खाट का खटराग (व्यंग्य लेख) - प्रमोद भार्गव

राजनीति में नए नए प्रयोगों के आदी रहे राहुल गांधी ने खाट-चर्चा के जरिए कांग्रेस को ठेठ आम लोगों के बीच चर्चा में ला दिया है। खाट-चैप...



राजनीति में नए नए प्रयोगों के आदी रहे राहुल गांधी ने खाट-चर्चा के जरिए कांग्रेस को ठेठ आम लोगों के बीच चर्चा में ला दिया है। खाट-चैपाल चर्चा में आनी ही थी, क्योंकि खाट का अपना एक शास्त्रीय राग भी होता है, जो शास्त्रीय संगीत में तो शामिल नहीं है, लेकिन लोक में लोकश्रुतियों की तरह लोकप्रिय इस राग को खटराग के नाम से जाना जाता है। नई-नई खटिया जब मूंज, कांस या सन की रस्सी से बुनी जाती है, तब इस पर बैठने से यह राग बिना किसी वाद्ययंत्र के तान छोड़ने लग जाता है। सोते में करवट बदलते समय इस राग का स्वर कुछ ऊंचा होता है, बगल में कोई व्यक्ति सो रहा होता है, तो उसकी नींद में यह राग खर्राटे सा खलल साबित होता है। पहले दिन की खाट-सभा से लूटी गई खटियाएं और दूसरे दिन की खाट पंचायत में तोड़ी गई खटियाओं का राग अलापना जनता-जर्नादन को रास आया या नहीं, इसकी तस्दीक तो वक्त ही करेगा। चुनांचे खटिया तोड़ मुहिम ने यह इशारा तो कर ही दिया है कि राग में कुछ बेसुरेपन का वजन ज्यादा है।

भारतीय सनातन संस्कृति में खाट का एक पूरा जीवन दर्शन है। वैभवशाली डबलबैड जब वजूद में नहीं आए थे, तब खाट की अपनी महिमा और महत्ता थी। गर्भवती महिलाएं खाट पर ही शिशुओं को जन्म देती थीं। यही खाट शिशुओं का चंद्र-बिछौना एवं चन्द्र खिलौना हुआ करती थी। खाट चैपालों पर बैठकर ही लोगों के अनुभवजन्य संस्कार विस्तृत होते थे।

खाट के साथ संकट यह है कि वह मोक्ष व तर्पण के संस्कार से भी जुड़ी है। कुटुंब में जब बुर्जुग की मत्यु हो जाती है तो गरुड़-पुराण बांचने वाले पुरोहित को बिछौने के साथ खाट भी दान में दी जाती है। खाट का दान, स्वर्गवासी मृतक के इसी खाट पर स्वर्ग में आराम फरमाने की धर्म-मान्यता से जुड़ा है। लूटी गई खाटें कांग्रेस के मोक्ष का माध्यम न बन जाए, यह आषंका जरूर ? इस लिहाज से कांग्रेस के नवाचारी रणनीतिकार प्रशांत किशोर को कोई नया आइडिया ईजाद करना होगा ताकि कांग्रेस मोक्ष मुक्त रहे । एक आइडिया तो अपने भी दिमाग में है। चलो मुफ्त में ही सही, कांग्रेस की गौरवशाली विरासत को बचाए रखने की दृश्टि से बताए देते हैं। खाटें भविष्य में न लूटी जाएं, इसके लिए खाट के साथ मजबूत खूंटा और सांकल का इंतजाम करना होगा। जागरूक मुसाफिर भारतीय रेल में सफर करने के दौरान अपने सामान की सुरक्षा के लिए यही तरीका अमल में लाते हैं। अटैची के साथ एक जोड़ी जंजीर और ताला साथ लेकर चलते हैं। इसे सीट के पाये से बांधकर निश्चिन्त सोते हैं। हालांकि खूंटे के साथ आशंका यह है कि ग्रामीण इसे बिना किसी औजार के उखाड़ने में दक्ष होते हैं। सो, यह भय तो रहेगा ही कि खाट, खूंटा और सांकल तीनों ही लोग न उठा ले जाएं ?

चुनांचे उत्तर-प्रदेश के चुनाव तक कांग्रेस अगर खाट लुटाती रही तो शायद फायदे में रहे। लूट की छूट का यह मंत्र कांग्रेस को सत्ता की दहलीज तक पहुंचाने में कामयाब हो सकता है। माया और मुलायम ने यूपी की जमीन में जो खूंटा 27 साल से गाढ़ा हुआ है, वह उखड़ सकता है। क्योंकि खाटों की लूट से यह तो जग-जहिर हो ही चुका है कि इस प्रदेश में खाटों की बड़ी मांग है। देवारिया में 1500 खाटें लूटी गईं। एक खाट की कीमत 500 रुपए आंकी जाए तो कुल योगफल बनता है, महज साढ़े सात लाख रुपए। मतदाता को लुभाने के लिए शराब भी बांटी जाती है और वोट भी खरीदे जाते हैं। इन दोनों कामों पर निर्वाचन आयोग की निगाहें टिकी रहती हैं, सो इस कदाचरण पर पहरेदारी बिठा दी गई है। फिलहाल खाट आयोग की निगरानी में नहीं है। लिहाजा खाट-लूट का यह सिलसिला जारी रहता है तो यह मंत्र कांग्रेस के लिए सिद्धी विनायक मंत्र साबित हो सकता है।

वैसे भी जंगलों को आरक्षित कर देने के बाद से गांवों में खाटों की कमी आ गई है। इसीलिए दो-चार लोगों ने ही नहीं, पूरे समाज ने खाटें लूटीं। इससे पता चलता है कि आजादी के 70 साल बाद भी सभी लोगों को राशन की तरह खाट भी मयस्सर नहीं है। मसलन आजादी के बाद आदमी कहीं ज्यादा अभावग्रस्त हुआ है। आजादी के दो-तीन दशक बाद तक आदमी के पास रोटी भले न हो, लेकिन खाटों की कमी नहीं थी। क्योंकि खाट के निर्माण के सभी संसाधन जंगल में निशुल्क उपलब्ध थे और ग्रामीण निर्माण की विधि में ज्ञान-परंपरा से सिद्धहस्त था। इस नाते अब खाटों की कमी मनावता को शर्मसार करने वाली हकीकत को दर्शाता है। पहले की तरह खाटों की भरमार होती तो ओडिषा के लाचार आदिवासी को पत्नी की लाश कंधे पर रखकर अस्पताल से गांव ले जाने की जरूरत नहीं पड़ती। दूसरे हृदयविदारक वाक्ये में पत्नी के शव की टांगे तोड़कर सुविधा के लिए गठरी बनाने की जरूरत नहीं रह जाती। जब खाटे सुलभ थीं, तो शव खाटों पर आसानी से ढोकर शमसान पहुंचाए जाते थे। ढोने के लिए चार कंधे भी मिल जाया करते थे। लेकिन इन त्रासदियों से लगता है, मानवता का जैसे हृास हो गया है। हालांकि गरीब अभावग्रस्त तब भी था, लेकिन मानवता अकालग्रस्त नहीं थी। अभाव झेल रहे व्यक्ति की विशम परिरिस्थतियों में समाज साझा हो जाया करता था। आज संपन्ता और विपन्नता के विशमता रूपी में झोल में साझा संस्कृति के मानवीय मूल्य कहीं विलोप हो गए हैं। खैर..।

हमारे लोकतंत्र की खूबी है कि वह खाट के पायों की तरह ही चार स्तंभों पर टिका है। चूंकि स्वतंत्रता संग्राम के लड़ाके और संविधान के निर्माता तब ठेठ गांव से निकले थे। इसलिए खाट का देशज दर्शन उनके अवचेतन में कहीं गहरे पैठ जमाए था। सो उन्होंने लोकतंत्र के स्थायित्व के लिए चार स्तंभ का आइडिया खाट के चार पायों से लिया। अब कल्पना में खाट को कांग्रेस मान लें तो इस समय यह खाट दो पायों पर टिकी है। पहला पाया तो कांगेस की इतिहास संबंधी विरासत से जुड़ा है, सो मजबूत है। लेकिन दूसरा पाया राहुल के रूप में नेतृत्व की अकुशलता से जुड़ा है, सो कांग्रेस की डगर कठिन है। इसीलिए चारपाई चौपाल, नरेंद्र मोदी की चाय-चौपाल को चुनौती नहीं दे पा रही है।
खाट-चौपालें बिना मजबूत विचार और नेतृत्व के यूं ही चलती रहीं, तो कांग्रेस की खाट खड़ी हो जाने का खतरा भी है। खाट से जुड़े जितने भी, खाट तोड़ना, खटिया खड़ी करना, खाट पकड़ना या खाट पर पड़ जाना, मुहाबरे हैं, उनके नकारात्म व अशुभ राग कहीं ज्यादा मुखर हैं, इसलिए कांग्रेस को यह खटराग, खाट पकड़ने के लिए मजबूर न कर दे, यह भी कांग्रेस को सोचने की जरूरत है।

प्रमोद भार्गव 

शब्दार्थ 49,श्रीराम काॅलोनी

शिवपुरी म.प्र.

मो. 09425488224,09981061100

फोनः 07492-232007,

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं ।



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