प्रेम का पान्‍थिक कुचक्र : डॉ. मयंक चतुर्वेदी

प्रेम शब्‍द आनन्‍द की अनुभूति कराता है। प्रेम समर्पण का प्रतीक है। प्रेम का आशय सीधे तौर पर त्‍याग है। प्रेम प्रतिउत्‍तर में कोई अपेक्ष...


प्रेम शब्‍द आनन्‍द की अनुभूति कराता है। प्रेम समर्पण का प्रतीक है। प्रेम का आशय सीधे तौर पर त्‍याग है। प्रेम प्रतिउत्‍तर में कोई अपेक्षा नहीं करता, वह तो सिर्फ देने में और सतत देते रहने में ही अपना विश्‍वास करता है। प्रेम में त्‍याग का उदाहरण कैसा होता है, इसे सूरदास कुछ यूं समझाते हैं - प्रीति करि काहू सुख न लह्यो। प्रीति पतंग करी दीपक सों आपै प्रान दह्यो।। अलिसुत प्रीति करी जलसुत सों¸ संपति हाथ गह्यो।सारंग प्रीति करी जो नाद सों¸ सन्मुख बान सह्यो।। हम जो प्रीति करी माधव सों¸चलत न कछू कह्यो। जब एक दीपक से पतंग को प्रेम हो जाता है तो वह उसके लिए अपने प्राण त्‍यागने में संकोच नहीं करता । किंतु इसके साथ सत्‍य यही है कि प्रेम में पतंग और दीपक दोनों ही अपने सत्‍य को जानते हैं। दोनों ही अपने स्‍वभाव के अनुरूप व्‍यवहार करते हैं। पर अंत तक सत्‍य पर अडिग रहते हैं।

जब किसी स्‍त्री को या पुरुष को प्रेम होता है, तब फिर उसे कोई ज्ञान दे, तो उसका उत्‍तर कुछ इस तरह का होता है, जैसे की गोपियां उधो को देती हैं, उधो, मन न भए दस बीस।एक हुतो सो गयौ स्याम संग, को अवराधै ईस॥ सिथिल भईं सबहीं माधौ बिनु जथा देह बिनु सीस। स्वासा अटकिरही आसा लगि, जीवहिं कोटि बरीस॥ तुम तौ सखा स्यामसुन्दर के, सकल जोग के ईस। सूरदास, रसिकन की बतियां पुरवौ मन जगदीस॥

अर्थात् मन तो हमारा एक ही है, दस-बीस मन तो हैं नहीं कि एक को किसी के लगा दें और दूसरे को किसी और में। अब वह भी नहीं है, कृष्ण के साथ अब वह भी चला गया।..गोपियां कहती हैं,यों तो हम बिना सिर की-सी हो गई हैं, हम कृष्ण वियोगिनी हैं,तो भी श्याम-मिलन की आशा में इस सिर-विहीन शरीर में हम अपने प्राणों को करोड़ों वर्ष रख सकती हैं वास्‍तव में प्रेम के पथिक का भी कुछ यही हाल होता है। किंतु सोचनेवाली बात यह है कि जब प्रेम के नाम पर पान्‍थिक धोखा किया जाए। जिसे की दूसरा एक नाम दिया गया है लव जिहाद, तब अवश्‍य ही प्रश्‍न खड़े हो जाते हैं, आखिर इस प्रेम के पीछे की सच्‍चाई इतनी अधिक कड़वी क्‍यों है कि वह अपने साथ कई लोगों को सिर्फ दुख एवं अवसाद के अतिरिक्‍त अन्‍य कुछ और नहीं देती है।

सत्‍य पुरुष और श्रेष्‍ठ पुरुष के बारे में संस्‍कृत वांग्‍मय में आया है कि यथा चित्तं तथा वाचो यथा वाचस्तथा क्रियाः । चित्ते वाचि क्रियायांच साधुनामेक्रूपता ॥ इसके अर्थ को समझें तो अच्छे लोगों के मन में जो बात होती है, वे वही बोलते हैं और ऐसे लोग जो बोलते हैं, वही करते हैं. सज्जन पुरुषों के मन, वचन और कर्म में एकरूपता होती है। किंतु जब इस प्रेम में कपट हो, धोखा हो, संदेह हो, अविश्‍वास हो, स्‍वार्थ हो, लालच हो तब फिर यह प्रेम न सूरदास सा प्रेम रहता है और न ही राधा और मीरा, रैदास की तरह पवित्र प्रेम रहता है। वस्‍तुत: प्रेम तो सत्‍य पर ही आधारित है, इसलिए इसे अंत तक सत्‍य पर ही अडिग रहना होता है। लेकिन क्‍या ऐसा व्‍यवहार में हो रहा है ? तो कहा जाएगा, नहीं ऐसा नहीं हो रहा है। आज देश में अधिकांश जन इस पान्‍थ‍िक स्‍वार्थ प्रेरित प्रेम पर बोलने से बचते हैं, कहीं उनकी धर्मनिरपेक्षता खतरे में न आ जाए ? किंतु सत्‍य यही है कि जब त‍क इस विषय पर खुलकर नहीं बोला जाएगा, तब तक इससे संबंधित बुराइयाँ सुधरनेवाली नहीं हैं।

देश में वर्तमान में इस कुचक्रपूर्ण प्रेम का जो स्‍वरूप दिखाई दे रहा है, वह इतना भयावह है कि उसकी सत्यता जानने के बाद लगता है कि जितनी जल्‍दी इसे रोका जाए,उतना ही यह देश के बहुसंख्‍यक समाज के हित में होगा। इस पर कहा तो यह भी जा सकता है कि यह न केवल हिन्‍दू समाज के हित में है बल्कि यह मानवता के हित में भी है। क्‍योंकि अपनी जनसंख्‍या का घनत्‍व बढ़ाने के लिए प्रेम के नाम पर किसी स्‍त्री पर अत्‍याचार करना पूरी तरह पांथि‍क रूप से ही गलत नहीं मानवीयता के रूप में भी विद्रूपित है। लव जिहाद के विवादित मामले में दो वर्ष पूर्व इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया था। हाई कोर्ट ने कहा कि इस्लाम में आस्था और विश्वास के बिना मुसलमान युवक से शादी के लिए गैर-मुस्लिम युवती के धर्म परिवर्तन को वैध नहीं ठहराया जा सकता। इस तरह की शादियां कुरान के सुरा-2 आयत 221 के खिलाफ हैं। इसी प्रकार से इसाईयत भी कहती है। किंतु व्‍यवहार में ठीक इसके विपरीत हो रहा है। प्रेम करना बुरा नहीं है। लेकिन वह सत्‍याधारित तो हो ? अब तक उत्‍तरप्रदेश के सहारनपुर, शामली और मुजफ्फर नगर इलाकों में पिछले कई सालों से लगातार 'लव जिहाद' के 'वेरिफाइड' मामले सामने आए हैं, जिनकी संख्‍या हजारों में है। इसी प्रकार मध्‍यप्रदेश के भोपाल शहर का हाल है। हिमाचल प्रदेश, झारखण्‍ड और बिहार, पश्‍चिमबंगाल से लेकर दक्षिण के कई प्रदेशों के साथ यही बात देश के उन अन्‍य नगरों एवं महानगरों में लागू होती है जहाँ हिन्‍दुओं के अलावा इस्‍लाम एवं ईसाईयत पर विश्‍वास व्‍यक्‍त करने वालों की संख्‍या ज्‍यादा मात्रा में है।

भोपाल में प्रकाश में आया अभी का इससे जुड़ा हालिया मामला यह सोचने पर अवश्‍य विवश करता है कि प्रेम के नाम पर आदमी धोखा क्‍यों दे रहा है ? गौतम नगर थाने पहुंची एक महिला ने शादी के एक महीने के अंदर ही पति के खिलाफ धोखा देकर शादी करने और दहेज के लिए प्रताड़ित करने का मामला दर्ज कराते हुए सीधे शब्‍दों में कहा, 'सर! इसने मुझे धोखा दिया है। अपना धर्म बदलकर अपने आप को ब्राह्मण बताकर मुझसे शादी की। बाद में मालूम हुआ कि वह शर्मा नहीं मि‍स्‍टर मार्टिन एक ईसाई है।

भोपाल में प्रकाश में आया यह कोई एक मामला नहीं है। देशभर में चर्चा में रांची का तारा सहदेव लव-जिहाद मामला अभी भी लोगों को याद है, जिसमें कि रकीबुल हसन द्वारा तारा पर इस्लाम धर्म अपनाने का इस हद तक दबाव बनाया गया था कि उसके चुंगल से बाहर आना असंभव जैसा हो गया था । यदि वह नेशनल शूटर नहीं होती तो हो सकता है कि मामला कभी इतने बड़े स्‍तर पर प्रकाश में ही न आ पाता । तारा शाहदेव के पति रंजीत सिंह कोहली (रकीबुल हसन) पर पत्‍नी को प्रताड़ित करने के मामले में जांच कर रही सीबीआई ने जो चार्जशीट दाखिल की है। उसमें कई बातें सामने आई है। सीबीआई के अनुसार, रकीबुल और उसकी मां तारा शाहदेव से जबरन इस्‍लाम धर्म कबूल करवाने पर अड़े थे। तारा की सास ने उससे साफ कह दिया था कि, अगर इस्‍लाम कबूल नहीं किया तो तुम्‍हारा बिस्‍तर वही रहेगा लेकिन मर्द बदलते रहेंगे। तारा के सिंदूर लगाने पर भी पाबंदी थी। रकीबुल और उसकी मां सिंदूर लगाने पर हाथ-पैर तोड़ने की धमकी देते थे। तारा ने बताया, रंजीत उर्फ रकीबुल हसन उसे विवाह के लिए प्रभावित करने के कई हथकंडे अपनाता था। वह अफसरों के साथ महंगी गाड़ियों में शूटिंग रेंज पर आता और खुद को बेहतर इंसान दिखाने की हर संभव कोशिश करता था।

आज तारा जैसी कई ताराएं देशभर में मौजूद हैं जो नितरोज लवजिहाद के चंगुल में फंस रही हैं। पिछले वर्ष मंगोलपुरी क्षेत्र में रहनेवाली एक युवती ने ‘लव जिहाद’ से बचने के लिए अपनी जान दे दी। आत्महत्या से पहले लिखी चिट्ठी में जो कुछ उसने लिखा है, उससे साफ हो जाता है कि, युवती प्रेमी से बहुत तंग आ गई थी।

वस्‍तुत: कहना यही है कि जब प्रेम हो तो वह सशर्त न हो । वह पान्‍थ‍िक केनवास से बंधा न हो । जब इस तरह का प्रेम प्रसंग सामने आता है तो निश्‍चित रूप से उसमें से षड्यंत्र की बू आती है। प्रेम तो भ्रमणगीत जैसा होना चाहिए, जिसमें अपने प्रिय के मिलने और बियोग दोनों ही स्‍थ‍िति में निसि दिन बरषत नैन हमारे, सदा रहति बरषा रितु हम पर जब तें स्याम सिधारे॥ दृग अंजन न रहत निसि बासर कर कपोल भए कारे। कंचुकि पट सूखत नहिं कबहूं उर बिच बहत पनारे॥ आंसू सलिल भई सब काया पल न जात रिस टारे।

इस पद में श्री कृष्‍ण को यादकर गोपियां कहती हैं कि हे कन्हाई! तुम्‍हारी याद में हमारे नयन नित्य ही वर्षा के जल की भांति बरस रहे हैं अर्थात् तुम्हारे वियोग में हम दिन-रात रोती रहती हैं। रोते रहने के कारण इन नेत्रों में काजल भी नहीं रह पाता अर्थात् वह भी आंसुओं के साथ बहकर हमारे कपोलों (गालों) को भी श्यामवर्णी कर देता है। हे श्याम! हमारी कंचुकि (चोली या अंगिया) आंसुओं से इतनी अधिक भीग जाती है कि सूखने का कभी नाम ही नहीं लेती। फलत: वक्ष के मध्य से परनाला-सा बहता रहता है। इन निरंतर बहने वाले आंसुओं के कारण हमारी यह देह जल का स्त्रोत बन गई है, जिसमें से जल सदैव रिसता रहता है। वास्‍तव में यही तो सच्‍चा प्रेम है, और प्रेम की उच्‍चावस्‍था भी । काश, यह सभी ठीक से समझ लें तो कितना अच्‍छा हो ! देश में कहीं लवजिहाद न हो।

डॉ. मयंक चतुर्वेदी 

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प्रेम का पान्‍थिक कुचक्र : डॉ. मयंक चतुर्वेदी
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