स्मृति जी को चाहिए कि वे राहुल जी को धन्यवाद दें ! - भाऊ तोर्सेकर

राजनीति की असली शक्ति जनता के विचारों में निहित है। जनधारणा की मदद से कुछ व्यक्ति अपनी छवि बनाकर अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफल...


राजनीति की असली शक्ति जनता के विचारों में निहित है। जनधारणा की मदद से कुछ व्यक्ति अपनी छवि बनाकर अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफल होते हैं, इसी का नाम राजनीति है । अपने प्रतिद्वंदी को खलनायक प्रमाणित कर स्वयं को नायक सिद्ध करने का नाम है राजनीति । इस पर विचार करें तो एक बात साफ़ दिखाई देती है कि कैसे मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने संसद में बुधवार को अपने विरोधियों की मूर्खता को जग जाहिर कर दिया । मोदी सरकार ने 20 महीने पहले शपथ ग्रहण कर सत्ता सूत्र संभाले । तब से आज तक जो इकलौता मंत्री विरोधियों की आँख में लगातार खटकता रहा, उसका नाम है स्मृति ईरानी! प्रश्न उठाये गए कि जिस मंत्री के हाथ में छात्रवृत्ति और शिक्षा का विकास सोंपा गया है, उसकी शैक्षणिक योग्यता क्या है, उसकी पहचान क्या है । ईरानी की शैक्षिक योग्यता और प्रमाण पत्र की छानबीन चलती रही । कुल मिलाकर चिल्लपों मचाई गई कि एक महत्वपूर्ण मंत्रालय एक नाकारा व्यक्ति को दिया गया है और मोदी सरकार भारत में शिक्षा प्रणाली को नष्ट कर रही है । यहाँ तक कि इस कोरस में कई मोदी समर्थक भी शामिल हो गए। विरोधियों को जब भी मौक़ा मिलता वे स्मृति ईरानी को बदनाम करने में कोई कसार नहीं छोड़ते । वेचारी ईरानी जब भी स्पष्टीकरण देने की कोशिश करतीं, उन्हें मनगढ़ंत बताकर उनकी छवि को और अधिक क्षतिग्रस्त करने का प्रयत्न होता । 

पिछले एक महीने में तो सारी सीमाएं लांघ दी गईं । कहा गया कि कि स्मृति ईरानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एजेंडे को लागू कर रही हैं और उनका प्रयास है शिक्षण संस्थानों का भगवाकरण | वे अल्पसंख्यकों और पिछड़े वर्ग के साथ भेदभाव कर रही हैं; अच्छे अधिकारियों और शिक्षकों को वहां से स्थानांतरित कर हिंदुत्व समर्थकों को लाया जा रहा है, आदि आदि | यहाँ तक कि कोई ईरानी का स्पष्टीकरण सुनने को भी तैयार नहीं था, ना ही वे अपने पर लगाए गए आरोपों को ठीक से अस्वीकार ही कर पा रही थीं ।

मीडिया जानबूझ कर बार बार उनकी पूर्व अभिनेता की छवि का अपमानजनक ढंग से उल्लेख करती रही । ध्यान देने योग्य बात यह है कि श्रीमती सोनिया गांधी भी राजनीति में आने के पूर्व एक गृहिणी ही थी और अपने प्रारंभिक जीवन में तो उन्होंने बारगर्ल के रूप में भी काम किया। खैर यह टैग हमेशा ईरानी के साथ बने रहे। उसके बाद आया जेएन यू में राष्ट्र विरोधी नारे का प्रकरण और उसके भी पहले हैदराबाद विश्वविद्यालय में रोहित बेमुला की आत्महत्या का मामला । जाहिर है, विरोधियों को एक और मौक़ा मिल गया और दोनों ही मामलों में मोदी सरकार और स्मृति ईरानी को कसूरवार ठहराया जाने लगा । यह एक परिपाटी सी बन गई है कि लगाए गए आरोपों की सत्यता जानने की कोई कोशिश ही नहीं होती । मानो आरोप ही अपने आप में सबूत हों । इसी टेंडेंसी के चलते राहुल गांधी ने खुले तौर पर आरोप लगाया कि विश्वविद्यालयों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 'के एजेंडे पर जोर दिया जा रहा है। उन्होंने अपनी बात के समर्थन में न टी कोई सबूत प्रस्तुत किया और ना ही अपने आरोप का कभी विस्तार से खुलासा ही किया । 

स्मृति ईरानी और मोदी सरकार द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण को मीडिया ने कभी महत्व ही नहीं दिया । इसलिए विपक्ष द्वारा लगाए गए आरोपों में जनता को सचाई दिखाई देने लगी । संक्षेप में कहा जाए तो विपक्ष ईरानी और मोदी सरकार के खिलाफ चलाये गए अपने कुटिल अभियान में सफल रहा और मोदी सरकार की छवि जनता में धूमिल होने लगी । लेकिन विपक्षी भूल गए कि अगर कभी इन आरोपों की सचाई जनता के सामने आई तो वे बेनकाब हो जायेंगे और पांसा पलट जाएगा, लेने के देने पड़ जायेंगे । और यही हुआ भी | नादान राहुल ने स्मृति ईरानी को संसदीय बहस में मौक़ा दे दिया | यह संसदीय बहस सीधे प्रसारण के माध्यम से व्यापक स्तर पर लोगों तक पहुंची और सच्चाई पर से पर्दा उठा गया विपक्ष भूल गया था कि असंसदीय तमाशा संसद में खेलना उसे भारी पड़ सकता है । लेकिन अब क्या हो सकता है ? राहुल आत्मघाती गोल कर चुके थे । उन्होंने स्मृति ईरानी को बेजोड़ मौक़ा दे दिया, अपने खिलाफ लगे हर आरोप को धोने का ।

स्मृति ईरानी के तरकस से जब तीर निकालने शुरू हुए तो कांग्रेस को सदन छोड़कर भागने के अलावा कोई मार्ग नहीं सूझा । राहुल गांधी, जो एक दिन पूर्व पत्रकारों से कह रहे थे कि मोदी सरकार उन्हें बोलने नहीं देगी, मौक़ा मिलाने पर भी बोलने की हिम्मत तक नहीं जुटा पाए | अपने स्थान पर ज्योतिरादित्य सिंधिया को बहस के लिए खड़ा किया । जब कांग्रेस लोकसभा से बहिर्गमन कर रही थी, तब स्मृति ईरानी ने टिप्पणी की " आप लोग तो बहस करना चाहते थे न अब भाग क्यों रहे हो ? अरे आप लोग बहस करना नहीं चाहते केवल संसद को बाधित करना चाहते हो । " कांग्रेस के पास कोई जबाब नहीं था, क्योंकि एक के बाद एक उनके सभी आरोप खारिज करते हुए स्मृति ईरानी ने संसद के समक्ष दस्तावेजी सबूत पेश किये | लोग समझ गए कि वास्तव में कांग्रेस अपनी सरकार के समय के पाप छुपाना चाहती है । विपक्ष के पास ईरानी के हमले का सामना करने की सहनशक्ति भी नहीं बची । स्मृति ईरानी ने अधिकारियों और कुलपतियों की एक सूची पेश की जिन्हें कांग्रेस के शासन के दौरान नियुक्त किया गया था और कांग्रेस उनका ठीकरा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के सर फोड़ना चाह रही थी । इससे पहले कभी भी पिछले 20 महीनों में सत्तारूढ़ पार्टी के इतने आक्रामक तेवर नहीं देखे गए थे । इस संसदीय बहस का मैन ऑफ द मैच स्मृति ईरानी ही रहीं ।

एक राजनीतिक दल अगर अवसर का लाभ लेने की कोशिश करे तो शायद उसमें कुछ भी गलत नहीं है । लेकिन ज्यादा चालाकी या चतुराई खुद के लिए ही गड्ढा खोदती है । गड्ढा दूसरे के लिए खोदा जाये तो उसमें खुद ही गिरना पड़ता है । संसद में इस बहस पर जोर देने का निर्णय बूमरेंग साबित हुआ । कांग्रेस के पाप बेनकाब हुए और संसदीय कार्यवाही के सीधे प्रसारण ने जनता को यह भी बता दिया कि जिस स्मृति ईरानी को औसत दर्जे की 12 वीं पास महिला बताया जाता रहा, उसकी योग्यता क्या है, स्मृति ईरानी के संसदीय कौशल को शायद ही कोई कभी भूल पाए । कमसेकम कांग्रेसी तो भूलने से रहे | वास्तव में, स्मृति ईरानी को राहुल सहित सभी विरोधियों का शुक्रिया अदा करना चाहिए, जिन्होंने उन्हें यह सुनहरा अवसर मुहैया करवाया |
विश्व संवाद केन्द्र-पश्चिम महाराष्ट्र
पुणे

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क्रांतिदूत: स्मृति जी को चाहिए कि वे राहुल जी को धन्यवाद दें ! - भाऊ तोर्सेकर
स्मृति जी को चाहिए कि वे राहुल जी को धन्यवाद दें ! - भाऊ तोर्सेकर
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