भारत, मुसलमान, राजनीति और वोटबैंक - संजय तिवारी

देश के पांच राज्यो में हो रहे विधानसभा चुनावो के बहाने कई नए और चौकाने वाले तथ्य भी राजनीतिक रूप से उभर कर सामने आने लगे हैं। हालांकि चु...

देश के पांच राज्यो में हो रहे विधानसभा चुनावो के बहाने कई नए और चौकाने वाले तथ्य भी राजनीतिक रूप से उभर कर सामने आने लगे हैं। हालांकि चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट ने कड़ाई से कहा है कि किसी भी दशा में जाति और सम्प्रदाय या धर्म का इस्तेमाल चुनाव में नहीं किया जाना चाहिए लेकिन ये राजनीतिक पार्टियां बावज़ूद इसके , अपनी जीत हार के सारे समीकरण जाति और सम्प्रदाय के आधार पर ही तय कर रही हैं। इतना ही नहीं , ख़ास तौर पर उत्तर प्रदेश में तो इस आदेश का कोई असर ही नहीं दिख रहा। मंचो से खुलेआम दलित मुस्लिम गठजोड़ की वकालत की जा रही है। मुस्लिम समुदाय को हर भाषण में इस बात से डराया जा रहा है कि यदि आप ने फला के साथ मिल कर वोट नहीं दिया तो फला जीत जाएगा और फिर आप संकट में आ जाओगे। कोई कहता है कि हमने 104 मुसलमान प्रत्याशी उतारे हैं इसलिए आप हमारे साथ आइये। कोई कहता है हमने 70 टिकट दिया है , मुसलमान हमारे साथ होने चाहिए। इस वोट बैंक पर कब्जे के चक्कर में सभी यह भूल गए हैं कि यहाँ और भी समुदाय हैं जो अल्पसंख्यक श्रेणी में आते हैं , लेकिन उनको कोई पूछने वाला नहीं है। यहाँ यह विंदु उल्लेख करना भी जरूरी है कि उत्तर प्रदेश की जंग में एक तरफ भाजपा के चेहरे के रूप में नरेंद्र मोदी स्वयं हैं और दूसरी तरफ सारे दल मोदी का ही भय दिखा कर मुस्लिम वोट बटोरने की जुगत में हैं। यहाँ सपा कांग्रेस गठबंधन ,मायावती की बसपा और भाजपा का त्रिकोणीय संघर्ष है लेकिन केंद्र में मुसलमान और उन्ही से जुडी राजनीति चर्चा में है। रोचक पहलू तो यह है कि इसी युद्ध के दरमियान मुस्लिम महिलाओ के तीन तलाक का मुद्दा भी आ गया है। भारत भीतर के राज्यो में हो रहे चुनाव के दौर में ही इस्लाम को लेकर एक व्यापक अध्ययन और दो पुस्तको की चर्चा आजकल दुनिया में छायी हुई है। इन पुस्तको के आधार पर हकीकत और फ़साना समझ लेना भी जरुरी है क्योकि यहाँ तो सवाल भारत , भारतीयता और वोटबैंक का है। 

धर्मांधता किसी की भी हो, हिंदू, सिक्ख, मुसलमान या ईसाई, मानवता के लिए खतरा होती है। गत 2-3 दशकों से इस्लाम धर्म के मानने वालों की हिंसक गतिविधियां पूरी दुनिया के लिए सिरदर्द बनी हुई हैं। 2005 में समाजशास्त्री डा.पीटर हैमण्ड ने गहरे शोध के बाद इस्लाम धर्म के मानने वालों की दुनियाभर में प्रवृत्ति पर एक पुस्तक लिखी, जिसका शीर्षक है ‘स्लेवरी, टेररिज्म एण्ड इस्लाम – द हिस्टोरिकल रूट्स एण्ड कण्टेम्पररी थ्रेट’। इसके साथ ही “द हज” के लेखक लियोन यूरिस ने भी इस विषय पर अपनी पुस्तक में विस्तार से प्रकाश डाला है। जो तथ्य निकलकर आए हैं, वह न सिर्फ चैंकाने वाले हैं, बल्कि चिंताजनक हैं। ये ऐसे तथ्य हैं, जिन्हें बिना धर्मांधता के चश्मे के हर किसी को देखना और समझना चाहिए ! चाहे वो मुसलमान ही क्यों न हों। अब फर्ज उन मुसलमानों का बनता है, जो खुद को धर्मनिरपेक्ष बताते हैं, वे संगठित होकर आगे आएं और इस्लाम धर्म के साथ जुड़ने वाले इस विश्लेषणों से पैगंबर के मानने वालों को मुक्त कराएं, अन्यथा न तो इस्लाम के मानने वालों का भला होगा और न ही बाकी दुनिया का। जहा तक भारत का सवाल है , तो यह सोचने और विचार करने का सटीक समय है कि उनके लिए भारतीयता कितनी अहमियत रखती है। वे वास्तव में भारतीय रहना चाहते हैं या केवल कुछ राजनीतिक पार्टियों के लिए वोटबैंक बनकर। 

भारत के खिलाफ साजिश और विध्वंस में लगे मोस्टवांटेड आतंकवादी 

1) हाफिज मोहम्मद सईद.
2) साजिद माजिद. 
3) सैयद हाशिम अब्दुर्रहमान पाशा.
4) मेजर इकबाल.
5) इलियास कश्मीरी.
6) राशिद अब्दुल्लाह.
7) मेजर समीर अली.
8) दाऊद इब्राहिम.
9) मेमन इब्राहिम.
10) छोटा शकील.
11) मेमन अब्दुल रज्जाक.
12) अनीस इब्राहिम.
13) अनवर अहमद हाजी जमाल.
14) मोहम्मद दोसा.
15) जावेद चिकना.
16) सलीम अब्दुल गाजा.
17) रियाज खत्री.
18) मुनाफा हलरी.
19) मोहम्मद सलीम मुजाहिद.
20) खान बशीर अहमद.
21) याकूब येदा खान.
22) मोहम्मद मेमन.
23) इरफान चौगले.
24) फिरोज राशिद खान.
25) अली मूसा.
26) सगीर अली शेख.
27) आफताब बटकी.
28) मौलाना मोहम्मद मसूद अजहर.
29) सलाउद्दीन.
30) आजम चीमा.
31) सैयद जबीउद्दीन जबी.
32) इब्राहिम अतहर.
33) अजहर युसुफ.
34) जहूर इब्राहिम मिस्त्री.
35) अख्तर सईद.
36) मोहम्मद शकीर.
37) रऊफ अब्दुल.
38) अमानुल्ला खान.
39) सूफियान मुफ्ती.
40) नाछन अकमल.
41) पठान याकूब खान.
42) कैम बशीर.
43) आयेश अहमद.
44) अल खालिद हुसैन.
45) इमरान तौकीब रजा.
46) शब्बीर तारिक हुसैन.
47) अबू हमजा.
48) जकी उर रहमान लखवी.
49) अमीर रजा खान.
50) मोहम्मद मोहसिन.
यहाँ यह उल्लेख करना भी आवश्यक है कि अज़मल कसाब और अफ़ज़ल गुरु को फांसी दी जा चुकी है।

जमात-ए-इस्लामी के संस्थापक मौलाना मौदूदी कहते हैं कि कुरान के अनुसार विश्व दो भागों में बँटा हुआ है, एक वह जो अल्लाह की तरफ़ हैं और दूसरा वे जो शैतान की तरफ़ हैं। देशो की सीमाओं को देखने का इस्लामिक नज़रिया कहता है कि विश्व में कुल मिलाकर सिर्फ़ दो खेमे हैं, पहला दार-उल-इस्लाम (यानी मुस्लिमों द्वारा शासित) और दार-उल-हर्ब (यानी “नास्तिकों” द्वारा शासित)। उनकी निगाह में नास्तिक का अर्थ है जो अल्लाह को नहीं मानता, क्योंकि विश्व के किसी भी धर्म के भगवानों को वे मान्यता ही नहीं देते हैं।

इस्लाम को लेकर बहुत से अध्ययन हो चुके हैं और अभी भी हो रहे हैं। हाल के दिनों में सर्वाधिक चर्चा में दो पुस्तके रही हैं जिनके आंकड़ो को लेकर आजकल काफी बहस छिड़ी है। एक है डॉ पीटर हैमण्ड की पुस्तक “स्लेवरी, टेररिज़्म एण्ड इस्लाम – द हिस्टोरिकल रूट्स एण्ड कण्टेम्पररी थ्रेट तथा लियोन यूरिस – “द हज। उपलब्ध तथ्य और साहित्य के अनुसार इस्लाम सिर्फ़ एक धर्म ही भर नहीं है, असल में इस्लाम एक पूजापद्धति तो है ही, लेकिन उससे भी बढ़कर यह एक समूची “व्यवस्था” के रूप में मौजूद रहता है। इस्लाम की कई शाखायें जैसे धार्मिक, न्यायिक, राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सैनिक होती हैं। इन सभी शाखाओं में सबसे ऊपर, सबसे प्रमुख और सभी के लिये बन्धनकारी होती है धार्मिक शाखा, जिसकी सलाह या निर्देश (बल्कि आदेश) सभी धर्मावलम्बियों को मानना बाध्यकारी होता है। किसी भी देश, प्रदेश या क्षेत्र के “इस्लामीकरण” करने की एक प्रक्रिया है। जब भी किसी देश में मुस्लिम जनसंख्या एक विशेष अनुपात से ज्यादा हो जाती है तब वहाँ इस्लामिक आंदोलन शुरु होते हैं। शुरुआत में उस देश विशेष की राजनैतिक व्यवस्था सहिष्णु और बहु-सांस्कृतिकवादी बनकर मुसलमानों को अपना धर्म मानने, प्रचार करने की इजाजत दे देती है, उसके बाद इस्लाम की “अन्य शाखायें” उस व्यवस्था में अपनी टाँग अड़ाने लगती हैं। इसे समझने के लिये हम कई देशों का उदाहरण देखेंगे, आईये देखते हैं कि यह सारा “खेल” कैसे होता है

जब तक मुस्लिमों की जनसंख्या किसी देश/प्रदेश/क्षेत्र में लगभग 2% के आसपास होती है, तब वे एकदम शांतिप्रिय, कानूनपसन्द अल्पसंख्यक बनकर रहते हैं और किसी को विशेष शिकायत का मौका नहीं देते, जैसे -
अमेरिका – मुस्लिम 0.6%
ऑस्ट्रेलिया – मुस्लिम 1.5%
कनाडा – मुस्लिम 1.9%
चीन – मुस्लिम 1.8%
इटली – मुस्लिम 1.5%
नॉर्वे – मुस्लिम 1.8%

जब मुस्लिम जनसंख्या 2% से 5% के बीच तक पहुँच जाती है, तब वे अन्य धर्मावलम्बियों में अपना “धर्मप्रचार” शुरु कर देते हैं, जिनमें अक्सर समाज का निचला तबका और अन्य धर्मों से असंतुष्ट हुए लोग होते हैं, जैसे कि –

डेनमार्क – मुस्लिम 2%
जर्मनी – मुस्लिम 3.7%
ब्रिटेन – मुस्लिम 2.7%
स्पेन – मुस्लिम 4%
थाईलैण्ड – मुस्लिम 4.6%

मुस्लिम जनसंख्या के 5% से ऊपर हो जाने पर वे अपने अनुपात के हिसाब से अन्य धर्मावलम्बियों पर दबाव बढ़ाने लगते हैं और अपना “प्रभाव” जमाने की कोशिश करने लगते हैं। उदाहरण के लिये वे सरकारों और शॉपिंग मॉल पर “हलाल” का माँस रखने का दबाव बनाने लगते हैं, वे कहते हैं कि “हलाल” का माँस न खाने से उनकी धार्मिक मान्यतायें प्रभावित होती हैं। इस कदम से कई पश्चिमी देशों में “खाद्य वस्तुओं” के बाजार में मुस्लिमों की तगड़ी पैठ बनी। उन्होंने कई देशों के सुपरमार्केट के मालिकों को दबाव डालकर अपने यहाँ “हलाल” का माँस रखने को बाध्य किया। दुकानदार भी “धंधे” को देखते हुए उनका कहा मान लेता है (अधिक जनसंख्या होने का “फ़ैक्टर” यहाँ से मजबूत होना शुरु हो जाता है), ऐसा जिन देशों में हो चुका वह हैं - 

फ़्रांस – मुस्लिम 8%
फ़िलीपीन्स – मुस्लिम 6%
स्वीडन – मुस्लिम 5.5%
स्विटजरलैण्ड – मुस्लिम 5.3%
नीडरलैण्ड – मुस्लिम 5.8%
त्रिनिदाद और टोबैगो – मुस्लिम 6%

इस बिन्दु पर आकर “मुस्लिम” सरकारों पर यह दबाव बनाने लगते हैं कि उन्हें उनके “क्षेत्रों” में शरीयत कानून (इस्लामिक कानून) के मुताबिक चलने दिया जाये (क्योंकि उनका अन्तिम लक्ष्य तो यही है कि समूचा विश्व “शरीयत” कानून के हिसाब से चले)। जब मुस्लिम जनसंख्या 10% से अधिक हो जाती है तब वे उस देश/प्रदेश/राज्य/क्षेत्र विशेष में कानून-व्यवस्था के लिये परेशानी पैदा करना शुरु कर देते हैं, शिकायतें करना शुरु कर देते हैं, उनकी “आर्थिक परिस्थिति” का रोना लेकर बैठ जाते हैं, छोटी-छोटी बातों को सहिष्णुता से लेने की बजाय दंगे, तोड़फ़ोड़ आदि पर उतर आते हैं, चाहे वह फ़्रांस के दंगे हों, डेनमार्क का कार्टून विवाद हो, या फ़िर एम्स्टर्डम में कारों का जलाना हो, हरेक विवाद को समझबूझ, बातचीत से खत्म करने की बजाय खामख्वाह और गहरा किया जाता है, जैसे कि –

गुयाना – मुस्लिम 10%
भारत – मुस्लिम 15%
इसराइल – मुस्लिम 16%
केन्या – मुस्लिम 11%
रूस – मुस्लिम 15% (चेचन्या – मुस्लिम आबादी 70%)
जब मुस्लिम जनसंख्या 20% से ऊपर हो जाती है तब विभिन्न “सैनिक शाखायें” जेहाद के नारे लगाने लगती हैं, असहिष्णुता और धार्मिक हत्याओं का दौर शुरु हो जाता है, जैसे-

इथियोपिया – मुस्लिम 32.8%

जनसंख्या के 40% के स्तर से ऊपर पहुँच जाने पर बड़ी संख्या में सामूहिक हत्याऐं, आतंकवादी कार्रवाईयाँ आदि चलने लगते हैं, जैसे –

बोस्निया – मुस्लिम 40%
चाड – मुस्लिम 54.2%
लेबनान – मुस्लिम 59%

जब मुस्लिम जनसंख्या 60% से ऊपर हो जाती है तब अन्य धर्मावलंबियों का “जातीय सफ़ाया” शुरु किया जाता है (उदाहरण भारत का कश्मीर), जबरिया मुस्लिम बनाना, अन्य धर्मों के धार्मिक स्थल तोड़ना, जजिया जैसा कोई अन्य कर वसूलना आदि किया जाता है, जैसे –

अल्बानिया – मुस्लिम 70%
मलेशिया – मुस्लिम 62%
कतर – मुस्लिम 78%
सूडान – मुस्लिम 75%

जनसंख्या के 80% से ऊपर हो जाने के बाद तो सत्ता/शासन प्रायोजित जातीय सफ़ाई की जाती है, अन्य धर्मों के अल्पसंख्यकों को उनके मूल नागरिक अधिकारों से भी वंचित कर दिया जाता है, सभी प्रकार के हथकण्डे/हथियार अपनाकर जनसंख्या को 100% तक ले जाने का लक्ष्य रखा जाता है, जैसे –

बांग्लादेश – मुस्लिम 83%
मिस्त्र – मुस्लिम 90%
गाज़ा पट्टी – मुस्लिम 98%
ईरान – मुस्लिम 98%
ईराक – मुस्लिम 97%
जोर्डन – मुस्लिम 93%
मोरक्को – मुस्लिम 98%
पाकिस्तान – मुस्लिम 97%
सीरिया – मुस्लिम 90%
संयुक्त अरब अमीरात – मुस्लिम 96%

बनती कोशिश पूरी 100% जनसंख्या मुस्लिम बन जाने, यानी कि दार-ए-स्सलाम होने की स्थिति में वहाँ सिर्फ़ मदरसे होते हैं और सिर्फ़ कुरान पढ़ाई जाती है और उसे ही अन्तिम सत्य माना जाता है, जैसे –

अफ़गानिस्तान – मुस्लिम 100%
सऊदी अरब – मुस्लिम 100%
सोमालिया – मुस्लिम 100%
यमन – मुस्लिम 100%

इन पुस्तको में स्पष्ट तौर पर लिखा है कि दुर्भाग्य से 100% मुस्लिम जनसंख्या होने के बावजूद भी उन देशों में तथाकथित “शांति” नहीं हो पाती। जिन देशों में मुस्लिम जनसंख्या 8 से 10 प्रतिशत हो चुकी होती है, उन देशों में यह तबका अपने खास “मोहल्लो” में रहना शुरु कर देता है, एक “ग्रुप” बनाकर विशेष कालोनियाँ या क्षेत्र बना लिये जाते हैं, उन क्षेत्रों में अघोषित रूप से “शरीयत कानून” लागू कर दिये जाते हैं। उस देश की पुलिस या कानून-व्यवस्था उन क्षेत्रों में काम नहीं कर पाती, यहाँ तक कि देश का न्यायालयीन कानून और सामान्य सरकारी स्कूल भी उन खास इलाकों में नहीं चल पाते। ऐसा भारत के कई जिलों के कई क्षेत्रों में खुलेआम देखा जा सकता है, कई प्रशासनिक अधिकारी भी दबी जुबान से इसे स्वीकार करते हैं, लेकिन कथित सेक्युलर राजनैतिज्ञों और विद्वानों को इसमे कुछ भी खराब नहीं दिखता। आज की स्थिति में मुस्लिमों की जनसंख्या समूचे विश्व की जनसंख्या का 22-24% है, लेकिन ईसाईयों, हिन्दुओं और यहूदियों के मुकाबले उनकी जन्मदर को देखते हुए कहा जा सकता है कि इस शताब्दी के अन्त से पहले ही मुस्लिम जनसंख्या विश्व की 50% हो जायेगी (यदि तब तक धरती बची तो)… भारत में कुल मुस्लिम जनसंख्या 15% के आसपास मानी जाती है, जबकि हकीकत यह है कि उत्तरप्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और केरल के कई जिलों में यह आँकड़ा 40 से 50% तक पहुँच चुका है… अब देश में आगे चलकर क्या परिस्थितियाँ बनेंगी , आसानी से सोच-समझ सकता है…

(सभी सन्दर्भ और आँकड़े : डॉ पीटर हैमण्ड की पुस्तक “स्लेवरी, टेररिज़्म एण्ड इस्लाम – द हिस्टोरिकल रूट्स एण्ड कण्टेम्पररी थ्रेट तथा लियोन यूरिस – “द हज”, से साभार)


भारत में 3 लाख मस्जिदें हैं। जो अन्य किसी देश में भी नहीं है । वाशिंगटन में 24 चर्च हैं ,लन्दन में 71 चर्च और इटली के मिलान शहर में 68 चर्च हैं, जबकि अकेले दिल्ली में 271 चर्च हैं।

'मुस्लिम आबादी सबसे तेज़ रफ़्तार से बढ़ेगी'

वॉशिंगटन डीसी से बीबीसी संवाददाता, ब्रजेश उपाध्याय लिखते हैं कि वर्ष 2050 तक भारत इंडोनेशिया को पीछे छोड़ पूरी दुनिया में सबसे ज़्यादा मुसलमान आबादी वाला देश बन जाएगा. इतना ही नहीं शोध में कहा गया है कि पूरी दुनिया में मुसलमानों और ईसाइयों की आबादी लगभग बराबर हो जाएगी। वॉशिंगटन स्थित प्यू रिसर्च सेंटर का कहना है कि दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी आबादी हिंदू धर्म मानने वालों की होगी और भारत में हिंदुओं का बहुमत बना रहेगा। अगले चार दशकों में ईसाई धर्म सबसे बड़ा धार्मिक समूह बना रहेगा लेकिन किसी भी धर्म के मुक़ाबले इस्लाम सबसे तेज़ रफ़्तार से आगे बढ़ेगा.

ग़ौरतलब है कि इस वक्त दुनिया में ईसाई धर्म सबसे बड़ा समूह है उसके बाद मुसलमान आते हैं और तीसरी सबसे बड़ी आबादी ऐसे लोगों की है जो किसी धर्म को नहीं मानते। अगर मौजूदा ट्रेंड बरकरार रहा तो वर्ष 2070 तक इस्लाम दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक समूह बन जाएगा। अगले चार बरसों में अंदाज़ा है कि दुनिया की आबादी 9.3 अरब तक पहुंच जाएगी और मुसलमानों की संख्या में 73 प्रतिशत की बढ़ोतरी होगी, ईसाइयों की संख्या 35 प्रतिशत बढ़ेगी और हिंदुओ की संख्या में 34 प्रतिशत की वृद्धि होगी। शोध में कहा गया है कि इस वक्त मुसलमानों में बच्चे पैदा करने की दर सबसे ज़्यादा है यानि औसतन हर महिला 3 से अधिक बच्चे पैदा कर रही है, ईसाइयों में हर महिला औसतन दो से अधिक बच्चों को जन्म दे रही है. हिंदुओं में बच्चे पैदा करने की औसत दर 2.4 है। वर्ष 2010 में पूरी दुनिया की 27 प्रतिशत आबादी 15 साल से कम उम्र की थी वहीं 34 प्रतिशत मुसलमान आबादी 15 साल से कम थी और हिंदुओं में ये प्रतिशत 30 प्रतिशत था. इसे एक बड़ी वजह माना जा रहा है कि मुसलमानों की संख्या दुनिया की आबादी के मुक़ाबले ज़्यादा तेज़ रफ़्तार से बढ़ेगी. वहीं हिंदू और ईसाई उसी रफ़्तार से बढ़ेंगे जिस रफ़्तार से दुनिया की आबादी बढ़ रही है.

रिपोर्ट के अनुसार अमरीका में मुसलमानों की आबादी यहूदियों से ज़्यादा हो जाएगी। रिपोर्ट में बच्चे पैदा करने की दर के अलावा धार्मिक आबादी में इस उलटफेर के पीछे धर्मांतरण को भी एक बड़ा कारण बताया गया है। आनेवाले दशकों में ईसाई धर्म को धर्मांतरण से सबसे ज़्यादा नुकसान होने के आसार हैं और कहा गया है कि चार करोड़ लोग ईसाई धर्म अपना लेंगे. शोध में कहा गया है कि दस करोड़ साठ लाख लोग ईसाई धर्म को छोड़ देंगे. उसी तरह एक करोड़ 12 लाख लोग इस्लाम को अपनाएंगे जबकि लगभग 92 लाख लोग इस्लाम को छोड़ देंगे। रिपोर्ट में कहा गया है कि ये अनुमान मौजूदा डाटा के आधार पर लगाए गए हैं लेकिन सामाजिक आंदोलन, युद्ध और प्राकृतिक विपदाओं के कारण ये बदल भी सकते हैं। इसके अलावा दुनिया की सबसे ज़्यादा आबादी वाला देश चीन की 50 प्रतिशत आबादी किसी धर्म को नहीं मानती और वहां धर्मांतरण के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है। लेकिन अगर आनेवाले दशकों में ये आबादी ईसाई धर्म अपनाती है, जैसा कि कई विशेषज्ञों का मानना है, तो फिर ये पूरा आकलन बदल सकता है। 

भारत की कुल आबादी 121.09 करोड़ है। जारी जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक देश में ईसाइयों की आबादी 2.78 करोड़ है। जो देश की कुल आबादी का 2.3% है। ईसाइयों की जनसंख्या वृद्धि दर 15.5% रही, जबकि सिखों की 8.4%, बौद्धों की 6.1% और जैनियों की 5.4% है। देश में ईसाई की जनसंख्या हिंदू और मुस्लिम के बाद सबसे अधिक है। भारत में 96.63 करोड़ हिंदू हैं, जो कुल आबादी का 79.8% है। मुस्लिम 17.22 करोड़ है जो कुल आबादी का 14.23% है। दूसरे अल्पसंख्यकों में ईसाई समुदाय है। एक दशक में देश की आबादी 17.7% बढ़ी है। आंकड़ों के मुताबिक देश की आबादी 2001 से 2011 के बीच 17.7% बढ़ी। मुस्लिमों की 24.6%, हिंदुओं की आबादी 16.8%, ईसाइयों की 15.5%, सिखों की 8.4%, बौद्धों की 6.1% तथा जैनियों की 5.4% आबादी बढ़ी है। साल 2001 से 2011 के बीच कुल आबादी में हिंदुओं की हिस्सेदारी 0.7%, सिखों की आबादी 0.2% और बौद्धों की 0.1% घटी है जबकि मुस्लिमों की हिस्सेदारी में 0.8% वृद्धि दर्ज की गई है। ईसाइयों और जैनियों की कुल जनसंख्या में हिस्सेदारी में कोई खास बढ़ोत्तरी नहीं दर्ज की गई। 

स्रोत : जनगणना भारत 2011 में

2001 की जनगणना के आधार पर कहा जा रहा है कि 220 सालों में भारत के मुसलमान हिन्दू आबादी के बराबर हो जाएंगे। 1991 की जनगणना में मुसलमानों की आबादी 106,700,000 थी। वहीं हिन्दुओं की आबादी 690,100,000 थी। 10 साल बाद मुसलमानों की आबादी बढ़कर 138,200,000 और हिन्दुओं की जनसंख्या बढ़कर 82 करोड़ 76 लाख हो गई। मतलब इन 10 सालों में मुसलमानों की आबादी में 29.5 फीसदी और हिन्दुओं की आबादी में 19.9 पर्सेंट की वृद्धि हुई। इस एक दशक में सालाना मुसलमानों की वृद्धि दर 2.62 पर्सेंट रही और हिन्दुओं की 1.83 पर्सेंट।

निश्चित रूप से इन 10 सालों में मुस्लिमों की आबादी हिन्दुओं के मुकाबले तेजी से बढ़ी। इसके कारणों की तहकीकात होनी चाहिए लेकिन यह अलग मामला है। मोटे तौर पर हम इस विश्लेषण को बदल नहीं सकते। बड़ी खूबसूरती से शुरुआती अर्थमेटिक के आधार पर दोनों समुदायों की वृद्धि दरें दिखाई गई हैं। और इसका निष्कर्ष यह निकाला गया है कि 220 सालों में मुस्लिमों की आबादी हिन्दुओं के लगभग बराबर हो जाएगी। मतलब 2233 में मुस्लिमों की आबादी हिन्दुओं के बराबर हो जाएगी। इस संख्या को कबूल करने के लिए हमें आगे निकलना होगा। क्या 220 साल बाद ऐसा होगा का डर दिखाकर हमारे स्थानीय नेता भड़काने की कोशिश कर रहे हैं? जैसा कि 500 साल पुरानी बाबरी मस्जिद को लेकर उकसाने की कोशिश की गई थी। यदि वास्तव में हम 90 के दशक की आबादी वृद्धि दर कायम रखते हैं तो सोचिए 2233 में क्या होगा? इस हिसाब से देश में 56 अरब हिन्दू और 56 अरब मुसलमान हो जाएंगे। मतलब 2233 में दुनिया की कुल आबादी के 16 गुना आबादी भारत में होगी। यदि इससे भी आप चकित नहीं हो रहे हैं तो फिर ऐसे सोचिए- अभी जिस जगह पर आप शांति से इस खबर को पढ़ रहे हैं वहां 2233 में 100 भारतीय होंगे। इसमें 50 हिन्दू और 50 मुस्लिम होंगे। मतलब अभी एक भारतीय की जगह 100 से ज्यादा भारतीय होंगे। यहां हम ईसाई, सिख, जैन, पारसी और बौध की तो बात ही नहीं कर रहे। देश की आबादी में ये समुदाय भी आते हैं। यदि इन्हीं कसौटी पर हम ईसाई आबादी को कसते हैं तो और आतंकित करने वाली स्थिति सामने आएगी। इसका नतीजा और हास्यास्पद है। 1991 में ईसाई आबादी 19 मिलियन थी जो 10 साल बाद 2001 में 24 मिलियन हो गई। मतलब इन 10 सालों में सालाना वृद्धि दर 2.36 पर्सेंट रही। इस फीगर के मुताबिक 670 साल बाद ईसाइयों की आबादी हिन्दुओं के बराबर हो जाएगी। मतलब तब देश में ईसाई 195 ट्रिलियन और 195 ट्रिलियन हिन्दू हो जाएंगे। जी, हां ट्रिलियन! अभी की दुनिया की कुल आबादी के 60 हजार गुना आबादी इस देश में होगी। तब एक भारतीय की जगह 4 लाख भारतीय होंगे।

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क्रांतिदूत: भारत, मुसलमान, राजनीति और वोटबैंक - संजय तिवारी
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