हिन्दू मुस्लिम बैमनस्य का मूल कारण !

दासता के एक हजार वर्षों में हिन्दू , लगभग ८०० वर्ष इस्लामी, तुर्क, अफगान अथवा मुग़ल शासकों के अधीन रहे ! इस काल खंड में, अत्यंत कठोर वाता...

दासता के एक हजार वर्षों में हिन्दू , लगभग ८०० वर्ष इस्लामी, तुर्क, अफगान अथवा मुग़ल शासकों के अधीन रहे ! इस काल खंड में, अत्यंत कठोर वातावरण में भी, हिन्दुओं ने अपना संघर्ष जारी रखा ! १८वी शताब्दी के अंत तक, भारत के अधिकांश भाग से उन्होंने इस्लामी राज्य हटा दिया था ! तत्पश्चात हिन्दू और मुसलमान दोनों ही अंग्रेज शासकों के अधीन आ गए ! १८वी शताब्दी के बाद, हिन्दू संघर्ष मूलतः अंग्रेजी शासन के विरुद्ध हो गया ! अंग्रेजी शासन के विरुद्ध, सन १८५७ का असफल विद्रोह, जिसे पहला स्वतंत्रता संग्राम भी कहा जाता है, जैसे कुछ ही हिन्दू-मुस्लिम का संयुक्त प्रयास कहा जा सकता है !

१५ अगस्त का अर्थ क्या है ?

सन १८५७ के स्वातंत्र्य समर के दौरान, सुप्रसिद्ध मुसलमान नेता सर सैय्यद अहमद खान ने अत्यंत निष्ठा से अंग्रेजों की सेवा की, जिसके लिए ब्रिटिश साम्राज्य ने उन्हें सर की उपाधि प्रदान की ! सैय्यद ने अंग्रेजों का साथ इसलिए दिया था कि, उनकी सोच में, यदि १८५७ के युद्ध में अंग्रेज हार जाते तो भारत में पुनः हिन्दू राष्ट्र ही स्थापित होता और मुसलमानों का भविष्य अंधकारमय हो जाता ! उन्होंने, इस युद्ध में बहुत से अंग्रेजों के प्राण बचाए थे, और कई प्रसिद्ध मुसलमान नेताओं और जमींदारों को अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध में शामिल होने से रोका था ! इसलिए १९ वी शताब्दी के उतरार्ध से २० वी शताब्दी, (लगभग सन १८८० से सन १९४७ तक) तक अधिकाँश मुसलमानों ने अंग्रेजों का साथ दिया ! विडम्बना यह है कि हिन्दू जनमानस को यह लगा कि अंग्रेज शासन हटने के बाद कहीं पुनः दिल्ली की मुग़ल बादशाहत न कायम हो जाए ! शायद यही कारण रहा कि १८५७ का स्वातंत्र समर असफल हुआ ! 

खैर, जो भी हो, १५ अगस्त १९४७ को अंग्रेजी राज्य की समाप्ति पर, जहाँ हिन्दू नेताओं और बुद्धिजीवियों ने कहा भारत को एक हजार वर्षों की पराधीनता से मुक्ति मिली है, वहीँ मुसलमानों, जिन्हें उपहारस्वरूप पाकिस्तान की प्राप्ति हुई, ने कहा कि उन्हें तो हिन्दू प्रभुत्व से मुक्ति मिली है ! जो पाकिस्तान न जाकर भारत में रह गए, केवल उन मुसलमानों ने कहा कि उन्हें १५०-२०० वर्षों के अंग्रेजी शासन से मुक्ति मिली है !

सत्य यह है कि अंग्रेजों का भारत से जाना और खंडित भारत के प्रशासन की डोर कांग्रेसी नेताओं के हाथ में आना, मात्र सत्ता का हस्तांतरण था ! हिन्दू नेताओं ने इसे स्वतंत्रता मान कर एक महान भूल की ! इससे भी बड़ी भूल मुसलमानों द्वारा भारतीय इतिहास की व्याख्या कर निहित अर्थ समझने की है ! आज भी मुस्तिम दृष्टिकोण यह है कि अंग्रेजी राज्य से पहले लगभग ८०० वर्षों का तुर्की, मुग़ल अथवा अफगानी राज्य उनका अपना ही स्वर्ण युग था ! इस ऐतिहासिक विचार भिन्नता में ही हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य के बीज पड़े है, क्यूंकि हिन्दू इन्ही ८०० वर्षों को अपना सबसे अधिक त्रासपूर्ण कालखंड मानते है ! यही वह काल था, जब उन पर हिन्दू-धर्मी होने के कारण, जजिया नामक धार्मिक कर लगाया जाता था, उनके तीर्थ स्थानों पर जाने का कर, उनके व्यापारिक सामग्री पर दुगनी-तिगुनी चुंगी और उत्पादन कर लगाया जाता था ! इनके अलावा हिन्दुओं को अपमानित करने के और भी राजकीय प्रावधान थे ! धर्म-पंथ ही नहीं बल्कि यह ऐतिहासिक तथ्य ही हिन्दू-मुस्लिम विवाद की जड़ है ! यही अलगाववादी अवधारणा थी, जिसके कारण, विभाजन से पूर्व मुसलमानों ने पाकिस्तान की मांग उठाई और उनकी वर्तमान पीढ़ी शेष हिन्दू भारत को, छल, बल और अन्य उपायों से, विजय करने को उद्यत दिखाई देती है ! यदि धर्म-पंथ ही विवाद की जड़ होते, तो सबसे पहले हिन्दू-ईसाई, हिन्दू-पारसी, हिन्दू-यहूदी आदि झगडे हुए होते ! पर ऐसा नहीं हुआ ! जब भी हुए, हिन्दू-मुस्लिम दंगे !

मुग़ल-राज्य की वापसी का अभियान

कम्युनिष्ट और नेहरूवादी ‘सेक्युलर’ दस्ते यह सब अच्छी तरह जानते थे ! सन १९४७ से ही उनका पूर्णकालिक कार्य यह था कि ब्रिटिश राज्य से पूर्व इस्लामी राज्य को स्वशासन और सुशासन के रूप में प्रस्तुत किया जाए, और मुग़ल राज्य को तो भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग साबित किया जाए ! साथ ही उनका भरसक प्रयत्न था कि इस्लामी राज्य काल में हिन्दुओं पर हुए अत्याचारों को झूठा बताया जाए और हजारों हिन्दू मंदिरों को तोड़े जाने की घटनाओं के लिए तर्क दिया जाए कि यह मध्यकालीन राजनीति थी कि विजेता अपने पूर्ववर्ती शासक के धर्म स्थानों को भी नष्ट करते थे ! २० वी शताब्दी में हुए ‘महात्मा गांधी’ को राष्ट्रपिता बनाना उपरोक्त हिन्दू-विरोधी अभियान का सबसे आवश्यक अंग था ! हिन्दू-मुस्लिम विवाद सुलझाने की उनकी यही योजना थी ! नेहरूवादियों को प्रायः यह कहते सुना जा सकता है, “यदि सारे हिन्दू इस्लाम धर्म स्वीकार कर लें तो इसमें हर्ज ही क्या है ? अंततः ईश्वर एक है ! चाहे उसे किसी भी नाम से पुकारो !”

एक बार एक बैठक में किसी ने जवाहर लाल नेहरु से पूछा “श्रीमान यदि सारे हिन्दू मुसलमान हो जाएँ तो आप क्या कहेंगे ?” नेहरु ने कहा, “कोई हर्ज नहीं, यदि स्वेच्छा से सब मुसलमान हो जाए !” उसी समय एक अन्य व्यक्ति पूछ बैठा. “श्रीमान यदि सब हिन्दू हो जाएँ तो ?” तत्काल उत्तर आया, “नहीं, नहीं; इससे तो भारत की विविधता नष्ट हो जायेगी !” किन्तु इससे भी मुस्लिम मानस को संतोष नहीं हुआ ! इसलिए १५ अगस्त सन १९८८ को दिल्ली के लाल किले से भाषण देते हुए तत्कालीन नेहरु-गाँधी परिवार के राजीव गांधी ने भारत के प्रधानमंत्री के रूप में घोषणा कि ; “हमारा प्रयत्न होना चाहिए कि हम इस देश को उस ऊंचाई तक ले जाएँ जहाँ यह २५०-३०० वर्ष पूर्व था, जिसके पूर्व विश्व के लोग, (अंग्रेज, फ्रांसीसी, पुर्तगाली आदि) भारत को ढूँढने निकले !” इतिहास के विद्यार्थी जानते है कि २५०-३०० वर्ष पूर्व भारत में मुगलवंश के क्रूर शासक ओरंगजेब का शासनकाल था ! यह जानते हुए कि भाषण का यह अंश सरासर मुगलिया व इस्लामी राज्य के पक्ष में और अधिकाँश हिन्दुओं को भड़काने वाला था, सदा से नेहरु-भक्त समाचार पत्रों ने इसे नहीं छापा ! हमने इसे अपने कानों से सुना था, सो इधर-उधर बहुत हाथ पैर मारने के बाद यह अंश, भारत सरकार के प्रचार विभाग की एक पुस्तिका “रैस्टोर इंडियाज ग्लोरी विथ स्ट्रेंग्थ” ( No. 1/24/88. pp-3) में मिला, जो अगस्त १९८८ में छपी थी !

खतरे की घंटियाँ

अल्पसंख्यक (मुसलमान-ईसाई) उन्मुख भारत का संविधान, और सभी राजनैतिक दलों की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति, राष्ट्रवादी हिन्दुओं के लिये घोर संकट की घंटियाँ जोर-जोर से बजा रही है ! किन्तु हिन्दू राष्ट्रवादी स्वयं बिखरे और भटके हुए है ! वे रो रहे है, चिल्ला रहे है, पर यह नहीं जानते कि क्या करें, कहाँ से शुरू करें ? यह समझना आवश्यक है कि हिन्दुओं के सामने आज जैसी संकट की घडी इतिहास में कभी नहीं आई ! मध्य युग में राजाओं और सुल्तानों के बीच युद्ध होते थे ! किन्तु आज हमारे सामने जो युद्ध है, वह विरोधी सभ्यताओं व जीवन मूल्यों के टकराव का है ! इसलिए बिना उद्देश्यपूर्ण अखिल भारतीय हिन्दू जनजागरण और सामूहिक प्रयत्नों के दिनों दिन बढ़ते जा रहे इस्लामी आक्रमण से पार पाना अत्यंत कठिन है, विशषकर इसलिए कि कम्युनिष्ट और ‘सेक्युलरवादी’ हिन्दू भी साम्राज्यवादी इस्लाम के संरक्षक और समर्थक है !

किन्तु, हिन्दू समाज को, सामूहिक रूप से, राष्ट्रीय ध्येय के लिए, बिना एक राष्ट्रीय संपर्क भाषा के जागृत करना असंभव है ! यह भाषा वही हो सकती है जो उच्चवर्गीय महानुभावों को ही नहीं, बल्कि आम गलियों, मोहल्लों में रहने वालों को, गगन-चुम्बी इमारतों से लेकर झुग्गी झोपडी तक में रहने वालों को जोड़ सके ! वह भाषा अंग्रेजी नहीं, हिंदी ही हो सकती है ! परन्तु अत्यंत दुःख की बात है कि अनेक सेक्युलर दलों, जिनमे हिन्दू द्रोही भी गिने जा सकते है, ने बड़ी चतुराई से हिन्दू बुद्धिजीवियों को हिन्दू-विरोधी तथा उत्तर-दक्षिण, आर्य-द्रविण, संघर्षों में फंसा दिया है ! मजे की बात तो यह है कि ठीक उन्ही दिनों लोगों ने अलगाववादी मुसलमानों को ही प्रोत्साहन देने के लिए उर्दू और इस्लामी शरियत क़ानून को प्रोत्साहन दिया ! यही दो चीजें केरल से कश्मीर तक और उत्तर-पूर्वी भारत से गुजरात तक के मुसलमानों को एकजुट करती है और गैर-मुसलमानों से अलगाववाद की प्रवृति को बढ़ावा देती है !

हिन्दुओं के मुख्य संकट

आज हिन्दू-भारत के सामने मुख्य रूप से पांच संकट है जैसे – (१) इस्लामी (सुन्नी) कट्टरवाद और उस पर आधारित आतंकवाद, (२) अंग्रेजी भाषा का साम्राज्यवाद, (३) आदिवासी क्षेत्रों में ईसाई मिशनरियों की गतिविधियाँ, (४) विभिन्न नामों और रूपों में सेक्युलरवादी संगठन और (५) हिन्दुओं की आंतरिक फूट और अपनी नाक से आगे देखने से परहेज ! इनमे से इस्लामी आतंकवाद सबसे बड़ा और सबसे अधिक घातक है ! सेक्युलर दल इसे हर प्रकार की सहायता कर रहे है ! ईसाई मिशनरियों का ख़तरा है अवश्य, पर इतना बड़ा नहीं ! भारत से बाहर तो इस्लामी और ईसाई शक्तियों का आपस में गहरा द्वेष है !

फिर क्या किया जाए

अरब मूल के इस साम्राज्यवादी इस्लाम रुपी राक्षस को समाप्त करने के लिए इसकी शक्ति, इसका शक्ति स्त्रोत और उसके अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञान आवश्यक है ! संक्षेप में, कुरआन आधारित युद्ध नीति इसकी आधारशिला है; मस्जिदें और मदरसे इसके शक्ति-स्त्रोत है, हजरत मोहम्मद पर अंधविश्वास इसका शक्ति पुंज है ! मदरसा शिक्षित युवक, खनिज तेलों के मालिक, बड़े बड़े शेखों द्वारा दिया गया और जकात के नाम पर इकठ्ठा किया गया अथाह धन तथा हर ओर से, यानि क्रय, चोरी या उधार से प्राप्त किये हथियार, इसके शस्त्रागार है !

इन सबकी बराबरी करने के लिए सर्वप्रथम हिन्दुओं को अपने आप में देश और धर्म की रक्षा के लिए मरने-मारने की मानसिकता जागृत करनी होगी ! यह स्वभाव हिन्दुओं के आर्य पूर्वजों में था जो कि २०वीं शताब्दी में नष्ट-प्राय हो गया है !

१४वी शताब्दी में खूंखार लुटेरे तैमूरलंग के पास दिल्ली गाजियाबाद आने तक भारतीय युद्धबंदियों की संख्या एक लाख हो गयी थी ! तैमूरलंग ने आज्ञा दी कि १५ वर्ष से अधिक, आयु वालों का वध कर दिया जाए ! यथा संभव जल्दी जल्दी काम निपटाने के लिए प्रत्येक सैनिक को १०-१० बंदी दे दिए गए ! सैनिकों में एक सैयाद भी था जिसने कभी एक मुर्गी की भी ह्त्या नही की थी ! उसने प्रार्थना की कि इस नर वध से उसे मुक्त किया जाए ! उसकी प्रार्थना सुन कर तैमूरलंग ने कहा “यदि सैय्यद यह काम नहीं करता है तो यह दस बंदी और सैय्यद भी  किसी अन्य सैनिक को वध करने को दे दिया जाए !” यह फैसला सुनकर स्वयं सैय्यद ने उन १० बंदियों का वध किया ! ऐसा न करता तो स्वयं उसका वध हो जाता ! ऐसे ही, यदि आताताई का वध करने के लिए हिन्दू नहीं उठता है तो स्वयं उसका और उसके परिवार का वध निश्चित है !

हिंदुत्व की अवधारणा को सुस्पष्ट और आम आदमी की समझ में आने वाली व्याख्या देनी होगी ! यह बताना होगा कि हिंदुत्व की अवधारणा में व्यक्ति का, परिवार का, समाज का, राष्ट्र का और राज्य का क्या स्थान है, क्या महत्त्व है ! ये सब धर्म के अंग है ! उन सबकी समुचित व्याख्या वेदों, रामायण, महाभारत, गीता, कौटिल्य के अर्थशास्त्र आदि में है ! हिन्दू-बुद्धिजीवियों को उन्हें एक बार फिर से देखने दिखाने की आवश्यकता है ! श्रीमद्भागवत गीता जो महाभारत का ही एक भाग है, धर्मयुद्ध में प्रवृत होने का पाठ पढ़ाती है ! धर्म युद्ध से विमुख हो, पलायन कर रहे अर्जुन को फिर से युद्ध की और प्रेरित कर उसे विजयश्री दिलाने वाला यही गीता ज्ञान है ! आज फिर हिन्दू समाज महाभारत पूर्व की स्थिति में खड़ा है ! 

सन्दर्भ-वश यह बताना आवश्यक है कि धर्मयुद्ध में प्रवृत होने का गीता का पाठ, न्याय एवं स्वाधिकार प्राप्त करने के लिए है, न कि दुसरे के अधिकार में हस्तक्षेप करने के लिए और इस अर्थ में यह कुरआन के जिहाद वाले सिद्धांत से बिलकुल भिन्न है, जो अरब साम्राज्य को फैलाने, दारुल-हर्ब को दारुल-इस्लाम बनाने या ‘काफिर’ की संज्ञा देकर गैर-मुसलमानों की ह्त्या करने की प्रेरणा देता है !

पिछले ५० से अधिक वर्षों से गांधी जी की अनर्थकारी अहिंसा और जवाहर लाल नेहरु की ‘धर्मनिरपेक्षता’ से अभिभूत, हिन्दू धर्माचार्य अपने ही धर्मग्रंथों की घोर अवहेलना कर रहे है ! उनका सारा बल आत्मा-परमात्मा अथवा आत्म चिंतन पर ही केन्द्रित है ! शायद ही वे कभी अपने शिष्यों और श्रोताओं को अपने समाज, राष्ट्र के प्रति, अपने अपने कर्तव्य पालन की शिक्षा देते है ! आज हिन्दू भारत को गांडीवधारी योद्धा अर्जुनों की आवश्यकता है, न कि ढोल मंजीरा लेकर नाचने गाने वाले वृहन्नलाओं की ! हिन्दू बुद्धिजीवियों को अकर्मण्यता छोड़, कर्मठता की राह पर आना परमावश्यक है !

धनी मानी हिन्दू और धर्म गुरु

व्यवहारिक धरातल पर धनी मानी हिन्दुओं और धर्म-गुरुओं को अपने निजी मान-सम्मान, जाती, सम्प्रदाय आदि से ऊपर उठकर हिन्दू जनता के बीच विचरण करना चाहिए; उन्हें उनकी भाषा में ज्ञान देना चाहिए, उनमे नैतिक बात और भौतिक संतोष का संचार करते हुए उन्हें राष्ट्रीय क्रियाकलापों में भागीदार बनाना चाहिए ! धनी-मानी व्यक्तियों पर नैतिक और कर्त्तव्य बोध का दवाब पड़ना चाहिए कि वे विलासिता, पंच-तारा मंदिरों-महलों के निर्माण, अनावश्यक और खर्चीले विवाह-जन्मदिन आदि की पार्टियों में धन लुटाने की बजाय हिन्दू-समाज और हिन्दू राष्ट्र के हित में लगायें तथा दान दें ! भारत विभाजन से कुछ वर्ष पहले, एक गाँव के मुखिया ने हिन्दू और मुसलमान का भेद यूं समझाया था – ‘यदि एक हिन्दू अमीर हो जाए तो वह तत्काल अच्छे अच्छे वस्त्राभूषण खरीदेगा, किन्तु एक मुसलमान अमीर होते ही सबसे पहले बन्दूक खरीदेगा ! सच यह है कि हिन्दुओं को भी बन्दूक और गोली-बारूद चलाना सीखना चाहिए ! उन्हें भी अपनी रक्षा पंक्ति दृढ करनी होगी और प्रतिरक्षा दस्ते बनाने होंगे !

श्रीमदभागवत गीता का अंतिम श्लोक है –

“यत्र योगेश्वरो कृष्णः यत्र पार्थो धनुर्धरः |
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम || (१८ : ७८)

अर्थात, जहाँ योगिराज श्री कृष्ण और गांडीवधारी अर्जुन है, वहीँ कल्याण है, विजय है ! यही नीति कहती है और मेरा भी यही मत है !’ तात्पर्य यह है कि विजयी होने के लिए, सिद्धांत के साथ शक्ति का समन्वय आवश्यक है !
हिन्दू, अपनी सोच और क्रिया में, सौ वर्षों से भी अधिक पिछड गए है ! सर सैय्यद अहमद खां ने मुस्लिम अलगाववाद तथा पाकिस्तान की नींव १९ वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में रख दी थी ! उसने यह अलगाववादी प्रक्रिया सन १८५७ में ही शुरू कर दी थी, जब जब उत्तर प्रदेश के हिन्दुओं ने तत्कालीन ब्रिटिश सरकार से देवनागिरी में लिखी हिंदी को, उर्दू के स्थान पर, राजभाषा बनाने की मांग की थी, तब सैय्यद महोदय ने हिंदी के विरोध और फ़ारसी लिपि में लिखी उर्दू के पक्ष में एक महान अभियान छेड़ दिया था ! उस समय यह भाषा सरकारी दफ्तरों और हाई कोर्ट से नीचे की अदालतों और थानों में प्रयुक्त होती थी ! सन १९०० में (सैय्यद के देहावसान के दो वर्ष बाद) उत्तर प्रदेश के लेफ्टिनेंट गवर्नर ए. मेक्डोनल ने हिंदी भाषा के प्रयोग की अनुमति दे दी ! शीघ्र ही सर सय्यद द्वारा स्थापित मेयो कॉलेज जो बाद में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी बनी, के अध्यापकों और मुस्लिम कर्मचारियों ने हिंदी के विरोध में आंदोलन चला दिया ! थोड़े समय बाद अंग्रेजों ने इन्हीं आंदोलनकारियों को सन 1906 में मुस्लिम लीग बनाने के लिए प्रयुक्त किया ! यह मुस्लिम लीग सन 1805 में अंग्रेजों द्वारा किए गए बंगाल विभाजन के विरुद्ध हिंदी आक्रोश की पुष्ठभूमि में बनाई गई थी ! हिंदी उर्दू विवाद के संदर्भ में सर सैयद अहमद खान का निम्नलिखित लेखन महत्वपूर्ण है -

" में, श्री शेक्सपियर, (तत्कालीन बनारस के कमिश्नर), से मुस्लिम शिक्षा के विषय पर बात कर रहा था । मैंने उत्तर दिया कि मुझे विश्वास है कि जहां भी सामूहिक प्रयत्न की आवश्यकता होगी हिंदू और मुसलमान यह दो समुदाय एक साथ मिलकर काम नहीं कर सकते, यद्यपि आज यह जातीय विरोध इतना गंभीर नहीं है फिर भी मेरे विचार में यह विरोध बढ़ेगा, मैंने उसे आश्वस्त किया कि जो कोई कुछ अधिक काल तक जीवित बचेगा वह मेरी भविष्यवाणी की सत्यता को देख सकेगा ( अल्ताफ हुसैन हाली रचित, हयात-इ-जावेद और एच. कादरी तथा डेविड मैथ्यू द्वारा अनुदित व इदाराह-इ-अदाबियात-इ-दिल्ली ६, पृ. 100) ! उपरोक्त भविष्यवाणी सन 1940 मैं सत्य सिद्ध हुई जब मुसलमानों की ओर से मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग उठाई।

पहला काम

व्यवहारिक दृष्टि से हिंदुओं को सबसे पहले सेक्युलरिस्टों से निपटना चाहिए क्योंकि यही हिंदू समाज के पंचमांगी या देशद्रोही है और यह वर्ग अदृश्य रूप से शत्रु पक्ष से मिला हुआ है ! युद्ध काल में यह पांचवा दस्ता सबसे अधिक विनाशकारी होता है सो सेक्युलरिस्टों को या तो सही राह यानी हिंदू राष्ट्र की धारा में लाया जाए या उनका सफाया किया जाए ! मुसलमानों में सुन्नी और शिया मुसलमान के भेद को जानना भी आवश्यक है, इसी प्रकार ईसाई समाज और धर्मांतरण करने कराने वाली ईसाई मिशनरियों में भी बहुत अंतर है ! विश्व के अन्य भागों में ईसाई समाज स्वयं इस्लामी आतंकवाद का शिकार है ! आपसी बातचीत अथवा कूटनीति द्वारा उन्हें इस्लामी कट्टरपंथियों से अलग किया जा सकता है ! हिंदुओं को स्वयं अपने सूचना केंद्र और जासूसी तंत्र विकसित करने की आवश्यकता है, इसका परस्पर तालमेल भी आवश्यक है ! इसके अभाव में हिंदू प्रतिक्रिया या तो होती नहीं है और यदि होती भी है तो बहुत देर से और अपर्याप्त ! इसके विपरीत मुस्लिम प्रतिक्रिया तत्काल और प्रभावी होती है ! हर मामले में हिंदुओं का सरकार पर भरोसा करना पुलिसिया फौजी कार्यवाही की आशा करना बुद्धिमानी नहीं कमजोरी की निशानी है !

वे लोग जो यह समझते हैं कि हिंदुत्व पिछले 5000 वर्षों के अनेक उतार-चढ़ाव झेल चुका है और उसे भविष्य में भी कोई खतरा नहीं है वह शेखचिल्ली की दुनिया में रह रहे हैं ! हमारी ही आंखों के सामने 1947 में अखंडित भारत के तिहाई भाग से हिंदू धर्म मिट गया शेष भारत में भी हिंदू और हिंदी शब्द अपमान कारी हो गए हैं, इसलिए या तो हिंदू अपने खोए हुए गौरव को पुनः प्राप्त करें या शेष भारत से भी मिट जाने के लिए तैयार रहे !

जिस मुस्लिम लीग ने भारत का विभाजन मांगा था और फलस्वरुप पाकिस्तान ले बैठी, उसे और उसकी कट्टर समर्थक कम्युनिस्ट पार्टी को हिंदू भारत में तो स्थान ही नहीं मिलना चाहिए था, परंतु भाग्य की विडंबना यह है कि भारतीय राजनीति में इन्ही दो का वर्चस्व है | वास्तव में कांग्रेस (या संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन) के छद्म नाम से इन्हीं का राज्य चल रहा है ! हाल ही 21-22 दिसंबर 2005 को संसद द्वारा 104 वां संविधान संशोधन विधेयक पास होना इसका ताजा प्रमाण है ! इसके अंतर्गत निजी शिक्षण संस्थाओं में भी अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए तो आरक्षण होगा किंतु अल्पसंख्यक अर्थात मुस्लिम और ईसाई शिक्षण संस्थाएं इस से मुक्त रहेंगी !

हिन्दू पराजय के मुख्य कारण

समय-समय पर विभिन्न इतिहासकारों ने विदेशी आक्रमणकारियों के समक्ष हिंदू राजाओं की हार के अनेको अनेक कारण गिनाये हैं, यथा, पुराने पड़ चुके हथियार भाग्यवाद और हिंदुओं की ‘निष्काम कर्म’ की अवधारणा, जिसका अर्थ है ‘कर्म करो फल की चिंता मत करो’ आदि – आदि !

हिंदू इतिहास के गहन और विवेकपूर्ण अध्ययन से पता चलेगा कि हिंदुओं के विदेशी शक्तियों के साथ टकराव के दो भिन्न कालखंड हैं - एक इस्लाम के पदार्पण से पहले और दूसरा इस्लाम के बाद ! कम से कम महात्मा गौतम बुद्ध (छठी शताब्दी ईसा पूर्व) से ईशा की सातवीं शताब्दी तक (लगभग 1300 वर्ष), अधिकांश विदेशी आक्रमणकारी या तो पहली लड़ाई में ही मार दिए गए या खदेड़ दिए गए ! जो बचे रह गए, जिन्होंने भारत के कुछ भू-भागों पर अधिकार भी कर लिया, उन्हें आगामी युद्धों में परास्त कर दिया गया या उन्हें हिंदू धर्म में दीक्षित कर हिंदू समाज का अंग बना लिया ! यहां तक कि इस्लाम पूर्व किसी भी विदेशी आक्रांता का यहां नामोनिशान नहीं है !

1. केंद्रीय सत्ता का अभाव - ई. सन 647 में महाराजा हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद यह हिंदू राष्ट्र बीसियों राज परिवारों में बट गया, जो सदा आपस में ही लड़ते मरते रहे ! कोई केंद्रीय सत्ता नहीं रही जो इन छोटे बड़े राजघरानों को बांध कर रख सके और विदेशी आक्रमणकारियों को मुंहतोड़ उत्तर दे सके ! यही सर्वप्रथम कारण था कि इस्लामी आक्रमणकारियों के आगे एक-एक कर हिंदू राजाओं का हारते जाना और इस्लामी राज्य सत्ता का दिनों-दिन बढ़ते जाना ! यहां तक कि कभी कभी तो भारत का ही कोई राजा विदेशी आक्रांता के साथ हो जाता था ! इसी क्रम में तुर्क अफगान व मुगल आक्रमणकारी आते गए और शासक बनते गए !

2. इस्लामी राजनीति और जिहादी अवधारणा का अज्ञान – मुहम्मदी धर्म पंथ ने एक नई ही प्रकार की युद्ध नीति का सूत्रपात किया था, जिससे हिंदू राजा अनभिज्ञ थे ! यह युद्धनीति, धर्म और राजनीति का विचित्र मिश्रण थी जिसकी परिणिति ‘जिहाद’ में हुई ! इस जिहाद का सबसे प्रबल अस्त्र था ‘आतंकवाद’ ! यह आज भी विद्यमान है ! पाकिस्तानी ब्रिगेडियर, एस. के. मलिक ने अपनी विश्व प्रसिद्ध पुस्तक ‘द कुरानिक कांसेप्ट ऑफ वार’ मैं इस जिहादी आतंकवाद को विस्तार से समझाया है ! इसका समुचित उत्तर महान ग्रंथ महाभारत से मिल सकता था, पर उसे पढ़ना और आचरण तो दूर उसे घर में रखना भी अपशकुन समझा जाने लगा ! इसका कारण एक अंधविश्वास है कि जहां यह ग्रंथ होगा वहां गृह युद्ध अवश्य होगा ! सैकड़ों वर्गों, जातियों, उप जातियों तथा अगणित संप्रदायों में बटा हिंदू समाज अपने वैदिक मूल्य से बहुत दूर जा चुका है !

3. युद्ध से पलायन की प्रवृति - हिंदू समाज के सैकड़ों वर्गों, जातियों व उप जातियों में से शत्रु से युद्ध करने का काम एक छोटे व विशेष समुदाय को सौंप दिया गया, जिसे ‘क्षत्रिय’ कहा जाता था ! दूसरी ओर प्रत्येक मुसलमान अनिवार्य रूप से पहले इस्लाम का योद्धा है !

भारत में पहला इस्लामी राज्य (अल्पकाल के लिए) सन 712 में एक अरब आक्रांता मोहम्मद बिन कासिम ने सिंध के हिंदू राजा दाहिर को परास्त कर के स्थापित किया था ! कम ही लोगों को ज्ञात होगा कि सन 712 से पहले राजा दाहिर 13 बार अरब आक्रमणकारियों को हराकर खदेड़ चुका था ! 14 वीं बार जब राजा दाहिर हारा तो वीरता, रणकौशल या हथियारों की कमी नहीं बल्कि अपने ही कुछ विश्वस्त व्यक्तियों के विश्वासघात से हारा ! 50 वर्षों के भीतर ही पड़ोस के ही हिंदू राजाओं जैसे चालुक्य, प्रतिहार और करकोटा ने इस अरब राज्य को उखाड़ फेंका !

चौदहवीं शताब्दी के आरंभ में दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु के बाद उसके ही एक सेनापति खुसरो खान ने खिलजी के पुत्र की हत्या कर दी और वह स्वयं गद्दी पर बैठ गया ! वह संभवतः मजबूरी में एक निम्न जाति के हिंदू परिवार से मुसलमान बना था, उसमें अब भी अपने पुराने हिंदू धर्म का आवेग भरा था ! उसने फिर से हिंदू राज स्थापित करने का प्रयत्न किया ! 6 महीने तक उसने, बिना पुनः हिंदू धर्म में दीक्षित हुए, एक हिंदू राजा के समान राज किया, किंतु उसे ना किसी हिंदू राजघराने से सहायता या समर्थन मिला, ना हिंदू धर्माचार्यों से ! इस बीच, मुस्लिम उलेमाओं के निर्देशन में सभी मुसलमान नवाब और तालुकेदार संगठित हो गए ! उन्होंने एक साथ खुसरो खान पर हमला बोल दिया भीषण युद्ध में घेर कर उसकी हत्या कर दी गयी !

4. विश्वासघात एवं राजद्रोह - इतिहास के विद्यार्थी 1526 ई. की पानीपत की पहली लड़ाई के बारे में जानते है कि इस युद्ध मैं तोपों के बल पर बाबर ने इब्राहिम लोदी पर विजय प्राप्त की थी ! भारत भूमि पर तोप का प्रयोग सर्वप्रथम बाबर ने किया था, किंतु यह तथ्य बहुत कम लोग जानते हैं कि सन 1556 में अकबर और हेमू के बीच लड़े गए पानीपत के दूसरे युद्ध के समय तोपखाना अकबर के पास नहीं बल्कि हेमू अर्थात हेमचंद्र विक्रमादित्य के पास था, किंतु हेमू के इस तोपखाने के तोपची मुसलमान थे ! युद्ध से एक दिन पहले वह विश्वासघात करके तोपखाना लेकर अकबर की ओर चले गए ! इतने पर भी हेमू बड़ी बहादुरी से लड़ा ! दोपहर बाद वह युद्ध जीतने ही वाला था कि पास से चलाया गया किसी का तीर उसकी एक आंख में जा लगा ! यह तीर उसके मस्तिष्क को भेजता हुआ खोपड़ी के बाहर आ गया ! अनुमान होता है कि हेमू के अपने पक्ष के किसी भेदी ने ही यह तीर चलाया होगा, क्योंकि दूर से मारा गया तीर इतनी तीव्रता से खोपड़ी चीरकर बाहर नहीं आ सकता ! एक बार फिर विश्वासघात ने रंग दिखाया और भारत के इतिहास की धारा बदल दी !

इस प्रकार पिछले लगभग एक हजार वर्षों में हिंदू पराजय के मुख्य कारण थे : - (1) कुरान आधारित युद्धनीति की अनभिज्ञता; (2). जन्मजात कठोर विभेदकारी जाति व्यवस्था; (3). बेहिसाब धर्म पंथ और उनके अर्थ हीन व बोझिल कर्मकांड; (4). अपर्याप्त गुप्तचर व्यवस्था; (5). विश्वासघात तथा (6). सही नेतृत्व की कमी ! इन सबके ऊपर कमी थी, एक केंद्रीय राष्ट्रीय सरकार की, जैसे चंद्रगुप्त मौर्य (322 वर्ष ईसा) से लगाकर गुप्त वंश के महान शासकों के काल (चौथी से छठी शताब्दी) तक रही थी !

उपरोक्त सभी कमियां आज भी हिंदू समाज में व्याप्त हैं ! हिंदुओं ने 20 वी शताब्दी में गांधी को अपना अवतार मान लिया ! उसे हिंदुओं की उपरोक्त कमजोरियां मालूम थी किंतु उसे लगा कि वह इन्हें दूर करने योग्य नहीं है ! इन कमियों की पूर्ति उसने मुसलमानों के जिहादी अंश से करनी चाहिए ! उसने सोचा कि हिंदुओं का संख्याबल और मुसलमानों की इस्लामी तलवार मिलकर ब्रिटिश साम्राज्य को ध्वस्त कर देंगे ! इसी विचार से गांधी ने सन 1922 में खिलाफत आंदोलन छेड़ा, किंतु उसका यह प्रयोग उल्टा पड़ा ! उसके कुछ ही समय बाद मुसलमानों ने अंग्रेजों से हाथ मिला लिया और हिंदुओं की हत्याएं करने लगे ! खिलाफत आंदोलन भारत विभाजन की राह में पहला महान कदम थी !

5 अहिंसा के सिद्धांत का दुरुपयोग – सन्दर्भ वश यह बताना भी उचित होगा कि गांधी ने अहिंसा की जो व्याख्या की वह दोषपूर्ण और आत्महत्या के समान थी, और भी दुःख की बात यह है कि उस समय के हिन्दू धर्माचार्यों ने गांधी को आड़े हाथों क्योँ नहीं लिया ? हिन्दू धर्म-शास्त्र कहते है : ‘एक आतातायी और आक्रान्ता सामने आता हो तो बिना अधिक विचारे तत्काल उसका वध कर करना चाहिए, चाहे वह गुरु, बच्चा, बूढा ब्राह्मण या कोई विशिष्ट व्यक्ति ही क्योँ न हो”, (मनु स्मृति 2/350) | आतातायी या आक्रान्ता की परिभाषा है, “घरों या अनाज के भंडारों में आग लगाने वाला, विष देने वाला, (निरपराध को), हथियार से प्रहार करने वाला, डाकू, खेती की चोरी करने वाला, स्त्री का अपहरण करने वाला ! यह छः आतातायी है”, वशिष्ठ स्मृति, (3/16) तथा मनु स्मृति, (8:350) के नीचे प्राक्षेप श्लोक 23/3 मनु स्मृति का यह भी कथन है; “अराजकता की स्थिति में, राजनैतिक उथल-पुथल के समय या अन्य कारणों से जब धार्मिक कृत्यों के परिपालन में बाधा पड़ रही हो, देश पर संकट आया हो, प्राणों का संकट हो, अपने, ब्राह्मण या स्त्री के प्राणों की रक्षा के लिए, ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को भी शस्त्र उठाने चाहिए, क्यूंकि आतातायी या हमलावर की ह्त्या करने में कोई दोष नहीं है ! (यहाँ पर शूद्र अर्थात राजकीय या निजी कर्मचारियों का उल्लेख इसलिए नहीं है क्यूंकि वे अपनी-अपनी नौकरी की शर्तों में बंधे होंगे ! नौकरी काल के आगे या पीछे उन पर भी उपरोक्त नियम लागू होगा !)

एक बार अपने भीतर के मुख्य दोष या कमियाँ दूर हो जाए और हिन्दू एक राष्ट्र के अंग के रूप में सोचने लगे और कर्मशील हो जाएँ, तो हथियारों और युद्ध की सामग्री जुटाने में कोई देर न लगेगी ! परमावश्यक यह है कि हिन्दू अपने धर्म को और राष्ट्र को अपनी लघु जाति या सम्प्रदाय से ऊपर समझें ! इस भारत देश में अनेकों पंथ व जातियां है ! इन सबकी अलग पहचान और उनके स्वार्थ राष्ट्रहित के सम्मुख गौण होने चाहिए ! यह नहीं होता तो समस्त धन, उन्नत शास्त्र या वैयक्तिक शौर्य एक संगठित शत्रु का सामना नहीं कर सकते, विशेष कर जब कि शत्रु घटिया शस्त्र होते हुए भी जिहादी भावना से अभिभूत हो !

टिप्पणीं - चिंताजनक बात यह है कि हिन्दुओं के बड़े संगठन, भी आज फिर गांधी वाली भयंकर भूलें कर रहे है ! वर्षों से वे भी मुसलमानों को रिझाने में लगे हुए है ! हिन्दुओं, हिन्दू धर्म व हिन्दू संस्कृति पर इस्लामी आक्रमणों के विरूद्ध उनकी तैयारियों के बारे में प्रश्न करने पर उत्तर मिलता है कि विश्व शक्तियां (अमेरिका आदि), आवश्यक कार्यवाही कर रही है ! हमें चिंता करने की आवश्यकता नहीं है !

राम गोपाल, डॉ. के. वी. पालीवाल की “हिन्दू जागरण क्योँ और कैसे ?” पुस्तक के कुछ अंश !


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