देश को बुद्धिजीवियों की दरकार, परजीवियों की भरमार ! – सत्यासिंह राठौर

मीडिया के रवीशकुमार जैसे चेहरे राष्ट्रवाद की तुलना फासीवाद से करते हैं। दरअसल यह वह मानसिकता है, जो तथाकथित प्रगतिवाद की आड़ में विशुद्ध ...



मीडिया के रवीशकुमार जैसे चेहरे राष्ट्रवाद की तुलना फासीवाद से करते हैं। दरअसल यह वह मानसिकता है, जो तथाकथित प्रगतिवाद की आड़ में विशुद्ध भौतिकवादी है। मानवता और राष्ट्रीयता से इनका कोई सरोकार नहीं। ये वे लोग हैं, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ लेकर राष्ट्र की अस्मिता और सुरक्षा के साथ समझौता करने से परहेज नहीं करते। ऐसे लोग विशुद्ध व्यक्तिवादी होते हैं, जो अपनी छुद्र स्वार्थपूर्ति की खातिर, अपने अज्ञात आकाओं को खुश करने के लिए राष्ट्रीयता की मनमानी व्याख्या करते हैं !

आज भारत के कई मीडिया घराने विदेशी शक्तियों के मोहरे हैं, जो अपनी वित्तपोषित कठपुतलियों को नचाते रहते हैं ! राष्ट्रीय भावना का मखौल उड़ाने वाले पीत पत्रकार भी ऎसी ही कठपुतलियाँ हैं ! वे राष्ट्र शब्द में अन्तर्निहित आध्यात्मिक भावना को क्या समझेंगे ? सम्पूर्ण धर्मों, जातियों, भाषाओं एवं प्रांतों को एकता के सूत्र में बांधकर इसकी अखण्डता की रक्षा के लिए दृढ़संकल्पित होना ही वस्तुतः राष्ट्रीयता की सच्ची संकल्पना है । 

हममें से अधिकाँश अमरबेल से परिचित हैं ! इस बेल में जड़ नहीं होती तथा यह जिस वृक्ष पर होती है, उसका जीवन रस चूसकर ही जीवित रहती है ! दूसरे शब्दों में कहें तो ये बेल पूर्णतः परजीवी होती हैं ! आज भारत में भी बुद्धिजीवी कम परजीवियों की संख्या कहीं अधिक है, जो भारत का जीवन रस चूस रहे हैं ! स्वत्वविहीन इन परजीवियों का सम्पूर्ण ध्यान केवल और केवल अपने स्वार्थ पर होता है ! कई बार तो लगता है कि भारत राष्ट्र राज्य कैसे विखंडित हो, कमजोर हो, मानो यही इनका मूल उद्देश्य है ! 

अब देखिये न दलितों को तथाकथित गौ सेवकों द्वारा पीटे जाने का मामला हो या पिछड़े वर्ग के रोहित बेमुला को दलित बताना, उद्देश्य एक ही है- देश में वर्ग संघर्ष को बढाने का प्रयत्न ! इसे उनकी सोच का संक्रीर्ण दायरा ही कह सकते हैं। क्या एपीजे अब्दुल कलाम और अशफाकउल्लाह खॉ राष्ट्रभक्त नहीं थे। क्या इनकी देश भक्ति पर उंगली उठाई जा सकती है। नस्लीय और संक्रीर्ण मनोवृति से निकलकर राष्ट्र भाव को बड़े क्षितिज पर ले जाकर देखने की जरूरत है। इसे त्याग, तपस्या और अपनी मातृभूमि के लिए कर्त्तव्यों से जोड़कर देखने की जरूरत है।

कन्हैया कुमार, अफजल गुरु जैसे चेहरे केवल ऐसे मुखोटे हैं जो सड़कछाप भाषा का इस्तेमाल कर अपनी ही मॉ को गाली दे जाते हैं। भला ऐसे लोग भारतीय संस्कृति में रचे बसे राष्ट्र भाव को क्या समझेंगे। अफजल गुरु का समर्थन करने वाले कन्हैया कुमार के साथी भारत विरोधी, राष्ट्रविरोधी नारे लगाते हैं, कश्मीर को भारत से अलग करने की बात करते हैं क्या इनके कारनामों पर पर्दा डाला जा सकता है ? परंतु कुछ मीडिया कर्मियों ने तो इनकी करतूतों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नाम दिया। कन्हैया कुमार का समर्थन इनोसेंट मानकर किया क्या यह सही हो सकता है। क्या कतिपय मीडिया कर्मियों द्वारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ लेकर राष्ट्र की अस्मिता, सुरक्षा से समझौता करना उचित है ?

एक भारत का लाल भगतसिंह केवल इसलिए फांसी पर चढ़ता है कि उसे भारत की युवा उर्जा को जगाना है ताकि भारत मॉ गुलामी की बेड़ियों से आजाद हो सके वहीं दूसरी तरफ एक कन्हैया कुमार कश्मीर को भारत से अलग करने वालों का सरपरस्त बना हुआ है। हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी के लिए रोने वालों की कमी न थी। लगता था जैसे कोई आतंकवादी नहीं कोई राष्ट्रनायक मारा गया हो। युवाओं को गलत दिशा देने वाला यह आतंकवादी क्या मानवता का रखवाला था। भारत के सैकडों सैनिक अभी तक इस आतंकवाद की भेंट चढ़ चुके हैं, वे आईडियल होना चाहिए या आतंकवादी बुराहनवानी। 

जो धारा 370 को स्थायी रखने की पुरजोर वकालत करते हैं क्या वे चीन और पाकिस्तान की नीयत को नहीं समझते। भारतीय संविधान की धारा 370 की व्याख्या ऐसे की जाती है, मानो वह जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा प्रदान करती है। 1976 का शहरी भूमि कानून जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं किया जा सकता । सूचना का अधिकार कानून भी यहां लागू नहीं होता। कितनी विचित्र स्थिति है कि कश्मीर में कश्मीर के मूल निवासी कश्मीरी पंडित तो नही रह सकते, किन्तु म्यांमार से विस्थापित होकर आये रोहिंग्या मुसलमान रह सकते हैं ! यह धारा 370 की मनमानी व्याख्या नहीं तो क्या है ? तिरंगे का अपमान करने वाले राष्ट्रीयता की भावना को क्या समझेंगे और क्या अपनाएंगे।

जो लोग भगवत् गीता को नहीं मानते, कुरान को नहीं मानते, बाइबिल को नहीं मानते, उस सर्वोच्च सत्ता को नहीं मानते, उनके लिए राष्ट्र केवल एक जमीन का टुकड़ा ही हो सकता है। राष्ट्र भाव को समझने के लिए राष्ट्र की आत्मा को समझना होगा। राष्ट्र की मिट्टी को सर माथे लगाना होगा। मीडिया कोई अलग नहीं है उसे भी राष्ट्र की अस्मिता और सुरक्षा को ध्यान में रखना होगा। अन्याय के खिलाफ बोलना, सच का समर्थन करना और इंसानियत का पैरोकार बने रहना ही इसकी लक्ष्मण रेखा है। इसे पार करना राष्ट्र के साथ खिलवाड़ करने जैसा है।

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क्रांतिदूत: देश को बुद्धिजीवियों की दरकार, परजीवियों की भरमार ! – सत्यासिंह राठौर
देश को बुद्धिजीवियों की दरकार, परजीवियों की भरमार ! – सत्यासिंह राठौर
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