सहारनपुर के पुरातात्विक स्थल - डा. राधेश्याम द्विवेदी

हड़प्पा कालीन सकतपुर में खुदाई शुरु भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण आगरा मंडल के अधीक्षण पुरातत्वविद डा. भुवन विक्रम के अनुसार हड़प्पा काल...


हड़प्पा कालीन सकतपुर में खुदाई शुरु
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण आगरा मंडल के अधीक्षण पुरातत्वविद डा. भुवन विक्रम के अनुसार हड़प्पा कालीन सभ्यता में पहले मेरठ के आलमगीर स्थान को छोर माना गया था, लेकिन सहारनपुर में हुलास और बाड़गांव में मृदभांड मिलने के बाद दक्षिणी छोर पर मौजूद गांव में तांबे की कुठार मिलना एएसआई को आगे की खोज के लिए रास्ता दिखा रही है। भारतीय पुरातत्व आगरा आफिस में ही धूसर मृदभांड और तांबे की कुठार की सफाई की गई थी। माना जा रहा है कि हड़प्पा संस्कृति के कई और महत्वपूर्ण प्रमाण इस साइट पर उत्खनन से मिल सकते हैं। यहां बड़े हिस्से में उत्तर हड़प्पाकालीन मृदभांड और तांबे की कुठार मिली है। हमारी टीम उन अवशेषों की जांच कर ली है। अब यहां एक परीक्षण उत्खनन किया जा रहा है। यदि सकारात्मक प्रमाण मिले तो आगे खुदाई बढ़ाई भी जा सकती है। अब आगरा सर्किल के सहायक अधीक्षण पुरातत्वविद् डा. आरके सिंह के नेतृत्व में टीम ट्रेंच का उत्खनन करेगी। करीब 40 दिन तक काम चल सकता है। 

उजागर होंगे जमीन में दबे ऐतिहासिक राज:- सहारनपुर में पिछले साल गांव सकतपुर में भट्ठा मजदूरों द्वारा की जा रही मिट्टी की खुदाई में निकली हड़प्पा सभ्यता कालीन तांबे की कुठार (कुल्हाड़ी) मिलने के बाद से भारतीय पुरातत्व विभाग (एएसआई) के अधिकारी की टीम उत्खनन के लिए गांव पहुंच गई है। ऐसे में प्रशासनिक लापरवाही का शिकार होकर अपना वजूद खो रहे अन्य ऐतिहासिक स्थलों की सुध लिए जाने की भी उम्मीद बढ़ गई है। हड़प्पा संस्कृति के पुरावशेष सहारनपुर के गांव हुलास, बाड़गांव, नसीरपुर और अंबाखेड़ी में मिल चुके हैं। पहली बार रामपुर मनिहारान तहसील के गांव सकतपुर में तांबे की कुल्हाड़ी के साथ चार हजार साल पुराने मृदभांड मिले थे।

चार हजार साल पुराने मृदभांड की जांच के लिए आगरा से पहुंची एएसआई टीम तीन फुट खोदाई के बाद पता चला पूरे 4 एकड़ क्षेत्र में बिखरे पड़े हैं मृदभांड ईंट भट्टे के लिए मिट्टी निकालने को खोदाई की, लेकिन जमीन के नीचे मिल गया इतिहास का खजाना। सहारनपुर के गांव सकतपुर में हड़प्पा सभ्यता की तांबे की कुल्हाड़ी और मृदभांड मिले हैं। आगरा सर्किल के एएसआई अधिकारियों की टीम चार एकड़ में फैले इस क्षेत्र से 4 हजार साल पहले के पुरावशेषों को एकत्र कर आगरा ले आई है, जहां इनकी सफाई करके जांच की गई है। हड़प्पा संस्कृति के पुरावशेष यूं तो सहारनपुर के गांव हुलास, बाड़गांव, नसीरपुर और अंबाखेड़ी में मिल चुके हैं, लेकिन यह पहला मौका है, जब यमुना किनारे की जगह सहारनपुर के दक्षिणी हिस्से में मौजूद तहसील रामपुर मनिहारन के गांव सकतपुर में तांबे की कुल्हाड़ी के साथ चार हजार साल पुराने मृदभांड मिले हों। सकतपुर में हड़प्पा कालीन पुरावशेष मिलना एएसआई अधिकारियों को भी चौंका रहा है। दरअसल, हड़प्पा कालीन सभ्यता में पहले मेरठ के आलमगीर स्थान को छोर माना गया था, लेकिन सहारनपुर में हुलास और बाड़गांव में मृदभांड मिलने के बाद दक्षिणी छोर पर मौजूद गांव में ताम्रयुग की कुठार मिलना एएसआई को आगे की खोज के लिए रास्ता दिखा रही है। सहारनपुर प्रशासन के पत्र के बाद आगरा सर्किल के अधिकारी सहायक पुरातत्वविद डा. आरके सिंह और अर्खित प्रधान की टीम सकतपुर जाकर मृदभांड और ताम्र कुठार आगरा ले आई थी।

सरसावा का टीला खतरे में : - पश्चिमी उत्तर प्रदेश के महत्वपूर्ण क्षेत्र सरसावा का सिंधुकालीन टीला अतिक्रमण की जद में है। पड़ोसी किसानों ने इसका काफी हिस्सा काटकर इसे अपने खेत में मिला लिया है। इसी प्रकार नानौता क्षेत्र के गांव मनोहरा के पास स्थित हुलास स्थल भी खतरे में है। पहले तो इस पर पट्टे काट दिए गए और उसके बाद प्रशासन ने एक कदम आगे बढ़ते हुए इस पर बिजलीघर के भवन का निर्माण करा दिया। ग्रामीणों का कहना है कि कार्रवाई नहीं होने से धरोहरें खतरे में हैं। सरसावा टीले को कोट के नाम से जाना जाता है। कोट संस्कृत का शब्द है, जिसका हिंदी अर्थ किला है। यानी टीले के स्थान पर कभी किला रहा होगा। टीले से धूसर चित्रित मृदभांड के टुकडे़ मिलते रहे हैं। इनका प्रयोग आज से करीब साढ़े तीन हजार साल पहले होता था। टीले के ऊपरी हिस्से पर दीवारों को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। टीले की विशालता क्रिकेट मैदान जितनी है। पुरातत्व विभाग का मानना है कि जब भी टीले की खुदाई होगी तो इससे अनेक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आएंगे। 

वर्ष 1978 से 1993 तक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के पुरातत्वविद काशीनाथ दीक्षित के नेतृत्व में सहारनपुर के सरसावा टीले का उत्खनन कराया था। उत्खनन में इसका आकलन सिंधु घाटी कालीन स्थल के रूप में हुआ। पुरातत्व विभाग की टीम सरसावा के सिंधुकालीन टीले संरक्षित घोषित कर दिया था। 2013 में शोधार्थी और लेखक राजीव उपाध्याय यायावर ने टीले पर अतिक्रमण होने की शिकायत राज्य के पुरातत्व विभाग के निदेशक से की थी। शिकायत को गंभीरता से लेते हुए पुरातत्व विभाग की एक टीम टीले पर पहुंची थी, जिसने इसकी बाउंड्री कराकर इसे संरक्षित करने का आश्वासन दिया था, मगर उसके बाद आज तक इसके संरक्षण के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया है। 

हुलास संरक्षित नहीं:-सिंधुकालीन हुलास स्थल नानौता क्षेत्र के गांव मनोहरा के पास स्थित है, जिसका ऐतिहासिक महत्व है। कुछ साल पहले इस पर पट्टे काट दिए गए थे, जिसके बाद प्रशासन ने इसके बड़े हिस्से पर बिजलीघर के भवन का निर्माण करा दिया। समय-समय पर इस स्थल से ईंटें, सिलबट्टे, मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े, धातु के औजार आदि सामान मिलता रहा है, जो साढ़े चार हजार साल पुराना आंका गया है। इस सबके बावजूद हुलास स्थल को संरक्षित करने के लिए प्रशासन या अन्य किसी स्तर से कोई कदम नहीं उठाया गया है, जिसकी वजह से यह स्थल अपना वजूद खो रहा है।

 डा. राधेश्याम द्विवेदी
लेखक परिचय -  डा.राधेश्याम द्विवेदी ने अवध विश्वविद्यालय फैजाबाद से बी.. और बी.एड. की डिग्री,गोरखपुर विश्वविद्यालय से एम.. (हिन्दी),एल.एल.बी., सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी का शास्त्री, साहित्याचार्य तथा ग्रंथालय विज्ञान की डिग्री तथा विद्यावारिधि की (पी.एच.डी) की डिग्री उपार्जित किया। आगरा विश्वविद्यालय से प्राचीन इतिहास से एम..डिग्री तथा’’बस्ती का पुरातत्व’’ विषय पर दूसरी पी.एच.डी.उपार्जित किया। बस्तीजयमानवसाप्ताहिक का संवाददाता, ’ग्रामदूतदैनिक साप्ताहिक में नियमित लेखन, राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित, बस्ती से प्रकाशित होने वाले  ‘अगौना संदेशके तथानवसृजनत्रयमासिक का प्रकाशन संपादन भी किया। सम्प्रति 2014 से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण आगरा मण्डल आगरा में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद पर कार्यरत हैं। प्रकाशित कृतिःइन्डेक्स टू एनुवल रिपोर्ट टू डायरेक्टर जनरल आफ आकाॅलाजिकल सर्वे आफ इण्डिया” 1930-36 (1997) पब्लिस्ड बाई डायरेक्टर जनरल, आकालाजिकल सर्वे आफ इण्डिया, न्यू डेलही। अनेक राष्ट्रीय पोर्टलों में नियमित रिर्पोटिंग कर रहे हैं।

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सहारनपुर के पुरातात्विक स्थल - डा. राधेश्याम द्विवेदी
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