कच्छप गति से चलती योजनायें ( कहानी )- डा. राधेश्याम द्विवेदी

भारत एक प्रजातंत्र देश है। यहां पर विकास की योजनायें कच्छप गति से चलती हैं। कहा यह भी जाता है कि भारत में सब समान हैं और सबका बराबर का ...


भारत एक प्रजातंत्र देश है। यहां पर विकास की योजनायें कच्छप गति से चलती हैं। कहा यह भी जाता है कि भारत में सब समान हैं और सबका बराबर का हक है, परन्तु हालात इसके विल्कुल बिपरीत है। यहां कच्छप गति से योजनायें चलती है,जो अपने लक्ष्य तक पहुंचते पहुंचते असरहीन हो जाती है। जहां से यह योजना चलती है वहां यह 100 पैसे की मूल्य की होती है। जब वह आम आदमी तक पहुंचती है तो कुछ पैसे कीमत मूल्य की रह जाती है। यह कहानी इसी लक्ष्य को इंगित करती है।

महामहिम राष्ट्रपतिजी के बेडरूम की खिड़की एक सड़क की ओर खुलती थी। रोजाना हजारों आदमी और वाहन उस सड़क से गुजरते थे। राष्ट्रपतिजी इस बहाने जनता की परेशानी और दुःख-दर्द को निकट से जानने का अवसर पा जाते थे। एक दिन की सुबह राष्ट्रपतिजी ने खिड़की का परदा हटाया। उस दिन भयंकर सर्दी पड़ रही थी। आसमान से रुई के फाहे जैसे वर्फ गिर रहे थे। दूर-दूर तक सफेद वर्फ की चादर फैली हुई थी। अचानक उन्हें दिखा कि बेंच पर एक आदमी बैठा हुआ है। जो हड्डी तोड़ ठंड से सिकुड़ कर गठरी जैसा होता जा रहा था ।

राष्ट्रपतिजी ने पीए को कहा - बेंच पर बैठे उस आदमी के बारे में जानकारी लो और उसकी जरूरत का पता लगाओ।

दो घंटे बाद , पीए ने राष्ट्रपतिजी को बताया - सर, वह एक भिखारी है। उसे ठंड से बचने के लिए एक अदद कंबल की जरूरत है।

राष्ट्रपतिजी ने कहा -ठीक है, उसे एक कंबल दे दो।

अगली दिन की सुबह राष्ट्रपतिजी ने खिड़की से पर्दा फिर हटाया। बाहर का दृश्य देखकर महामहिमजी को घोर हैरानी हुई। कल वाला वही भिखारी अभी भी उसी बेंच पर जमा हुआ था। उसके पास ओढ़ने के कंबल अभी तक नहीं उपलब्ध नही कराया जा सका था। राष्ट्रपतिजी गुस्सित हुए और पीए से पूछे - यह क्या है ? उस भिखारी को अभी तक कंबल क्यों नहीं दिया गया ? मैंने तो कल ही बोल दिया था।

पीए ने कहा - महोदय, मैंने आपका आदेश सेक्रेटरी होम के आगे बढ़ा दिया था। मैं अभी देखता हूं कि आदेश का पालन क्यों नहीं हुआ है। 

थोड़ी देर बाद सेक्रेटरी होम राष्ट्रपतिजी के सामने पेश हुए और सफाई देते हुए बोले - सर, हमारे शहर में हजारों भिखारी हैं। अगर एक भिखारी को कंबल दिया गया तो शहर के बाकी भिखारियों को भी देना पड़ेगा और शायद पूरे मुल्क में भी एसा करना पड़ेगा। अगर न दिया तो आम आदमी और मीडिया हम पर भेदभाव का इल्जाम लगायेगा।

राष्ट्रपतिजी को गुस्सा आया। वे बोले - तो फिर ऐसा क्या होना चाहिए कि उस जरूरतमंद भिखारी को कंबल मिल जाए ?

सेक्रेटरी होम ने सुझाव दिया -सर, जरूरतमंद तो हर भिखारी है। आपके नाम से एक कंबल ओढ़ाओ, भिखारी बचाओ योजना शुरू की जा सकती है। उसके अंतर्गत मुल्क के सारे भिखारियों को कंबल बांटा जा सकता है।

राष्ट्रपतिजी इस स्कीम से बहुत खुश हुए। वह अपने दैनिक कामो मे लग गये। अगली सुबह राष्ट्रपतिजी ने खिड़की से परदा फिर हटाया तो देखा कि वह भिखारी अभी तक उसी बेंच पर बैठा है। इसे देख राष्ट्रपतिजी आग-बबूला हो गए। उनके आदेश की लगातार अवहेलना जो हो रही थी। उन्होंने सेक्रेटरी होम को तलब किया और कारण पूछा। 

सेक्रेटरी होम ने स्पष्टीकरण दिया -सर, भिखारियों की गिनती की जा रही है, ताकि उतने कंबलों की खरीद की जा सके।

राष्ट्रपति दांत पीस कर रह गए। अगले दिन की सुबह राष्ट्रपतिजी को फिर वही भिखारी उसी बेंच पर वहां बैठा दिखा। वह खून का घूंट पीकर रहे गए। सेक्रेटरी होम की फौरन पेशी कराई गई। सेक्रेटरी ने विनम्रता के साथ बताया -सर, ऑडिट ऑब्जेक्शन से बचने के लिए कंबल खरीद का शार्ट-टर्म कोटेशन डाला गया है। आज शाम तक कंबल खरीद हो जायेगी और रात में बांट भी दिए जाएंगे।

राष्ट्रपति ने जोर देकर कहा -यह आखिरी चेतावनी है। अब मैं कोई बहाना सुनना नहीं चाहता।
अगले दिन की सुबह राष्ट्रपतिजी ने खिड़की पर से फिर परदा हटाया तो देखा बेंच के इर्द-गिर्द भीड़ जमा है। राष्ट्रपतिजी ने पीए को भेज कर पता लगवाया। पीए ने लौट कर बताया - सर, कंबल नहीं होने के कारण उस भिखारी की ठंड से मौत हो गयी है।

गुस्से से हुए लाल-पीले राष्ट्रपति ने फौरन से सेक्रेटरी होम को तलब किया। सेक्रेटरी होम ने बड़े अदब से सफाई दी -सर, खरीद की कार्यवाही पूरी हो गई थी। आनन-फानन में हमने सारे कंबल बांट भी दिए। मगर अफसोस कंबल कम पड़ गये।
राष्ट्रपतिजी ने पैर पटके -आखिर क्यों कम पड़े ? मुझे अभी जवाब चाहिये।

सेक्रेटरी होम नजरें झुकाकर बोले- श्रीमान पहले हमने कम्बल अनुसूचित जाति के भिखारियों में बंटवाया उसके बाद अनुसूचित जनजाति के लोगो को दिया। फिर जो बचा वह अल्पसंख्यक लोगो को बंटवाया।

उसके बाद क्या ? राष्ट्रपतिजी ने गुस्से में तेजी आवाज में पूछा।

उसके बाद, सर,ओ बी सी के भिखारियों में कंबल बंटते रहे। आखिर में जब उस भिखारी का नंबर आया तो कंबल खत्म हो गए।

राष्ट्रपति चिंघाड़े -आखिर में एसा हुआ क्यों?

सेक्रेटरी होम ने भोलेपन से कहा -सर, इसलिये कि उस भिखारी की जाति ऊँची थी , और वह आरक्षण की श्रेणी में नही आता था। इसलिये उस को नही दे पाये। और जब उस भिखारी का नम्बर आया तो कम्बल खत्म हो चुका था।

आरक्षण का लाभ उन व्यक्तियों को दिया जा रहा है जिसको उसकी जरुरत नहीं। जिसको जरुरत है उसे नही मिल पाता है। यह भारत के लोकतंत्र की योजना व नीति है। ना जाने देश इससे मुक्ति पायेगा या एसे ही इसके तले दबता चला जायेगा ?

डॉ. राधेश्याम द्विवेदी 
लेखक परिचय -
डा.राधेश्याम द्विवेदी ने अवध विश्वविद्यालय फैजाबाद से बी.ए. और बी.एड. की डिग्री,गोरखपुर विश्वविद्यालय से एम.ए.(हिन्दी),एल.एल.बी., सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी का शास्त्री, साहित्याचार्य तथा ग्रंथालय विज्ञान की डिग्री तथा विद्यावारिधि की(पी.एच.डी) की डिग्री उपार्जित किया। आगरा विश्वविद्यालय से प्राचीन इतिहास से एम.ए.डिग्री तथा’’बस्ती का पुरातत्व’’ विषय पर दूसरी पी.एच.डी.उपार्जित किया। बस्ती ’जयमानव’ साप्ताहिक का संवाददाता, ’ग्रामदूत’ दैनिक व साप्ताहिक में नियमित लेखन, राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित, बस्ती से प्रकाशित होने वाले ‘अगौना संदेश’ के तथा ‘नवसृजन’त्रयमासिक का प्रकाशन व संपादन भी किया। सम्प्रति2014 से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण आगरा मण्डल आगरा में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद पर कार्यरत हैं। प्रकाशित कृतिः ”इन्डेक्स टू एनुवल रिपोर्ट टू द डायरेक्टर जनरल आफ आकाॅलाजिकल सर्वे आफ इण्डिया” 1930-36 (1997) पब्लिस्ड बाईडायरेक्टर जनरल, आकालाजिकल सर्वे आफ इण्डिया, न्यू डेलही। अनेक राष्ट्रीय पोर्टलों में नियमित रिर्पोटिंग कर रहे हैं।

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