पहले गोली फिर सवाल यही है केजरीवाल

राजनैतिक हलकों में इस समय जो सबसे बड़ा सवाल किया जा रहा है, वय यह कि क्या वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा अरविंद केजरीवाल, कुमार विश्वास, ...


राजनैतिक हलकों में इस समय जो सबसे बड़ा सवाल किया जा रहा है, वय यह कि क्या वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा अरविंद केजरीवाल, कुमार विश्वास, आशुतोष, संजय सिंह, राघव चड्ढा और दीपक बाजपेयी के खिलाफ दायर किया गया मानहानि का मुकदमा किसी निश्चित फैसले तक पहुँच पायेगा ? हालांकि यह भी सही है कि केजरीवाल द्वारा दिल्ली जिला क्रिकेट संघ (डीडीसीए) में हुए संदिग्ध लेन-देन में जेटली के शामिल होने संबंधी लगाए गए गंभीर आरोपों के बाद उनके पास इसके अलावा कोई और विकल्प बचा भी नहीं था । 

घटना चक्र में रोचकता तब और बढ़ गई जब इधर जेटली ने सोमवार को राष्ट्रीय राजधानी में पटियाला कोर्ट में केजरीवाल और पांच अन्य आम आदमी पार्टी के नेताओं के खिलाफ सिविल मानहानि का मामला दायर किया, उसके तुरंत बाद भाजपा के पूर्व सदस्य और वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी ने इस मानहानि मुकदमे में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का वकील बनने की घोषणा कर दी | अब वे केजरीवाल का बचाव करते दिखेंगे । स्मरणीय है कि जेठमलानी को पार्टी विरोधी बयान देने के बाद 2013 में भाजपा से निष्कासित कर दिया गया था।

यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि क्रिकेट हमारे देश में खेल कम दीवानगी ज्यादा है | इसमें सियासत और पैसे की स्पिन बोलिंग होती है | अतः हर रसूखदार राजनेता अपने अपने क्षेत्र के क्रिकेट संघों के साथ नत्थी नजर आता है, फिर चाहे वो शरद पंवार हों, ज्योतिरादित्य सिंधिया हों, सुरेश कलमाडी हों अथवा स्वयं हमारे जेटली साहब हों | दरअसल केजरीवाल ने आरोपों का पत्थर मधुमक्खी के छत्ते पर फेंका है | अगर लड़ाई वास्तविक चली, जिसकी कि संभावना बहुत कम है, तो एक के बाद एक अनेक नेताओं के चेहरों की कलई खुलती दिखाई दे सकती है | इसलिए जल्द ही आप देखेंगे कि नेताओं की कौम कैसी कैसी कलाबाजी इस मामले में खाती है ।

बैसे भी केजरीवाल ने आरोपों की झडी तब लगाई, जब सीबीआई ने करप्शन के आरोपी उनके प्रधान सचिव राजेंद्र कुमार पर छापा मारा | अतः स्वाभाविक ही उनके आरोपों की विश्वसनीयता और उनकी नियत शुरूआत से ही शक के घेरे में आ गई है । अब वे भले ही यह कहें कि वित्त मंत्री अरुण जेटली मानहानि के मुकदमें के माध्यम से उन्हें डराने की कोशिश कर रहे हैं, किन्तु आप पार्टी का पुराना रिकोर्ड बताता है कि उसके नेता सीना फुलाकर आरोप लगाने के बाद कानूनी कार्यवाही की जद में आते ही, माफी मांगकर पीछा छुडाते नजर आते हैं, जैसा कि नितिन गडकरी जी वाले मामले में हुआ था ।

यह केजरीवाल की पुरानी कार्यपद्धति है कि पहले संदेह की कीचड़ बनाओ, और दुनिया को बताओ कि कैसे सारे नेता बदमाश और भ्रष्ट हैं, और कैसे वे ही भ्रष्टाचार से लड़ सकते हैं, और आम जन को बचा सकते हैं । लेकिन इसके बाद वे पुराने मामलों को भूलकर, किसी और नए मामले को पैदा कर लेते हैं । जहाँ तक भ्रष्टाचार का सवाल है, आप पार्टी और उसके नेता केजरीवाल किसी अन्य भारतीय राजनेता से अलग है, इस बात पर अब देश में शायद ही कोई भरोसा करे । भाजपा को अन्य पार्टियों जैसा बनने में 20 साल लगे, जबकि समानता की दौड़ में केजरीवाल ज्यादा तेज निकले ।

अब देखिये न, इस बार भी केजरीवाल ने डीडीसीए में घोटाले के आरोप लगाए और फिर आरोपों की जांच के लिए एक सदस्यीय जांच आयोग बना दिया | मजे की बात यह है कि जो गोपाल सुब्रमण्यम आरोपों की जांच करेंगे, वे सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पदोन्नति से वंचित कर दिए गए थे | कितनी क्रांतिकारी कारगुजारी है, कितना चमत्कारिक निर्णय है । यह ठेठ केजरीवाली निर्णय है। आरोप भी हमारे और जज भी हम | आपको याद होगा कि जब 2012 में आम आदमी पार्टी अपनी शैशव अवस्था में थी, तब ही प्रशांत भूषण, अंजलि दमानिया और मयंक गांधी के खिलाफ आरोप लगे थे और बड़ी धूमधाम से इनके खिलाफ आंतरिक लोकपाल से जांच कराने की घोषणा की गई थी | किन्तु उसके बाद क्या हुआ ? आज तक तो कुछ सूना नहीं कि उस आतंरिक लोकपाल ने कोई रिपोर्ट दी भी या नहीं ।

अपने प्रधान सचिव पर छापे से शर्मिन्दा केजरीवाल एक बार फिर कीचड़ बनाने में लग गए हैं, और इस बार उनका निशाना है जेटली । दरअसल मानहानि का मुक़दमा केजरीवाल तकनीक के खिलाफ एक कदम है, जिसमें पहले गोली मारी जाती है, फिर सवाल पूछा जाता है । क्या यह अच्छा नहीं होता कि केजरीवाल आरोप लगाने के स्थान पर पहले जाँच आयोग बनाते, पुख्ता सबूत इकट्ठा करते और उसके बाद सीधे सजा दिलवाते | तब तो लगता कि वे सचमुच भ्रष्टाचार के खिलाफ एक जानदार मुहीम चला रहे हैं | जेटली ने केजरीवाल के जन्मजात दोष को सही पहचाना है और शायद ठीक ही कदम उठाया है ।


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