प.रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा के अंश

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में राम प्रसाद बिस्मिल एक ऐसा जानामाना नाम है, जो किसी परिचय का मोहताज नहीं ! एक अमर क्रांतिकारी जिन्होंने अंग...



भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में राम प्रसाद बिस्मिल एक ऐसा जानामाना नाम है, जो किसी परिचय का मोहताज नहीं ! एक अमर क्रांतिकारी जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ते हुए आत्माहुति दी ।

असंख्य लोगों को उन्होंने अपनी वीरता, बहादुरी 'सरफरोशी की तमन्ना' जैसी कविताओं से प्रेरित किया । उन्होंने 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' की स्थापना की, जिसमें आगे चलकर चंद्रशेखर आजाद, अशफाकउल्लाह खान और भगत सिंह जैसे लोकप्रिय क्रांतिकारी सदस्य बने ।

भगत सिंह के आग्रह पर 1928 में इस संगठन का नाम बदलकर 'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' कर दिया गया ।

बिस्मिल के बारे में एक तथ्य कई लोगों को ज्ञात नहीं है कि उन्होंने गोरखपुर जेल में अपनी आत्मकथा भी लिखी थी, जिसे बाद में प्रसिद्ध पत्रकार स्व. गणेश शंकर विद्यार्थी द्वारा प्रकाशित किया गया ।

* बिस्मिल के जन्म के एक वर्ष पूर्व उनके माता-पिता ने एक बच्चे को जन्म दिया, लेकिन वह बच नहीं सका। जन्म के कुछ महीने बाद बिस्मिल का स्वास्थ्य भी उसी प्रकार बिगड़ने लगा, तो उनके दादा ने उन्हें बचाने के लिए परामनोविज्ञान (प्रेत विद्या) के माध्यम से उन्हें बचाने की चेष्टा की ।

* सात वर्ष की उम्र में, बिस्मिल के पिता ने उनकी हिंदी शिक्षा प्रारम्भ की और साथ साथ उर्दू सीखने के लिए उन्हें एक 'मौलवी' के पास भी भेजा।

* बिस्मिल के बाद, उनके माता-पिता ने पांच लड़कियों और तीन लड़कों को और जन्म दिया। उन दिनों जन्म के तुरंत बाद लड़कियों को मार देने की कुप्रथा थी, किन्तु उनकी माँ ने इस विचार का द्रढ़ता से विरोध किया । उसके कारण ऐसा पहली बार हुआ कि उस परिवार में लड़कियां जीवित बचीं ।

* बिस्मिल की महानता की अद्भुत मिसाल आत्मकथा में उनकी यह स्वीकारोक्ति है कि 14 साल की उम्र में वे अपने घर से पैसे चुराकर धूम्रपान करने जैसी आदतों की गिरफ्त में आ गए थे । चुराए गए पैसों से वे किताबें और उपन्यास भी खरीदते थे, जिनसे कि उनका गहरा लगाव था ।

* ईश्वर की कृपा से जैसे जैसे बड़े हुए बिस्मिल को अन्य बुरी आदतों से तो छुटकारा मिल गया, किन्तु वे धूम्रपान नहीं छोड़ पाए । उन्होंने अपनी आत्मकथा में एक स्थान पर तो यह भी स्वीकार किया है कि वे एक दिन में 50-60 सिगरेट तक पी जाते थे । इन्हीं दिनों वे मुंशी इंद्रजीत और आर्य समाज के संपर्क में आये और उसके बाद मानो उनका जीवन ही बदल गया । वे कट्टर 'आर्य समाजी' बन गए।

* बाद में, बिस्मिल कांग्रेस की गतिविधियों की ओर आकर्षित हुए और उन्हें गुप्त रूप से संचालित क्रांतिकारी समूह की जानकारी मिली । बिस्मिल इसका हिस्सा बन गये और पैसे जुटाने के अलावा हथियारों की खरीद की दिशा में सक्रिय रूप से काम करने लगे ।

* अपनी आत्मकथा में उन्होंने अपने घर छोड़ने और आजादी की लड़ाई में शामिल होने का विस्तार से वर्णन किया है । बिस्मिल के साथ आजादी के मकसद से किसी भी स्तर तक जाकर लड़ने वाले लोग जुड़ते गए और एक अच्छा खासा समूह तैयार हो गया ।

* काकोरी षड्यंत्र के नाम से मशहूर प्रकरण के बाद तो वे पुलिस के प्रमुख टार्गेट बन गए । उन्होंने लिखा है कि किस प्रकार रात में 4 बजे पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने पहुंची और उन्होंने भागने के स्थान पर आत्म समर्पण किया ।

* बिस्मिल को जिला कलेक्टर ने बताया कि उन्हें मृत्यु दण्ड दिया जाने वाला है, बाद में एक अधिकारी ने उन्हें बताया कि अगर वह बंगाल से 'बोल्शेविक' के संबंध को लेकर बयान दे दें तो उनकी सजा कम की जा सकती है, यहाँ तक कि उनकी रिहाई का आग्रह भी इंग्लैंड तक भेजा जाएगा।

* अपनी आत्मकथा में एक पूरा अध्याय बिस्मिल ने अपने करीबी दोस्त अशफाकउल्लाह खान को समर्पित किया है, जिन्होंने अपने परिवार और समुदाय के दबाव को नजरअंदाज कर स्वतंत्रता संग्राम में उनका साथ देकर दोस्ती का फर्ज निभाया ।

* अपनी आत्मकथा के अंत में बिस्मिल ने एक ऐसी घटना का वर्णन किया है जो हैरतअंगेज तो है ही, उनके विराट व्यक्तित्व को भी प्रदर्शित करती है ! हुआ कुछ यूं कि एक पुलिसकर्मी ने अपने साथी को सलाह दी कि कि वह बिस्मिल को जंजीरों में रखे । लेकिन दूसरे पुलिसकर्मी ने जबाब दिया कि उसे बिस्मिल पर पूरा भरोसा है और कुश्ती देखने में व्यस्त हो गया। मौत की सजा पाए एक कैदी के रूप में बिस्मिल के पास उस पल मौक़ा था, वे चाहते तो फरार हो सकते थे और खुद को मौत से बचा सकते थे ! किन्तु जिस व्यक्ति ने खुद होकर अपने आप को गिरफ्तार कराया हो, वह मौत से बचने के लिए अपने पर भरोसा करने वाले पुलिसकर्मी को धोखा कैसे कर सकता था ? उन्होंने चुपचाप उसके साथ जेल जाना ही चुना ।

अगर उस दिन वे फरार हो गए होते, तो शायद मौत से तो बच जाते, किन्तु क्या हमारे और आपके दिलों में ज़िंदा रहते ? आखिर भगतसिंह ने भी सदन में बम फोड़कर स्वयं को गिरफ्तार ही कराया था ! इन शहीदों ने अपनी शहादत से सोते हिन्दुस्तान को जगाया !

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क्रांतिदूत: प.रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा के अंश
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