लोकमान्य तिलक और पहले स्वदेशी आन्दोलन की कहानी – राजीव भाई दीक्षित

1894 में अंग्रेज़ो ने भारत मे एक बहुत खतरनाक कानून बना दिया ! उस कानून में ये था कि किसी भी स्थान पर 5 से अधिक भारतीय इकट्ठे नहीं हो सकत...

1894 में अंग्रेज़ो ने भारत मे एक बहुत खतरनाक कानून बना दिया ! उस कानून में ये था कि किसी भी स्थान पर 5 से अधिक भारतीय इकट्ठे नहीं हो सकते ! समूह बनाकर कहीं प्रदर्शन नहीं कर सकते और अगर कोई ब्रिटिश पुलिस का अधिकारी उनको कहीं इकट्ठा देख ले, तो आप विश्वास नहीं कर सकते, कितनी कड़ी सजा उनको दी जाती थी ! उनको कोड़े से मारा जाता था, हाथों से नाखूनों तक को खींच लिया जाता था ! 1882 में भारत के क्रांतिकारी जिनका नाम था बंकिम चंद्र चटर्जी उन्होंने एक गीत लिखा था, जिसका नाम था वन्देमातरम! इस गीत को गाने पर अंग्रेजों ने प्रतिबंध लगा दिया ! गीत गाने वालों को जेल मे डालने का फरमान जारी कर दिया ! इन दोनों बातों के कारण लोगों में अंग्रेज़ो के प्रति बहुत भय आ गया था !

लोगों में अंग्रेज़ो के प्रति भय को खत्म करने के लिए और इस कानून का विरोध करने के लिए लोकमान्य तिलक ने गणपति उत्सव की स्थापना की ! सबसे पहले पुणे के शनिवारवाडा में गणपति उत्सव का आयोजन किया गया ! 1894 से पहले लोग अपने अपने घरो मे गणपति उत्सव मनाते थे, लेकिन 1894 के बाद इसे सामूहिक तौर पर मनाने लगे! पुणे के शनिवारवाडा मे हजारो लोगो की भीड़ उमड़ी ! लोकमान्य तिलक ने अंग्रेज़ो को चेतावनी दी कि हम गणपति उत्सव मनाएगे, अंग्रेज़ पुलिस उन्हे गिरफ्तार करके दिखाये ! कानून के हिसाब से अंग्रेज़ पुलिस किसी राजनीतिक कार्यक्रम मे उमड़ी भीड़ को ही गिरफ्तार कर सकती थी, लेकिन किसी धार्मिक समारोह मे उमड़ी भीड़ को नहीं !

इस प्रकार पूरे 10 दिन तक 20 अक्तूबर 1894 से लेकर 30 अक्तूबर 1894 तक पुणे के शनिवारवाड़ा मे गणपति उत्सव मनाया गया ! हर दिन लोकमान्य तिलक वहाँ भाषण के लिए किसी बड़े व्यक्ति को आमंत्रित करते ! 20 तारीख को बंगाल के सबसे बड़े नेता बिपिन चंद्र पाल वहाँ आए, इसी प्रकार 21 तारीख को उत्तर भारत के लाला लाजपत राय वहाँ पहुंचे ! एक ही परिवार मे पैदा हुए तीन क्रांतिकारी भाई जिनको चाफेकर बंधु कहा जाता है वहाँ पहुंचे ! वहाँ 10 दिन तक इन महान नेताओ के भाषण हुआ करते थे ! सभी भाषणो का मुख्य मुद्दा यही होता था कि गणपति जी हमको इतनी शक्ति दें, कि हम भारत से अंग्रेज़ो को भगाएँ ! गणपति जी हमे इतनी शक्ति दें कि हम भारत मे स्वराज्य लाएँ ! इसी तरह अगले साल 1895 मे पुणे के शनिवारवाड़ा मे 11 गणपति स्थापित किए गए, और उसके अगले साल 31, अगले वर्ष यह संख्या 100 को पार कर गई ! धीरे -धीरे पुणे के नजदीक महाराष्ट्र के अन्य बड़े शहरो मे ये गणपति उत्सव अहमदनगर, मुंबई, नागपुर आदि तक फैलता गया ! हर वर्ष हजारो लोग इकट्ठे होते और बड़े नेता उनमे राष्ट्रीयता भरने का कार्य करते ! इस तरह लोगो का गणपति उत्सव के प्रति उत्साह बढ़ता गया एवं राष्ट्र के प्रति चेतना बढ़ती गई !

1904 में लोकमान्य तिलक ने लोगो से कहा कि गणपति उत्सव का मुख्य उद्देश्य स्वराज्य हासिल करना है, आजादी हासिल करना है, अंग्रेज़ो को भारत से भगाना है ! बिना आजादी के गणेश उत्सव का कोई महत्व नहीं ! पहली बार लोगो ने लोकमान्य तिलक के इस उद्देश्य को बहुत गंभीरता से समझा ! इसके बाद एक दुर्घटना हो गई अपने देश में ! 1905 मे अंग्रेज़ो की सरकार ने बंगाल का बंटवारा कर दिया ! एक अंग्रेज़ अधिकारी था जिसका नाम कर्ज़न था, उसने बंगाल को दो हिस्सो मे बाँट दिया ! एक पूर्वी बंगाल एक पश्चमी बंगाल ! पूर्वी बंगाल था मुसलमानो के लिए पश्चमी बंगाल था हिन्दुओ के लिए ! हिन्दू और मुसलमान के आधार पर यह देश का पहला बंटवारा था ! और इसका नाम रखा division of Bengal act ! बंगाल उस समय भारत का सबसे बड़ा राज्य था और इसकी कुल आबादी 7 करोड़ थी !

लोकमान्य तिलक ने इस बँटवारे के खिलाफ सबसे पहले विरोध की घोषणा की ! उन्होने लोगो से कहा कि अगर अंग्रेज़ भारत मे संप्रदाय के आधार पर बंटवारा करते हैं, तो हम अंग्रेज़ो को भारत में रहने नहीं देंगे ! उन्होने अपने एक मित्र बंगाल के सबसे बड़े नेता बिपिन चंद्र पाल एवं उनके साथ अरबिंदो घोष जी को बुलाया और कुछ और अन्य बड़े नेताओं को बुलाया एवं उनसे कहा कि आप बंगाल मे गणेश उत्सव का आयोजन कीजिये ! इस पर बिपिन चंद्र पाल जी ने कहा कि बंगाल के लोगो पर गणेश जी का प्रभाव ज्यादा नहीं है ! तब तिलक जी ने प्रश्न किया कि फिर किसका प्रभाव है ? तब उन्होने कहा कि बंगाल में नवदुर्गा एक उत्सव मनाया जाता है उसका बहुत प्रभाव है ! तिलक जी ने कहा ठीक है मैं यहाँ गणेश उत्सव का आयोजन करता हूँ आप वहाँ दुर्गा उत्सव का आयोजन करिए ! अब बंगाल मे समूहिक रूप से दुर्गा उत्सव मनाना शुरू हुआ जो अब तक जारी है ! दुर्गा उत्सव और गणेश उत्सव के आयोजनो के माध्यम से लाखो-लाखो लोग तिलक जी के संपर्क मे आए और तिलक जी ने उन्हे कहा कि आप सब इस बंगाल विभाजन का विरोध करें !

लोगो ने उनसे पूछा कि विरोध का तरीका क्या होगा ? लोकमान्य तिलक ने जवाब दिया कि देखो भारत मे अँग्रेजी सरकार ईस्ट इंडिया कंपनी की मदद से चल रही है ! ईस्ट इंडिया कंपनी का माल जब तक भारत मे बिकेगा तब तक अंग्रेज़ो की सरकार भारत मे चलेगी ! जब माल बिकना बंद हो जाएगा, तो अंग्रेज़ो के पास धन जाना बंद हो जाएगा और अँग्रेज़ भारत से भाग जाएँगे !

इस तरह से लोगो ने बँटवारे का विरोध किया ! बंग भंग के विरोध मे एक आंदोलन शुरू हुआ ! इस आंदोलन के प्रमुख नेता थे (लाला लाजपतराय) जो उत्तर भारत मे थे !(विपिन चंद्र पाल) जो बंगाल और पूर्व भारत का नेतत्व करते थे ! लोक मान्य बाल गंगाधर तिलक जो पश्चिम भारत के बड़े नेता थे ! इस तीनों नेताओ ने अंग्रेज़ो के बंगाल विभाजन का विरोध शुरू किया ! इस आंदोलन का एक हिस्सा था (अंग्रेज़ो भारत छोड़ो) (अँग्रेजी सरकार का असहयोग) करो ! (अँग्रेजी कपड़े मत पहनो) (अँग्रेजी वस्तुओ का बहिष्कार करो) ! और दूसरा सकरात्मक हिस्सा था कि भारत मे स्वदेशी का निर्माण करो ! स्वदेशी पथ पर आगे बढ़ो !

लोकमान्य तिलक ने अपने शब्दो मे इसको स्वदेशी आंदोलन कहा ! अँग्रेजी सरकार इसको बंग भंग विरोधी आंदोलन कहती रही ! लोकमान्य तिलक कहते थे यह हमारा स्वदेशी आंदोलन है ! उस आंदोलन की ताकत इतनी अधिक थी कि यह तीनों नेता अंग्रेज़ो के खिलाफ जो बोल देते उसे पूरे भारत के लोग अपना लेते ! जैसे उन्होने एलान किया अँग्रेजी कपड़े पहनना बंद करो ! करोड़ो भारत वासियो ने अँग्रेजी कपड़े पहनना बंद कर दिया और उसी समय भले हिंदुस्तानी कपड़ा मिले, मोटा मिले, पतला मिले वही पहनना है ! उन्होने कहाँ अँग्रेजी ब्लेड का इस्तेमाल करना बंद करो ! तो भारत के हजारो नाईयो ने अँग्रेजी ब्लेड से दाड़ी बनाना बंद कर दिया ! इस तरह उस्तरा भारत मे वापिस आया ! फिर लोक मान्य तिलक ने कहा अँग्रेजी चीनी खाना बंद करो ! क्यूकि चीनी उस वक्त इंग्लैंड से बन कर आती थी !

भारत मे गुड बनता था अब हजारो लाखो हलवाइयों ने गुड डाल कर मिठाई बनाना शुरू कर दिया ! फिर उन्होने अपील लिया अँग्रेजी कपड़े और अँग्रेजी साबुन से अपने घरो को मुक्त करो ! हजारो लाखो धोबियो ने अँग्रेजी साबुन से कपड़े धोना बंद कर दिया और काली मिट्टी से कपड़े धोने लगे ! फिर उन्होने पंडितो से कहा तुम शादी करवाओ अगर, तो उन लोगो कि मत करवाओ जो अँग्रेजी वस्त्र पहनते हो ! तो पंडितो ने सूट पैंट पहने टाई पहनने वालों का बहिष्कार कर दिया !

इतने व्यापक स्तर पर ये आंदोलन फैला कि 5-6 साल मे अँग्रेजी सरकार घबरा गयी क्यूंकि उनका माल बिकना बंद हो गया ! ईस्ट इंडिया कंपनी का धंधा चोपट हो गया ! अब ईस्ट इंडिया कंपनी ने अंग्रेज़ सरकार पर दबाव डाला कि भारत मे हमारा तो धंधा ही चौपट हो गया ! भारतीयो ने हमारा सामान खरीदना बंद कर दिया है ! हमारे सामानो की होली जलाई जा रही हैं ! लोकमान्य तिलक के 1 करोड़ 20 लाख कार्यकर्ता ये काम कर रहे हैं ! हमारे पास कोई उपाय नहीं है आप इन भारतवासियो की मांग को मंजूर करो ! मांग क्या थी ? मांग थी कि यह जो बंटवारा किया है बंगाल का हिन्दू मुस्लिम से आधार पर, इसको वापिस लो ! हमे बंगाल का विभाजन संप्रदाय के आधार पर नहीं चाहिए ! अँग्रेजी सरकार को झुकना पड़ा, 1911 मे division of Bengal act वापिस लिया गया ! और इस तरह पूरे देश मे लोकमान्य तिलक की जय जयकार होने लगी ! 

तो मित्रो इतनी बड़ी होती है बहिष्कार की ताकत ! जिसने अंग्रेज़ो को झुका दिया और मजबूर कर दिया कि वो बंगाल विभाजन वापस लें ! हमेशा याद रखें कि दुश्मन को अगर खत्म करना है तो उसकी supply line ही काट दो ! दुश्मन अपने आप खत्म हो जाएगा ! स्वदेशी और स्वराज्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं ! बिना स्वदेशी के स्वराज्य कभी संभव नहीं !

भारतीयो मे स्वदेशी की अलख जगाने वाले ! स्वदेशी आंदोलन के जनक लोकमान्य तिलक को शत शत नमन !!

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क्रांतिदूत: लोकमान्य तिलक और पहले स्वदेशी आन्दोलन की कहानी – राजीव भाई दीक्षित
लोकमान्य तिलक और पहले स्वदेशी आन्दोलन की कहानी – राजीव भाई दीक्षित
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