भारत विभाजन की दास्ताँ नई पीढी को बताना जरूरी !

मैं विभाजन से पहले डीएवी हाई स्कूल प्रहलाद पुरी (मुल्तान) का छात्र था। मेरी कक्षा में तसद्दक हुसैन एकमात्र मुसलमान छात्र था शेष सब हिन...


मैं विभाजन से पहले डीएवी हाई स्कूल प्रहलाद पुरी (मुल्तान) का छात्र था। मेरी कक्षा में तसद्दक हुसैन एकमात्र मुसलमान छात्र था शेष सब हिन्दू थे। 1946 के अंत में एक दिन वह बहुत उत्तेजित होकर कक्षा में आया और बोला, काफिरों की विदाई के दिन आ गए । 

मैंने उससे पूछा "क्यों? आखिर सदियों से साथ रहने वाले हिन्दू मुसलमानों को अलग करने और देश तोड़ने की बात क्यों कर रहे हो?"

उसका जबाब था - "हिंदू मुसलमानों का शोषण कर रहे हैं, हम गरीब हैं और उनकी दया पर आश्रित हैं, जबकि किसी समय वे हमारे गुलाम थे ! यह हम कतई बर्दाश्त नहीं कर सकते कि वे हम पर शासन करें । अगले 20 साल में एक भी मुसलमान भारत में नहीं रहेगा ! हमें अपने संप्रभु देश की जरूरत है । हम पाकिस्तान को अगले 20 साल में फ्रांस और इंग्लैंड के समान विकसित देश बना देंगे, सारे प्राकृतिक संसाधन हमारे होंगे, अल्लाह के फजल से हर पाकिस्तानी पर एक घर होगा, गर्म और ठंडे पानी का माकूल इंतजाम होगा, पश्चिमी शैली के शौचालय होंगे और खाने के लिए बहुत कुछ होगा । "

जो कुछ उसने कहा, वही इस उप महाद्वीप के सब जाहिलों ने समझा था और वे सब एकजुट हो गए । पंडित जवाहर लाल नेहरू और मोहम्मद अली जिन्ना में सगे भाईयों जैसे सम्बन्ध थे, दोनों लंदन में साथ साथ पढ़कर बैरिस्टर बने थे, और सबसे ख़ास बात यह कि दोनों की सोच भी एक जैसी थी ! दोनों खुद को बेहतर और हिंदुओं से अलग मानते थे । नेहरू हिन्दुओं से इस हद तक नफ़रत करते थे, कि उन्होंने स्वयं स्वीकार किया कि वे हिन्दू बाई एक्सीडेंट हैं ! तबसे लेकर अब तक सत्तारूढ़ हलकों की यही दास्ताँ रही है, मुसलमानों से दोस्ती और हिंदुओं से घृणा ।

नेहरू की जीवन शैली एक सम्राट जैसी थी और व्यवहार ब्रिटिश मालिकों जैसा । नातो वे हिन्दू थे और नाही हिन्दुस्तानी । यह बेहद स्पष्ट था, लेकिन साम्राज्यवादी शक्ति के प्रचार तंत्र ने वास्तविकता को छुपाये रखा, क्योंकि इसमें ही उनका हित था ।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि दिल्ली में हिन्दू पूरी तरह उदासीन थे और उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में हिंदुओं को कुछ जानकारी ही नहीं थी । जबकि मुस्लिम बहुल कस्बों और उत्तरी भारत के शहरों में उन्मादी जुलूस निकल रहे थे, पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे गूँज रहे थे ! जबकि सौम्य, शांत हिंदुओं की सदाबहार "ओम शांति शांति" की मुद्रा उन्हें उदासीन और मात्र दर्शक बनाए हुए थी । यहां तक ​​कि उन्हें आसन्न नरसंहार के बारे में भी सोचने की सुध नहीं थी । उन्हें पता भी नहीं था कि ईस्ट बंगाल और सिंध में क्या होने जा रहा था।

जैसे जैसे सांप्रदायिक तनाव बढ़ा, अंग्रेज स्वयं को सुरक्षित रखकर दूर से तमाशा देखते रहे ! बहुत से हिन्दू परिवार अपने घरों को ताला लगाकर हिन्दू बहुल क्षेत्रों में अपने रिश्तेदारों के यहाँ चले गए, ताकि इस्लामी देश बन जाने के बाद लौटकर शांति से जीवन यापन करेंगे ! कैसे भोले और अज्ञानी थे वे लोग जो इस्लाम की विनाशकारी विचारधारा के बारे में रत्तीभर भी नहीं जानते थे ! उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि वे अब कभी अपने घरों को लौट नहीं पायेंगे । (हम आज भी कहाँ चेते हैं?)। 

ब्रिटिश शासक जानते थे कि बड़े पैमाने पर भूमि और प्राकृतिक संसाधनों के साथ हिंदुस्तान के पास वह सब कुछ है, जिससे वह एक एक विश्व शक्ति बन सकता है, इसलिए उन्होंने इस उप महाद्वीप के दो टुकडे करने का फैसला किया। इतना ही नहीं तो उन्होंने दो उपाय और भी किये । सबसे पहले तो कई दशकों तक हमारे आर्थिक सुधार को आगे बढ़ाया और दूसरे हथियार बेच बेच कर दक्षिण एशिया में दुश्मनी का एक ऐसा इलाका बना दिया, जो सदा आपस में लड़ता रहे ।

नेहरू जो कि इस्लाम की सबसे बड़ी संपत्ति थे, उन्होंने सबसे पहले तो महात्मा / बापू गांधी के साथ मिलकर सुनिश्चित किया कि कोई मुस्लिम हिन्दुस्तान छोड़कर पाकिस्तान न जाए और दूसरी बात यह की कि हिन्दुओं को फिर से गुलाम बनाने के लिए एक संविधान में व्यवस्था की कि जो कोई भी मोहम्मद साहब की निंदा करेगा, उसे जेल जाना होगा । मुस्लिम को हर कीमत पर संरक्षित किया गया । मुस्लिम होना विशिष्टता बन गया। हिंदुस्तान में शांति के नाम पर मुस्लिम तुष्टीकरण की इन्तहा की गई ।

कांग्रेस शासन काल में नीति रही कि विभाजन काल का कहीं उल्लेख भी न किया जाए, कभी भी कहीं भी "ढाका स्मृति दिवस" ​​या "मुल्तान स्मृति दिवस" न मनाया जाए ! हद तो यह कि उन दो लाख लोगों का भी कहीं स्मारक न बने, जो उस दौरान मार डाले गए या वे 15 लाख लोग जो 1947 में अपने घर द्वार छोड़कर विस्थापित होने को, दरदर की ठोकरें खाने को विवश हुए !

सच कहा जाए तो विभाजन की त्रासदी को भूल जाने का ही दुष्परिणाम है कि आज कश्मीर धधक रहा है । झूठी धर्मनिरपेक्षता के आवरण में वास्तविक समस्याओं से नजरें चुराना आत्मघाती है । इसलिए उन दिनों की अमूल्य यादों को विभाजन के बाद पैदा हुई नई पीढी के साथ साझा करना आवश्यक है  ।

यह लेख मूलतः अंग्रेजी में मोहन गुप्ता जी (mgupta@rogers.com) के माध्यम से प्राप्त  हुआ है एवं हरिहर शर्मा जी ने इसका हिंदी अनुवाद किया है

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