आगामी 15 अगस्त को कराची में फहरे तिरंगा

15 अगस्त आने को है। निश्चित रूप से हम सभी 'आजादी के इस दिन' को हर बार की तरह इस बार भी हमेशा की तरह सामान्य ढंग से मना ही लेंगे ...


15 अगस्त आने को है। निश्चित रूप से हम सभी 'आजादी के इस दिन' को हर बार की तरह इस बार भी हमेशा की तरह सामान्य ढंग से मना ही लेंगे । हममें से कुछ लोग याद करेंगे कि कैसे आजादी मिली, कितना नरसंहार हुआ, कुछ लोगों ने प्रलय जैसी त्रासदी को भुगता आदि आदि ! शायद इसीलिए उस समय सरदार पटेल ने कहा भी था कि स्वतंत्रता भले ही मिल गई, पर देशवासियों के चेहरे पर कोई खुशी नहीं है ! आज भी सबकुछ एक बंधे बंधाये ढर्रे में होगा, कितने लोग सोचेंगे कि जो कुछ 15 अगस्त 1947 को हुआ, वह दोबारा न हो ? 

जो जैसा करता है, बैसा ही भरता है ! अब देखिये न, जिसने जन्नत पाने की तमन्ना में अपने पडौसी की पीठ में छुरा घोंपा, इस देश के दो टुकडे करवाए, वह कट्टरपंथी पाकिस्तान क्या आज सुकून से है ? यह कोई ढकी छुपी बात नहीं है कि वहां के लोगों में आज कष्टदायी निराशा है । 14 अगस्त 1947 को अंग्रेजों की धूर्तता, मुस्लिम लीग के डायरेक्ट एक्शन और गांधी-नेहरू की सहमति से पाकिस्तान बना । लेकिन क्या तबसे लेकर अब तक, पाकिस्तान के निवासियों के होठों पर मुस्कान है ? क्या भविष्य के वर्षों में उनके चेहरों पर खुशी आने की दूर दूर तक कोई संभावना है ? दो राष्ट्र का लीगी सिद्धांत फ़ैल हो चुका है, चतुर वकील जिन्ना की धोखाधड़ी सामने आ चुकी है । अपने दुःख तकलीफ के लिए पाकिस्तान के लोग खुद जिम्मेदार हैं, और उन्होंने जैसा बोया, बैसा ही वे काट रहे हैं । पाकिस्तान आज एक बार फिर विभाजन की आग में झुलसने की कगार पर है ! जीवन रक्षक प्रणाली पर जीवित शरीर जैसी हालत वाले राष्ट्र को कौन जीवंत राष्ट्र मानेगा ? 

सदियों के संघर्ष के बाद पाई स्वतंत्रता पर लगातार तुष्टीकरण की बारूद छिड़की जाती रही, और आज धर्मनिरपेक्षता की आड़ में कट्टरता के अंगारे उस बारूद पर डालने का कार्य हो रहा है, तब हमें पाकिस्तान की हालत पर गौर करने और कराने की और ज्यादा जरूरत है जो हमारे साथ स्थाई शत्रुता की बिना पर ही जिन्दा है ।

जबकि भारत अपनी भारतीयता पर जीवित है, आज से नहीं सदियों से , सहस्त्राब्दियों से ! आजादी के पहले दिन से उस कालातीत सभ्यता के आत्म विश्वास को लगातार खंडित करने का प्रयास हुआ, ठीक बैसे ही जैसे देश को खंडित किया गया ! अंग्रेजों का तो मानना ही था कि भारत एक राष्ट्र के रूप में नहीं रह सकता, इसके और विभाजन होंगे ही । उन्होंने सोचा था कि 562 रियासतों वाला देश एक कैसे रह सकता है, इस अति आत्मविश्वास में ही उन्होंने भारत के उतावले नेताओं के हाथ में विभाजित भारत सोंपा था ! अराजकता के वातावरण में स्थाई शत्रु पाकिस्तान के निर्माण के साथ स्वतंत्रता प्रदान की थी ।

एक नए युग का धुंधलका ...

ब्रिटेन और अमेरिका इस विषय पर एकमत थे कि भारत एक राष्ट्र के रूप में रह पाना असंभव है । निक्सन का मानना था कि तत्काल नहीं तो नेहरू के बाद जरूर भारत टूट जाएगा, इसीलिए उसने पाकिस्तान की पूरी पूरी सैन्य मदद की ! बाद में किसिंजर ने भी यही प्रोत्साहन नीति जारी रखी ! पाकिस्तान को क्या नहीं दिया उन्होंने ? बंदूक, नाव, से लेकर पैटन टैंक और जेट विमान तक सब कुछ ! उन्हें आशा थी कि लड़ाकू कौम मुस्लिम जल्द ही लाल किले पर अपना हरा परचम लहरा देगी ।

लेकिन जैसा हमेशा से होता आया है, जो जैसा करेगा - बैसा भरेगा ! एक इस्लामी राष्ट्र पाकिस्तान का निर्माण आज पूरे पश्चिम विशेष रूप से ब्रिटेन, अमेरिका और यूरोप के लिए भस्मासुर राक्षस साबित हो रहा है ! पाकिस्तान जितना भारत के लिए खतरे का सबब है, उतना ही पश्चिमी राष्ट्रों के लिए भी घातक हो गया है ! पाकिस्तान की गजनी और गौरी मिसाईलें कब पश्चिम या पश्चिमी सभ्यता की ओर रुख कर लें, कौन कह सकता है ?

लेकिन इससे यह न माना जाए कि पश्चिमी दुनिया भविष्य में भारत के विघटन का प्रयत्न नहीं करेगी ! उनके प्रयत्न अभी तक सफल नहीं हुए हैं, इसका कारण महज हमारा भाग्यशाली होना नहीं है, बल्कि इसका मुख्य कारण है, हमारी विविधता को मान्यता देने वाली सार्वभौमिक संस्कृति ! यही प्रतिबिंबित होता है, हमारी सेना में भी, जो कि किसी एक राज्य की नहीं है, बल्कि सभी राज्यों के लोग सेना में हैं ! भारत की ताकत यही शक्ति है ।

इस साल 15 अगस्त, 2016 को भी राष्ट्र हर बार की तरह अपनी विभिन्न उपलब्धियों का स्मरण करे, राष्ट्रपिता की समाधि पर भजन गाये, किन्तु साथ ही विभाजन की त्रासदी और वह दोबारा न झेलनी पड़े इस पर भी गंभीर चिंतन मनन करे ! उस दौर की हिमालयन भूलों पर भी गौर करे ।

आईये विभाजन के समय की दो घटनाओं पर विचार करें । भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपने कराची अधिवेशन में 'पूर्ण स्वराज' का संकल्प पारित किया था । उसके कुछ वर्षों बाद उसी कांग्रेस ने गांधी - माउंटबेटन के निर्णय का समर्थन किया जो उनके विभाजन विरोधी पूर्व संकल्प के एकदम विपरीत था । आज वह कराची ही दूसरे देश में है। केवल देश नया है, भारत नहीं, वही हिमालय, वही गंगा, सबका वही प्राचीन रूप । 

कुछ लोग गांधी और नेहरू पर श्रद्धाभाव रखते हैं, तो कुछ उनसे नफ़रत करते हैं, किन्तु यह सार्वकालिक सत्य है कि पाकिस्तान के निर्माण से न भारत का कोई हित हुआ न पाकिस्तान का, न तो हिंदुओं का भला हुआ और न ही भारत के मुसलमानों को कोई मदद मिली ।

आज भारत महान राष्ट्र के रूप में उभर रहा है, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता के लिए उसे समर्थन मिलने लगा है । क्या यह इसलिए है कि वह अब आत्मनिर्भर है ? या इसलिए कि उसने पूर्व में हुई उन हिमालय जैसी विराट भूलों को समझ लिया है, और उनसे निजात पा ली है? एक ओर तो शांति से जीने नहीं देंगे की नफ़रत भरी मानसिकता, और दूसरी ओर जो हो गया सो हो जाने कह कर कंधे उचकाने की मूर्खतापूर्ण उदारता के कारण भारत लगातार परेशान रहा है ! 3 युद्ध, और सतत छद्म युद्ध भारत झेलता आया है । आजादी के पहले दिन 15 अगस्त 1947 के बाद से वर्तमान 15 अगस्त, 2016 तक के 69 वर्षों में भारत ने शांति प्रक्रिया की इकतरफा कोशिश की है। बस बहुत हुआ, आखिर कितनी पीढ़ियों तक हम एक ऐसे देश का आतंकवाद झेलेंगे, जो छद्म युद्ध किए जा रहा है? जबकि सचाई यह है कि वह देश है ही नहीं !

एक पुरानी अंग्रेजी कहावत है – “doing the same thing but expecting a different result” अर्थात करना वही लेकिन परिणाम की आशा कुछ और करना ! ऐसी उम्मीद को पागलपन नहीं तो क्या कहा जाये । सौभाग्य से, 69 साल पहले अंग्रेजों से, और अब गांधी और छद्म-गांधियों के काल से भारत मुक्त हो गया है । क्रिकेट मैचों, समझौता एक्सप्रेस, दो देशों की अस्थिर व्यवस्था को स्थिर मानना जैसी नीतियों के स्थान पर अब एक अलग तरह की रणनीति की आशा की जा सकती है ! क्या होनी चाहिए वह रणनीति ? आगामी 15 अगस्त कराची में मने, जहाँ पूर्ण स्वराज प्राप्त करने का प्रस्ताव पारित किया गया था । निश्चित रूप से तब ही हम संयुक्त भारत के लोगों की आँखों में खुशी के आँसू देख सकते हैं ।

जय हिन्द।

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