अनुलोम-विलोम काव्य राघवयादवीयम - संजय तिवारी

संस्कृत के अतिरिक्त दुनिया की किसी भाषा में यह क्षमता नहीं है। भाषा की इस क्षमता को अनुलोम - विलोम काव्य कहा जाता है। कांचीपुरम के 17...




संस्कृत के अतिरिक्त दुनिया की किसी भाषा में यह क्षमता नहीं है। भाषा की इस क्षमता को अनुलोम - विलोम काव्य कहा जाता है। कांचीपुरम के 17वीं सदी के कवि वेंकटाध्वरि रचित ग्रन्थ ‘राघवयादवीयम’ ऐसा ही एक अद्भुत ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ को ‘अनुलोम-विलोम काव्य’ भी कहा जाता है। पूरे ग्रन्थ में केवल 30 श्लोक हैं। इन श्लोकों को सीधे-सीधे पढ़ते जाएं, तो रामकथा बनती है और विपरीत (उल्टा) क्रम में पढऩे पर कृष्णकथा।

सृजन भारत की मौलिक पहचान है। सृजन ही यहां की संस्कृति है और इस सृजनात्मकता के कारण ही भारतीय आद्य साहित्य की अलौकिकता प्रमाणित होती है। भाषा, शब्द, वाक्य विन्यास, रस, छंद, अलंकार, समास, कारक, संधि, विभक्ति आदि व्याकरण के अंग है। भाषिक संरचना और सम्प्रेषणीयता के लिए भाषा के व्याकरण का बहुत महत्व है। आज दुनिया में हर भाषा अपनी वैयाकरणीय व्यवस्था के कारण ही स्थापित अथवा विमुक्त होती है। भारत का महाभाग्य है कि यहां संस्कृत जैसी समृद्ध भाषा विद्यमान रही है। यद्यपि आज यह प्रचलन में बहुत कम हो गयी है लेकिन इसकी विरासत इतनी समृद्ध है जो इसे कभी विलुप्त नहीं होने देगी। इस संस्कृत की क्षमता ही है जिसमें ऐसे काव्य की रचना भी संभव है जिसे एक शैर से पढऩे पर एक अलग अर्थ हो और दूसरे शैर से पढऩे पर दूसरा अर्थ निकलता हो। यह भी केवल अर्थ तक ही सीमित नहीं है बल्कि एक सिरा रामकथा के आख्यान बताये और दूसरा सिरा कृष्ण कथा सुनाये, जब की काव्य केवल एक है।

इस प्रकार हैं तो केवल 30 श्लोक, लेकिन कृष्णकथा के भी 30 श्लोक जोड़ लिए जाएं तो बनते हैं 60 श्लोक। पुस्तक के नाम से भी यह प्रदर्शित होता है, राघव (राम) + यादव (कृष्ण) के चरित को बताने वाली गाथा है-‘राघवयादवीयम।’

उदाहरण के तौर पर पुस्तक का पहला श्लोक है:

वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा य:।
रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे ॥ 1॥
अर्थात:
मैं उन भगवान श्रीराम के चरणों में प्रणाम करता हूं, जिनके हृदय में सीताजी रहती हैं तथा जिन्होंने अपनी पत्नी सीता के लिए सहयाद्री की पहाडिय़ों से होते हुए लंका जाकर रावण का वध किया तथा वनवास पूरा कर अयोध्या वापिस लौटे।

विलोमम्:

सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी भारामोरा:।
यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वन्देऽहं देवम् ॥ 1॥

अर्थात:

मैं रुक्मिणी तथा गोपियों के पूज्य भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में प्रणाम करता हूं, जो सदा ही मां लक्ष्मी के साथ विराजमान हैं तथा जिनकी शोभा समस्त जवाहरातों की शोभा हर लेती है।

‘राघवयादवीयम’ के ये 60 संस्कृत श्लोक इस प्रकार हैं-

राघवयादवीयम् रामस्तोत्राणि

वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा य:।
रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे ॥ 1॥
विलोमम्:
सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी भारामोरा:।
यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वन्देऽहं देवम् ॥ 1॥

साकेताख्या ज्यायामासीद्याविप्रादीप्तार्याधारा।
पूराजीतादेवाद्याविश्वासाग्र्यासावाशारावा ॥ 2॥
विलोमम्:
वाराशावासाग्र्या साश्वाविद्यावादेताजीरापू:।
राधार्यप्ता दीप्राविद्यासीमायाज्याख्याताकेसा॥ 2॥

कामभारस्स्थलसारश्रीसौधासौघनवापिका।
सारसारवपीनासरागाकारसुभूरुभू: ॥ 3॥
विलोमम्:
भूरिभूसुरकागारासनापीवरसारसा।
कापिवानघसौधासौ श्रीरसालस्थभामका ॥ 3 ॥

रामधामसमानेनमागोरोधनमासताम्।
नामहामक्षररसं ताराभास्तु न वेद या ॥ 4॥
विलोमम्:
यादवेनस्तुभारातासंररक्षमहामना:।
तां समानधरोगोमाननेमासमधामरा: ॥ 4॥

यन् गाधेयो योगी रागी वैताने सौम्ये सौख्येसौ।
तं ख्यातं शीतं स्फीतं भीमानामाश्रीहाता त्रातम् ॥ 5॥
विलोमम्:
तं त्राताहाश्रीमानामाभीतं स्फीत्तं शीतं ख्यातं।
सौख्ये सौम्येसौ नेता वै गीरागीयो योधेगायन् ॥ 5॥

मारमं सुकुमाराभं रसाजापनृताश्रितं।
काविरामदलापागोसमावामतरानते ॥ 6॥
विलोमम्:
तेन रातमवामास गोपालादमराविका।
तं श्रितानृपजासारंभ रामाकुसुमं रमा ॥ 6॥

रामनामा सदा खेदभावे दया-वानतापीनतेजारिपावनते।
कादिमोदासहातास्वभासारसा-मेसुगोरेणुकागात्रजे भूरुमे ॥ 7॥
विलोमम्:
मेरुभूजेत्रगाकाणुरेगोसुमे-सारसा भास्वताहासदामोदिका।
तेन वा पारिजातेन पीता नवायादवे भादखेदासमानामरा ॥ 7॥

सारसासमधाताक्षिभूम्नाधामसु सीतया।
साध्वसाविहरेमेक्षेम्यरमासुरसारहा ॥ 8॥
विलोमम्:
हारसारसुमारम्यक्षेमेरेहविसाध्वसा।
यातसीसुमधाम्नाभूक्षिताधामससारसा ॥ 8॥

सागसाभरतायेभमाभातामन्युमत्तया।
सात्रमध्यमयातापेपोतायाधिगतारसा ॥ 9॥
विलोमम्:
सारतागधियातापोपेतायामध्यमत्रसा।
यात्तमन्युमताभामा भयेतारभसागसा ॥ 9॥

तानवादपकोमाभारामेकाननदाससा।
यालतावृद्धसेवाकाकैकेयीमहदाहह ॥ 10॥
विलोमम्:
हहदाहमयीकेकैकावासेद्ध्वृतालया।
सासदाननकामेराभामाकोपदवानता ॥ 10॥

वरमानदसत्यासह्रीतपित्रादरादहो।
भास्वरस्थिरधीरोपहारोरावनगाम्यसौ ॥ 11॥
विलोमम्:
सौम्यगानवरारोहापरोधीरस्स्थिरस्वभा:।
होदरादत्रापितह्रीसत्यासदनमारवा ॥ 11॥

यानयानघधीतादा रसायास्तनयादवे।
सागताहिवियाताह्रीसतापानकिलोनभा ॥ 12॥
विलोमम्:
भानलोकिनपातासह्रीतायाविहितागसा।
वेदयानस्तयासारदाताधीघनयानया ॥ 12॥

रागिराधुतिगर्वादारदाहोमहसाहह।
यानगातभरद्वाजमायासीदमगाहिन: ॥ 13॥
विलोमम्:
नोहिगामदसीयामाजद्वारभतगानया।
हह साहमहोदारदार्वागतिधुरागिरा ॥ 13॥

यातुराजिदभाभारं द्यां वमारुतगन्धगम्।
सोगमारपदं यक्षतुंगाभोनघयात्रया ॥ 14॥
विलोमम्:
यात्रयाघनभोगातुं क्षयदं परमागस:।
गन्धगंतरुमावद्यं रंभाभादजिरा तु या ॥ 14॥

दण्डकां प्रदमोराजाल्याहतामयकारिहा।
ससमानवतानेनोभोग्याभोनतदासन ॥ 15॥
विलोमम्:
नसदातनभोग्याभो नोनेतावनमास स: ।
हारिकायमताहल्याजारामोदप्रकाण्डदम् ॥ 15॥

सोरमारदनज्ञानोवेदेराकण्ठकुंभजम्।
तं द्रुसारपटोनागानानादोषविराधहा ॥ 16॥
विलोमम्:
हाधराविषदोनानागानाटोपरसाद्रुतम् ।
जम्भकुण्ठकरादेवेनोज्ञानदरमारस: ॥ 16॥

सागमाकरपाताहाकंकेनावनतोहिस:।
न समानर्दमारामालंकाराजस्वसा रतम् ॥ 17॥
विलोमम्:
तं रसास्वजराकालंमारामार्दनमासन।
सहितोनवनाकेकं हातापारकमागसा ॥ 17॥

तां स गोरमदोश्रीदो विग्रामसदरोतत।
वैरमासपलाहारा विनासा रविवंशके ॥ 18॥
विलोमम्:
केशवं विरसानाविराहालापसमारवै:।
ततरोदसमग्राविदोश्रीदोमरगोसताम् ॥ 18॥

गोद्युगोमस्वमायोभूदश्रीगखरसेनया।
सहसाहवधारोविकलोराजदरातिहा ॥ 19॥
विलोमम्:
हातिरादजरालोकविरोधावहसाहस ।
यानसेरखगश्रीद भूयोमास्वमगोद्युग: ॥ 19॥

हतपापचयेहेयो लंकेशोयमसारधी:।
राजिराविरतेरापोहाहाहंग्रहमारघ: ॥ 20॥
विलोमम्:
घोरमाहग्रहंहाहापोरातेरविराजिरा:।
धीरसामयशोकेलं यो हेये च पपात ह ॥ 20॥

ताटकेयलवादेनोहारीहारिगिरासम:।
हासहायजनासीतानाप्तेनादमनाभुवि ॥ 21॥
विलोमम्:
विभुनामदनाप्तेनातासीनाजयहासहा।
ससरागिरिहारीहानोदेवालयकेटता ॥ 21॥

भारमाकुदशाकेनाशराधीकुहकेनहा।
चारुधीवनपालोक्या वैदेहीमहिताहृता ॥ 22॥
विलोमम्:
ताहृताहिमहीदेव्यैक्यालोपानवधीरुचा।
हानकेहकुधीराशानाकेशादकुमारभा: ॥ 22॥

हारितोयदभोरामावियोगेनघवायुज:।
तंरुमामहितोपेतामोदोसारज्ञरामय: ॥ 23॥
विलोमम्:
योमराज्ञरसादोमोतापेतोहिममारुतम्।
जोयुवाघनगेयोविमाराभोदयतोरिहा ॥ 23॥

भानुभानुतभावामासदामोदपरोहतं।
तंहतामरसाभक्षोतिराताकृतवासविम् ॥ 24॥
विलोमम्:
विंसवातकृतारातिक्षोभासारमताहतं।
तं हरोपदमोदासमावाभातनुभानुभा: ॥ 24॥

हंसजारुद्धबलजापरोदारसुभाजिनि।
राजिरावणरक्षोरविघातायरमारयम् ॥ 25॥
विलोमम्:
यं रमारयताघाविरक्षोरणवराजिरा।
निजभासुरदारोपजालबद्धरुजासहम् ॥ 25॥

सागरातिगमाभातिनाकेशोसुरमासह:।
तंसमारुतजंगोप्ताभादासाद्यगतोगजम् ॥ 26॥
विलोमम्:
जंगतोगद्यसादाभाप्तागोजंतरुमासतं।
हस्समारसुशोकेनातिभामागतिरागसा ॥ 26॥

वीरवानरसेनस्य त्राताभादवता हि स:।
तोयधावरिगोयादस्ययतोनवसेतुना ॥ 27॥
विलोमम्:
नातुसेवनतोयस्यदयागोरिवधायत:।
सहितावदभातात्रास्यनसेरनवारवी ॥ 27॥

हारिसाहसलंकेनासुभेदीमहितोहिस:।
चारुभूतनुजोरामोरमाराधयदार्तिहा ॥ 28॥
विलोमम्:
हार्तिदायधरामारमोराजोनुतभूरुचा।
सहितोहिमदीभेसुनाकेलंसहसारिहा ॥ 28॥

नालिकेरसुभाकारागारासौसुरसापिका।
रावणारिक्षमेरापूराभेजे हि ननामुना ॥ 29॥
विलोमम्:
नामुनानहिजेभेरापूरामेक्षरिणावरा।
कापिसारसुसौरागाराकाभासुरकेलिना ॥ 29॥

साग्र्यतामरसागारामक्षामाघनभारगौ:।
निजदेपरजित्यास श्रीरामे सुगराजभा ॥ 30॥
विलोमम्:
भाजरागसुमेराश्रीसत्याजिरपदेजनि। स
गौरभानघमाक्षामरागासारमताग्र्यसा ॥ 30॥

॥ इति श्रीवेङ्कटाध्वरि कृतं श्री।।

यह अद्भुत रचना केवल भारत और भारतीय साहित्य में ही संभव है। दुनिया की कोई भाषा इस तरह की काव्य रचना की क्षमता नहीं रखती। भारतीय भाषा विज्ञान के इस तत्व को समझने और वितरित करने की आवश्यकता इस लिए भी है क्योकि अब तो पश्चिम के आधुनिक विज्ञान ने भी संस्कृत की शक्ति का लोहा मान लिया है। उपरोक्त श्लोको को गौर से अवलोकन करें कि दुनिया में कहीं भी ऐसा ग्रंथ नही पाया गया  है।

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