“मनु स्मृति”- प्रथम अध्याय (सृष्टि उत्पत्ति एवं धर्मोत्पत्ति विषय) भाग – 1

महर्षियों का मनु के पास आगमन  मनुमेकाप्रमासीनभभिगम्य .................... वचनमब्रुवन ||१|| महर्षि लोग एकाग्रतापूर्वक बैठे हुए मनु क...



महर्षियों का मनु के पास आगमन 

मनुमेकाप्रमासीनभभिगम्य .................... वचनमब्रुवन ||१||

महर्षि लोग एकाग्रतापूर्वक बैठे हुए मनु के पास जाकर और उनका यथोचित सत्कार करके यह वचन बोले ||१||
महर्षियों का मनु से वर्गाश्रम-धर्मों के विषय में प्रश्न –

भगवंसर्ववर्णानां................................ वक्तुमर्हसी ||२||

हे भगवन ! आप सब वर्णों (ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य,शूद्र और सभी वर्णों के अन्दर होने वाले अर्थात आश्रमों (ब्रह्मचर्य,गृहस्थ,वानप्रस्थ और संन्यास) के धर्मों-कर्तव्यों को यथावत रूप से और क्रमानुसार अर्थात वर्णों को ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र के क्रम से तथा आश्रमों को ब्रह्मचर्य,गृहस्थ,वानप्रस्थ और संन्यास के क्रम से हमें बतलाइये ||२||

त्वमेको ...................................... कार्यतत्वार्थवित्प्रभो ||३|| (३)

क्यूंकि वेदज्ञ होने से धर्मोपदेश में समर्थ है विद्वन ! समस्त जगत के जिसका चिंतन से पार नहीं पाया जा सकता अथवा जिनमे असत्य कुछ भी नहीं है और जिनमे अपरिमित सत्यविधाओं का का वर्णन है, उन स्वयंभू परमात्मा द्वारा रचित विधानरूप वेदों के कार्य=कर्तव्य रूप धर्मों या प्रतिपाध विषयों के, यथार्थरूप अथवा उनके रहस्यों की, और वेदार्थों को जानने वाले एक आप ही हो (अर्थात इस समय धर्मों के विशेषज्ञ विद्वान आप ही दिखाई देते है, अतः आप ही उन्हें कहिये) ||

अभिप्राय यह है कि वेद सब सत्य विधाओं के विधायक ग्रन्थ है, इस प्रकार वे जगत के विधान रूप अर्थात संविधान है ! महर्षि लोग प्रशंसा पूर्वक मनु से कह रहे है कि उन विधान्रूप वेदों में कौन कौन से करने योग्य कार्य अर्थात कर्तव्यरूप धर्म विहित है, उन्हें भलीभांति समझने वाले विशेषज्ञ विद्वान आप ही है, अतः हमें वर्णों और आश्रमों के धर्मों को बतलाइये ! (यह श्लोक १|२ का पूरक वाक्य है ! दुसरे श्लोक में वर्णाश्रम धर्मों का प्रश्न है, अतः इसमें उन्ही का ज्ञाता बताकर मनु की प्रशंसा की गयी है ! यही मनु स्मृति का प्रतिपाघ विषय है – ‘धर्मों का कथन’)||३||


मनु का महर्षियों को उत्तर –
स तै: पृष्टस्तथा........................ यतामिति ||४|| (४)
उन महर्षि लोगों द्वारा भलीभांति श्रधासत्कार पूर्वक उपर्युक्त प्रकार से पूछे जाने पर, वह अत्याधिक ज्ञानसम्पन्न महर्षि मनु उन सब महर्षियों का यथाविधि सत्कार करके ऐसा उत्तर में बोले ||४||

उत्पत्ति से पूर्व जगत की स्थिति –

त्रासिदिदं ............................. सर्वत: ||५|| (५)
यह सब जगत सृष्टि से पहले प्रलय में अन्धकार से आवृत(आच्छादित) था ! उस समय न किसी के जानने, न तर्क में लाने और न प्रसिद्ध चिन्हों से युक्त इन्द्रियों से जानने योग्य था और न होगा ! किन्तु वर्तमान में जाना जाता है और प्रसिद्ध चिन्हों से युक्त जानने के योग्य होता और यथावत उपलब्ध है ! 

जगतउत्पत्ति और उसका क्रम –

तत: ................................ प्रादुरासीत्तमोनुदः ||६|| (६)

तब अपने कार्यों को करने में स्वयं समर्थ, किसी दुसरे की सहायता की अपेक्षा न रखने वाला स्थूल रूप में प्रकट न होने वाला ‘तम’ रूप प्रकृति का प्रेरक (प्रकटावस्था की और उन्मुख करनेवाला) अग्नि, वायु आदि महाभूतों को ‘आदि’ शब्द से महत्त अहंकार आदि को भी उत्पन्न करने की महान शक्ति वाला परमात्मा इस समस्त संसार को प्रकटावस्था में लाते हुए ही प्रकट हुआ !

स्वयंभू का सही अर्थ – 

कुछ टीकाकारों ने ‘स्वयंभू’ का अर्थ ‘स्वेच्छा से शरीर धारण करनेवाला’ अर्थ किया है ! इसी श्लोक में परमात्मा के लिए ‘अव्यक्त’ विशेषण प्रयुक्त है जिसका अर्थ है – ‘जो कभी स्थूल रूप में प्रकट नहीं होता’ ! इससे स्पष्ट है कि परमात्मा सदैव सूक्ष्म रूप में ही रहता है ! कभी शरीर धारण नहीं करता ! इसके विरुद्ध होने से टीकाकारों का अर्थ अमान्य है !

परमात्मा की प्रकटता से अभिप्राय –
परमात्मा के प्रकट होने से भी यहाँ तात्पर्य ‘जगत को प्रकटावस्था में लाते हुए ही प्रकट होने’ से है ! इसी भाव की और इंगित करने के लिए ही मनु ने ‘व्यंजयन इदम’ पाठ का प्रयोग किया है ! यदि मनु को स्वतंत्र रूप से अथवा बिना जगत की प्रकटता के ही परमात्मा की प्रकटता अभीष्ट होती तो वे परमात्मा की प्रकटता के साथ जगत की व्यक्तता वर्णित नहीं करते, अपितु पहले स्वतंत्र रूप से परमात्मा की उत्पत्ति दर्शाते, परमात्मा की उत्पत्ति के बाद फिर जगत की उत्पत्ति का वर्णन करते ! जगत की प्रकटता को देखकर ही परमात्मा की सत्ता प्रतीत होती है ! जगत को प्रकटावस्था में लाना ही उसकी अप्रकटता है ! परमात्मा की इन्ही अवस्थाओं को क्रमशः ‘जागृत’ और ‘सुषुप्ति’ कहा है ! इन श्लोकों से उक्त बातों की पुष्टि भलीभांति हो जाती है ! अतः इस श्लोक में किसी शरीरधारी के रूप में परमात्मा की उत्पत्ति प्रदर्शित करना अशुद्ध एवं मनु स्मृति के विरुद्ध है !


क्रमशः .....


साभार – विशुद्ध मनुस्मृति

भाष्यकार – प्रो. सुरेन्द्र कुमार      

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क्रांतिदूत: “मनु स्मृति”- प्रथम अध्याय (सृष्टि उत्पत्ति एवं धर्मोत्पत्ति विषय) भाग – 1
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