17 अगस्त बलिदान दिवस विशेष – भारत भूमि के वीर सपूत “मदनलाल ढींगरा” को शत शत नमन !

माँ भारती के आंचल में एक से एक महान वीर पुत्रों ने जन्म लिया है, जिन्होंने जन्म भूमि के सम्मान के लिए हंसते-हंसते अपना सब कुछ लुटा दिया,...

माँ भारती के आंचल में एक से एक महान वीर पुत्रों ने जन्म लिया है, जिन्होंने जन्म भूमि के सम्मान के लिए हंसते-हंसते अपना सब कुछ लुटा दिया, उन्हीं महान शूरवीरों में ‘अमर शहीद मदन लाल ढींगरा’ का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखे जाने योग्य है। मदन लाल ढींगरा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रान्तिकारी थे। अमर शहीद मदनलाल ढींगरा महान देशभक्त, धर्मनिष्ठ क्रांतिकारी थे- उन्होंने भारत मां की आज़ादी के लिए जीवन-पर्यन्त अनेक प्रकार के कष्ट सहन किए, परन्तु अपने मार्ग से विचलित न हुए और स्वाधीनता प्राप्ति के लिए फांसी पर झूल गए।

हमारे प्यारे भारत देश की आजादी के लिए ना जाने कितने वीर भारतवासियों ने अपने प्राणों की बाजी लगा दी थी। उनमें से कितने नौजवान विद्यार्थी थे, उनका विवाह भी नहीं हुआ था सच कहा जाए तो उनके जीवन के इस उत्सर्ग के पीछे अपना कोई व्यक्तिगत लाभ नहीं था। सिर्फ भारत आजाद हो, गुलामी से मुक्ति मिले और अंग्रेज सरकार का खात्मा हो, यही उनका उद्देश्य था। 

हमारी सरकार ने आजादी के इन दीवानों के लिए स्मारक बनवाए हैं। सड़कों, नगरों, मोहल्लों का नाम क्रान्तिकारियों के नाम पर रखे गए। गाहे बगाहे लोग इसी बहाने आजादी के इन दीवानों का नाम याद कर लेते हैं। 

इसके बावजूद बहुत से क्रांतिकारी ऐसे हैं जिनके बारे में इतिहास मौन है। ना उनकी कभी जयंती मनाई जाती है, न उनके नाम पर कोई ग्राम, सड़क, शहर व मोहल्ले का कोई नाम रखा गया था। ऐसे क्रांतिकारियों का गोरखपुर में एक स्मारक बनाया गया है.......जिस पर शिलालेख लगा है.....उन शहीदों के नाम जिनका इतिहास में कभी कोई जिक्र नहीं होता और होता भी है तो बहुत कम ।

इन्हीं क्रांतिकारियों में अमर शहीद मदनलाल ढींगरा भी एक है। 

मदनलाल ढींगरा के कार्यकाल के दौरान भारत का उच्चकुलीन वर्ग अंग्रेज अधिकारियों की ठकुरसुहाती में लगा हुआ था, अंग्रेज सरकार के एक इशारे पर देशी रजवाड़े हर तरह का अत्याचार करने से चूक नहीं रहे थे। भारतीय जनता इस स्थिति में बड़ी उदास थी। उनका कोई भी ऐसा अगुआ नहीं था। जो कोई ठोस रास्ता उनके लिए सुझाता या राजनीतिक संघर्ष की शुरूआत करता। 

जो थोड़ी राजनीतिक हलचल थी भी वह सरकारी सुविधाएं पाने के लिए थीं, राय साहिबी, राय बहादुरी पाने के लिए थी । इन लोगों से किसी बड़े कार्य की आशा करना भी व्यर्थ ही था। बहुत से नौजवान कुछ कर गुजरने को उत्सुक थे भी तो उनके पास बहुत अल्प साधन थे। उनको कोई सही राह दिखलाने वाला नहीं था। ये नौजवान देशवासियों को राहत देना चाहते थे। देश के लिए कुछ करने की उत्कट इच्छा रखने वाले और अपने प्राणों की बाजी लगाने के इच्छुक इन नौजवानों को कोई रास्ता भी नहीं सूझता था और कोई प्रणेता भी नहीं था।

मदनलाल ढींगरा उन नौजवानों में से एक थे जिन्होंने क्रांति का मार्ग तलाशने का प्रयास किया। उन्होंने मार्ग की तलाश में स्वयं एक रास्ता न केवल खोजा बल्कि औरों के लिए भी नया मार्ग प्रशस्त किया। 

ऐसे ही उत्साही वीर मदनलाल ढींगरा की यह जीवन गाथा प्रस्तुत है।

अमर शहीद मदनलाल ढींगरा का जन्म कब और कहां हुआ था, यह आज भी खोज का विषय है। पर कुछ इतिहास लेखक यह मानते है कि संभवत: सन् 1887 के आस-पास पंजाब के किसी स्थान पर मदनलाल ढींगरा का जन्म हुआ होगा। वैसे संभावना तो यही है कि मदनलाल ढींगरा का जन्म अमृतसर शहर में ही हुआ हो, क्योंकि सन् 1855 या 1856 तक मदनलाल ढींगरा का परिवार अमृतसर में आकर बस चुका था।

पंजाब यानी पांच पवित्र नदियों वाला प्रदेश, जहाँ प्राचीन काल से ही महान संत शूरवीर योद्धाओं ने जन्म लिया है। लगभग 450 वर्ष पूर्व इस्लाम के कारण जब हिन्दुत्व संकट में पड़ गया, उस समय हिन्दू धर्म की रक्षा करने के लिए हिन्दुओं में जागृति के लिए सिख पंथ की स्थापना हुई थी। 

ऐसी महान धरती और रणबांकुरी कौम में अमर शहीद मदनलाल ढींगरा का जन्म हुआ था। 

उस समय भारत में अंग्रेजों का राज्य था। अंग्रेजी हुकूमत ने भारत के उच्च कुलीन परिवारों और राजे रजवाड़ों को इस कदर प्रभावित किया था कि वह अंग्रेजों को बिल्कुल अपना आका समझने लगे थे। 

मदनलाल ढींगरा का परिवार भी इसी विचारधारा से प्रभावित था। यह परिवार पंजाब के सम्पन्न परिवारों में से एक था। उनके पिता राय साहब डॉ. दित्तामल पंजाब सिविल सर्विस के सदस्य थे और पंजाब के सिविल सर्जन के उच्च पद पहुंचे थे। डॉ. दित्तामल जन्म से ही नहीं तथा कर्मों से तथा रहन-सहन से पूरे अंग्रेज थे। साहबी सूट-बूट, सिगार और अंग्रेजी भाषा से अगाध प्रेम। पर डॉ. दित्तामल की पत्नी मंतों बड़े ही धार्मिक संस्कारों को मानने वाली और विशुद्ध आचार वाली महिला थी। हमेशा पूजा भजन में लीन रहती। घर में नौकर और खानसामों की मौजूदगी में वह अपना सादा व शुद्ध शाकाहारी भोजन खुद अपने हाथों से बनातीं और रसोई के अन्दर बैठकर खातीं।

ऐसे धार्मिक संस्कारों वाली महिला के पति डॉ. दित्तामल अंग्रेज-भक्त होने के साथ-साथ बहुत ही धन लोलुप थे। उन्होंने बहुत से मकान अमृतसर में खरीद लिए थे जो उन्होंने किराए पर उठा रखे थे। इसके अलावा खेत-खलिहान, दुकानें, गोदाम आदि जमीन-जायदाद उन्होंने अपनी कमाई से खरीद डाली थी। ऐसे पिता के पुत्र थे मदनलाल ढींगरा, जिनके संस्कार अपने पिता के विचार से बिल्कुल प्रतिकूल थे। मदनलाल ढींगरा बचपन से ही स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों में बहुत ज्यादा प्रभावित थे। मंगल पाण्डेय उनके महा-नायक थे। 

अपने बचपन में ही मदनलाल ढींगरा ने अपने पिता डॉ.साहब दित्तामल को अंग्रेज अफसरों, जजों, डिप्टी कमिश्नरों के साथ बहुत घुल-मिलकर रहते देखा था।

एक अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर के पास एक बहुत सुन्दर अलसेसियन कुत्ता था। अंग्रेज साहब के सारे आदेश कुत्ते के लिए भी अंग्रेजी भाषा में ही होते थे, जिसे कुत्ता अच्छी तरह समझ लेता था।

एक बार डिप्टी कमिश्नर अपने साथ उस कुत्ते को लेकर सैर करने आया। डॉ. साहब दित्तामल ने उस अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर को अपने घर एक कप चाय पीने बुला लिया। चाय के दौरान ही मदनलाल ढींगरा जो उस समय बहुत कम उम्र के ही थे, खेलते-खेलते उस कमरे में आ गए। कमरे में ही कुत्ता बैठा हुआ था। अपने बचपन और जिज्ञासावश मदनलाल उस कुत्ते से हिन्दी में बोलते हुए प्यार करने लगे। कुत्ता गुर्राता रहा। उसने मदनलाल ढींगरा के इस स्नेह का कोई जवाब नहीं दिया, जिससे मदनलाल ढींगरा का बाल मन थोड़ा-सा क्षुब्ध हो गया। 

अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर ने हंसते हुए मदनलाल से कहा- ‘‘यह कुत्ता ऊँची अंग्रेजी जाति का है इसलिए सिर्फ अंग्रेजी ही समझता है।’’

क्षुब्ध मदनलाल ढींगरा के मुख से बेसाख्ता निकल पड़ा- ‘‘अंग्रेजी भाषा है ही कुत्तों की भाषा ।’’(स्त्रोत पुस्तक भारत के महान अमर क्रांतिकारी मदनलाल ढींगरा और शहीद उधम सिंह)

तेजस्वी तथा लक्ष्यप्रेरित लोग किसी के जीवन को कैसे बदल सकते हैं, मदनलाल ढींगरा इसका उदाहरण है। एक दिन वह आया जब मदन लाल को भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन से सम्बन्ध रखने के आरोप में लाहौर के एक विद्यालय से निकाल दिया गया, तो परिवार ने मदन लाल से नाता तोड़ लिया। मदन लाल को एक क्लर्क रूप में, एक तांगा-चालक के रूप में और एक कारखाने में श्रमिक के रूप में काम करना पडा। वहां उन्होंने एक यूनियन (संघ) बनाने का प्रयास किया; पर उन्हें वहां से भी निकाल दिया गया। कुछ दिन उन्होंने मुम्बई में भी काम किया।

बी.ए. करने के बाद मदनलाल लन्दन गये। वहाँ उसे क्रान्तिकारी श्यामजी कृष्ण वर्मा द्वारा स्थापित ‘इण्डिया हाउस’ में एक कमरा मिल गया। लंदन में वे विनायक दामोदर सावरकर और श्याम जी कृष्ण वर्मा जैसे कट्टर देशभक्तों के संपर्क में आए। सावरकर ने उन्हें हथियार चलाने का प्रशिक्षण दिया। ढींगरा अभिनव भारत मंडल के सदस्य होने के साथ ही इंडिया हाउस नाम के संगठन से भी जुड़ गए जो भारतीय विद्यार्थियों के लिए राजनीतिक गतिविधियों का आधार था। इस दौरान सावरकर और ढींगरा के अतिरिक्त ब्रिटेन में पढ़ने वाले अन्य बहुत से भारतीय छात्र भारत में खुदीराम बोस, कनानी दत्त, सतिंदर पाल और कांशीराम जैसे देशभक्तों को फांसी दिए जाने की घटनाओं से तिलमिला उठे और उन्होंने बदला लेने की ठानी।

1 जुलाई 1909 को इंडियन नेशनल एसोसिएशन के लंदन में आयोजित वार्षिक दिवस समारोह में बहुत से भारतीय और अंग्रेज़ शामिल हुए। ढींगरा इस समारोह में अंग्रेज़ों को सबक सिखाने के उद्देश्य से गए थे। अंग्रेज़ों के लिए भारतीयों से जासूसी कराने वाले ब्रिटिश अधिकारी सर कर्ज़न वाइली ने जैसे ही हॉल में प्रवेश किया तो ढींगरा ने रिवाल्वर से उस पर चार गोलियां दाग़ दीं। कर्ज़न को बचाने की कोशिश करने वाला पारसी डॉक्टर कोवासी ललकाका भी ढींगरा की गोलियों से मारा गया।

कर्ज़न वाइली को गोली मारने के बाद मदन लाल ढींगरा ने अपने पिस्तौल से अपनी हत्या करनी चाही, परंतु उन्हें पकड लिया गया। 23 जुलाई को ढींगरा के प्रकरण की सुनवाई पुराने बेली कोर्ट, लंदन में हुई। अब मदनलाल पर मुकदमा शुरू हुआ। मदनलाल ने कहा – मैंने जो किया है, वह बिल्कुल ठीक किया है। भगवान से मेरी यही प्रार्थना है कि मेरा जन्म फिर से भारत में ही हो। उन्होंने एक लिखित वक्तव्य भी दिया। शासन ने उसे वितरित नहीं किया; पर उसकी एक प्रति सावरकर के पास भी थी। उन्होंने उसे प्रसारित करा दिया। इससे ब्रिटिश राज्य की दुनिया भर में थू-थू हुई। 17 अगस्त, 1909 को पेण्टनविला जेल में मदनलाल ढींगरा ने खूब बन-ठन कर भारत माता की जय बोलते हुए फाँसी का फन्दा चूम लिया। उस दिन वह बहुत प्रसन्न थे। फांसी पर चढ़ते समय उन्होंने अपने हाथ में धार्मिक ग्रन्थ “गीता” को ले रखा था ! इस घटना का इंग्लैण्ड के भारतीयों पर इतना प्रभाव पड़ा कि उस दिन सभी ने उपवास रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी।

उनका अंतिम संस्कार भी अंग्रेजी सरकार ने किया था क्योंकि उनके राजभक्त परिवार ने उनसे सभी सम्बन्ध समाप्त करने की घोषणा कर दी थी और उनके शव को सौंपने के सावरकर के अनुरोध को ब्रिटिश अधिकारियों ने ठुकरा दिया। उनकी मृत्यु के 67 वर्ष बाद 13 दिसम्बर, 1976 को इस 22 वर्षीय हुतात्मा की अस्थियां तब भारत लाई गई, जब शहीद उधम सिंह की अस्थियों की तलाश करते हुए जेल अधिकारियों को उनकी अस्थियों के बारे में पता लगा। 13 दिसम्बर से 20 दिसम्बर तक पंजाब के विभिन्न नगरों में कृतज्ञ भारत वासियों ने श्रद्धांजलि दी तथा 25 दिसम्बर को वे अस्थियां हरिद्वार में विसर्जित कर दी गईं।

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