1947 से आजतक लगातार विध्वंशक राजनीति का शिकार बंगाल !

सत्तारूढ़ दल के सहयोग और समर्थन के चलते बढ़ रहे जिहादी उन्माद के कारण बंगाल की अस्मिता और अस्तित्व पर ही संकट के बादल मंडराने लगे हैं । स्...


सत्तारूढ़ दल के सहयोग और समर्थन के चलते बढ़ रहे जिहादी उन्माद के कारण बंगाल की अस्मिता और अस्तित्व पर ही संकट के बादल मंडराने लगे हैं । स्वाभाविक ही इससे राज्य के हित भी प्रभावित हो रहे हैं।
यह कितनी दुखद स्थिति है कि भारत की आजादी के लिए संघर्ष में अग्रणी रहा बंगाल, क्रांतिकारी राष्ट्रवादियों की भूमि बंगाल, भारत की बौद्धिक परंपराओं का प्रतीक बंगाल, आज भारत विभाजक षडयंत्रकारियों का अखाडा बन गया है । वे सक्रिय हैं, बराये मेहरवानी राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी की मिलीभगत से ।
जब कम्युनिस्टों का शासन था, तब उन्होंने बंगाल की सभ्यता और सांस्कृतिक विरासत को कमजोर करने और नष्ट करने का प्रयत्न किया, जिन प्रेरणादायक प्रतीकों पर बंगालियत पल्लवित पुष्पित हुई, उस महान अतीत की स्मृति मिटाने की चेष्टा हुई ! और उसके बाद जबसे ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस का शासन आया है, तबसे तो बंगाल पूरी तरह असहिष्णुता के दलदल में फंस गया है ! सीमावर्ती क्षेत्रों में तो मानो जिहादी और चरमपंथी तत्वों का ही कब्ज़ा हो गया है, जहाँ केवल घनघोर राष्ट्रद्रोही, पूर्णतः भारत विरोधी और दुर्दांत खूंखार पागल तत्व ही फलफूल रहे हैं ।
स्वतंत्रता के समय बंगाल के सम्मुख भीषण अस्तित्व का संकट आया था, और लग रहा था कि वह जिन्ना के पाकिस्तान यूटोपिया का हिस्सा बन जाएगा । किन्तु उस समय केवल डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सशक्त और समझदारी पूर्ण हस्तक्षेप के कारण पूरा बंगाल जिन्ना की योजनानुसार इस्लामी ज्वाला में जलने से बचा रह गया, केवल एक भाग ही उनके कब्जे में गया । श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बंगाल को बचाया, ताकि बंगालियों की गरिमा सुरक्षित रह सके । विडंबना यह है कि जब उन्होंने मांग की कि पाकिस्तान अपने बंगाली अल्पसंख्यकों पर अत्याचार करना बंद करे, और उन्हें शरणार्थी के रूप में भारत में न धकेले, तब यही कामरेड थे, जिन्होंने उनके खिलाफ कलकत्ता की सड़कों पर जुलूस निकाले, श्यामा प्रसाद जी की निंदा करते हुए प्रस्ताव पारित किये ।
आज बंगाल एक बार पुनः अपने अस्तित्व और पहचान के संकट का सामना कर रहा है, और उसका कारण है धर्मान्ध जिहादी और उन्मादी इस्लामी अतिवादी, जिन्हें राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी का पूरा समर्थन प्राप्त है । इसके कारण राज्य के हित, उसका भविष्य और वह संकल्पना खतरे में पड़ गई है, जिसके चलते बंगाल मुस्लिम लीग के खूनी चंगुल से बच पाया था ।
दुखद स्थिति यह है कि इस सबके बाबजूद कुछ मुट्ठीभर स्वतंत्र लेखकों व भाजपा को छोड़कर किसी भी बुद्धिजीवी या राजनेता ने इन घटनाओं पर कोई चिंता व्यक्त नहीं की है; कोई सार्वजनिक विमर्श नही हुआ है – वे लोग जो विशेष रूप से जेट सेटिंग, पर्यावरण के खतरे, 'हिन्दू राष्ट्र' की काली छाया और फासीवाद के काल्पनिक मुद्दों से लोगों को सचेत करते दिखाई देते थे, चुप्पी साधे हुए हैं ! उन्हें बंगाल में बढ़ती असहिष्णुता नहीं दिखाई दे रही ! कैसे अराजक तत्व धीरे-धीरे अपनी जड़ें गहरी करते जा रहे हैं, वे इस पर खामोश हैं ! कैसे बंगाली हिंदुओं पर - विशेष रूप से समाज के कमजोर और वंचित वर्गों के लोगों पर यह बढ़ती जिहादी मानसिकता क्रूर प्रहार कर रही है, उन्हें जैसे इससे कोई मतलब ही नहीं है ।
हमारे मानव अधिकारों के स्वयंभू चेम्पियन कार्यकर्ता भी बंगालियों पर जिहादियों द्वारा हो रहे इन अत्याचारों को देखकर भी अनदेखा कर रहे हैं । चाहे धौलागढ़ की हिंसा हो और चाहे मोल्लारगेट में हुए ताजा हमले, मुख्यधारा की भारतीय मीडिया और तथाकथित बुद्धिजीवी खामोशी का कंबल ओढ़े दिखाई दे रहे हैं । हिंसा के नवीनतम चक्र में, आतंक का एक ही पैटर्न दिखाई दे रहा है, दुकानों की लूटपाट, महिलाओं से अभद्रता, घरों में आगजनी और पुरुषों के साथ बेरहमी से मारपीट । और कितनी लोकतांत्रिक हैं महारानी ममता बनर्जी, जिन्होंने हर बार भाजपा द्वारा भेजे गए केंद्रीय दल को अपनी पुलिस और प्रशासनिक मशीनरी द्वारा प्रभावित क्षेत्रों तक पहुँचने भी नहीं दिया ! भाजपा के अलावा अन्य किसी दल ने तो अपनी टीम भेजने की जहमत उठाई ही नहीं, क्योंकि इससे “दीदी – दादी” के नाराज हो जाने का खतरा जो था ! कालियाचक मामले में भी यही हुआ, जब भाजपा के सांसद भूपेंद्र यादव और एसएस अहलूवालिया के नेतृत्व में एक टीम ने घटनास्थल पर जाने का प्रयत्न किया, तो उन्हें रोक दिया गया और इसी प्रकार धौलागढ़ में भी भाजपा अध्यक्ष अमित शाह द्वारा
गठित की गई संसदीय टीम को प्रभावित क्षेत्र का दौरा करने से रोक दिया गया । स्मरणीय है कि कम्यूनिस्ट शासन काल में जब ममता बनर्जी को सिंगुर का दौरा करने से रोका गया था, तब उन्होंने राज्य विधानसभा विधानसभा की लॉबी में फर्नीचर तोडा, गमले फेंके, अपशब्दों की बौछार की और पूरे दिन विधानसभा में कोई कार्यवाही नहीं चलने दी । वास्तव में तो आज ममता बनर्जी भारत की सर्वाधिक असहिष्णु मुख्यमंत्री हैं, जो संविधान को भी अपने ठेंगे पर रख रही हैं । उन्होंने गैर जिम्मेदारी और असंवैधानिक क्रियाकलापों में अपने विरोधी कम्यूनिस्टों को भी बहुत पीछे छोड़ दिया है ।
बंगाल में विध्वंशक राजनीति का प्रारम्भ 1970 के दशक में हुआ, जब चारू मजूमदार के नक्सल स्वप्नलोक से प्रेरित आत्म हन्ता चिंतन ने बंगाली बुद्धिजीवियों के बीच पैठ बना ली, और उन्हें एक पूरी पीढी को अतिवादी हिंसा की आग में झोंक दिया ! तब से ही बंगाल लगातार अस्थिरता और अकर्मण्यता के दौर में रुका हुआ है ।
दिलचस्प बात यह है कि राज्य में अभी भी एक तबका है जो चारु के स्वप्नलोक और उसकी झूठे दर्शन से प्रभावित है, और आज भी अपनी गतिविधियाँ जारी रखे हुए है । उनके कामरेड खुले तौर पर बंदूक की नली के माध्यम से भारत को समाप्त करने के लिए काम करते हैं, और भारत को टुकडे टुकडे करने के ख़्वाब संजोते हैं, शहरी भारत के अनेकों बुद्धिजीवी इनके सरपरस्त हैं ।
विध्वंशक राजनीति का दूसरा दौर सर्वहारा वर्ग के मुक्तिदाता के आगमन के साथ शुरू हुआ, जिन्होंने राजनीति में पूरी तरह नीम हकीम होते हुए भी, मुक्त अस्तित्व और भरपूर अवसरों का वायदा किया, नतीजा यह हुआ कि बंगाल में एक ऐसी शासन व्यवस्था बनी, जिसने राज्य को औद्योगिक और शैक्षिक रूप से और अधिक पीछे धकेल दिया ! हालात इतने बिगड़े कि सारी संभावनाओं और अवसरों को समाप्त समझकर बंगालियों की एक पूरी पीढ़ी बड़ी तादाद में राज्य से बाहर पलायन करने को विवश हुई ।
यहाँ तक कि कामरेडों द्वारा पूजित अमर्त्य सेन के आर्थिक सिद्धांत या उनके व्यक्तित्व की तथाकथित शक्ति भी डूबते हुए बंगाल को नहीं उबार सकी और तीन दशकों के बामपंथी शासन अवधि में पूरा बंगाल विनाश के कगार पर जा पहुंचा ।
विध्वंशक राजनीति का तीसरा चरण तब शुरू हुआ जब संभावित “पोरिबोर्तन” के लिए दिया गया जनादेश, अराजकता और जिहादी तत्वों को बढ़ावा देकर उन्हें असीमित उत्पीड़न के लिए खुली छूट में बदल गया। बंगाल ने अपने अस्तित्व पर जो पहला संकट झेला था, वर्तमान संकट भी बैसा ही, बल्कि और अधिक भयावह है, और अधिक घातक है, क्योंकि इसे राज्य की लोकतांत्रिक सत्ता द्वारा ही बढ़ावा दिया जा रहा है ।
विध्वंश का यह तीसरा दौर बंगाल के लिए शोकांतिका में न बदल जाए, क्योंकि वह खुद को खो रहा है। बंगाल अधःपतन के इस दौर से स्वयं को बाहर निकालने में भी असमर्थ दिखाई दे रहा है । क्या देश भी उदासीन रहेगा !


साभार आधार - http://vsktelangana.org/monumental-betrayal-of-bengal-its-values/

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क्रांतिदूत: 1947 से आजतक लगातार विध्वंशक राजनीति का शिकार बंगाल !
1947 से आजतक लगातार विध्वंशक राजनीति का शिकार बंगाल !
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