस्सा हैं। लोग हिन्दू धर्म के 16 संस्कारों को अपनाते हैं लेकिन उसका शास्त्रसम्मत पालन नहीं करते उसमें स्थानीय परंपरा का प्रभाव ज्यादा रहता है। यज्ञ भी मात्र पांच तरह के होते हैं:- 1.ब्रह्मयज्ञ, 2.देवयज्ञ, 3.पितृयज्ञ, 4.वैश्वदेव यज्ञ, 5.अतिथि यज्ञ।

इस तरह हमने देखा है कि कई राज्यों में एक ही त्योहार, व्रत, संस्कार, उत्सव, यज्ञ आदि को अलग अलग तरीके से प्रयोजित किया जाता या मनाया जाता है। इस विभिन्नता का कारण लंबे काल की परंपरा और स्थानीय संस्कृति, भाषा आदि है।

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क्रांतिदूत: हिंदू धर्म के बारे में फैलाए गए भ्रम - भाग 3
हिंदू धर्म के बारे में फैलाए गए भ्रम - भाग 3
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