बदला जरूरी पर उकसावे में नहीं, विजय के लिए जरूरी योजनाबद्ध रणनीति - अभिषेक पुरोहित

आज सोशल मीडिया पर दो विचारपूर्ण आलेख देखने को मिले - श्री अभिषेक पुरोहित  वास्तव में अब देश को मोदी और डोभाल की जरूरत नहीं रही। सोशल म...

आज सोशल मीडिया पर दो विचारपूर्ण आलेख देखने को मिले -

श्री अभिषेक पुरोहित 
वास्तव में अब देश को मोदी और डोभाल की जरूरत नहीं रही। सोशल मीडिया पर ही कई धुरंधर हैं, जो युद्ध नीति, कूटनीति, राजनीति, राष्ट्रनीति, सैन्य संचालन आदि सभी मामलों के जानकार, अनुभवी और विशेषज्ञ हैं।
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ये वही लोग हैं जो लाहौर में एक हमला होने पर पाकिस्तान से सहानुभूति जताने के लिए अपना प्रोफ़ाइल फोटो काला कर रहे थे, और फिर बुरहान वानी के एनकाउंटर के बाद पाकिस्तान के उकसाने पर भारतीय सेना के समर्थन में भी प्रोफ़ाइल फोटो बदल रहे थे। ये वही लोग हैं, जो 2 रूपये बचाने के लिए चीनी सामान खरीदते हैं, लेकिन सरकार को सिखाते हैं कि चीन भारत के बाज़ार को निगल रहा है। ये वही लोग हैं, जो अंडरवर्ल्ड के पैसों से बनी खान की फ़िल्में देखने के लिए हर वीकेंड पर मल्टीप्लेक्स के बाहर कतार लगाते हैं और सोशल मीडिया पर सरकार से पूछते हैं कि सरकार दाऊद को खत्म क्यों नहीं कर रही है। ये वही लोग हैं, जो दिन-रात मीडिया चैनलों की निंदा करते हैं, लेकिन उन्हीं चैनलों द्वारा सेट किए जाने वाले एजेंडा का भी रोज शिकार बनते हैं।
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अपनी सुख-सुविधाओं में एक कतरा भी कटौती नहीं करना चाहते, 50 पैसे टैक्स बढ़ जाए तो छाती पीटने लगते हैं और ऐसे लोग आज युद्ध की भाषा बोल रहे हैं! पहले अपने कम्फर्ट ज़ोन से तो बाहर निकलिए, उसके बाद युद्ध के उपदेश दीजिए। मैंने वामपंथियों को कभी अपनी विचारधारा और एजेंडा के बारे में कन्फ्यूज नहीं देखा, मैंने भारत-विरोधियों को कभी अपनी विचारधारा और एजेंडा के बारे में कन्फ्यूज नहीं देखा, लेकिन राष्ट्रवादी टोली मुझे वैचारिक धरातल पर सबसे ज्यादा कन्फ्यूज दिखती है क्योंकि बुद्धि और विवेक को परे रखकर हर बात में भावनाओं के अनुसार बहते रहते हैं। एक दिन का उफान होता है, दूसरे दिन सब भूल जाते हैं।
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मेरा सुझाव है कि इस कन्फ्यूजन से बाहर निकलिए। मुझे नहीं पता कितने लोग मीडिया चैनलों और प्रचलित अख़बारों की खबरों के अलावा कुछ पढ़ते हैं। मुझे नहीं पता मीडिया में शोर सुनकर यहां चिल्ला रहे कितने लोगों को याद है कि कुछ ही दिनों पहले वायुसेना का जो विमान अंडमान जाते समय लापता हो गया, उसमें कितने सैनिक थे?
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जब कोई हम पर हमला करने आता है, तो बेशक पहला समझदारी का काम उस पर जवाबी हमला करना ही होता है। भारतीय सेना ने वो किया है, तभी चारों आतंकियों को मार गिराया गया। लेकिन जब सामने वाला हमला करके जा चुका है, और अब आपको जवाब देना है, तो वह ठंडे दिमाग से, सोच-समझकर और योजना बनाकर ही दिया जाना चाहिए, न कि उकसावे में आकर। पाकिस्तान ने हमला करके आपको उकसा दिया है, इसलिए ये ज़रूरी नहीं कि भारतीय सेना तुरन्त अपने टैंक और मिसाइलें लेकर पाकिस्तान में घुस जाए।
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अजीत डोभाल ने पूरी ज़िंदगी उच्च-स्तरीय मिशन और सीक्रेट ऑपरेशन पूरे करने में बिताई है। जो आदमी जासूस बनकर 6 साल लाहौर में अंडरकवर एजेंट रहा है, क्या आपको लगता है कि इस मामले की समझ आप में उससे ज्यादा है?? ये कॉमन सेन्स की बात है कि उच्च-स्तर पर प्लानिंग हो रही होगी, हर मोर्चे पर हमले की रणनीति बन रही होगी। ये भी कॉमन सेन्स की बात है कि इसकी जानकारी न किसी सरकारी बयान में दी जाएगी, न सोशल मीडिया पर पोस्ट और ट्वीट में। (पहले भी हर बार बदला लिया जा चूका है, पाक के 50 चौकियों उड़ा दी गई, म्यांमार स्ट्राइक अटेक, बुरहान वानी etc) अपनी भावनाओं को अपने विवेक और बुद्धि पर हावी मत होने दीजिए। 
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ये जरूरी नहीं है कि कश्मीर के जवाब में हमला कश्मीर वाली सीमा से ही हो। हमला अफगानिस्तान की तरफ से भी हो सकता है, हमला बलूचिस्तान से भी हो सकता है, हमला चीन के इकोनॉमिक कॉरिडोर की तरफ भी हो सकता है। इसलिए जिस मामले की समझ जिन लोगों को हमसे ज्यादा है, उनको उनका काम उनके ढंग से करने दीजिए। उनको पता है क्या परिणाम चाहिए और वो कैसे मिलेगा। उनको ये भी पता है कि आप सिर्फ एक दिन चिल्लाएंगे और दूसरे दिन भूल जाएंगे क्योंकि सबसे सरल काम यही है।
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जो लोग टीवी पर क्रिकेट देखते समय घर बैठेे चिल्लाते हैं कि कप्तान को कौन-सा फील्डर कहां खड़ा करवाना चाहिए, वो जरा ये समझें कि कप्तान में क्रिकेट की समझ आपसे ज्यादा है और मैदान की परिस्थिति को भी वह आपसे बेहतर समझता है । उसको निर्णय लेने दीजिए और उसके निर्णय पर भरोसा कीजिए। आपसे ज्यादा कन्फ्यूज लोग दुनिया में कोई दूसरे नहीं हैं क्योंकि आप किसी विषय में पूरी जानकारी नहीं लेना चाहते और न किसी बात को शुरू करने पर आखिरी तक ले जाना चाहते हैं। बेहतर है कि दूसरों को आईना दिखाने की कोशिश करने वाले एक बार खुद भी आईना देखें।
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कोई देश सिर्फ सरकार के भरोसे इजरायल और जापान नहीं बन जाता, वह तब इजराइल और जापान बनता है, जब लोग अपने देश के लिए त्याग करने को तैयार होते हैं, जब लोग अपने देश के लिए कष्ट उठाने को तैयार होते हैं, जब लोग अपने कम्फर्ट ज़ोन से बाहर निकलकर देश के लिए कुछ करते हैं। पहले वह काम कीजिए और भारत में वैसा माहौल बनाने में कुछ योगदान दीजिए, उसके बाद ही समस्या जड़ से मिटेगी, क्योंकि समस्या की जड़ बाहर नहीं है, भीतर ही है।

कुछ ऐसा ही विचार व्यक्त किया है श्री विश्वास कुमार चौहान ने -

बदला बनाम धैर्य...

इतिहास के पन्ने पलटकर यदि *छत्रपति वीर शिवाजी* की युद्ध्शैली/कार्यशैली एवं जीवनी को पढ़ेंगे तो मन में उमड़ने - घुमड़ने वाले संशय के बादल छँट जाएँगे।जब अफ़ज़लखान ने शिवाजी की आराध्य माँ तुलजा भवानी का मंदिर नष्ट कर दिया तो सबने एक मत से कहा कि अब शिवाजी अफ़ज़ल पर आक्रमण करने के लिए और कितना इंतज़ार करेंगे एवं यदि अब भी शिवाजी हमला नहीं करते हैं तो उनका जीवन व्यर्थ है वो नपुंसक हे , सत्ता के लालची हे ,कुछ नही करेंगे आदि आदि। इतिहास गवाह है, शिवाजी ने उचित अवसर का ना केवल इंतज़ार किया बल्कि ख़ुद ये अफ़वाह फैलवाकर कि *पहाड़ी चूहा बहुत डर गया है*, अफ़ज़लखान को उसकी जीत के प्रति over confident कर दिया। अफ़ज़लखान का क्या हश्र हुआ, हम सब भली भाँति जानते हैं। 

मुझे आ० मोदी जी की अब तक की रणनीति, कार्यशैली, क्षमता एवं इरादों से पूर्ण विश्वास है कि वे कुछ ऐसा करेंगे कि दुनिया देखेगी पाकिस्तान का भयानक अंजाम। 

I said it long back that we shouldn't suggest Modi Ji on *what to do, when to do or how to do.... etc etc*. 
And pl, don't loose your faith in Modi Ji. Till now he hasn't defaulted even once.

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क्रांतिदूत: बदला जरूरी पर उकसावे में नहीं, विजय के लिए जरूरी योजनाबद्ध रणनीति - अभिषेक पुरोहित
बदला जरूरी पर उकसावे में नहीं, विजय के लिए जरूरी योजनाबद्ध रणनीति - अभिषेक पुरोहित
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