सिंधु जल-संधि समाप्त करना, पाकिस्तान के खिलाफ एक कारगर हथियार - प्रमोद भार्गव

दगाबाजी की स्पष्ट मंशा से किए गए उड़ी हमले ने यह स्पष्ट कर दिया हैकि पाकिस्तान न केवल अपनी सीमा लांध रहा है, बल्कि दोनों देशों के बीच...



दगाबाजी की स्पष्ट मंशा से किए गए उड़ी हमले ने यह स्पष्ट कर दिया हैकि पाकिस्तान न केवल अपनी सीमा लांध रहा है, बल्कि दोनों देशों के बीच युद्ध के हालात उत्पन्न कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने जिस तरह से आतंकी बुरहान बानी को कष्मीरी अलगाववादियों का नायक बताने की कोशिश की है, उसने भारत के घावों पर नमक छिड़कने का काम किया है। यह हरकत उल्टा चोर कोतवाल को डाटे जैसी है। भारत ने पाकिस्तान के साथ 56 साल पहले हुए सिंधु जल-समझौते को तोड़ने के जो संकेत दिए हैं, उन पर अमल की इच्छा शक्ति जताने की भी जरूरत है। वैसे भी सिंधु जल-संधि दुनिया की अंतरदेशीय ऐसी उदार जल संधि है, जिसमें नदियों का जल ग्रहण क्षेत्र और उद्गम तो भारत में है, किन्तु इसके बावजूद भारत को ही 60,000 करोड़ रुपए की वार्षिक हानि भी उठानी पड़ रही है। 

इस बार पहली बार भारत ने ढाई दशक से चले आ रहे पाक प्रायोजित छाया युद्ध के खिलाफ 1960 में हुए सिंधु जल समझौते को रद्द करने का कठोर कूटनीतिक संदेश पाक को दिया है। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने स्पष्ट किया है कि भारत सरकार पाकिस्तान से सिंधु जल समझौते को तोड़ने की संभावना पर विचार कर सकती है। क्योंकि आपसी विश्वास और सहयोग से ही कोई समझौता स्थाई बना रह सकता है। 

उल्लेखनीय हैकि विश्व बैंक की मध्यस्थता में 19 सितंबर 1960 को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तानी राष्ट्रपति अयूब खान ने सिंधु जल-संधि पर हस्ताक्षर किए थे। इसके अंतर्गत पाकिस्तान से पूर्वी क्षेत्र की तीन नदियों व्यास, रावी व सतलज की जल राशि पर नियंत्रण भारत के सुपुर्द किया गया था। और पश्चिम की नदियों सिंधु, चिनाब व झेलम पर नियंत्रण की जिम्मेबारी पाक को सौंपी गई थी। इसके तहत भारत के ऊपरी हिस्से में बहने वाली इन छह नदियों का 80.52 यानी 167.2 अरब घन मीटर पानी पाकिस्तान को हर साल दिया जाता है। जबकि भारत के हिस्से में महज 19.48 प्रतिशत पानी ही शेष रहता है। नदियों की ऊपरी धारा ( भारत में बहने वाला पानी) के जल-बंटवारे में उदारता की ऐसी अनूठी मिसाल दुनिया के किसी भी अन्य जल-समझौते में देखने में नहीं आई है। इसीलिए अमेरिकी सीनेट की विदेशी मामलों से संबंधित समिति ने 2011 में दावा किया था कि यह संधि दुनिया की सफलतम संधियों में से एक है। लेकिन यह संधि केवल इसलिए सफल है, क्योंकि भारत संधियों की शर्तों को निभाने के प्रति अब तक उदार एवं प्रतिबद्ध बना हुआ है। जबकि जम्मू-कश्मीर को हर साल इस संधि के पालन में 60 हजार करोड़ रुपए का नुकसान उठाना पड़ता है। भारत की भूमि पर इन नदियों का अकूत जल भंडार होने के बावजूद इस संधि के चलते इस राज्य को बिजली नहीं मिल पा रही है।

दरअसल सिंधु-संधि के तहत उत्तर से दक्षिण को बांटने वाली एक रेखा सुनिश्चित की गई है। इसके तहत सिंधु क्षेत्र में आने वाली तीन नदियां सिंधु, चिनाब और झेलम पूरी तरह पाकिस्तान को उपहार में दे दी गई हैं। इसके उलट भारतीय संप्रभुता क्षेत्र में आने वाली व्यास, रावी व सतलज नदियों के बचे हुए हिस्से में ही जल सीमित रह गया है। इस लिहाज से यह संधि दुनिया की ऐसी इकलौती अंतरदेषीय जल संधि है, जिसमें ऊपरी जलधारा वाला देश नीचे की ओर प्रवाहित होने वाली जलधारा वाले देश पाकिस्तान के लिए अपने हितों की न केवल अनदेखी करता है, वरन बालिदान कर देता है। इतनी बेजोड़ और पाक हितकारी संधि होने के बावजूद पाक ने भारत की उदार शालीनता का उत्तर पूरे जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में आतंकी हमलों के रूप में तो दिया ही, अब इनका विस्तार भारतीय सेना व पुलिस के सुरक्षित ठिकानों तक भी हो गया है। प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में ही उड़ी, हेरात, गुरूदासपुर, उधमपुर, पठानकोट, मजार-ए-शरीफ, पंपोर और जलालाबाद में आतंकी हमले हुए हैं। ये सभी हमले आतंकवाद को बहाना बनाकर छद्म युद्ध के जरिए किए गए, जबकि ये सभी हमले पाक सेना की करतूत हैं। दरअसल छद्म युद्ध में लागत तो कम आती ही है, हमलाबर देश पाकिस्तान वैश्विक मंचों पर इसका दोष आतंकवादियों के मत्थे मढ़कर स्वयं को बचा लेता है । बावजूद इसके हैरानी इस बात पर है कि इस संधि को तोड़ने की हिम्मत न तो 1965 में भारत-पाक युद्ध के बाद दिखाई गई और न ही 1971 में। हालांकि 1971 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान को दो टुकड़ों में विभाजित कर नए राष्ट्र बांग्लादेश को अस्तित्व में लाने की बड़ी कूटनीतिक सफलता हासिल की थी। कारगिल युद्ध के समय भी हम इस संधि को तोड़ने से चूके हैं।

दरअसल पाकिस्तान की प्रकृति में ही अहसानफरोषी शुमार है। इसीलिए भारत ने जब झेलम की सहायक नदी किशनगंगा पर बनने वाली ‘किशन गंगा जल विद्युत परियोजना‘ की बुनियाद रखी तो पाकिस्तान ने बुनियाद रखते ही नीदरलैंड में स्थित ‘अंतरराश्ट्रीय मध्यस्थता न्यायालय‘ में 2010 में ही आपत्ति दर्ज करा दी थी। जम्मू-कश्मीर के बारामूला जिले में किशनगंगा नदी पर 300 मेगावाट की जल विद्युत परियोजना प्रस्तावित है। हालांकि 20 दिसंबर 2013 को इसका फैसला भी हो गया। पाकिस्तान ने अपील में 100 क्यूसिक मीटर प्रति सेकेंड पानी के प्राकृतिक प्रवाह की मांग की थी, जिसे न्यायालय ने नहीं माना। न्यायालय ने भारत को परियोजना निर्माण की अनुमति भी दी, साथ ही किशनगंगा नदी में पूरे साल हर समय मात्र 9 क्यूसिक मीटर प्रति सेंकेड का न्यूनतम जल प्रवाह जारी रखने का निर्देश भी दिया ! न्यायालय के फैसले में भले ही पाकिस्तान की बात नहीं मानी गई हो, किन्तु प्रश्न यह खड़ा होता है कि यदि किसी साल पानी कम बरसता है और किशनगंगा नदी के बांध में पानी छोड़ने के लायक रह ही नहीं जाता है तो ‘रन ऑफ दी रीवर‘ प्रणाली का सिद्धांत अमल में कैसे लाया जाएगा ? इस दृश्टि से यह फैसला सिंधु जल-संधि की संकीर्ण व्याख्या है। कालांतर में पाकिस्तान को यदि इस फैसले के मुताबिक पानी नहीं मिलता है तो उसे यह कहने का मौका मिलेगा कि भारत अंतरराश्ट्रीय मध्यस्थता न्यायालय के फरमान का सम्मान नहीं कर रहा है। इसलिए अच्छा तो यह है कि भारत सिंधु जल-बंटवारे की संधि को भंग ही कर दे । न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी ! पाकिस्तान को तो हर हालत में भारत पर आरोप मढ़ने ही हैं ! इसके पहले पाकिस्तान ने बगलिहार जल विद्युत परियोजना पर भी आपत्ति दर्ज कराई थी। जिसे विश्व बैंक ने निरस्त कर दिया था। 

किशनगंगा को पाकिस्तान में नीलम नदी के नाम से जाना जाता है। इसके तहत इस नदी पर 37 मीटर यानी 121 फीट ऊंचा बांध बनाया जाना है। बांध की गहराई 103 मीटर होगी। यह स्थल गुरेज घाटी में है। इसका निर्माण पूरा होने के अंतिम चरण में है। 2017 की शुरूआत में इसका काम पूरा हो जाने की उम्मीद है। बांध बनने के बाद किशनगंगा के पानी को बोनार मदमती नाले में प्रवाहित किया जाएगा। भारत ने इस परियोजना की शुरूआत 2007 में 3642.04 करोड़ की लागत से की थी। ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि द्विपक्षीय वार्ता के बाद हुए ऐतिहासिक शिमला समझौते में स्पष्ट उल्लेख है कि पाकिस्तान अपनी जमीन से भारत के खिलाफ आतंकवाद को फैलाने की इजाजत नहीं देगा। किंतु पाकिस्तान इस समझौते के लागू होने के बाद से ही, इसका खुला उल्लघंन कर रहा है। लिहाजा पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देने के नजरिए से भारत को सिंधु जल-संधि को ठुकराकर पानी को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की जरूरत है। पाकिस्तान की 2.6 लाख एकड़ कृषि भूमि इन्हीं नदियों के जल से सिंचित होती है। पेयजल का भी यही नदियां प्रमुख संसाधन हैं। यदि भारत कूटनीतिक पहल करते हुए इन नदियों का जल अवरुद्ध कर दे तो पाकिस्तान की कमर टूट जाएगी। पाक को सबक सिखाने का यह सबसे सरल और श्रेष्ठ उपाय है। नदियों के प्रवाह को बाधित करना इसलिए भी अनुचित नहीं है, क्योंकि यह संधि भारत के अपने राज्य जम्मू-कश्मीर के नागरिकों के लिए न केवल औद्योगिक व कृषि उत्पादन हेतु पानी के दोहन में बाधा बन रही है, बल्कि पेयजल के लिए नए संसाधन निर्माण में भी बांधा है। इस संधि के चलते यहां की जनता को पानी के उपयोग के मौलिक अधिकार से भी वंचित होना पड़ रहा है। हैरानी की बात यह भी है कि यहां सत्तारूढ़ रहने वाली सरकारों और अलगाववादी जमातों ने इस बुनियादी मुद्दे को उछालकर पाकिस्तान को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश कभी नहीं की। इसलिए आतंक का माकूल जबाव देने के लिए भारत सरकार को सिंधु जल को कूटनीतिक अस्त्र के रूप में इस्तेमाल करने की जरूरत है।

प्रमोद भार्गव 
शब्दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी
शिवपुरी म.प्र.

मो. 09425488224,09981061100
फोनः 07492-232007,

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।

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