मातृशक्ति वंदन का पर्व नवरात्रि !

आज जबकि महिला सशक्तीकरण की बात जोरशोर से उठ रही है, साथ ही लिंगभेद एक आन्दोलन की शक्ल ले रहा है, यह देखना उपयुक्त होगा कि हमारे आदर्श मह...


आज जबकि महिला सशक्तीकरण की बात जोरशोर से उठ रही है, साथ ही लिंगभेद एक आन्दोलन की शक्ल ले रहा है, यह देखना उपयुक्त होगा कि हमारे आदर्श महापुरुषों ने इस विषय पर क्या सन्देश दिया है !

भारत में नवरात्रि पर्व वर्ष में दो बार आता है | एक बार आश्विन में तो एक बार चैत्र में | क्या यह महज संयोग है कि दोनों ही नवरात्रि का समापन भगवान श्री राम के पूण्य स्मरण से होता है | चैत्र मास की नवरात्रि का अंतिम दिन होता है राम जन्म महोत्सव अर्थात राम नवमी | जबकि आश्विन मास की नवरात्रि के बाद आता है बुराई पर अच्छाई की विजय का महापर्व विजया दशमी | अर्थात वह दिन जिस दिन राम ने लंकाधिपति रावण पर विजय प्राप्त की | सीधे शब्दों में कहें तो नवरात्रि में महामाया भगवती माँ दुर्गा और मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का पावन स्मरण होता है | इसका निहितार्थ समझने की आवश्यकता है |

भगवान राम के जीवन के दो प्रसंग हमें यह विषय समझने में मदद कर सकते हैं | पहली घटना है अहल्या उद्धार की | अहल्या प्रकरण में दोषी अगर कोई था तो वह था इंद्र, किन्तु पुरुष प्रधान समाज और अहिल्या के पति ऋषि गौतम ने उन्हें निर्वासन का दण्ड दिया | अहिल्या घने जंगल में कुटिया बनाकर, कंदमूल फल खाकर, पशु पक्षियों के बीच रहने लगी | उनसे न कोई मिलने आता था, न वे कहीं जाती थीं, अहिल्या के पत्थर होने का यही भावार्थ हो सकता है |

लेकिन मुनि विश्वामित्र के साथ उनके यज्ञ की रक्षा के लिए जाते समय मार्ग में जब श्री राम को इस घटना की जानकारी मिली, तो वे अहिल्या के आश्रम में गए और उन्हें वहां से लाकर समाज में पुनः प्रतिष्ठा और सम्मान दिलवाया | पत्थर बनी नारी को मानो नया जीवन मिल गया | श्री राम चक्रवर्ती सम्राट दशरथ के सुपुत्र थे, अतः उनके द्वारा दी गई व्यवस्था को सबने सहज स्वीकार भी कर लिया | 

श्री राम के जीवन की दूसरी घटना सीता के खोज के समय की है | उस दौरान जब वे दण्डकारण्य में स्थित शबरी के आश्रम में पहुंचे, तो भाव विभोर शबरी उन्हें चखचख कर मीठे बेर देने लगी | श्रीराम भी भक्त के प्रेम में डूबकर बेर खाते रहे | कहते हैं शबरी की सलाह मानकर ही रामजी ने सुग्रीव से मित्रता की, जिससे आगे चलकर सीता की खोज भी हुई और रावण वध भी संभव हुआ |

सीधी सी बात है कि मातृशक्ति को सम्मानित किये बिना समाज न तो शक्तिसंपन्न हो सकता है और नहीं विजयशाली | कहा जा सकता है कि नवरात्रि का यही सन्देश है | दुर्गा पूजा अर्थात मातृशक्ति का बंदन | और श्री राम का पूण्यस्मरण अर्थात उनके द्वारा स्थापित व परिभाषित सिद्धांतों को हृदयंगम करना | तभी आयेगा रामराज्य जिसमें –

दैहिक दैविक भौतिक तापा,
रामराज्य नहीं काहुहीं व्यापा |

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क्रांतिदूत: मातृशक्ति वंदन का पर्व नवरात्रि !
मातृशक्ति वंदन का पर्व नवरात्रि !
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