तब असहिष्णुता का हल्ला, अब मौन ! - बलबीर पुंज

दादरी में मोहम्मद अखलाक की हत्या पर पिछले साल बवाल काटने वाले सेकुलरिस्ट इस मामले में हाल ही में हुए एक महत्वपूर्ण रहस्योद्घाटन पर मौन ह...


दादरी में मोहम्मद अखलाक की हत्या पर पिछले साल बवाल काटने वाले सेकुलरिस्ट इस मामले में हाल ही में हुए एक महत्वपूर्ण रहस्योद्घाटन पर मौन है। नि:संदेह, भीड़ द्वारा एक व्यक्ति को मौत के घाट उतारना निंदनीय है। मामला कानून-व्यवस्था से संबंधित था, जिसे विकृत सेकुलरिस्टों और मीडिया के एक वर्ग ने ‘असहिष्णुता’ का नाम दिया। साहित्यकारों द्वारा पुरस्कार वापसी का दौर शुरू हुआ। विश्व में भारत को मुस्लिम विरोधी और असहिष्णु राष्ट्र के रुप में प्रस्तुत किया जाने लगा। किंतु अब यह प्रमाणिक रुप से सिद्ध हो चुका है कि अखलाक के घर से बरामद मांस गोवंश का था और यह गोहत्या का मामला है, तो छद्म-पंथनिरपेक्षक चुप है।

ऐसे मे क्या सेकुलर विमर्श की यह मान्यता है कि हिंदुओं के मान-बिंदुओं पर आघात होना उनकी नियति है, क्योंकि 800 वर्षों से इस देश में अक्सर ऐसा होता रहा है ? क्यों सेकुलरिस्टों के लिए हिंदुओं की अपने अपमान के विरोध में शांतिपूर्ण प्रतिक्रिया सांप्रदायिक और कोई भी हिंसक कार्रवाई असहिष्णुता का पर्याय बन जाती है ?

उत्तरप्रदेश (नोएडा) की स्थानीय पुलिस ने विगत शुक्रवार को अखलाक समेत उसकी मां असगरी, पत्नी इकरामन, बेटे दानिश, बेटी साहिस्ता, भाभी सोना, छोटे भाई जान मोहम्मद के खिलाफ गोकशी का केस दर्ज किया है। जिला न्यायालय के निर्देश पर उत्तरप्रदेश के गोहत्या निवारण अधिनियम और पशु क्रूरता निवारण अधिनियम के अंतर्गत कार्रवाई की जा रही है। मथुरा लैब की रिपोर्ट ने पुष्टि की थी कि अखलाक के घर से मिला मांस गोवंश का था। न्यायालय ने गत 31 मई को यह रिपोर्ट आरोपियों को दी थी। इसके बाद ग्रामीणों ने अखलाक के परिवार पर गोहत्या का मामला दर्ज करने की लिखित शिकायत पुलिस को दी। कार्रवाई न होने पर उन्होंने जिला न्यायालय में याचिका दायर की। जिसके पश्चात न्यायिक दण्डाधिकारी ने 14 जुलाई को केस दर्ज करने का निर्देश जारी कर दिया।

उक्त अधिनियम के अंतर्गत दोषियों को सात साल की सजा का प्रावधान है। इससे पूर्व दादरी पुलिस-प्रशासन द्वारा दावा किया जा रहा था कि घटनास्थल से बरामद मांस गोवंश का नहीं था। किंतु मथुरा लैब की रिपोर्ट ने उत्तरप्रदेश सरकार सहित सेकुलरिस्टों के दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए है। जब उत्तरप्रदेश में गोकशी प्रतिबंधित है तो इस सच को क्यों दबाया गया ? क्या मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए भारत को विश्व में असहिष्णुता की संज्ञा देकर अपमानित करने का षड़यंत्र रचा गया ?

मैं आपको अब लगभग 25 वर्ष पीछे ले जाता हूं। अयोध्या के विवादित ढांचे को सेकुलरिस्टों ने भारत में सेकुलरिज्म और मुसलमानों के सम्मान के प्रतीक के रुप में घोषित कर दिया था। अयोध्या में ढहाया गया ढांचा कभी भी मुसलमानों का आस्था केंद्र नहीं था। भगवान श्रीराम के जन्मस्थान होने के कारण अयोध्या हिंदुओं के लिए पावन व पूजनीय रहा है। खुदाई में इसके पर्याप्त साक्ष्य मिले है कि विवादित ढांचे के स्थान पर पहले भव्य हिंदू मंदिर था, जिसे मुस्लिम आक्रांताओं ने पराजित हिंदुओं को अपमानित करने के लिए ध्वस्त किया और उसमें स्थापित हिंदू देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को खंडित कर दिया था।

जर्जर और खंडहर भवन, जिसका दशकों तक मुस्लिमों ने कभी उपयोग नहीं किया, उसके ढहने पर सेकुलरिस्टों ने जमकर बवाल काटा। उनके अनुसार इस भवन के गिरते ही भारत का संविधान ध्वस्त हो गया, सेकुलरिज्म की मौत हो गई और मुसलमानों के मौलिक अधिकारों पर कुठाराघात हो गया। इससे पूर्व 1987-90 के कालखंड में कश्मीर में इस्लामी जेहादियों द्वारा दर्जनों मंदिरों को या तो क्षतिग्रस्त कर दिया गया था या फिर उन्हे जमींदोज कर दिया गया।

यह सांस्कृतिक धरोहर घाटी की मूल संस्कृति के ध्वजावाहक कश्मीरी पंडितों व अन्य करोड़ों हिंदुओं के आस्था के केंद्र थे। इस समाचार को दबाने व झूठलाने के अथक प्रयास हुए। किंतु सेकुलरिस्टों के लिए दिसंबर 1992 में ढहा विवादित ढांचा इतना महत्वपूर्ण हो गया कि केंद्र की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने चार भाजपा शासित राज्यों की सरकारों को बर्खास्त कर दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सहित कई हिंदू संगठनों को प्रतिबंधित कर दिया। हजारों लोगों को गिरफ्तार कर लिया।

सेकुलरिस्टों द्वारा पोषित कट्टर इस्लामी शक्तियों ने ‘शहीद मस्जिद’ के नाम पर देश के कई शहरों को दंगों की आग में झोंक दिया। वर्ष 1993 में मुंबई के सिलसिलेवार धमाकों में 257 निरपराध लोगों की हत्या भी सेकुलरिस्टों द्वारा काटे उसी बवाल से जनित विषाक्त वातावरण का परिणाम था। सेकुलरिस्टों को बाबरी ढांचा ढहने के बाद सरकारी कार्रवाई और हिंसा मुसलमानों में व्याप्त गुस्से का एक स्भाविक परिणाम लगता है। क्यों ?

अब हम दादरी वापस लौटते है। यह स्थापित सत्य है कि बिसहड़ा गांव में गोवंश की हत्या हुई थी। गाय, जिसे श्रद्धालु गौमाता भी कहते है, वह करोड़ों हिंदुओं की आस्था का प्रतीक है। भारत के संविधान के नीति-निर्देशक सिद्धांतों के अनुसार, सरकार को भी उनकी रक्षा के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी गोरक्षा को स्वाधीनता के समकक्ष मानते थे। स्वाभाविक रुप से जब दादरी के उस गांव में गोवध हुआ, तो लोगों में आक्रोश पैदा हुआ और उसी गुस्से में एक व्यक्ति की जान चली गई, तो उससे पूरा भारत असहिष्णु राष्ट्र कैसे हो गया ? नि:संदेह, अखलाक की हत्या निंदनीय थी और भारत में किसी को भी अपने हाथ में कानून लेने और सजा देने का अधिकार नहीं है।

दादरी का मामला उत्तरप्रदेश के कानून-व्यवस्था से संबंधित था, उसे सेकुलरिस्टों ने असहिष्णुता का अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बना लिया। साहित्यकारों ने पुरस्कार लौटाना शुरू कर दिया। विश्व में भारत का नेतृत्व कर रहे मोदी सरकार को सांप्रदायिक बताए जाने लगा। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बुद्धिजीवियों और मीडिया के खास वर्ग में चीख-पुकार मच गई। अभिनेता आमिर खान की पत्नी को तो भारत में रहने में ही खतरा महसूस होने लगा। क्यों ?

वैदिक काल से ही गोवंश हिंदुओं की आस्था का परिचायक है। स्वाधीनता के पश्चात 19 नवंबर 1947 को मवेशियों के संरक्षण व संवर्द्धन के लिए सर दातार सिंह की अध्यक्षता में गठित आयोग ने भी मवेशियों के कत्ल पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की संस्तुति की थी। किंतु मुस्लिम तुष्टिकरण के खेल ने इसे पूरा होने नहीं दिया। आजाद भारत में गोवध पर अबतक पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया जा सका है। देश की 80 प्रतिशत से अधिक जनता की भावनाओं से खिलवाड़ जारी है। जब भी देश में गोकशी के विरुद्ध कानून बनाने की चर्चा होती है, तथाकथित पंथनिरेपक्षकों और पश्चिमपरस्त नेता ‘सेकुलरवाद’ का प्रलाप कर इसके रास्ते में रोड़े अटका देते है। यद्यपि उत्तरप्रदेश, हरियाणा सहित भारत के कुछ राज्यों में गोकशी प्रतिबंधित है।

सेकुलरिस्ट पैगंबर साहब का कार्टून बनाने वालों के खिलाफ संसद में निंदा प्रस्ताव तो पारित करते है, किंतु हिंदू देवी-देवताओं का नग्न चित्रण करने वालों और गोवंश के हत्यारों के खिलाफ जुबान खोलना तो दूर उसकी निंदा भी नहीं करते है। यदि अयोध्या का विवादित ढांचा गिराया जाना गलत था, तो बिसहड़ा गांव में गोहत्या कैसे ठीक ठहराया जा सकता है ? यदि बाबरी ढांचा विध्वंस के आरोप में कई सरकारों को बर्खास्त किया जा सकता है, हजारों की संख्या में लोगों को जेल में डाला जा सकता है और कई संगठनों को प्रतिबंधित किया जा सकता है, तो करोड़ों लोगों के आस्था के प्रतीक गोवंश के गले पर छुरा फेरने वाले को दंडित क्यों नहीं किया जाता ? (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और भाजपा सांसद रहे हैं)

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क्रांतिदूत: तब असहिष्णुता का हल्ला, अब मौन ! - बलबीर पुंज
तब असहिष्णुता का हल्ला, अब मौन ! - बलबीर पुंज
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