कॉमन सिविल कोड की दिशा में बढे कदम – संजय तिवारी

भारत में सर्वोच्च न्यायालय ने ट्रिपल तलाक को असंवैधानिक घोषित कर दिया है। इसी के साथ देश कॉमन सिविल कोड की दिशा में एक कदम आगे बढ़ गया है...

भारत में सर्वोच्च न्यायालय ने ट्रिपल तलाक को असंवैधानिक घोषित कर दिया है। इसी के साथ देश कॉमन सिविल कोड की दिशा में एक कदम आगे बढ़ गया है। देश की मुस्लिम महिलाओ ने इसका खुल कर स्वागत किया है। इस चलन के पक्ष में खड़े मौलानाओ को बहुत बड़ा झटका लगा है। भाजपा ने वर्ष 2014 के चुनाव के समय ही कॉमन सिविल कोड को लेकर स्पष्ट किया था कि संविधान की धारा 44 में समान नागरिक संहिता राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों के रूप में दर्ज की गई है। भाजपा का मानना है कि जब तक भारत में समान नागरिक संहिता को अपनाया नहीं जाता है, तब तक लैंगिक समानता कायम नहीं हो सकती है। समान नागरिक संहिता सभी महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करती है। भाजपा सर्वश्रेष्ठ परंपराओं से प्रेरित समान नागरिक संहिता बनाने को कटिबद्ध है जिसमें उन परंपराओं को आधुनिक समय की जरूरतों के मुताबिक ढाला जाएगा।अब जबकि सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिपल तलाक के अपने फैसले में संसद से क़ानून बनाने को कह दिया तब सरकार के लिए इस दिशा में कदम बढ़ाना बहुत आसान हो गया है। 

तीन तलाक के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संवैधानिक बेंच ने मंगलवार को अपना फैसला सुनाया। कोर्ट ने तीन तलाक पर 6 महीने की रोक लगा दी। साथ ही ये भी कहा कि इसे रोकने के लिए सरकार कानून बनाए। चीफ जस्टिस जेएस खेहर ने कहा, "तलाक-ए-बिद्दत संविधान के आर्टिकल 14, 15, 21 और 25 का वॉयलेशन नहीं करता। वहीं 3 जजों, जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस कुरियन जोसेफ और जस्टिस आरएफ नरीमन ने तीन तलाक को असंवैधानिक बताया। कोर्ट को ये तय करना था कि तीन तलाक महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों का हनन करता है या नहीं, यह कानूनी रूप से जायज है या नहीं और तीन तलाक इस्लाम का मूल हिस्सा है या नहीं ? इससे पहले केंद्र सरकार ने कोर्ट में कहा था कि वह तीन तलाक को जायज नहीं मानती और इसे जारी रखने के पक्ष में नहीं है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने माना था कि वह सभी काजियों को एडवायजरी जारी करेगा कि वे तीन तलाक पर न सिर्फ महिलाओं की राय लें, बल्कि उसे निकाहनामे में शामिल भी करें।

न्यायलय के इस फैसले पर पूरे देश की निगाहें लगी थीं। फैसला आते ही इस पर गंभीर बहस भी शुरू हो गयी। डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा की यह ऐतिहासिक फैसला है। आधी आबादी के लिए यह स्वतंत्रता का दिन है। देश में कॉमन सिविल कोड लागू करने की दिशा में एक सराहनीय कदम है। योगी आदित्यनाथ ने भी फैसले का स्वागत किया है। मौलाना खालिद राशिद फिरंगी महली का कहना है कि वह कोर्ट के आदेश का सम्मान करते हैं। फाइनल निर्णय का पर्सनेल लॉ बोर्ड अध्ययन करेगा। सितम्बर में भोपाल में पर्सनेल लॉ बोर्ड की बैठक होगी . उसमे इस पर विचार होगा। 

2016 में दायर हुई थी पिटीशन

फरवरी 2016 में उत्तराखंड की रहने वाली शायरा बानो (38) वो पहली महिला बनीं, जिन्होंने ट्रिपल तलाक, बहुविवाह (polygamy) और निकाह हलाला पर बैन लगाने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन दायर की। शायरा को भी उनके पति ने तीन तलाक दिया था। ट्रिपल तलाक यानी पति तीन बार ‘तलाक’ लफ्ज बोलकर अपनी पत्नी को छोड़ सकता है। निकाह हलाला यानी पहले शौहर के पास लौटने के लिए अपनाई जाने वाली एक प्रॉसेस। इसके तहत महिला को अपने पहले पति के पास लौटने से पहले किसी और से शादी करनी होती है और उसे तलाक देना होता है। सेपरेशन के वक्त को इद्दत कहते हैं। बहुविवाह यानी एक से ज्यादा पत्नियां रखना। कई मामले ऐसे भी आए, जिसमें पति ने वॉट्सऐप या मैसेज भेजकर पत्नी को तीन तलाक दे दिया।

मुस्लिम महिलाओं की ओर से 7 पिटीशन्स दायर की गई थीं। इनमें अलग से दायर की गई 5 रिट-पिटीशन भी हैं। इनमें दावा किया गया है कि तीन तलाक अनकॉन्स्टिट्यूशनल है।

भारत में तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं की स्थिति

'इंडियास्पेंड' एनजीओ के 2011 सेंसस के एनालिसिस के मुताबिक, भारत में अगर एक मुस्लिम तलाकशुदा पुरुष है तो 4 महिलाएं हैं।रिपोर्ट के मुताबिक, अगर सिखों को छोड़ दें तो अन्य कम्युनिटीज में पुरुषों की बजाय तलाकशुदा महिलाओं की तादाद ज्यादा है। मुस्लिमों में ये रेशो 79:21 (यानी 79 महिलाएं और 21 पुरुष तलाकशुदा), अन्य धर्मों में 72:28 और बौद्धों में 70:30 है। 

मामले में पक्ष कौन-कौन हैं?

केंद्र: 

इस मुद्दे को मुस्लिम महिलाओं के ह्यूमन राइट्स से जुड़ा मुद्दा बताता है। ट्रिपल तलाक का सख्त विरोध करता है।

पर्सनल लॉ बाेर्ड: 

इसे शरीयत के मुताबिक बताते हुए कहता है कि मजहबी मामलों से अदालतों को दूर रहना चाहिए।

जमीयत-ए-इस्लामी हिंद:

ये भी मजहबी मामलों में सरकार और कोर्ट की दखलन्दाजी का विरोध करता है। यानी मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के साथ खड़ा है।

मुस्लिम स्कॉलर्स:

इनका कहना है कि कुरान में एक बार में तीन तलाक कहने का जिक्र नहीं है।

बेंच ने इन 3 सवालों के जवाबों पर विचार किया

1) क्या तीन तलाक इस्लाम का अभिन्न हिस्सा है या नहीं?

2)तीन तलाक मुसलमानों के लिए प्रवर्तनीय मौलिक अधिकार है या नहीं?

3) क्या यह मुद्दे महिला के मौलिक अधिकार हैं? इस पर आदेश दे सकते हैं?

बेंच में कितने जज?

बेंच में चीफ जस्टिस जेएस खेहर, जस्टिस कुरियन जोसेफ, जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस अब्दुल नजीर शामिल हैं। इस बेंच की खासियत यह है कि इसमें हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और पारसी धर्म को मानने वाले जज शामिल हैं।

सबसे पहले कोर्ट पहुंची थीं शायरा

तीन तलाक के खिलाफ सबसे पहले 38 साल की शायरा बानो ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इस रिवाज के तहत कोई भी शख्स बेहद आसान तरीके से अपनी पत्नी को तीन तलाक बोलकर उसे छोड़ सकता है। बता दें कि शायरा को उनके पति ने टेलीग्राम से तलाकनामा भेजा था। उनके दो बच्चे हैं, लेकिन वे एक साल से उनका मुंह देखने को तरस रही हैं। फोन पर भी बात नहीं करने दी जाती।

शायरा बानो ने सुप्रीम कोर्ट में निकाह हालाला की रिवाज को भी चैलेंज किया। इसके तहत मुस्लिम महिलाओं को अपने पहले पति के साथ रहने के लिए दूसरे शख्स से दोबारा शादी करनी होती है। वे मुस्लिमों में बहुविवाह को भी गैर-कानूनी बनाने की मांग कर रही हैं।

उत्तराखंड के काशीपुर की रहने वाली शायरा की शादी 2002 में इलाहाबाद के प्रॉपर्टी डीलर रिजवान के साथ हुई थी। उनके साथ जल्द की परेशानी शुरू हो गई। उन्होंने बताया, "मेरे ससुराल वाले फोर व्हीलर की मांग करने लगे और मेरे पैरेंट्स से चार-पांच लाख रुपए कैश चाहते थे। उनकी माली हालत ऐसी नहीं थी कि यह मांग पूरी कर सकें। मेरी और भी बहनें थीं। शायरा के दो बच्चे हैं। 13 साल का बेटा और 11 साल की बेटी। शायरा का आरोप है कि शादी के बाद उसे हर दिन पीटा जाता था। रिजवान हर दिन छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा करता था। "बहुत ज्यादा बहस करना और झगड़ना उसकी आदम में शामिल था।"

छह बार करवाया अबॉर्शन

शायरा के मुताबिक, रिजवान से शादी के बाद उसे कई गर्भनिरोध (contraceptives) लेने को कहा गया, जिसकी वजह से वह काफी बीमार हो गई। रिजवान ने उसका छह बार अबॉर्शन करवाया। "पिछले साल अप्रैल में मैं अपने पैरेंट्स के घर लौट आ गई, तो मुझे लौट आने को कहा जाने लगा। अक्टूबर में मुझे टेलीग्राम के जरिए तलाकनामा भेज दिया गया।" वह एक मुफ्ती के पास गई तो उन्होंने कहा कि ट्रेलीग्राम से भेजा गया तलाक जायज है।शायरा के बच्चे रिजवान के साथ रहे हैं। वह उन्हें देखने के लिए एक साल से तरस रही है। शायरा का कहना है कि यहां तक कि उसे बच्चों से फोन पर भी बात नहीं करने दी जाती। शायरा का कहना है कि वे इस जंग में पीछे हटने वाली नहीं हैं। उनका यह कदम दूसरी महिलाअों के लिए मददगार होगा।

फरीन रहमान

जयपुर की रहने वाली 28 साल की अाफरीन रहमान एमबीए-ग्रेजुएट हैं। मेट्रीमोनियल वेबसाइट की मदद से 2014 में उनकी शादी इंदौर के वकील से हुई। अाफरीन का कहना है, "लगता था वह बेहद शरीफ और अच्छे परिवार से ताल्लुक रखने वाला शख्स है। ऐसे में पहली ही मुलाकात के बाद मैं उसके साथ शादी को राजी हो गई। अाफरीन के मुताबिक, उनकी चार बहनें हैं और उनकी शादी के लिए भाई ने 25 लाख का लोन लिया था। उन्होंने बताया, "शादी के बाद जब उन्हें पहली बार पीटा गया तो वह हैरान रह गईं। इसके बाद यह हर दिन की बात हो गई। यहां तक सास-ससुर भी मुझे पीटते थे। यह सब दहेज के लिए होता था। अाफरीन का कहना है कि उन्होंने इन जुल्मों के बारे में अपने मायके वालों को नहीं बताया, क्योंकि उन पर पहले से ही बैंक का कर्ज था। इससे वे और तनाव में आ जाते।

आखिरकार, शादी के एक साल बात उसे अगस्त 2015 में पति ने उन्हें घर से निकाल दिया। मायके वालों की गुजारिश पर नौ दिन बाद वापस ले गया, लेकिन अगले ही महीने फिर वापस भेज दिया। अक्टूबर में आफरीन की मां की बस एक्सीडेंट में मौत हो गई तो उनका पति हमदर्दी जताने के लिए कुछ दिन आया, फिर बातचीत बंद कर दी। फोन और सोशल मीडिया पर भी कोई बात नहीं करता। जनवरी में उसे स्पीड पोस्ट से एक लिफाफा आया। खोला तो देखकर दंग रह गई। यह तलाकनामा था। इसमें तलाक की वजह भी नहीं बताई गई थी। बेसहारा महसूस कर रही आफरीन भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन से जुड़ी। शायरा और दूसरी सताई हुई महिलाओं से इंस्पायर होकर उसने भी कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

जकिया रहमान और नूरजहां सैफिया नियाज

ये दोनों भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की फाउंडर हैं। 2007 में बनाए गए इस एनजीओ से अब तक 15 राज्यों की 30 हजार महिलाएं जुड़ चुकी हैं। यह संगठन मस्जिदों और मुंबई की हाजी अली दरगाह में मुस्लिम महिलाओं की एंट्री की मांग करके चर्चा में आया।

92% महिलाएं तीन तलाक के खिलाफ

इस एनजीओ ने पिछले साल देश का पहला मुस्लिम महिलाओं का सर्वे करवाया, जिसमें दावा किया गया कि देश की 92% मुस्लिम महिलाएं तीन तलाक पर रोक चाहती हैं। एनजीओ ने अपने इस कैम्पेन के पक्ष में चलाई गई ऑनलाइन पिटीशन पर 50 हजार लोगों ने दस्तखत किए थे। इनमें महिला और पुरुष दोनों शामिल थे। इस आंदोलन के तहत "शरिया अदालतों" या शरिया पर आधारित अनौपचारिक (informal) अदालतों का आयोजन भी किया जाता है। इनमें मुस्लिम महिलाएं अपनी घरेलू दिक्कतें पुरुष काजियों (इस्लामिक जजों) के सामने रखती हैं।

इशरत जहां

30 साल की इशरत जहां वेस्ट बंगाल के हावड़ा की रहने वाली हैं। उन्होंने कोर्ट में कहा है कि उनकी शादी 2001 में हुई थी। उनके बच्चे भी हैं, जिन्हें पति ने जबर्दस्त अपने पास रखा है। उन्होंने अपनी पिटीशन में बच्चों को वापस दिलाने और उसे पुलिस सुरक्षा दिलाने की मांग की। इशरत ने कहा है कि उसके पति ने दूसरी शादी कर ली है। यह भी कहा कि ट्रिपल तलाक गैरकानूनी है और मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों का हनन है।

गुलशन परवीन, अतिया साबरी

गुलशन परवीन उत्तर प्रदेश के रामपुर की और अतिया साबरी उत्तर प्रदेश के ही सहारनपुर की रहने वाली हैं। इन्होंने भी तील तलाक को कोर्ट में चैलेंज किया है। बता दें कि अतिया इस मामले में आखिरी पिटीशनर हैं। 

ऐसे हुई सुनवाई :

पहली सुनवाई:
बेंच:

"अगर हम इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि तीन तलाक मजहब से जुड़ा बुनियादी हक है तो हम उसकी कॉन्स्टिट्यूशनल वैलिडिटी पर सवाल नहीं उठाएंगे। एक बार में तीन तलाक बोलने के मामले में सुनवाई होगी, लेकिन तीन महीने के अंतराल पर बोले गए तलाक पर विचार नहीं किया जाएगा।"

पहली पिटीशन दायर करने वाली शायरा बानो के वकील:

"तीन तलाक का रिवाज इस्लाम की बुनियाद से जुड़ा नहीं है। लिहाजा, इस रिवाज को खत्म किया जा सकता है। पाकिस्तान-बांग्लादेश में भी ऐसा नहीं होता। तीन तलाक गैर-इस्लामिक है।"

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड:

- "कोई भी समझदार मुस्लिम किसी भी दिन उठकर सीधे तलाक-तलाक-तलाक नहीं कहता। यह कोई मुद्दा ही नहीं है।"

दूसरी सुनवाई:

सीनियर एडवोकेट सलमान खुर्शीद:

"एक साथ तीन तलाक कहना खुदा की नजर में गुनाह है, लेकिन पर्सनल लॉ में जायज है।" बता दें इस केस में सलमान ने एक वकील तौर पर दलीलें दी थीं।

राम जेठमलानी (आरएसएस से जुड़ी संस्था फोरम फॉर अवेयरनेस ऑन नेशनल सिक्युरिटी की ओर से दलीलें रखीं):

"तीन तलाक कुरान शरीफ के खिलाफ है, कोई भी दलील इस घिनौनी प्रथा का बचाव नहीं कर सकती। तीन तलाक महिलाओं को तलाक में बराबरी का हक नहीं देता।"

बेंच:

"जो काम खुदा की नजर में गुनाह है, क्या उसे कानूनी तौर पर जायज मान सकते हैं?"

तीसरी सुनवाई:

बेंच:

"अभी हमारे पास वक्त कम है। इसलिए ट्रिपल तलाक पर ही सुनवाई होगी। अभी हम यहां ट्रिपल तलाक के मामले में ही सुनवाई कर रहे हैं। बहुविवाह (पॉलीगैमी) और हलाला पर बाद में सुनवाई होगी। "हां, अगर तीन तलाक जैसी प्रथा को खत्म कर दिया जाता है तो किसी भी मुस्लिम पुरुष के लिए क्या तरीके मौजूद हैं?"

केंद्र:

"अगर सुप्रीम कोर्ट तीन तलाक को अमान्य या असंवैधानिक करार देते हुए खारिज कर देता है तो केंद्र सरकार नया कानून लाएगी। यह कानून मुस्लिमों में शादी और डिवोर्स को रेगुलेट करने के लिए होगा।"

चौथी सुनवाई:

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड:

"अगर राम का अयोध्या में जन्म होना आस्था का विषय हो सकता है तो तीन तलाक भी आस्था का मामला है। इस पर सवाल नहीं उठाए जाने चाहिए। "

बेंच:

"तो क्या आप कहना चाहते हैं कि हमें इस मामले में सुनवाई नहीं करनी चाहिए?"

पांचवींं सुनवाई:

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड:

"मुस्लिमों की हालत एक चिड़िया जैसी है, जिसे गोल्डन ईगल यानी बहुसंख्यक दबोचना चाहते हैं। उम्मीद है कि चिड़िया को घोंसले तक पहुंचाने के लिए कोर्ट न्याय करेगा।"

केंद्र:

"यहां तो टकराव मुस्लिम महिलाओं और पुरुषों के बीच ही है।"

बेंच:

"केंद्र ने मुस्लिमों में शादी और तलाक के लिए कानून क्यों नहीं बनाया, इसे रेगुलेट क्यों नहीं किया? आप (केंद्र) कहते हैं कि अगर कोर्ट ट्रिपल तलाक को अमान्य घोषित कर दे तो आप कानून बनाएंगे, लेकिन सरकारों ने पिछले 60 साल में कोई कानून क्यों नहीं बनाया?"

छठी सुनवाई:

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड :

"मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड काजियों को एडवायजरी जारी करेगा कि तीन तलाक पर न सिर्फ महिलाओं का मशविरा लिया जाए, बल्कि उसे निकाहनामे में भी शामिल किया जाए।"

शायरा बानो के वकील:

"इस्लाम ने कभी औरत और मर्द में भेदभाव नहीं किया। मेरी राय में तीन तलाक एक पाप है। यह मेरे और मुझे बनाने वाले (ईश्वर) के बीच में रुकावट है।"

बेंच:

"कोई चीज मजहब के हिसाब से गुनाह है तो वह किसी कम्युनिटी की रिवाज का हिस्सा कैसे बन सकती है?"

कुछ और महत्वपूर्ण तथ्य :

कई महिलाएं सुप्रीम कोर्ट में भी पिटीशन लगाकर तीन तलाक को खत्म करने की मांग कर चुकी हैं। केंद्र सरकार भी सुप्रीम कोर्ट से कह चुकी है कि यह कॉन्स्टिट्यूशन में औरत और आदमी को मिले बराबरी के हक के खिलाफ है। हालांकि, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने इस प्रैक्टिस का बचाव किया है। उसका कहना है कि किसी महिला की हत्या हो, इससे बेहतर है कि उसे तलाक दिया जाए। AIMPLB का कहना है, "धर्म में मिले हकों पर कानून की अदालत में सवाल नहीं उठाए जा सकते।

मोदी ने भी किया था तीन तलाक का विरोध

पिछले साल नरेंद्र मोदी ने भी कहा था कि वो तीन तलाक के खिलाफ हैं। उन्होंने कहा था, "मुस्लिम महिलाओं की जिंदगी को तीन तलाक से खत्म करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। इस बार लालकिले से अपने भाषण में भी प्रधानमंत्री ने ट्रिपल तलाक की चर्चा की थी। 

UP चुनाव में क्या हुआ

बीजेपी ने ट्रिपल तलाक का मुद्दा उठाया। सपा, बसपा, कांग्रेस चुप रहे। यही चुप्पी मुस्लिम महिलाओं को बीजेपी के करीब ले गई। नतीजा यह रहा कि बीजेपी को 15% मुस्लिम महिलाओं ने वोट दिए। बीजेपी ने मुस्लिम बहुल 124 सीटों (20%+मुस्लिम) में से 99 सीट जीती। 20 करोड़ आबादी वाले उत्तर प्रदेश में मुस्लिमों की तादाद 18.5% है।चुनाव के दौरान मोदी के मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा था कि UP चुनाव के बाद सरकार तीन तलाक पर बैन का फैसला ले सकती है।

फरवरी में प्रसाद ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, "सरकार उप्र चुनाव के बाद तीन तलाक पर पाबंदी लगाने का बड़ा कदम उठा सकती है।केंद्र सरकार इस सामाजिक बुराई को खत्म करने के लिए कमिटेड है। हम महिलाओं के लिए इंसाफ, बराबरी और गरिमा के 3 बिंदुओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी यह मामला उठाएंगे।इस मुद्दे का धर्म से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन इससे महिलाओं की गरिमा और उनका सम्मान जरूर जुड़ा हुआ है।सरकार आस्था का सम्मान करती है, लेकिन इबादत और सामाजिक बुराई एक साथ नहीं रह सकती।

SC ने कहा था बेहद गंभीर मामला

16 फरवरी को इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ''इश्यू बेहद गंभीर है। इससे छोड़ा नहीं जा सकता। कानूनी तौर पर विचार करने के लिए बड़ी बेंच की जरूरत होगी। बेंच ने कहा कि पार्टियां अगली सुनवाई तक अपने इश्यूज लिखित में अटॉर्नी जनरल के पास जमा करा दें, जो 15 पेज से ज्यादा ना हों। कोर्ट ने कहा कि इन मामलों पर 11 मई से संविधान के तहत 5 जजों की कॉन्स्टिट्यूशन बेंच सुनवाई करेगी। सुनवाई के दौरान केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को तलाक और निकाह हलाला जैसे मुद्दों पर सुनवाई के लिए अपने सवाल सौंपे थे। इनमें से 4 सवालों पर सुप्रीम कोर्ट ने अपनी मुहर लगा दी थी।

ये थे चार सवाल जिन पर SC ने मुहर लगाई

1.धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के तहत तीन तलाक, हलाला और बहु-विवाह की इजाजत संविधान के तहत दी जा सकती है या नहीं?

2. समानता का अधिकार, गरिमा के साथ जीने का अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार में प्राथमिकता किसे दी जाए?

3. पर्सनल लॉ को संविधान के आर्टिकल 13 के तहत कानून माना जाए या नहीं?

4.क्या तीन तलाक, निकाह हलाला और बहु-विवाह उन अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत सही है, जिस पर भारत ने भी साइन किए हैं?

वे इस्लामिक देश जहा ख़त्म हो चुका है ट्रिपल तलाक 

सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिपल तलाक यानी तीन तलाक पर अपना एतिहासिक फैसला सुना चुका है। आपको जानकर हैरानी होगी भारत जो 21वीं सदी का एक आधुनिक देश है और जहां पर महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की बात होती है, वह ट्रिपल तलाक पर पाकिस्तान, बांग्लादेश और सीरिया जैसे देशों से भी पिछड़ा था। दुनिया के 22 मुसलमान देशों ने अपने यहां पर ट्रिपल तलाक को बैन किया हुआ है। जानिए कुछ खास मुसलमान देशों के बारे में जहां पर तीन तलाक की मान्यता बिल्कुल भी नहीं है।

दुनिया का पहला देश इजिप्ट 

इजिप्ट दुनिया का पहला ऐसा देश है जिसने ट्रिपल तलाक को खत्म किया था। सन् 1929 में इजिप्ट ने कई मुसलमान जजों की राय पर ट्रिपल तलाक को खत्म किया था। इजिप्ट ने एक इस्लामिक विद्वान इब्न तामियां की 13वीं सदी में कुरान की विवेचना के आधार पर ट्रिपल तलाक को मानने से इनकार कर दिया था। इसके बाद सन् 1929 में सूडान ने भी इजिप्ट के रास्ते पर चलते हुए ट्रिपल तलाक को बैन कर दिया था। 

पाकिस्तान

पाकिस्तान ने भारत से अलग होने के नौ साल बाद यानी सन् 1956 में ही ट्रिपल तलाक को खत्म कर दिया था। यहां पर ट्रिपल तलाक के खत्म होने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। सन् 1955 में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री मोहम्मद अली बोगरा ने अपनी सेक्रेटरी से शादी कर ली थी और वह भी अपनी पत्नी को तलाक दिए बिना। इसके बाद पूरे देश में ऑल पाकिस्तान वीमेन एसोसिएशन की ओर से विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए थे। यहां से पाकिस्तान में ट्रिपल तलाक के खत्म होने पर बहस शुरू हुई। साल 1956 में सात सदस्यों वाले एक कमीशन ने ट्रिपल तलाक को खत्म कर दिया। कमीशन की ओर से फैसला दिया गया कि पत्नी को तलाक कहने से पहले पति को मैट्रीमोनियल एंड फैमिली कोर्ट से तलाक का आदेश लेना होगा। साल 1961 में इसमें बदलावा हुआ और फिर यह तय हुआ कि पति तलाक के मामले पर बनाई गई एक सरकारी संस्था के चेयरमैन को नोटिस देगा। इसके 30 दिन बाद एक यूनियन काउंसिल पति और पत्नी को 90 दिनों का समय देगी कि दोनों रजामंदी कर लें। अगर ऐसा नहीं होता है तो फिर तलाक वैध माना जाएगा। 

बांग्लादेश 

साल 1971 में पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश का जन्म हुआ। इसके बाद यहां पर शादी और तलाक के कानूनों में सुधार हुआ। बांग्लादेश ने ट्रिपल तलाक को खत्म कर दिया और यहां पर तलाक के लिए कोर्ट का फैसला मान्य माना गया। इसके अलावा यहां पर तलाक से पहले यूनियन काउंसिल के चेयरमैन को शादी खत्म करने से जुड़ा एक नोटिस देना होता है। 

इराक

सन् 1959 में इराक दुनिया का पहला अरब देश बना था जिसने शरिया कोर्ट के कानूनों को सरकारी कोर्ट के कानूनों के साथ बदल दिया। इसके साथ ही यहां पर ट्रिपल तलाक खत्म कर दिया गया। इराक के पर्सनल स्टेटस लॉ के मुताबिक 'तीन बार तलाक बोलने को सिर्फ एक ही तलाक माना जाएगा।' 1959 के इराक लॉ ऑफ पर्सनल स्टेटस के तहत पति और पत्नी दोनों को ही अलग-अलग रहने का अधिकार दिया गया है। 

श्रीलंका 

श्रीलंका में ट्रिपल तलाक का जो कानून है उसे कई विद्वानों ने एक आदर्श कानून करार दिया है। यहां पर मैरिज एंड डिवोर्स (मुस्लिम) एक्ट 1951 के तहत पत्नी से तलाक चाहने वाले पति को एक मुस्लिम जज को नोटिस देना होगा जिसमें उसकी पत्नी के रिश्तेदार, उसके घर के बड़े लोग और इलाके के प्रभावशाली मुसलमान भी शामिल होंगे। ये सभी लोग दोनों के बीच सुलह की कोशिश करेंगे। अगर ऐसा नहीं होता है तो फिर 30 दिन बाद तलाक को मान्य करार दिया जाएगा। तलाक एक मुसलमान जज और दो गवाहों के सामने होता है। 

सीरिया 

सीरिया में मुसलमान आबादी करीब 74 प्रतिशत है और यहां पर सन् 1953 में तलाक का कानून बना था। सीरिया के पर्सनल स्टेटस लॉ के आर्टिकल 92 के तहत तलाक को तीन या चाहे कितनी भी संख्या में बोला जाए लेकिन इसे एक ही तलाक माना जाएगा। यहां पर भी तलाक जज के सामने ही वैध माना जाता है। 

ट्यूनीशिया 

ट्यूनीशिया में कोई भी तलाक तब तक वैध नहीं माना जाता है जब तक कि अदालत की ओर से शादीशुदा जिंदगी में जारी तनाव को लेकर एक गहन इन्क्वॉयरी पूरी नहीं कर ली जाती। सन् 1956 में ट्यूनीशिया में यह कानून बना था। 

मलेशिया और इंडोनेशिया 

मलेशिया में डिवोर्स रिफॉर्म एक्ट 1969 के तहत कई बदलाव किए गए। यहां पर अगर किसी पति को तलाक लेना है तो फिर उसे अदालत में अपील दायर करनी होगी। इसके बाद अदालत पति को सलाह देती है कि वह तलाक की बजाय संबंध सुधारने की कोशिश करे। अगर मतभेद नहीं सुलझते हैं तो फिर पति अदालत के सामने तलाक दे सकता है। मलेशिया में अदालत के बाहर दिए गए तलाक की कोई मान्यता नहीं है। इंडोनेशिया में भी तलाक बिना कोर्ट के वैध नहीं है। इंडोनेशिया में तलाक यहां के आर्टिकल 19 के तहत कुछ वैध वजहों के आधार पर मिल सकता है। 

और कौन-कौन से देश 

इन देशों के अलावा साइप्रस, जॉर्डन, अल्जीरिया, इरान, ब्रुनेई, मोरक्को, कतर और यूएई में भी ट्रिपल तलाक को बैन किया गया है।

संजय तिवारी
संस्थापक-भारत संस्कृति न्यास,
वरिष्ठ पत्रकार 

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क्रांतिदूत: कॉमन सिविल कोड की दिशा में बढे कदम – संजय तिवारी
कॉमन सिविल कोड की दिशा में बढे कदम – संजय तिवारी
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क्रांतिदूत
http://www.krantidoot.in/2017/08/Steps-towards-Common-Civil-Code.html
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