अपने नेताओं को जानिये - सीताराम येचुरी

सीताराम येचुरी मूलतः आंध्र प्रदेश के तेलुगू भाषी ब्राह्मण हैं और उनका जन्म मद्रास में हुआ था, जिसे आजकल चेन्नई कहा जाता है । उनके पिता...


सीताराम येचुरी मूलतः आंध्र प्रदेश के तेलुगू भाषी ब्राह्मण हैं और उनका जन्म मद्रास में हुआ था, जिसे आजकल चेन्नई कहा जाता है । उनके पिता सर्वेश्वर सौम्योजुला येचुरी आंध्र प्रदेश सड़क परिवहन निगम में इंजीनियर थे और मद्रास में तैनात थे क्योंकि तब तक आंध्र और तमिलनाडु का पुनर्गठन नहीं हुआ था और मद्रास तब आंध्र का हिस्सा था।

उनकी मां कल्याणी येचुरी एक सरकारी अधिकारी थीं इसलिए वे बालक सीताराम येचुरी को लेकर हैदराबाद बसीं। वहीं के एक क्रिश्चियन स्कूल में सीताराम की पढ़ाई हुई। पर 1969 के तेलांगाना आंदोलन के वक्त सीताराम येचुरी दिल्ली लाए गए और यहीं पर प्रसीडेंसी एस्टेट स्कूल से उन्होंने हायर सेकेंड्री पास किया। वे पूरे सीबीएसई बोर्ड में प्रथम आए। फिर सेंट स्टीफेन्स से उन्होंने अर्थशास्त्र में बीए आनर्स किया और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से एमए किया। राजनीतिक गतिविधियों में उनका प्रवेश 1974 में हुआ जब उन्होंने माकपा के छात्र संगठन एसएफआई में शिरकत करनी शुरू की।

बहरहाल, यह निष्कर्ष बनता है कि संभवतः जेएनयू के संस्कारों के चलते ही सीताराम येचुरी आज एक ऐसे मिथकीय पात्र की जबरदस्ती पैरवी में जुट गए हैं जिसके वजूद पर ही शुबहा है। सीताराम येचुरी ने शुक्रवार को राज्यसभा में कहा कि 1971 में बांग्लादेश को पाकिस्तान से अलग करते वक्त तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की भूमिका से विपक्ष गदगद था। तब जनसंघ के नेता अटलबिहारी बाजपेयी ने उनकी कामयाबी पर बधाई देते हुए इंदिरा गांधी को देवी दुर्गा बताया था। पर इंदिरा गांधी ने यह कहते हुए इसे नहीं स्वीकारा कि चूंकि महिषासुर की पूजा भी भारतवर्ष में होती है इसलिए वे महिषासुर मर्दिनी की पदवी नहीं लेना चाहतीं।

अब यह तो पता नहीं कि सीताराम येचुरी ने कहां से इस बात को मालूम किया क्योंकि तब की मीडिया रपटों में इंदिरा गांधी की ऐसी बात का कही जिक्र भी नही पढ़ा लेकिन अटलबिहारी बाजपेयी द्वारा उन्हें दुर्गा कहने और इंदिरा गांधी द्वारा सहर्ष यह पदवी स्वीकार कर लेने के किस्सों का जिक्र अवश्य था। अब या तो वे मीडिया रपटें झूठी हैं अथवा माकपा के महासचिव सीताराम येचुरी। 

हर धर्म में खल पात्र हैं और नायक उन खलपात्रों पर जीत का प्रतीक है। इस्लाम में शैतान है और बौद्घों में मार। राम के साथ रावण भी है और कृष्ण के साथ कंस को भी याद किया जाता ही रहेगा। पर इसका मतलब यह तो नहीं कि हिंदू धर्म की मिथकीय कथा को तोड़-मरोड़ कर हम खल पात्र को पूजने लगेंगे।

ऐसा करेंगे तो आप हिंदू द्रोही कहलाएंगे ही और जब हिंदू द्रोही तो आप कृपया हिंदू समाज सुधारक होने का चोला उतार दें। आप वामपंथी हैं तो फिर निस्पृह बने रहिए कामरेड! फालतू में हिंदुओं को तो लताड़ रहे हो और एक गलत संदर्भ में देवी दुर्गा को प्रस्तुत कर रहे हो। शायद इसलिए भी क्योंकि हिंदू समाज में धर्म को लेकर कुछ भी बोला जा सकता है। औसत हिंदू हर नाजुक वक्त में आत्मग्लानि का शिकार हो जाता है।

याद करिए जब 18वीं सदी में यूरोपीय यहां आए थे तो ईसाई धर्म प्रचारक सरेआम हिंदुओं को शर्मसार करते थे। ईसाई धर्म प्रचारक हिंदुओं की पाषाण मूर्ति को मंदिर से उठाते और नदी में बहा देते। दूसरी तरफ वे चर्च की काष्ठ प्रतिमाएं पानी में डालते और वे तैरती रहतीं तो तर्क देते कि देखो तुम्हारा भगवान तो खुद अपने को नहीं बचा पाता तो तुम्हें क्या बचाएगा।

हिंदू युवा भ्रमित होते और कलकत्ता, मुंबई, पुणे तथा मद्रास में वे आत्मग्लानि में डूबे परंपरागत हिंदू धर्म से ऊबने लगते। ब्राह्मो समाज, प्रार्थना समाज और आर्य समाज इसी मानसिकता की उपज थे।

ऐसे ही वक्त में आए रामकृष्ण परमहंस और उन्होंने समरसता तथा समस्त धर्मों के प्रति आदर का भाव रखते हुए सनातन हिंदू धर्म के हर विश्वास और हर आस्था को समादृत किया। उन्होंने कंकर में शंकर की स्थापना की और उन्हीं के शिष्य स्वामी विवेकानंद ने हिंदू धर्म के विश्वासों के कारण तर्कहीन बंगाली और शेष भारतीय युवाओं को उनकी आत्मग्लानि से उबारा। उन्होंने हिंदू धर्म और सनातन विश्वास की तर्कसम्मत व्याख्या की और हिंदू धर्म को पुर्नस्थापित किया। 

साभार - नया इंडिया 

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