घर के चिराग से जलता मुलायम सिंह का सत्ता महल ?

समाजवादी नेता मुलायम सिंह ने जातिप्रथा और परम्पराएं तोड़ने में अहम भूमिका निबाही है। अब देखिये न उनकी पहली पत्नी मालती का देहावसान हुआ 20...


समाजवादी नेता मुलायम सिंह ने जातिप्रथा और परम्पराएं तोड़ने में अहम भूमिका निबाही है। अब देखिये न उनकी पहली पत्नी मालती का देहावसान हुआ 2003 में, किन्तु दूसरी पत्नी साधना गुप्ता से पुत्र प्रतीक प्राप्त हुआ 1988 में । उनकी पहली पत्नी से उनका बड़ा बेटा अखिलेश है जो कि मुख्यमंत्री हैं। अखिलेश का जन्म 1973 में हुआ था। अब यह अलग बात हैकि उनके भक्तगण कहते हैं कि अखिलेश की मां के निधन हो जाने के बाद नेताजी खुद को बेहद अकेला महसूस करने लगे इसलिए उन्होंने साधना गुप्ता से विवाह कर लिया। लेकिन इसको क्या कहा जाए कि प्रतीक का जन्मदिनांक 1988 में ही आ गया । इस मामले में तमाम मत भिन्नताएं हैं। सपा के वरिष्ठतम नेता भी यह बता पाने में असफल हैं कि दूसरा विवाह कब व कैसे हुआ?

इतना स्पष्ट है कि पहली पत्नी 2003 तक जीवित थी व प्रतीक 1988 में पैदा हुआ। पूरा मामला रहस्य, रोमांच और किवंदतियों से भरपूर हैं। पहली बार अधिकारिक रुप से लोगों को साधना गुप्ता के उनकी पत्नी होने का तब पता चला जब कि आय के ज्ञात स्त्रोतों से ज्यादा संपत्ति के मामले में मुलायम सिंह यादव ने फरवरी 2007 में सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर उन्हें अपनी पत्नी बताया।

पता नहीं कि ठाकुर अमरसिंह से मुलायम सिंह के रिश्तों का असर था या कुछ और दोनों ही बेटों ने पहाड़ की ठाकुर लड़कियों को अपनी पत्नी बनाना पसंद किया। अखिलेश की पत्नी डिंपल उनके साथ सैनिक स्कूल में पढ़ती थी और वे कर्नल रावत की बेटी है। जबकि प्रतीक की पत्नी अपर्णा के पिता अरविंदर सिंह बिष्ट पत्रकार हैं। अपर्णा भी प्रतीक के बचपन की दोस्त है। 

इन दिनों मुलायम सिंह के परिवार में शीत युद्ध चल रहा है। इस समय छोटी बहू, प्रतीक व शिवपाल यादव एक खेमे में हैं तो रामगोपाल-अखिलेश यादव दूसरे खेमे में हैं। मुलायम सिंह ने बड़े बेटे अखिलेश का राजतिलक भले ही कर दिया हो, किन्तु छोटे बेटे की पत्नी अपनी महत्वाकांक्षा नहीं छुपा रहीं। मैनचेस्टर यूनीवर्सटी से अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में डिग्री हासिल करने वाली राजनीतिक परिवार की बहू भला राजनीति से दूर कैसे रह सकती हैं ? बताते हैं कि पहले उसने जिम का शौक रखने वाले अपने पति प्रतीक यादव को राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया। उनके समर्थकों ने 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्हें आजमगढ़ से टिकट दिए जाने की मांग को लेकर प्रदर्शन किया। हालांकि इस सीट से मुलायम सिंह यादव खुद चुनाव लड़े और जीते।

बहू काफी तेज है इसलिए समझ चुकी है कि दबाव की राजनीति ही उसे उसकी मंजिल तक पहुंचा सकती है । भातखंडे संगीत महाविद्यालय में शास्त्रीय संगीत सीख चुकी यह बहू हर्ष फाउंडेशन नाम के एनजीओ से जुड़ी हुई है। उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छता अभियान की तारीफ की। जब प्रधानमंत्री उत्तरप्रदेश के दौरे पर आए तो उनके साथ अपनी सेल्फी खिंचवायी। नरेंद्र मोदी ने भी उसके विचारों को अपनी साइट पर डाला। उसने मुलायम सिंह के करीबी आमिर खान के विवादास्पद बयान की जमकर आलोचना की। गोहत्या पर कड़ी पाबंदी लगाए जाने की मांग की।

जब मंहत अवैद्यनाथ का निधन हुआ तो गोरखपुर जाकर योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की। जब किसी ने मोदी की तारीफ करने के बारे में पूछा तो छूटते ही कह दिया कि यह तो मेरे दिल से निकले उदगार है। मैंने यह कहते समय अपने दिमाग का नहीं बल्कि दिल का इस्तेमाल किया है। शायद यह सब बातें ससुरजी को यह संकेत देने के लिए काफी थी कि घर में ‘वीर तुम बढ़े चलो, सामने पहाड़ हो, सिंह की ललकार हो,’ शुरु हो गया। इसलिए उन्होंने उसे उत्तरप्रदेश से विधानसभा का चुनाव लड़वाने का फैसला कर लिया। वैसे भी दूसरी पत्नी का दबाव था। जब बड़ी बहू सांसद हो तो छोटी विधायक भी न बने यह कैसे हो सकता है ? यही कारण है कि मुलायम सिंह यादव को न चाहते हुए भी अपनी छोटी बहू व प्रतीक की पत्नी अपर्णा यादव को लखनऊ (छावनी) से उम्मीदवार घोषित करना पड़ा है। अभी तक नेताजी और कांग्रेस की मिलीजुली कुश्ती में इस सीट से कांग्रेस की रीता बहुगुणा जोशी जीतती आई हैं । अब चाहे रीता हारें चाहे अपर्णा, दोनों ही स्थितियों में मुलायम सिंह की तो फजीहत ही है !

साभार आधार – नया इंडिया

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