छत्तीसगढ की डायरी...घोडा है, घुडसवार है, और लगाम..? - (अनिल द्विवेदी )

नई उम्मीदों, आकांक्षाओं और शुभाकांक्षाओं के साथ संत वल्लभाचार्य की नगरी चम्पारण्य में चार दिनों तक चला प्रदेश भाजपा का चिंतन शिविर, इस स...


नई उम्मीदों, आकांक्षाओं और शुभाकांक्षाओं के साथ संत वल्लभाचार्य की नगरी चम्पारण्य में चार दिनों तक चला प्रदेश भाजपा का चिंतन शिविर, इस संकल्प के साथ खत्म हो गया कि 2018 के विधानसभा चुनाव में पार्टी का कमल फिर खिलेगा..? भाजपा में सबसे ज्यादा समय तक मुख्यमंत्री रहने का नया रिकॉर्ड बनाने वाले डॉ. रमन सिंह ने अंतिम दिन स्टंटी तेवर दिखाते हुए कार्यकर्ताओं में जोश भरा कि हममें आखिरी समय में छक्का मारकर मैच जीतने की ताकत है। उन्होंने विपक्ष पर कटाक्ष करते हुए कहा कि जय और वीरू (सिंहदेव-भूपेश) की जोड़ी के छद्म मंसूबे कभी सफल नही हो सकते। हालांकि कांग्रेस के हाजिरजवाबी प्रवक्ता शैलेष नितिन त्रिवेदी जी ने इसके जवाब में कहा कि यह जोड़ी ही गब्बर (मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह) के कुशासन का खत्मा करेगी।

वैसे फिल्म तो रिलीज होगी 2018 में तब पता चलेगा कि सत्ता रूपी बसंती किसके हाथ लगती है। फिलहाल यह समझने से गुरेज नही कि विकास और छबि के मामले में रमन सरकार आज भी उतनी ही विश्वसनीय है जितनी 2003 के चुनावों में थी। कांग्रेस या जोगी कांग्रेस तो इसकी छटांकभर भी नही होगी। आम धारणा है कि दोनों ही दल, करिश्माई व्यक्तित्व वाले मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के बराबर का ऐसा कोई चेहरा अभी नही खोज सके हैं जिस पर जनता आंखें मूंदकर भरोसा कर सके। एक बड़ी उम्मीद कांग्रेस में टी.एस. सिंहदेव हैं लेकिन कई धड़ों में बंटी पार्टी उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट कर सकेगी, फिलहाल तो यह सपना ही लगता है। भाजपा भी इस मजबूरी को समझती है इसलिए वह चेहरे के मामले में दृढ़ है। थोड़ा बहुत डर जोगीरूपी चेहरे से है, मगर उसकी काट बीजेपी ने ढूंढ़ रखी होगी।

यह दबी-छुपी बात नही रही कि पहले कांग्रेस की अंगड़ाई और अब जोगी कांग्रेस के तेवरों ने बीजेपी के माथे पर सिलन तो ला दी है। पार्टी नई रणनीति अपनाने को मजबूर हुई है। नतीजन चिंतन शिविर में ही प्रदेश अध्यक्ष धरम लाल कौशिक जी के सान्निध्य में बैठे शीर्षस्थ पांच नेताओं ने तय किया है कि आगे करना क्या है? बीजेपी ने 2018 का किला फतह करने के लिए तीन बातें तय की हैं। उसकी पहली नजर लगभग 35 लाख युवा वोटरों पर है जिन्हें अपनी ओर खींचने के लिए चुनावी साल की शुरूआत में ही नि:शुल्क लैपटॉप बांटने की सीमा को बढ़ाया जा सकता है। यानि बारहवीं के बाद कॉलेज में प्रवेश लेने वाले प्रत्येक विद्यार्थी को लैपटाप की सौगात दी जा सकती है।

दूसरा कांग्रेस और जोगी कांग्रेस के संगठित वोट बैंक में भी सेध लगाने की रणनीति बनी है। इसमें कांग्रेस बाद में है और जनता कांग्रेस पहले। जोगीजी का सतनामी समाज, पिछड़ों की जमात और कुछ-कुछ आदिवासी वोट बैंक पर इस कदर जादुई करिश्मा है कि वे आठ-दस सीटों पर खेल करके दोनों ही प्रमुख दलों का गेम बजाने के लिए पर्याप्त हैं इसलिए भाजपा ने अभी से सतनामी गुरूओं को पटाना शुरू किया है और अपने चुनाव जीतने योगय नेताओं को संकेत दे दिए हैं कि हे पार्थ, चुनावी समर में उतरने की तैयारी शुरू करो। कमल के फूल निशान वाली पार्टी ने कांग्रेस के जनाधार की जड़ यानि मुस्लिम समाज को अपनी ओर खींचने का काम तो सालों पहले शुरू कर दिया था, हालांकि उसमें यह मात्र 8.5 प्रतिशत ही सफल रही है।

वास्तविकता का दृष्टिकोण यह है कि बीजेपी अभी से चुनावों की ओर देख रही है तो वजह यह कि वर्तमान की परिस्थितियों ने उसे भविष्य पर नजरें गड़ाने के लिए मजबूर कर दिया है। कांग्रेस की बनिस्बत दीनदयाल उपाध्याय वाली पार्टी में सरकार ही सब कुछ नही है। जो कहते हैं, वो करते हैं जैसा नारा देने वाले इस दल का अमोघ अस्त्र संगठन, उसके देवतुल्य कार्यकर्ता तथा संघ परिवार भी रहा है। इसमें कोई शक नही कि 13 साल तक सत्ता में रहकर मुख्यमंत्री रमन सिंह ने यह साबित कर दिखाया है कि उन्होंने दीनदयाल उपाध्याय और श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सपनों का सुशासन लाने की अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई है और अब बारी संगठन की है।

इसलिए इसके कर्ता-धर्ता यानि प्रदेश अध्यक्ष धरम लाल कौशिक ने अपने पहले कार्यकाल और अब दूसरी पारी में सधे हुए ढंग से पार्टी-डैमेज को दुरूस्त किया है। आदिवासी वोट बैंक से बीजेपी को फिलहाल कोई खतरा नहीं दिखता। कुछ असंतुष्ट नेता थे मगर उन्हें लुभाते-पटाते-डराते हुए चुप करा दिया गया है। बस पार्टी को इतना करना होगा कि जिन 16 आदिवासी विधायकों के हारने का डर उसे सता रहा है, वहां पर नया चेहरा लाने की तैयारी करना चाहिए। पार्टी के समक्ष एक बड़ी चिंता अपने सवर्ण वोट बैंक को बचाना तथा दूसरे दलों के वोट बैंक पर सेंध मारने की भी है। खुद की अनदेखी होने से ब्राम्हण समाज खासा नाराज है, पार्टी को उसे भी सहलाना और उपकृत करना होगा।

मगर हमेशा से एक ऊंचे नैतिक ओटले पर खड़े होकर उपदेश देने वाली भाजपा के समक्ष बड़ा संकट यह है कि वह निरंकुश भ्रष्टाचार और नाक रगड़ाने की कीमत पर काम करने वाले प्रशासन से कैसे निबटेगी? जैसा कि पार्टी के मुखिया यानि प्रदेश अध्यक्ष धरम लाल कौशिक ने कहा कि प्रशासन घोड़ा और हम घुड़सवार हैं तो सवाल यह खड़ा होता है कि वह चाबुक कहां है जिसके भय से घोड़ा तेज दौड़ता है या दिशा नही भटकता। दूसरे कई जगहों पर फूटे बीजेपी नेताओं के उद्गारों को सुनकर लगता है कि भाजपा के समक्ष इन्हीं दो खामियों को दुरूस्त करने की असल चुनौती है। लेकिन जहां वास्तविकताओं को समझने का अंधापन हो, वहां दलीलें थोथी साबित होती हैं। मूछों पर ताव देने वाले जूदेव साहब, जो स्वर्गीय हो गए, जाते-जाते सच बोल गए थे कि अफसरशाही पार्टी के आधार को दीमक की तरह चाट रही है तो यह गलत नही था। स्पष्ट है कि जब एक सांसद स्तर का व्यक्ति इतना दु:खी है तो कार्यकर्ता कितना आजिज आ चुका होगा? प्रशासनिक उच्छृंखलता से मंत्री भी जले-भुने बैठे हैं मगर बेचारे आखिर किससे अपना दु:खड़ा रोएं? जहां सुनाने बैठते हैं, बूमरेंग की तरह कार्यकर्ता उन्हीं पर अक्षम होने का आरोप मढ़ देता है इसलिए घोड़े पर चाबुक पड़ते रहने चाहिए।

इधर संघ परिवार वास्तविकताओं को समझकर चलना चाहता है सो प्रांत प्रचारक दीपक जी ने चिंतन शिविर में आगाह किया कि देवतुल्य कार्यकर्ताओं और अनुषांगिक संगठनों के स्वयंसेवकों की अनदेखी महंगी पड़ सकती है। संघ-प्रमुख के इशारों का अर्थ निकालूं तो आखिर कार्यकर्ता यह कैसे देखता रहेगा कि उन्हीं की पार्टी के नेता, मंत्री तो भ्रष्टाचार में आकण्ठ डूबे हैं या कई तो शून्यपति से अरबपति भी बन गए जबकि कार्यकर्ताओं को लंगोटी पहनकर अलख जगाने को कहा जा रहा है। पार्टी वर्कर्स को सावधान करना जरूरी है लेकिन यह संदेश खासतौर पर उनके लिए भी होना चाहिए जो सत्ता में हैं या उसके रसगुल्ले खा रहे हैं। एक तरह का सर्वत्यागी खिलंडरीपन चाहिए ही। बीजेपी के साथ-साथ संघ भी इस मजबूरी को समझ गया है कि अब वह जमाना लद गया जब कार्यकर्ता के लिए व्यक्ति नहीं, निशान ही सब कुछ होता था इसलिए दिल्ली की किरण बेदी मामले में बेइज्जती का कड़ुवा घूंट पीने वाली भाजपा से उम्मीद है कि अब से वह छाछ भी फूंककर पीएगी।

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क्रांतिदूत: छत्तीसगढ की डायरी...घोडा है, घुडसवार है, और लगाम..? - (अनिल द्विवेदी )
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