यूरेका! यूरेका ! आखिर ईरानी गिरफ्त में आ ही गईं ! - भाऊ तोर्सेकर

मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने बुधवार को लोकसभा में एक जबरदस्त आक्रामक भाषण दिया और अपने खिलाफ लगाए गए सभी आरोपों की धज्जियां ...



मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने बुधवार को लोकसभा में एक जबरदस्त आक्रामक भाषण दिया और अपने खिलाफ लगाए गए सभी आरोपों की धज्जियां उड़ा दीं । उसके भाषण का देश भर में सीधा प्रसारण किया गया था और परिणाम स्वरुप न केवल समर्थक बल्कि मीडिया में उनके धुर विरोधी माने जाने वाले लोग भी उनकी प्रतिभा की सराहना करने के लिए विवश हुए । भले ही यह सराहना मन से न की हो | दरअसल, मीडिया के इस समर्पण में मूल कारण वह वातावरण था, जो उस एक भाषण के बाद पूरे देश में बना । क्योंकि खुर्दबीन से देखने के बाद भी मीडिया के लोगों को स्मृति ईरानी के भाषण में कोई कमी समझ में नहीं आई । कोई भी ऐसी गलती या कोई एक बिंदु जिसकी मदद से वे लोगों को गुमराह कर पाते । इसे न उदारता कहा जा सकता न ही सहिष्णुता | जिन लोगों को सफेद झूठ बोले बिना खाना भी हजम नहीं होता, वे तहे दिल से ईरानी के भाषण को स्वीकार करेंगे, इसकी तो उम्मीद ही नहीं की जा सकती ।

और हुआ भी यही | और आखिरकार आर्कमिडीज के समान वे नंगे होकर बाथरूम से चिल्लाते हुए निकले यूरेका यूरेका, मिल गया मिल गया, मुद्दा मिल गया | क्या महान खोज की उन्होंने ? उन्होंने खोज की कि स्मृति ईरानी ने लोकसभा में झूठ बोला, उन्होंने संसद व देश को गुमराह किया, इसलिए उन्हें स्तीफा दे देना चाहिए |

इन साहिबानों के अनुसार आखिर मानव संसाधन विकास मंत्री ने क्या झूठ बोला ? उनका कहना है कि स्मृति ईरानी ने कहा कि रोहित बेमुला की आत्महत्या के बाद डॉक्टरों को उसके मृत शरीर के पास लंबे समय तक जाने नहीं दिया गया । ईरानी को झूठा सिद्ध करने के लिए एक डॉक्टर के बयान का उपयोग किया गया । क्या इसे एक मजबूत सबूत माना जा सकता है ? डॉक्टर को सच्ची बताने वाले वे ही लोग है जो लगातार हेडली को झूठा बताते रहे हैं । डॉक्टर राजश्री कहती है कि वह रोहित के पास सूचना मिलते ही बिना किसी देरी के पांच मिनट के भीतर पहुँच गईं और उन्होंने उसकी जाँच की तथा जाँच के बाद उसे मृत घोषित कर दिया। 

चूंकि उस समय वे ड्यूटी पर थीं, अतः कोई भी उनके दावे पर विवाद नहीं कर सकता । लेकिन केवल उनका यह दावा क्या लोकसभा में स्मृति ईरानी को झूठा सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है? ईरानी ने अपने बयान में डॉ राजश्री का तो हवाला ही नहीं दिया । सवाल यह भी उठता है कि डॉ राजश्री ने इससे पहले यह जानकारी मुख्य मंत्री या केन्द्रीय मंत्री को क्यों नहीं भेजी ? आज एक तोते के समान बोलने वाली डॉक्टर इतने दिनों तक चुप क्यों रहीं ? क्या वे यह इन्तजार कर रही थीं, कि कब स्मृति ईरानी लोकसभा को गुमराह करे? रोहित की आत्महत्या को भुनाने का प्रयत्न यहाँ स्वतः उजागर हो जाता है । 

दूसरे एंगिल से विचार करें तो डॉ. राजश्री का बयान अपने आप में स्मृति ईरानी को ही सही सिद्ध करता है | जरा सोचिये कि कोई व्यक्ति फांसी लगाकर आत्म ह्त्या करे, तो उसके परिजन व आत्मीय स्वजन क्या करेंगे ? वे डॉ. को बुलायेंगे या उसकी जान बचाने के लिए नीचे उतारकर हॉस्पिटल पहुचायेगे ? डॉ. राजश्री ने अपने बयान में महज इतना ही कहा है कि सूचना मिलने के तुरंत बाद घटनास्थल पर पहुँच गईं | किन्तु सूचना कितने समय बाद दी गई, इसका कोई उल्लेख नहीं है |

ईरानी ने केवल यह जानकारी दी थी कि इस आत्महत्या के बाद उन्होंने एक मंत्री के रूप में क्या कदम उठाये । लोकसभा में उन्होंने स्थानीय स्तर पर हुई लापरवाहियों का वर्णन किया था । अपने भाषण में स्मृति ईरानी ने स्थानीय प्रशासन और सरकार के सुस्त और लापरवाह रवैये पर उंगली उठाई थी | उन्होंने कहा था कि यह एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है, किन्तु यह विश्वविद्यालय तेलंगाना राज्य में होने के कारण कानून और व्यवस्था की जिम्मेदारी स्थानीय सरकार की है । इसलिए आत्महत्या की सूचना मिलने के तुरंत बाद उन्होंने मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव से फोन पर बात करने की कोशिश की, लेकिन उन्हें फोन पर जवाब मिला कि वे व्यस्त हैं । उसके बाद उन्होंने अपने सांसद की बेटी से संपर्क का प्रयत्न किया, किन्तु उन्होंने भी कोई जवाब नहीं दिया। इसके बाद उन्होंने स्थानीय पुलिस से संपर्क किया और जानकारी एकत्रित करने का प्रयत्न किया ।

महाराष्ट्र टाइम्स ने “स्मृति ने झूठ बोला” शीर्षक से एक आलेख प्रकाशित किया है, लेकिन वे भी यह मानते हैं कि ईरानी ने तेलंगाना पुलिस की सूचना के आधार पर दावा किया था । क्या इसका मतलब यह नहीं है कि स्मृति ईरानी को जो भी जानकारी मिली वह पुलिस से मिली ? क्योंकि उदार मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव ने तो कई हफ्तों के बाद भी इस संवेदनशील और धर्मनिरपेक्ष मुद्दे पर तत्काल केंद्र की जरूरत ही नहीं समझी । स्मृति ईरानी ने यही प्रमाणित करने का प्रयत्न किया कि कैसे तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीतिज्ञों ने रोहित बेमुला के मुद्दे को जीवित रखने की साजिश रची । 

ईरानी ने जोर देकर लोकसभा को बताया कि राव ने आज तक उन्हें वापस फोन नहीं किया । तो डॉ राजश्री के बयान का क्या निहितार्थ है ? क्यों डॉ राजश्री ने पुलिस द्वारा स्मृति ईरानी को दी गई जानकारी को दुरुस्त करने के अपने कर्तव्य को पूरा नहीं किया? जब उनके मुख्यमंत्री ने कुछ नहीं किया, तो डॉ राजश्री को चाहिए था कि वह केंद्रीय मंत्री को सूचित करतीं, किन्तु वह आज तक चुप रहीं । शायद उनकी रूचि सत्य को सामने लाने में नहीं थी । रोहित मरे चाहे जिये, इससे सेक्यूलर और उदारवादियों को कोई मतलब नहीं है। उनकी रूचि महज स्मृति या भाजपा को फंसाने में है । 

उनकी ऐसी ही कारगुजारियों के चलते रोहित या उसके समान अन्य बच्चों को अपना जीवन बलिदान करना पड़ा है । क्या विचित्र सोच है सेक्यूलरों का ? अगर मुख्यमंत्री उपलब्ध नहीं थे तो स्मृति ईरानी के पास इन डॉ राजश्री की जानकारी होनी चाहिए थी, डॉ. राजश्री का फोन नंबर होना चाहए था, और उन्हें चाहिए था कि वे इनके पास जातीं और पूछतीं कि वास्तविकता क्या है | कोई धर्मनिरपेक्ष उदारवादी नहीं पूछ रहा कि मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव ने केन्द्रीय मंत्री के फोन का जबाब क्यों नहीं दिया ? रोहित जैसे लोग मरने ही चाहिए, ताकि ये उदारवादी अमर रहें ।

ईरानी को झूठा सिद्ध करने के लिए जितनी शीघ्रता और उतावली दिखाई जा रही है, उदारवादियों को क्या रोहित को बचाने के लिए भी उतना ही प्रयत्न नहीं करना चाहिए था ? ऐसा कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है कि किसी उदारमना ने रोहित को आत्महत्या से रोकने का थोड़ा भी प्रयत्न किया हो । क्या एक भी धर्मनिरपेक्ष नेता ने मंत्री स्मृति ईरानी के समक्ष आकर कभी कहा या लिखा है कि रोहित व अन्य छात्रों के खिलाफ हुई कार्यवाही ठीक नहीं है, उन्हें न्याय मिलना चाहिए? ऐसा कोई विवरण उपलब्ध नहीं है, जिससे यह ज्ञात हो कि आज रोहित के लिए मगरमच्छी आंसू बहाने वाले किसी भी व्यक्ति ने रोहित की उदासी व निराशा के दौरान उसे आत्महत्या से रोकने का थोड़ा भी उपाय किया हो । किसी धर्मनिरपेक्ष ने उसके घायल मन की व्यथा सुनने, उसके मन को छूने की चेष्टा भी नहीं की, फिर आज उनकी सहानुभूति कितनी असली है? सच तो यह है कि उन्होंने कुछ भी नहीं किया । किसी उदारवादी ने कभी रोहित की दुर्दशा की चिंता नहीं की, नाही उसके साथ हुए अन्याय पर थोड़ा भी ध्यान दिया । 

आखिर किसी उदार राजनेता को उसके जीवित रहने से क्या लाभ होता ? इसके बजाय, उसकी आत्महत्या या मौत उदारवादियों के लिए एक वरदान थी । इसलिए, इन शवभक्षी गिद्धों की नजर उसकी मौत पर गडी हुई थी । उसे मरने दिया गया, उसे आत्महत्या करने दिया गया और अब हर कोई शोर मचाने पहुँच चुका है । स्मृति ईरानी ने तथ्यों को ठीक ही बताया है। ईरानी ने कम से कम खबर मिलने के बाद चिंता तो की, और तेलंगाना के मुख्यमंत्री को फोन किया । उन्हें कोई जबाब नहीं मिला । ईरानी ने उदारवादियों के घिनौने स्वरुप का पर्दाफ़ाश किया है । डॉ राजश्री इस प्रकरण का प्रत्यक्ष प्रमाण है, क्योंकि उनके द्वारा की गई जांच की जानकारी न तो मुख्यमंत्री को थी और नाही तेलंगाना पुलिस को उनके विषय में कोई जानकारी थी । कोई उदार नहीं चाहता था कि दिल्ली में ईरानी को रोहित के मरने के विषय में कोई जानकारी मिले । इससे साफ़ पता चलता है कि झूठ कौन बोल रहा है और कितनी बेशर्मी से बोल रहा है ।

- भाऊ तोर्सेकर

विश्व संवाद केन्द्र-पश्चिम महाराष्ट्र
पुणे

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क्रांतिदूत: यूरेका! यूरेका ! आखिर ईरानी गिरफ्त में आ ही गईं ! - भाऊ तोर्सेकर
यूरेका! यूरेका ! आखिर ईरानी गिरफ्त में आ ही गईं ! - भाऊ तोर्सेकर
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