कर्ज के खिलाड़ी - प्रमोद भार्गव

संदर्भः देश से माल्या का भागना  सर्वोच्च न्यायालय का शिकंजा अपने ऊपर कसता देख विजय माल्या जिस चालाकी से देश छोड़कर नौ दो ग्यारह हो गए, ...

संदर्भः देश से माल्या का भागना 

सर्वोच्च न्यायालय का शिकंजा अपने ऊपर कसता देख विजय माल्या जिस चालाकी से देश छोड़कर नौ दो ग्यारह हो गए, उससे लगता है,सरकार चाहे संप्रग की रही हो या राजग की पूंजीपतियों के पक्ष में इनकी कार्य संस्कृति एक जैसी ही रहती है। शराब और फिर किंगफिशर एयरलाइंस शुरू करने वाले कारोबारी विजय माल्या एक समय भले ही व्यापरियों के आदर्श रहे हों, लेकिन बाद में उनकी भूमिका भोग विलासी, कर्ज के खिलाड़ी के रूप में ही सामने आई है। अब कर्ज वसूली की सख्ती के चलते जिस तरह से राज्यसभा सदस्य होने के बावजूद उन्होंने देश से पलायन किया है, उससे उनकी भगोड़े की भूमिका भी सामने आ गई हैं। 31 मार्च 2015 तक केवल 44 कर्जदारों के पास सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंकों का 4,87,521 करोड़ रुपए बकाया चल रहा है। इनमें से भी 5 बड़े कर्जदार हैं। 

वह कर्ज ही क्या,जो ब्याज समेत न लौटे ? लेकिन ब्याज तो ब्याज उद्योग जगत के बड़े कर्जदार, बैंकों का मूलधन भी नहीं लौटा रहे हैं। अब उन्होंने कर्ज वसूली से बचने के दो उपाय सोच लिए हैं, एक दिवालिया घोषित होकर कानून के शिकंजे से बचे रहें,दूसरे विदेश जाकर कानून को ठेंगा दिखाते रहें। पहले ललित मोदी ने ऐसा किया और अब विजय माल्या इसी राह पर चल पड़े है। माल्या पर 17 बैंकों का 9000 करोड़ रुपए बकाया है। इनमें से अकेली किंगफिशर कंपनी पर 7800 करोड़ रुपए का कर्ज हैं। माल्या को जिस दरियादिली से बैंकों ने कर्ज दिया है और जिस ढंग से उन्होंने देश छोड़ा है, उससे लगता है कि जनता की इस गाढ़ी कमाई के डूबने-डूबाने के खेल में राजनीति, अधिकारी, कारोबारी और बैंक प्रबंधकों का पूरा एक तंत्र शामिल हैं। कांग्रेस ने जब संसद में भाजपा को घेरा तो भाजपा ने भोपाल गैस कांड के आरोपी वारेन एंडरसन और क्वात्रोची का मुद्दा उठा दिया। इससे भाजपा ने यह जाहिर किया है कि बोफोर्स तोप सौदे के आरोपी क्वात्रोची को देश छोड़ने की इजाजत दी तो हमने माल्या को जाने देने में कौनसा बड़ा गुनाह किया है। ? 

माल्या की किंगफिशर के 2012 में ही डूब जाने के कारण इसका लाइसेंस रद्द कर दिया था, बावजूद बैंक चार साल तक मौन रहे। माल्या को सबसे ज्यादा धन स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने दिया है। अब गैरसरकारी संगठन सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन ने सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर करने और अदालत की सख्ती के बाद बैंक छाती पीट रहे हैं। न्यायालय ने भारतीय रिजर्व बैंक से उन कंपनियों की सूची पेश करने को कहा है,जिन पर 500 करोड़ रुपए से अधिक का सार्वजनिक बैंकों का कर्ज बकाया है। साथ ही कर्ज वसूली में भी सख्ती की हिदायत बैंकों को दी हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए यह जरूरी है कि वे सफेदपोश व्यापारियों के चेहरे सामने आएं,जो बैंकों का कर्ज नहीं लौटा रहे हैं। याचिकाकर्ता संगठन का दावा है कि 2015 में 40,000 करोड़ रुपए का ऋण बट्टे खाते में डाल दिया गया है। आरबीआई की वित्तिय स्थिति रिपोर्ट के मुताबिक भी बैंकों का 4,43,691 करोड़ रुपए का कर्ज डूबने के कगार पर हैं,इसमें 70 फीसदी हिस्सा कंपनियों को दिए गए कर्ज का है। बैंकों को सुचारू रूप से चलाने के लिए 1.80 करोड़ रुपए की जरूरत होती है, जो बढ़ते एनपीए के चलते बैंकों के पास नहीं रही है। सरकार चाहे मनमोहन सिंह की रही हो या अब नरेंद्र मोदी की,दोनों ने ही औद्योगिक जगत के हितों का सरंक्षण बढ़-चढ़कर किया है। इस बात की पुष्टि हाल ही में आए नए बजट से भी होती है। सरकार ने 70,000 करोड़ रुपए की योजना बैंकों को डूबने से बचाने के लिए तैयार की हैं। इस बजट में इस हेतु 25000 करोड़ रुपए का प्रावधान कर भी दिया गया है। जबकि सरकार को जरूरत थी कि वह माल्या जैसे कर्ज के खिलाड़ियों से धन-वसूली करती। 

इस तथ्य से सभी भलिभांति परिचित हैं कि बैंक और साहूकार की कमाई कर्ज दी गई धनराशि पर मिलने वाले सूद से होती है। यदि ऋणदाता ब्याज और मूलधन की किस्त दोनों ही चुकाना बंद कर दें तो बैंक के कारोबारी लक्ष्य कैसे पूरे होंगे ? हालात इतने बद्तर हो गए है कि 40 सूचीबद्ध बैंकों का 4,43,691 करोड़ रुपए डूबंत खाते में आ गया है। ऐसी कंपनियों की संख्या लगभग 1100 है,जो वर्षों से किस्त नहीं चुका रही हैं। चूंकि सरकार और बैंक इस कर्ज को वसूलने के लिए सख्ती से पेश नहीं आ रहे हैं,इसलिए यह आशंका भी पनप रही है कि सरकार और बैंकों की साठगांठ के चलते आम जनता की गाढ़ी कमाई की पूंजी हड़पने के लिए कुछ बड़े कार्पोरेट घरानों ने यह सुनियोजित ढंग से षड्यंत्र रचा है। इस नजरिए से मध्यप्रदेश में निर्माणाधीन महेष्वर विद्युत परियोजना में इस सच का खुलासा भी हुआ है। इस परियोजना को 1994 में मध्यप्रदेश विद्युत मंडल से छीनकर निजी कंपनी एस कुमार को दे दिया गया था। किंतु दो दशक बीत जाने के बावजूद काम तो पूरा हुआ नहीं,अलबत्ता प्रदेश सरकार ने फिर से अधूरी योजना को पूरी करने की जिम्मेदारी अपने हाथों में ले ली। इस दौरान कंपनी के कई करोड़ रुपए माफ किए गए। बावजूद एस कुमार पर परियोजना के लिए सार्वजनिक बैंकों का 2400 करोड़ रुपए बकाया है। एनपीए की सूची में एस कुमार का नाम पांचवें स्थान पर है। 

कर्ज में डूबी 1129 ऐसी कंपनियां हैं,जिन पर निरंतर कर्ज बढ़ रहा है। देश के बैंकों में जमा पूंजी करीब 80 लाख करोड़ है। इसमें 75 प्रतिशत राशि छोटे बचतकर्ताओं और आम जनता की है। जनधन योजना के तहत जो नए खाते खुले हैं, उनसे भी बैंकों में करीब 25,000 करोड़ रुपए जमा हुए हैं। कायदे से तो इस पूंजी पर नियंत्रण सरकार का होना चाहिए,जिससे जरूरतमंद किसानों,शिक्षित बेरोजगारों और लघु व मंझेले उद्योगपतियों की पूंजीगत जरूरतें पूरी हो सकें। लेकिन दुर्भाग्य से यह राशि बड़े औद्योगिक घरानों के पास चली गई है और वे न उसे केवल दावे बैठे हैं, बल्कि गुलछर्रे उड़ा रहे हैं। जबकि फसल उत्पादक किसान आत्महत्या कर रहा है। 

जिस वक्त केंद्र में संप्रग की सरकार थी और अर्थव्यवस्था की गुलाबी तस्वीर पेश की जा रही थी, ठीक उसी वक्त तत्कालीन वित्तमंत्री चिंदबरम ने एक बेलाग सच्चाई से अवगत कराते हुए कहा था, ‘गरीब कर्जदारों की वजह से कभी भी बैंकों का हजारों करोड़ रुपए का वैसा नुकसान नहीं हुआ, जैसे अभी-अभी किंगफिशर एयरलाइंस के डिफॉल्टर के कारण हुआ है। यह घटना अपवाद नहीं है, बल्कि ऐसे कई डिफॉल्टर हैं।‘ इसी समय चिदंबरम ने वित्तीय संस्थानों को सलाह देते हुए कहा था, ‘भारत में गरीब कर्जदार कतई बुरे नहीं हैं। वे ईमानदार हैं। गरीब नैतिक द्रष्टि से मजबूत और पारंपरिक ज्ञान में दक्ष हैं,इसलिए इन्हें अधिक कर्ज देने की जरूरत है।‘ 

बावजूद यह विंडबना ही है कि औद्योगिक घरानों को आसानी से हजारों करोड़ का कर्ज मिल जाता है, जबकि छोटे कर्जदारों को बैंकों के कई-कई चक्कर लगाने होते हैं। विसंगति यह भी है कि उद्योगों के लिए कम ब्याज दर पर कर्ज मिलता है। इन बाधाओं की वजह से नवीन उद्यमियों व नवोन्मेशियों को अपना कारोबार शुरू करना ही मुश्किल होता है। घर के लिए कर्ज लेना भी कठिन होता है। यही वजह है कि आम आदमी सूदखोर महाजनों के चंगुल में फंसता जा रहा है। ऐसी विषम कठिनाइयों के चलते माइक्रो फाइनेंस का धंधा पूरे देश में फला-फूला है। जबकि ये 30 फीसदी की ऊंची सालाना ब्याज दर पर गरीब और मध्य वर्ग के लोगों को कर्ज देते हैं। लेकिन यह कर्ज का ऐसा दुष्चक्र है,जिसमें फंसकर व्यक्ति उबर नहीं पाता। यहां तक कि कई कर्जदार आत्मघाती कदम उठाने को मजबूर हो जाते हैं। इस हकीकत से पता चलता है कि बैंकिंग क्षेत्र कमजोर तबकों का सहारा बनने में नाकाम रहे हैं। जबकि इसके विपरीत यही बैंक धनी वर्ग की सुख-सुविधाएं बढ़ाने, औद्योगिक क्षेत्र के वित्तीय स्रोत खोलने और कुप्रबंधन के चलते डूबने वाली कंपनियों को उबारने का जरिया जरूर बने हैं। लेकिन इस कवायद में बैंकों का एनपीए इतना बढ़ गया कि बैंक तो आर्थिक रूप से खस्ताहाल हुए ही, देश की समूची अर्थव्यवस्था भी डावांडोल है। चिड़िया के खेत चुगने के बावजूद रिर्जव बैंक और वित्त मंत्रालय ने तो धन वसूली की चिंता नहीं की थी, किंतु जब न्यायालय ने सख्ती दिखाई तो माल्या जैसे कर्ज के खिलाड़ियों ने सरकार की सभी एजेंसियों की आंखों में मिर्ची झोंककर भागना शुरू कर दिया है। 

कर्ज का सूद समेत नहीं लौटने का असर नई और अधूरी परियोजनाओं पर पड़ रहा है। दरअसल, कर्ज के रूप में दी गई धनराशि के लौटने से ही उसका फिर से निवेश संभव है। लेकिन एनपीए की समस्या को नीतिगत स्तर पर भी देखने की जरूरत है। भारत में किसी कंपनी को दिवालिया घोशित करने और उसकी संपत्ति की नीलामी की प्रक्रिया पूरी करने में लंबा समय लगता है। यह सच्चाई किंगफिशर के मामले में सामने भी आ चुकी है। नियमों में शिथिलता के चलते ही देश की अदालतों में दिवालिया घोषित करने और संपत्ति की कुर्की से जुड़े 60 हजार प्रकरण विचाराधीन हैं। लिहाजा इन लचर नियमों को ‘चैक बाउंस‘ से संबंधित मामलों की तरह चुस्त-दुरस्त करने की जरूरत है। इस दृश्टि से बैंक द्वारा एक ही कंपनी और कंपनी समूह को कर्ज देने की सीमा भी निर्धारित करना जरूरी है। फिलहाल कोई बैंक अपनी कुल पूंजी का 25 प्रतिशत तक सिर्फ एक कंपनी को और 55 फीसदी तक किसी एक कंपनी समूह को कर्ज दे सकता है। यह लोच बैंक अधिकारियों को उदारता से ऋण मंजूर करने का अधिकार देता है। बैंकों में कदाचरण भी ऐसे ही झोलों के चलते पनपा है। 

प्रमोद भार्गव 
लेखक/पत्रकार 
शब्दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी 
शिवपुरी म.प्र. 
मो. 09425488224 
फोन 07492 232007 

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं। 


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क्रांतिदूत: कर्ज के खिलाड़ी - प्रमोद भार्गव
कर्ज के खिलाड़ी - प्रमोद भार्गव
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