हिमालय की गोद में अंगड़ाई लेते भूकंप - प्रमोद भार्गव

हिमालय की गोद में जिस तरह से एक के बाद एक भूकंप तबाही मचा रहे हैं,उससे लगता है कि हिमालय क्षेत्र की भौगोलिक सरंचना में तनाव बढ़ रहा है। प...


हिमालय की गोद में जिस तरह से एक के बाद एक भूकंप तबाही मचा रहे हैं,उससे लगता है कि हिमालय क्षेत्र की भौगोलिक सरंचना में तनाव बढ़ रहा है। पूर्वोत्तर के राज्य मणिपुर में आया भूकंप इस कड़ी का नया उदाहरण है। भूकंप का केंद्र तमेंगलोंग जिले की सतह से 17 किमी नीचे जरूर था,लेकिन इसका असर पूर्वोत्तर के सभी सातों राज्यों के अलावा पश्चिम बंगाल,ओडिशा,बिहार और झारखण्ड में भी दिखाई दिया। इससे पता चलता है कि हिमालय के गर्भ में फैल रही ऊर्जा बाहर आने को बेचैन हो रही है। भूगर्भशास्त्री हिमालय पर्वत के 2400 वर्ग किलोमीटर दायरे को भूकंप प्रभावित क्षेत्र मानकर चल रहे हैं। किन्तु विडंबना यह है कि विज्ञान की तकनीकी उपलब्धियों के चलते अतिवृष्टि,अनावृष्टि,चक्रवात,तूफान एवं अन्य प्राकृतिक आपदाओं की जानकारी तो पूर्व में मिल जाती है,लेकिन भूकंप की पूर्व सूचना प्राप्त करना अभी भी असंभव बना हुआ है। इसलिए भूकंप को रोक पाना तो नामुमकिन है ही इसके विस्फोट के साथ निकलने वाली ऊर्जा को निष्क्रिय करना भी संभव नहीं है।

बिना आहट के इतने बड़े इलाके में भूकंप आना और पल भर में तबाही मचा जाना,इस बात का संकेत है कि प्राकृतिक आपदाओं के आगे इंसान मजबूर है। हिमालय क्षेत्र में इससे पहले 25 अप्रैल 2015 को नेपाल में आए विनाशकारी जलजले के प्रवाह में देखते-देखते ढाई़ हजार से भी ज्यादा लोगों की जीवन-लीला खत्म हो गई थी। भारत में भी 40 लोग मारे गए। इस भूकंप का असर नेपाल,चीन,भूटान,बांग्लादेश,पाकिस्तान और भारत में देखने में आया था। इससे पहले इतने बड़े भू-क्षेत्र में पहले कभी धरती नहीं डोली। इससे साफ होता है कि,वे सब क्षेत्र भूकंप के दायरे में हैं,जिनकी जानकारी भू-गर्भ वैज्ञानिक पहले से देते रहे हैं। मणिपुर में आया भूकंप 6.7 त्रीवता का था। इसलिए इससे जनहानि कम हुई। फिलहाल 8 लोगों के मरने और 150 के घायल होने की जानकारी आई है। 

हिमालय में अब तक आए भूकंपों का अध्ययन करने वाले अमेरिकी विशेषज्ञों का मानना है कि जितनी ऊर्जा हिमालय के गर्भ में इस दौर में बन रही है,उसकी महज 8 फीसदी ऊर्जा ही भूकंपों के रूप में बाहर आई है। साफ है इस क्षेत्र में भविष्य में भी भूकंपों की आशंका बनी हुई है। मणिपुर व नेपाल में आए भूकंप और उत्तराखंड व जम्मू-कश्मीर में आई भीषण बाढ़ें इस बात का संकेत हैं कि असंतुलित विकास से उपजे जलवायु परिवर्तन के संकट ने पूरी हिमालय पर्वतमाला में भूकंप का बीजारोपण कर दिया है। इस तबाही के संकेत सामने आने लगे हैं। इन सबूतों ने तय कर दिया है कि चुपचाप आने वाला पल भर का प्रलय विनाश का कितना बड़ा कारण बन सकता है।

भूकंप आना कोई नई बात नहीं है। भारत और नेपाल समेत पूरी दुनिया धरती के इस अभिशाप को झेलने के लिए विवश होती रही है। हिमालय क्षेत्र में 1897 में भी बड़ा भूकंप आया था। इसके बाद 1950 में असम में भी बड़े भूकंप की त्रासदी लोग झेल चुके हैं। इसके बाद उत्तरकाशी भी भूकंप के बड़े संकट का सामना कर चुका है। दरअसल हिमालय की भारतीय परत 40 से 50 मिमी की दर से खिसक रही है। इस कारण पिछले कुछ वर्षों में भूकंप की घटनाएं बढ़ गई है। इस जानकारी के बाबजूद दुनिया के वैज्ञानिक आजतक ऐसी तकनीक इजाद करने में असफल रहे हैं,जिससे भूकंप की पहले ही जानकारी हासिल कर ली जाए। 

भूकंप के लिए जरूरी ऊर्जा के एकत्रित होने की प्रक्रिया को धरती की विभिन्न परतों के आपस में टकराने के सिंद्धात से आसानी से समझा जा सकता है। ऐसी वैज्ञानिक मान्यता है कि करीब साढ़े पांच करोड़ साल पहले भारत और आस्ट्रेलिया को जोड़े रखने वाली भूगर्भीय परतें एक-दूसरे से अलग हो गईं और वे यूरेशिया की परत से जा टकराईं। इस टक्कर के परिणामरूवरूप हिमालय पर्वतमाला अस्तित्व में आई और धरती की विभिन्न परतों के बीच वर्तमान में मौजूद दरारें बनीं। हिमालय पर्वत उस स्थल पर अब तक अटल खड़ा है,जहां पृथ्वी की दो अलग-अलग परतें एक दूसरे से टकराकर घुस गई हैं। परतों के टकराने की इसी प्रक्रिया की वजह से हिमालय और उसके प्रायद्वीपीय क्षेत्र में भूकंप आते रहते हैं। आधुनिकतम तकनीकी उपकरणों के माध्यम से परतों की गति मापने से पता चला है कि भारत और तिब्बत एक-दूसरे की ओर दो सेंटीमीटर प्रति वर्ष की रफ्तार से खिसक रहे हैं। नतीजतन इस प्रक्रिया से हिमालय क्षेत्र पर दबाव बढ़ रहा है। इस दबाव के प्रवाह को बाहर निकालने का प्रकृति के पास एक ही मार्ग है,और वह है भूकंप।

एशिया के हिमालय प्रायद्वीपीय इलाकों में बीते सौ वर्ष से धरती के खोल की विभिन्न दरारों में हलचल जारी है। हालांकि वैज्ञानिकों का ऐसा मानना है कि सामान्य तौर पर भूकंप 13 साल में एक बार आता है। लेकिन अब यह धारणा खंडित हो रही है। जबलपुर में 1997 में भूकंप आया और इसके ठीक 4 साल साल बाद गुजरात के कच्छ में भूकंप ने जबरदस्त तबाही मचाई थी। 1934 में बिहार-नेपाल की सीमा पर तूफान आया था। अमेरिका की प्रसिद्ध ‘सांइस‘ पत्रिका ने कुछ वर्ष पहले भाविष्यवाणी की थी कि अभी हिमालय के क्षेत्र में एक भयानक भूकंप आना शेष है। यदि यह भूकंप आया तो यह 5 करोड़ से भी ज्यादा लोगों को प्रभावित करेगा। जिसमें करीब 2 लाख लोग मारे जाएंगे। हालांकि पत्रिका ने इस अनुमानित भूकंप के क्षेत्र,समय और तीव्रता सुनिश्चित नहीं किए हैं,लेकिन मणिपुर का यह ताजा भूकंप जितने बड़े इलाके को हिलाकर गुजर गया है,उससे यह संकेत मिलता है कि पत्रिका में की गई भयानक भूकंप की भविष्यवाणी महज अटकल नहीं है। 

वैसे भी भूकंप की परतें भारत से लेकर अंटार्कटिक तक फैली हैं। यह पाकिस्तान सीमा से भी स्पर्श करती है। यह हिमालय के दक्षिण में है। जबकि यूरेशियन परतें हिमालय के उत्तर में हैं। भारतीय परतें उत्तर पूर्व दिशा में यूरेशियन परतों से जा मिलती है। इसी क्षेत्र में चीन बसा है। यदि ये परतें आपस में टकराती हैं तो भूकंप का सबसे बड़ा क्रेंद्र भारत होगा। भूकंप के खतरे के हिसाब से भारत 5 क्षेत्रों में बंटा है। 

पहले क्षेत्र में पश्चिमी मध्यप्रदेश,पूर्वी महाराष्ट्र,आंध्र प्रदेश,कर्नाटक और ओडिशा के हिस्से आते हैं। यहां भूकंप का सबसे कम खतरा है। 

दूसरा क्षेत्र तमिलनाडू,मध्यप्रदेश,राजस्थान,पश्चिम बंगाल और हरियाणा है। यहां भूकंप की संभावना बनी रहती है। 

तीसरे क्षेत्र में केरल,बिहार,पंजाब,महाराष्ट्र,पश्चिमी राजस्थान,पूर्वी गुजरात,उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश का कुछ भाग आता है। इसमें जब-तब भूकंप के झटके आते रहते हैं। 

चौथे क्षेत्र में मुबंई,दिल्ली जैसे महानगर हैं। जम्मू-कश्मीर,हिमाचल प्रदेश,पश्चिमी गुजरात,उत्तराखंड,उत्तर प्रदेश के पहाड़ी इलाके और नेपाल बिहार सीमा रेखा क्षेत्र शामिल हैं। यहां भूकंप का खतरा सबसे ज्यादा बना रहता है। 

पांचवे क्षेत्र में गुजरात का कच्छ इलाका और उत्तराखंड का कुछ हिस्सा आता है। पूर्वोत्तर के ज्यादातर राज्य इसी क्षेत्र में आते हैं। भूकंप की दृष्टि से ये इलाके सबसे ज्यादा संवेदनशील हैं,। इन्हीं क्षेत्रों को भयानक भूकंपों का क्षेत्र माना गया है। नेपाल और मणिपुर में आए भूकंप इसी क्षेत्र में हैं। 

वैज्ञानिकों का मानना है कि रासायनिक क्रियाओं के कारण भी भूकंप आते हैं। भूकंपों की उत्पत्ति धरती की सतह से 30 से 100 किमी भीतर होती है। लेकिन मणिपुर में जो भूकंप आया है,उसका केंद्र सतह से महज 17 किमी नीचे था। इसी तरह नेपाल में जो भूकंप आया था उसका केंद्र भी महज धरती से 15 किमी नीचे था। इससे यह पता चलता है कि भूकंप की प्रक्रिया की गहराई कम होती जा रही है। इसलिए कालांतर में आने वाले भूकंप बड़ी तबाही का सबब बन सकते हैं।

दरअसल सतह के नीचे धरती की परत ठंडी होने व कम दबाव के कारण कमजोर पड़ जाती है। ऐसी स्थिति में जब चट्टानें दरकती हैं तो भूकंप आता है। कुछ भूकंप धरती की सतह से 100 से 650 किमी नीचे भी आते हैं। इतनी गहराई में धरती इतनी गर्म होती है कि एक तरह से वह द्रव्य में बदल जाती है। यह हलचल इतनी नीचे होती है,इसके झटकों या टकराव के असर ऊपर तक कम ही आ पाते हैं। लेकिन इन भूकंपों से ऊर्जा बड़ी मात्रा में बाहर निकलती है। धरती की इतनी गहराई से प्रगट हुआ सबसे बड़ा भूकंप 1994 में बोलीविया में रिकॉर्ड किया गया है। सतह से 600 किमी भीतर दर्ज इस भूकंप की तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 8.3 मापी गई थी। हालांकि इस अवधारणा के विपरीत कुछ वैज्ञानिकों की यह भी मान्यता है कि इतनी गहराई से भूकंप धरती की सतह पर तबाही मचाने में सफल नहीं हो सकते,क्योंकि चट्टाने तरल द्रव्य के रूप में होती हैं।

प्रमोद भार्गव
लेखक/पत्रकार
शब्दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी
शिवपुरी म.प्र.
मो. 09425488224
फोन 07492 232007
लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है।

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